"परमार वंश" के अवतरणों में अंतर

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== परिचय ==
परमार एक राजवंश का नाम है, जो मध्ययुग के प्रारम्भिक काल में महत्वपूर्ण हुआ। [[चारण]] कथाओं में इसका उल्लेख [[राजपूत]] जाति के एक [[गोत्र]] रूप में मिलता है। 1918 की किताब "राजपूत" जिसमे कहा गया है की परमार, पंँवार या पोवार यह मूल संस्कृत शब्द "प्रमार" के ही रूप है। इसमें लिखा है की एक समय में समस्त भारत में प्रमारो का साम्राज्य था , जिसके कारण कहावत प्रचलित हो गयी थी की "यह संसार प्रमारो का है।" इस किताब में अन्य राजपूतो का भी उल्लेख है। <ref>RAJPUTS. Compiled in the Intelligence Branch of the Quarler Master General's Deparlment in India. BY CAPTAIN A. H. BINGLEY, 71 (DUKE or CONNAUGHT'S Owx) BENGAL INFANTRY CAT.CUTTA SUPERINTENDENT GOVERNMENT PRINTING, INDIA (Reprinted 1918)</ref><ref>RAJPUTS.https://books.google.com › about.Handbook on Rajputs - A. H. Bingley - Google Books</ref>
'पृथ्वी तणा पँवार' की कहावत विक्रमादित्य और शालिवाहन जैसे विश्व विजयेता चक्रवर्ती सम्राटों के शौर्य के कारण भारतीय जनमानस में प्रचलित हुईं। परमारों को पोवार,पँवार,पवॉर,प्रमार आदि नामों से भी जाना जाता है। <ref>Hindu World. An encyclopaedia survey of Hinduism, Volume 2.p.136,671.https://books.google.com › about.The Hindu World - Google Books</ref> मरूस्थलीं राजस्थान में पोवार क्षत्रियों के नवकोट किल्ले होने का भी राजस्थान के इतिहास में उल्लेख मिलता है। <ref> The Annals and Antiquities of Rajasthan on the central and western Rajpoot states of India.James Tod. Vol.2.published by Brojendro Lall Doss.1884.</ref>
फ्रांस के पेरिस शहर से प्रकाशित सन 1854 के एक जर्नल में लिखा है कि -'पोवारों के विषय में भारत के इतिहास में वर्णित है कि विक्रमादित्य पौवार ने अपने युग में एक युग संवत् या संवत् की स्थापना की थीं । यह बात रीनाउड द्वारा उनके लिखे गए संस्मरण में भी व्यक्त की गई है। राजा भोज के विषय में वर्णित है कि मालवा साम्राज्य की राजधानी, शहर उज्जयिनी से उनके द्वारा धार शहर में स्थानांतरित किया गया। हिंदु राजा भोज का निवास स्थान धार में रहा। उनकी जाती पौवार थीं।'<ref>JOURNAL ASIATIQUE OF RECUEIL DE MÉMOIRES GINQUIEME SERIE.Vol.3.PARIS.Janvier 1854.</ref> <ref>JOURNAL ASIATIQUE vol 3.https://books.google.co.in/books?id=h39FAQAAMAAJ&source=gbs_slider_cls_metadata_9_mylibrary.</ref>
धारा नगरी बहुत समय तक पँवारों की राजधानी रही इसलिए कहाँवत पड़ गई की- 'जहाँ पँवार तहाँ धार, धार जहाँ पँवार'। <ref>Raajasthaana ke Raajavamsom kaa itihaasa.p.46. Jagdish singh Gahlot. Rajasthan sahitya Mandira.1980.</ref>
राजस्थान के इतिहास में भी पँवारों पर 'पृथ्वी तणा पँवार' एवं धारानगरी पर लोकप्रिय कहाँवते जनमानस में आज भी लोकप्रसिद्ध हैं -
 
