"उच्चारण" के अवतरणों में अंतर

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उच्चारण के अंतर्गत प्रधानतया तीन बातें आती हैं :
 
*(1) ध्वनियों, विशेषतया स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद,
*(2) बलात्मक स्वराघात,
*(3) गीतात्मक स्वराघात।
 
इन्हीं के अंतर से किसी व्यक्ति या वर्ग के उच्चारण में अंतर आ जाता है। कभी-कभी ध्वनियों के उच्चारणस्थान में भी कुछ भेद पाए जाते हैं।
उच्चारण के अध्ययन का व्यावहारिक उपयोग साधारणतया तीन क्षेत्रों में किया जाता है :
 
*(1) मातृभाषा अथवा विदेशी भाषा के अध्ययन अध्यापन के लिए,
*(2) लिपिहीन भाषाओं को लिखने के निमित्त वर्णमाला निश्चित करने के लिए,
*(3) भिन्न-भिन्न भाषाओं के उच्चारण की विशेषताओं को समझने तथा उनका तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए।
 
यद्यपि संसार की भिन्न-भिन्न भाषाओं के उच्चारण में समानता का अंश अधिक पाया जाता है, तथापि साथ ही प्रत्येक भाषा के उच्चारण में कुछ विशेषताएँ भी मिलती हैं, जैसे भारतीय भाषाओं की मूर्धन्य ध्वनियाँ ट् ठ्‌ ड् आदि, फारसी अरबी की अनेक संघर्षी ध्वनियाँ जेसे ख़ ग़्ा ज़ आदि, हिंदी की बोलियों में ठेठ ब्रजभाषा के उच्चारण में अर्धविवृत स्वर ऐं, ओं, [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] में शब्दों के उच्चारण में अंत्य स्वराघात।
भाषा के लिखित रूप का प्रभाव कभी-कभी भाषा के उच्चारण पर भी पड़ता है, विशेषतया ऐसे वर्ग के उच्चारण पर जो भाषा को लिखित रूप के माध्यम से सीखता है; जैसे हिंदीभाषी "वह' को प्राय: "वो' बोलते हैं, यद्यपि लिखते "वह' हैं। लिखित रूप के प्रभाव के कारण अहिंदीभाषी सदा "वह' बोलते हैं।
 
प्रत्येक भाषा के संबंध में [[आदर्श]] उच्चारण की भावना सदा वर्तमान रही है। साधारणतया प्रत्येक भाषाप्रदेश के प्रधान राजनीतिक अथवा साहित्यिक केंद्र के शिष्ट नागरिक वर्ग का उच्चारण आदर्श माना जाता है। किंतु यह आवश्यक नहीं है कि इसका सफल अनुकरण निरंतर हो सके। यही कारण है कि प्रत्येक भाषा के उच्चारण में कम या अधिक मात्रा में अनेकरूपता रहती ही है।
 
किसी भाषा के उच्चारण का वैज्ञानिक अध्ययन करने या कराने के लिए ध्वनिविज्ञान की जानकारी आवश्यक है। [[प्रयोगात्मक ध्वनिविज्ञान]] की सहायता से उच्चारण की विशेषताओं का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण संभव हो गया है। किंतु उच्चारण के इस वैज्ञानिक विश्लेषण के कुछ ही अंशों का व्यावहारिक उपयोग संभव हो पाता है।
 
==इन्हें भी देखें==
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