"चितरंजन दास" के अवतरणों में अंतर

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| birth_date = {{Birth date|df=yes|1870|11|5}}
| birth_place = तेलीरबाग, [[ढाका]], [[ब्रिटिश राज|ब्रितानी भारत]]
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| title = "''देशबन्धु''"
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|spouse = [[बसंती देवी|बसन्ती देवी]]
 
}}
 
'''देशबन्धु चितरंजनदास''' (1870-1925 ई.) सुप्रसिद्ध भारतीय नेता, राजनीतिज्ञ, वकील, कवि, पत्रकार तथा [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन]] के प्रमुख नेता थे। उन्होंने कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों के मुकद्दमे भी लड़े।
 
चितरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को [[कोलकाता]] में हुआ। उनका परिवार मूलतः [[ढाका]] के बिक्रमपुर का प्रसिद्ध परिवार था। चितरंजन दास के पिता [[भुबनमोहन दास]] [[कलकत्ता उच्च न्यायालय]] के जाने-माने वकीलों में से एक थे। वे [[बाङ्ला भाषा|बँगला]] में कविता भी करते थे। उनका परिवार वकीलों का परिवार थi
 
सन्‌ 1890 ई. में बी.ए. पास करने के बाद चितरंजन दास आइ.सी.एस्‌. होने के लिए [[इंग्लैण्ड|इंग्लैंड]] गए और सन्‌ 1892 ई. में बैरिस्टर होकर स्वदेश लौटे। शुरू में तो वकालत ठीक नहीं चली। पर कुछ समय बाद खूब चमकी और इन्होंने अपना तमादी कर्ज भी चुका दिया।
 
[[अधिवक्ता|वकालत]] में इनकी कुशलता का परिचय लोगों को सर्वप्रथम '[[वंदेमातरम्वन्दे मातरम्|वंदेमातरम्‌]]' के संपादक श्री [[अरविन्द घोष|अरविंद घोष]] पर चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे में मिला और मानसिकतला बाग षड्यंत्र के मुकदमे ने तो कलकत्ता हाईकोर्ट में इनकी धाक अच्छी तरह जमा दी। इतना ही नहीं, इस मुकदमे में उन्होंने जो निस्स्वार्थ भाव से अथक परिश्रम किया और तेजस्वितापूर्ण वकालत का परिचय दिया उसके कारण समस्त भारतवर्ष में 'राष्ट्रीय वकील' नाम से इनकी ख्याति फैल गई। इस प्रकार के मुकदमों में ये पारिश्रमिक नहीं लेते थे।
 
इन्होंने सन्‌ 1906 ई. में कांग्रेस में प्रवेश किया। सन्‌ 1917 ई. में ये बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद् के अध्यक्ष हुए। इसी समय से वे राजनीति में धड़ल्ले से भाग लेने लगे। सन्‌ 1917 ई. के कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष का पद [[एनी बेसेन्ट|श्रीमती एनी बेसंट]] को दिलाने में इनका प्रमुख हाथ था। इनकी उग्र नीति सहन न होने के कारण इसी साल श्री [[सुरेंद्रनाथ बैनर्जी|सुरेंद्रनाथ बनर्जी]] तथा उनके दल के अन्य लोग कांग्रेस छोड़कर चले गए और अलग से [[प्रागतिक परिषद्]] की स्थापना की। सन्‌ 1918 ई. की कांग्रेस में श्रीमती एनी बेसंट के विरोध के बावजूद प्रांतीय स्थानिक शासन का प्रस्ताव इन्होंने मंजूर करा लिया और [[रॉलेट एक्ट|रौलट कानून]] का जमकर विरोध किया। पंजाब कांड की जाँच के लिए नियुक्त की गई कमेटी में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। इन्होंने [[महात्मा गांधी]] के सत्याग्रह का समर्थन किया। लेकिन कलकत्ते में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। [[नागपुर]] अधिवेशन में इन्होंने उनके असहयोग के प्रस्ताव का विरोध किया। नापुर अधिवेशन में ये 250 प्रतिनिधियों का एक दल इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए ले गए थे, लेकिन अंत में इन्होंने स्वयं ही उक्त प्रस्ताव सभा के सम्मुख उपस्थित किया। कांग्रेस के निर्णय के अनुसार इन्होंने वकालत छोड़ दी और अपनी सारी सपत्ति मेडिकल कॉलेज तथा स्त्रियों के अस्पताल को दे डाली। इनके इस महान्‌ त्याग को देखकर जनता इन्हें 'देशबंधु' कहने लगी।
 
