"क्षेमेंद्र" के अवतरणों में अंतर

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'''क्षेमेन्द्र''' (जन्म लगभग 1025-1066) [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] के प्रतिभासंपन्न [[कश्मीर|काश्मीरी]] महाकवि थे। ये विद्वान ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुए थे। ये सिंधु के प्रपौत्र, निम्नाशय के पौत्र और प्रकाशेंद्र के पुत्र थे। इन्होंने प्रसिद्ध आलोचक तथा [[तंत|तन्त्]]रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् [[अभिनवगुप्त]] से [[साहित्य सिद्धान्त|साहित्यशास्त्र]] का अध्ययन किया था। इनके पुत्र [[सोमेन्द्र]] ने पिता की रचना '''बोधिसत्त्वावदानकल्पलता''' को एक नया पल्लव (कथा) जोड़कर पूरा किया था।
 
== काल ==
 
== रचना संसार ==
क्षेमेन्द्र के पूर्वपुरूष राज्य के अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। फलत: इन्होंने अपने देश की राजनीति को बड़े निकट से देखा तथा परखा। अपने युग के अशांत वातावरण से ये इतने असंतुष्ट और मर्माहत थे कि उसे सुधारने में, उसे पवित्र बनाने में तथा स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना दृढ़ करने में इन्होंने अपना जीवन लगा दिया तथा अपनी द्रुतगामिनी लेखनी को इसी की पूर्ति के निमित्त काव्य के नाना अंगों की रचना में लगाया। इनके आदर्श थे महर्षि [[वेदव्यास]] और उनके ही समान क्षेमेंद्र ने सरस, सुबोध तथा उदात्त रचनाओं से संस्कृतभारती के प्रासाद को अलंकृत किया। प्रथमत: उन्होंने प्राचीन महत्वपूर्ण महाकाव्यों के कथानकों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। '''रामायणमंजरी''', '''भारतमंजरी''' तथा '''[[बृहत्कथामञ्जरी|बृहत्कथामंजरी]]''' - ये तीनों ही क्रमश: [[रामायण]], [[महाभारत]] तथा [[बृहत्कथा]] के अत्यंत रोचक तथा सरस संक्षेप हैं। '''बोधिसत्त्वावदानकल्पलता''' में [[महात्मागौतम बुद्ध|बुद्ध]] के पूर्व जन्मों से संबद्ध पारमितासूची आख्यानों का पद्यबद्ध वर्णन है। '''दशावतारचरित''' इनका उदात्त [[महाकाव्य]] है जिसमें भगवान विष्णु से दसों अवतारों का बड़ा ही रमणीय तथा प्रांजल, सरस एवं मुंजुल काव्यात्मक वर्णन किया गया है। '''औचित्य-विचार-चर्चा''' में क्षेमेन्द्र ने [[औचित्यवाद|औचित्य]] को काव्य का मूलभूत तत्व माना है तथा उसकी प्रकृष्ट व्यापकता [[काव्य]] प्रत्येक अंग में दिखलाई है।
 
'''वात्स्यायनसूत्रसार''' नामक एक [[कामशास्त्र]] की भी इन्होने रचना की।
 
== शैली ==
क्षेमेन्द्र संस्कृत में [[कटूपहास|परिहासकथा]] (सटायर) के धनी हैं। हम नि:संदेह कह सकते हैं कि संस्कृत में इनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त सटायर लेखक नहीं है। इनकी सिद्ध लेखनी पाठकों पर चोट करना जानती है परंतु उसकी चोट मीठी होती है परिहास कथा विषयक इनकी दो अनुपम कृतियाँ हैं - '''नर्ममाला''' तथा '''देशोपदेश''' ; जिनमें उस युग का वातावरण अपने पूर्ण वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। ये विदग्धी के कवि होने के अतिरिक्त जनसाधारण के भी कवि हैं जिनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध मनोरंजन के साथ ही साथ जनता का चरित्रनिर्माण भी है। '''कलाविलास''', '''चतुर्वर्गसंग्रह''', '''[[चारुचर्या]]''', '''समयमातृका''' आदि लघु काव्य इस दिशा में इनके सफल उद्योग के समर्थ प्रमाण हैं। इनकी भाषा सरस और सुबोध है, न पांडित्य का व्यर्थ प्रदर्शन है और न शब्द का अनावश्यक चमत्कार है। भावों की उदात्त व्यंजना में तथा भाषा के सुबोध सरस विन्यास में क्षेमेंद्र सचमुच ही अपने उपनाम के सदृश व्यासदास हैं।
 
==सन्दर्भ==
85,676

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