"भक्ति काल" के अवतरणों में अंतर

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'''भक्ति काल''' अपना एक अहम और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। [[आदिकाल]] के बाद आये इस युग को पूर्व मध्यकाल भी कहा जाता है। जिसकी समयावधि संवत् 1343ई से संवत् 1643ई तक की मानी जाती है। यह [[हिंदी साहित्य]](साहित्यिक दो प्रकार के हैं- धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य) का श्रेष्ठ युग है। जिसको [[जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन|जॉर्ज ग्रियर्सन]] ने '''स्वर्णकाल,''' श्यामसुन्दर दास ने '''स्वर्णयुग,''' [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य राम चंद्र शुक्ल]] ने '''[[भक्तिकाल के कवि|भक्ति काल]]''' एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने '''लोक जागरण''' कहा। सम्पूर्ण साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इसी में प्राप्त होती हैं।
 
दक्षिण में [[आलवार सन्त|आलवार बंधु]] नाम से कई प्रख्यात भक्त हुए हैं। इनमें से कई तथाकथित नीची जातियों के भी थे। वे बहुत पढे-लिखे नहीं थे, परंतु अनुभवी थे। आलवारों के पश्चात दक्षिण में आचार्यों की एक परंपरा चली जिसमें [[रामानुज]]ाचार्य प्रमुख थे।
दक्षिण में [[आलवार सन्त pagal
बंधु]] नाम से कई प्रख्यात भक्त हुए हैं। इनमें से कई तथाकथित नीची जातियों के भी थे। वे बहुत पढे-लिखे नहीं थे, परंतु अनुभवी थे। आलवारों के पश्चात दक्षिण में आचार्यों की एक परंपरा चली जिसमें [[रामानुज]]ाचार्य प्रमुख थे।
 
रामानुजाचार्य की परंपरा में [[स्वामी रामानन्दाचार्य|रामानंद]] हुए। उनका व्यक्तित्व असाधारण था। वे उस समय के सबसे बड़े आचार्य थे। उन्होंने भक्ति के क्षेत्र में ऊंच-नीच का भेद तोड़ दिया। सभी जातियों के अधिकारी व्यक्तियों को आपने शिष्य बनाया। उस समय का सूत्र हो गयाः

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