[[असहयोग आन्दोलन|असहयोग आंदोलन]] में जिन विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए थे उनके लिए इन्होंने [[ढाका]] में 'राष्ट्रीय विद्यालय' की स्थापना की। [[असम|आसाम]] के चाय बागानों के मजदूरों की दुःस्थिति ने भी कुछ समय तक इनका ध्यान आकर्षित कर रखा था।
 
सन्‌ 1921 ई. में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के लिए दस लाख स्वयंसेवक माँगे थे। उसकी पूर्ति के लिए इन्होंने प्रयत्न किया और [[खादी]] विक्रय आदि कांग्रेस के कार्यक्रम को संपन्न करना आरंभ कर दिया। आंदोलन की मजबूत होते देखकर ब्रिटिश सरकार ने इसे अवैध करार दिया। ये सपत्नीक पकड़े गए और दोनों को छह छह महीने की सजा हुई। सन्‌ 1921 ई. में अहमदाबाद कांग्रेस के ये अध्यक्ष चुने गए। लेकिन ये उस समय जेल में थे अतएव इनके प्रतिनिधि के रूप में [[हकीम अजमल खाँ]] ने अध्यक्ष का कार्यभार सँभाला। इनका अध्यक्षीय भाषण श्रीमती [[सरोजिनी नायडू]] ने पढ़कर सुनाया। ये जब छूटकर आए उस समय आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। बाहर से आंदोलन करने के बजाए इन्होंने कांउसिलों में घुसकर भीतर से अड़ंगा लगाने की नीति की घोषणा की। [[गया कांग्रेस]] में ये अध्यक्ष थे लेकिन इनका यह प्रस्ताव वहाँ स्वीकार न हो सका। अतएव इन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और [[स्वराज पार्टी|स्वराज दल]] की स्थापना की। कांग्रेस को उनकी नीति माननी पड़ी और उनका कांउसिल प्रवेश का प्रस्ताव सितंबर, 1923 ई. में दिल्ली में हुए कांग्रेस के अतिरिक्त अधिवेशन में स्वीकार हो गया।
 
प्रस्ताव के अनुसार ये काउंसिल में घुसे। इनका दल बंगाल काउंसिल में निर्विरोध चुना गया। इन्हांने मंत्रिमंडल बनाना अस्वीकार कर दिया और मंत्रियों के वेतनों को मान्यता देना नामंजूर कर मांटफोर्ड सुधारों की दुर्गति कर डाली। सन्‌ 1924-25 में इन्होंने कलकत्ता नगर महापालिका में अपने पक्ष के काफी लोग घुसाए और स्वयं मेयर हुए।
चितरंजन दास की अंतिम यात्रा कोलकाता में निकाली गई, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया। गांधी जी ने कहा, ”देशबंधु एक महान आत्मा थे। उन्होंने एक ही सपना देखा था… आजाद भारत का सपना… उनके दिल में हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई अंतर नहीं था।”
 
देशबन्धु चितरंजन दास के निधन पर विश्वकवि [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] ने लिखा-
 
:'' एनेछिले साथे करे मृत्युहीन प्रान।
:'' मरने ताहाय तुमी करे गेले दान॥
 
अपने निधन से कुछ समय पहले देशबन्धु ने अपना घर और सारी जमीन राष्ट्र के नाम कर दी। जिस घर में वे रहते थे, वहां अब [[चितरंजन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान|चितरंजन दास राष्ट्रीय कैंसर संस्थान]] है। वहीं दार्जिलिंग वाला उनका निवास अब [[मातृ एवं शिशु संरक्षण केंद्र]] के रूप में राज्य सरकार द्वारा चलाया जा रहा है। [[दिल्ली]] का प्रसिद्ध आवासीय क्षेत्र 'सीआर पार्क' का नाम भी देशबंधु चितरंजन दास के नाम पर रखा गया है और यहाँ बड़ी संख्या में बंगालियों का निवास है, जो बंटवारे के बाद भारत आ गए थे। देशभर में उनके नाम पर कई बड़े संस्थानों का नाम रखा गया है। देशबंधु कॉलेज हो या फिर चितरंजन अवेन्यू ऐसे कई संस्थान हैं, जिनका देश को एक सूत्र में पिरोने वाले देशबंधु चितरंजन दास के नाम से पहचान मिली है।
 
==चित्रदीर्घा==
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