"वरंगल" के अवतरणों में अंतर

Jump to navigation Jump to search
116 बैट्स् जोड़े गए ,  8 माह पहले
(Rescuing 5 sources and tagging 0 as dead.) #IABot (v2.0.1)
टैग: मोबाइल संपादन मोबाइल वेब सम्पादन
 
12वीं 13वीं शती का एक विशाल मन्दिर भी यहाँ से कुछ दूर पर है, जिसके आँगन की दीवार दुहरी तथा असाधारण रूप से स्थूल है। यह विशेषता ककातीय शैली के अनुरूप ही है। इसकी बाहरी दीवार में तीन प्रवेशद्वार हैं, जो वरंगल के क़िले के मुख्य मन्दिर के तोरणों की भाँति ही हैं। यहाँ से दो ककातीय अभिलेख प्राप्त हुए हैं–पहला सातफुट लम्बी वेदी पर और दूसरा एक तड़ाग के बाँध पर अंकित है। वरंगल पर प्रारम्भ में दक्षिण के प्रसिद्ध आन्ध्र वंशीय नरेशों का अधिकार था। तत्पश्चात् मध्यकाल में चालुक्यों और ककातीयों का शासन रहा। ककातीय वंश का सर्वप्रथम प्रतापशाली राजा गणपति था जो 1199 ई. में गद्दी पर बैठा। गणपति का राज्य गोंडवाना से काँची तक और बंगाल की खाड़ी से बीदर और हैदराबाद तक फैला हुआ था। इसी ने पहली बार वरंगल में अपनी राजधानी बनाई और यहाँ के प्रसिद्ध दुर्ग की नींव डाली। गणपति के पश्चात् उसकी पुत्री रुद्रमा देवी ने 1260 से 1296 ई. तक राज्य किया। इसी के शासन काल में इटली का प्रसिद्ध पर्यटक मार्कोपोलो मोटुपल्ली के बंदरगाह पर उतर कर आन्ध्र प्रदेश में आया था। मार्कोपोलो ने वरंगल का वर्णन करते हुए लिखा है कि यहाँ पर संसार का सबसे बारीक सूती कपड़ा (मलमल) तैयार होता है। जो मकड़ी के जाले के समान दिखाई देता है। संसार में कोई ऐसा राजा या रानी नहीं है जो इस आश्चर्यजनक कपड़े के वस्त्र पहन कर स्वयं को गौरवान्वित न माने।
 
== शासन काल ==
बीटा प्रथम
गणपति
रूद्रमादेवी
प्रताप रूद्र
 
रुद्रमादेवी ने 36 वर्ष तक बड़ी योग्यता से राज्य किया। उसे रुद्रदेव महाराज कहकर संबोधित किया जाता था। प्रतापरुद्र (शासन काल 1296-1326 ई.) रुद्रमा दोहित्र था। इसने पाण्डयनरेश को हराकर काँची को जीता। इसने छः बार मुसलमानों के आक्रमणों को विफल किया, किन्तु 1326 ई. में उलुगख़ाँ ने जो पीछे मुहम्मद बिन तुग़लक़ नाम से दिल्ली का सुल्तान हुआ, ककातीय के राज्य की समाप्ति कर दी। उसने प्रतापरुद्र को बन्दी बनाकर दिल्ली ले जाना चाहा था किन्तु मार्ग में ही नर्मदा नदी के तट पर इस स्वाभिमानी और वीर पुरुष ने अपने प्राण त्याग कर दिए। ककातीयों के शासनकाल में वरंगल में हिन्दू संस्कृति तथा संस्कृत की ओर तेलुगु भाषाओं की अभूतपूर्व उन्नति हुई। शैव धर्म के अंतर्गत पाशुपत सम्प्रदाय का यह उत्कर्षकाल था। इस समय वरंगल का दूर-दूर के देशों से व्यापार होता था।
 
बेनामी उपयोगकर्ता

दिक्चालन सूची