'''पृथ्वी पुँवारा तणो अनै पृथ्वी तणे पँवार।'''
'''एका आबु गढ़ देशणों दुजी उज्जैनी धार॥'''
 
अर्थात् पृथ्वी पँवारों की है और पृथ्वी पर सर्वत्र उन्ही का अधिपत्य हैं, आबू उनका प्रसिद्ध गढ़ है तथा दुसरा उनके लिए प्रसिद्ध स्थान है धार। और इस प्रकार पृथ्वी के व्यापक भूभाग पर शालिवाहन परमार, गंधर्वसेन, मालवगणमुख्य चक्रवर्ती विक्रमादित्य आदि के काल में प्रमारो का अधिपत्य रहने के कारण ही ऐसी कहाँवतों का प्रचलन हुआ।<ref>Raajasthaana ke Raajavamsom kaa Itihaasa.p.45. Jagdish Singh Gahlot. Rajasthan sahitya mandir, 1980.Rajsthan.
India.</ref>
राजस्थान के लोकगाथाओं की मौखिक परंपरा में प्राप्त [[भरथरी]] लोकगाथा का कथानक है, जिसमें उल्लेख मिलता है कि - 'उज्जैनी के शासक पँवार वंशी भरथरी की दो राणीयाँ थीं। एक का नाम स्यामदे तथा दुसरी राणी का नाम पिंगला था।' <ref>राजस्थानी लोकगाथा का अध्ययन. कृष्ण कुमार शर्मा. राजस्थान प्रकाशन. 1972.</ref>
पँवार या प्रमार अग्निवंश के अति शक्तिशाली लोग थे। उनकी 35 शाखाएं थीं। 'पृथ्वी पँवारों की है' ऐसी कहावत यह दर्शाती है कि उनका प्रभुत्व व्यापक था। <ref>Rajputana classes.1921. Government monotype press. 1922.</ref>
मालवगणमुख्य चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य भी पोवार थे। <ref>The History of India as Told by Its Own Historians. The Mohammadan Period. The posthumous paper of H. M. Elliot. Vol.11.S.
Gupta.(India)1952.</ref>
 
परमार(पँवार) वंश कि उत्पत्ति राजस्थान के आबू पर्वत में स्थित अनल कूण्ड हुई थी तथा चन्द्रावती एव किराडू दो मुख्य राजधानीया भी राजस्थान में ही थी यही से परमार(पँवार) मालवा गये एवं उज्जैन(अवतीका) एवं धार(धारा) को अपनी राजधानी बनाया भारत वर्ष में केवल परमार(पँवार)वंश ही एक मात्र ऐसा वंश हैं जिसमें चक्रवर्ती सम्राट हुई इसलिए यह कहा जाता है कि.
'पृथ्वी तणा परमार, पृथ्वी परमारो तणी' यानी धरती की शोभा परमारो से है या इस धरती की रक्षा का दायित्व परमारो का है परमार राजा दानवीर, साहित्य व शौर्य के धनी थे। तथा वे कृपाण एवं कलम दोनों में दक्ष थे। उनका शासन भारत के बाहर, दूसरे देशों तक था। लेकिन राजा भोज के पश्चात परमार सम्राटों का पतन हो गया एवं परमारो के पतन होते ही भारत वर्ष मुसलमानों के अधिन हो गया अर्थात परमारो का इतिहास बहुत ही गौरव शाली रहा है। <ref>http://parmardiyodar.blogspot.com/</ref>
 
