"राष्ट्रवाद" के अवतरणों में अंतर

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इन दावों में सच्चाई तो है, लेकिन केवल आंशिक किस्म की। एक राजनीतिक ताकत के रूप में राष्ट्रवाद आज भी निर्णायक बना हुआ है। पूर्व में चल रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थानवादी आंदोलन, दुनिया भर में हो रही नस्ल और आव्रजन संबंधी बहस और पश्चिम का बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोॄसग) संबंधी विवाद इसका प्रमाण है। आज भी फ़िलिस्तीनियों द्वारा राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का आंदोलन जारी है। ईस्ट तिमूर इण्डोनेशिया से हाल ही में आज़ाद हो कर अलग राष्ट्र बना है।
 
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद के बोलबाले को कुछ संदिग्ध अवश्य कर दिया है, पर इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उदारतावादी और लोकतांत्रिक राज्य से गठजोड़ करके ग़रीबी और पिछड़ेपन के शिकार समाजों को आगे ले जाने में राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सभी उत्तर-औपनिवेशिक समाजों ने अपने वैकासिक लक्ष्यों को वेधने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। ख़ास तौर से भारत जैसे बहुलतामूलक समाजों को एक राजनीतिक समुदाय में विकसित करने में राष्ट्रवाद एक प्रमुख कारक रहा है।
 
== सन्दर्भ ==
 
1. ई.जे. हॉब्सबॉम (1089), नेशंस ऐंड नैशनलिज़म सिंस 1789, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज.
 
2. एस. सेठ (1995), मार्क्सिस्ट थियरी ऐंड नैशनलिस्ट पॉलिटिक्स, सेज, नयी दिल्ली.
 
3. ए. स्मिथ (1994), नैशनलिज़म : अ रीडर, खण्ड 1, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, ऑक्सफ़र्ड.
 
4. सुनलिनी कुमार (2008), ‘नैशनलिज़म’, राजीव भार्गव और अशोक आचार्य (सम्पा.), पॉलिटिकल थियरी : ऐन इंट्रोडक्शन, पियर्सन लोंगमेन, नयी दिल्ली.
 
== इन्हें भी देखें ==
== सन्दर्भ ==
{{टिप्पणीसूची}}
1. ई.जे. हॉब्सबॉम (1089), नेशंस ऐंड नैशनलिज़म सिंस 1789, केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज.
 
2. एस. सेठ (1995), मार्क्सिस्ट थियरी ऐंड नैशनलिस्ट पॉलिटिक्स, सेज, नयी दिल्ली.
 
3. ए. स्मिथ (1994), नैशनलिज़म : अ रीडर, खण्ड 1, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, ऑक्सफ़र्ड.
 
4. सुनलिनी कुमार (2008), ‘नैशनलिज़म’, राजीव भार्गव और अशोक आचार्य (सम्पा.), पॉलिटिकल थियरी : ऐन इंट्रोडक्शन, पियर्सन लोंगमेन, नयी दिल्ली.
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://www.lakesparadise.com/madhumati/show_artical.php?id=379 राष्ट्रवाद और भाषा]

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