=== कथा ===
[[परमार सिन्धुराज]] के दरबारी कवि [[पद्मगुप्त परिमल]] ने अपनी पुस्तक 'नवसाहसांकचरित' में एक कथा का वर्णन किया है। ऋषि [[वशिष्ठ]] ने ऋषि [[विश्वामित्र]] के विरुद्ध युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिये आबु पर्वत पर यज्ञ किया। उस यज्ञ के अग्निकुंड से एक पुरुष प्रकट हुआ । दरअसल ये पुरुष वे थे जिन्होंने ऋषि वशिष्ठ को साथ देने का प्रण लिया जिनके पूर्वज अग्निवंश के क्षत्रिय थे। इस पुरुष का नाम प्रमार रखा गया, जो इस वंश का संस्थापक हुआ और उसी के नाम पर वंश का नाम पड़ा। परमार के अभिलेखों में बाद को भी इस कहानी का पुनरुल्लेख हुआ है। इससे कुछ लोग यों समझने लगे कि परमारों का मूल निवासस्थान आबू पर्वत पर था, जहाँ से वे पड़ोस के देशों में जा जाकर बस गए। किंतु इस वंश के एक प्राचीन अभिलेख से यह पता चलता है कि परमार दक्षिण के राष्ट्रकूटों के उत्तराधिकारी थे।{{citation needed}}
=== वर्तमान ===
वर्तमान में परमार वंश की एक शाखा उज्जैन के गांव नंदवासला,खाताखेडी तथा नरसिंहगढ एवं इन्दौर के गांव बेंगन्दा में निवास करते हैं।धारविया परमार तलावली में भी निवास करते हैंकालिका माता के भक्त होने के कारण ये परमार कलौता के नाम से भी जाने जाते हैं।धारविया भोजवंश परमार की एक शाखा धार जिल्हे के सरदारपुर तहसील में रहती है। इनके ईष्टदेव श्री हनुमान जी तथा कुलदेवी माँ कालिका(धार)है|ये अपने यहाँ पैदा होने वाले हर लड़के का मुंडन राजस्थान के पाली जिला के बूसी में स्थित श्री हनुमान जी के मंदिर में करते हैं। इनकी तीन शाखा और है;एक बूसी गाँव में,एक मालपुरिया राजस्थान में तथा एक निमच में निवासरत् है।11वी से 17 वी शताब्दी तक पंवारो का प्रदेशान्तर सतपुड़ा और विदर्भ में हुआ । सतपुड़ा क्षेत्र में उन्हें भोयर पंवार कहा जाता है धारा नगर से 15 वी से 17 वी सदी स्थलांतरित हुए पंवारो की करीब 72 (कुल) शाखाए बैतूल छिंदवाडा वर्धा व् अन्य जिलों में निवास करती हैं। पूर्व विदर्भ, मध्यप्रदेश के बालाघाट सिवनी क्षेत्र में धारा नगर से सन 1700 में स्थलांतरित हुए पंवारो/पोवारो की करीब 36 (कुल) शाखाए निवास करती हैं जो कि राजा भोज को अपना पूर्वज मानते हैं । संस्कृत शब्द प्रमार से अपभ्रंषित होकर परमार तथा पंवार/पोवार/भोयर पंवार शब्द प्रचलित हुए ।
 
पंवार वंश की एक शाखा जिसका प्रधान कल्याण सिंह परमार थे। इनके तेरह भाई थे।
 
कल्याण सिंह परमार, दिल्ली के तत्कालीन शासक अनंगपाल तोमर के दामाद थे। कल्याण सिंह परमार ने रोहतक ( हरियाणा) के पास कलानौर नाम का गांव बसाया था जो उन्होंने अपने नाम कल्याण सिंह के नाम पर रखा था।
 
इस वंश के लोग विक्रम संवत 1499(1442 ईसा पूर्व) में धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम हुए।
राजा कल्याण सिंह पवार की वंशज कलानौर से जये राजस्थान में जाकर बस गए।
 
विक्रम संवत 1905(1848 ईसा पूर्व)मे राजा कल्याण सिंह परमार के वंशज उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती शहर जेवर में आकर बस गये।
 
== राजा ==
[[श्रेणी:राजवंश]]
[[श्रेणी:परमार राजवंश|*]]
 
==संदर्भ==

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