"मैथिलीशरण गुप्त" के अवतरणों में अंतर

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: ''संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
: ''उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।
 
===गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता===
एक समुन्नत, सुगठित और सशक्त राष्ट्रीय नैतिकता से युक्त आदर्श समाज, मर्यादित एवं स्नेहसिक्त परिवार और उदात्त चरित्र वाले नर-नारी के निर्माण की दिशा में उन्होंने प्राचीन आख्यानों को अपने काव्य का वर्ण्य विषय बनाकर उनके सभी पात्रों को एक नया अभिप्राय दिया है। जयद्रथवध, साकेत, पंचवटी, सैरन्ध्री, बक संहार, यशोधरा, द्वापर, नहुष, जयभारत, हिडिम्बा, विष्णुप्रिया एवं रत्नावली आदि रचनाएं इसके उदाहरण हैं।
 
===दार्शनिकता===
[[दर्शन]] की जिज्ञासा आध्यात्मिक चिन्तन से अभिन्न होकर भी भिन्न है । मननशील आर्यसुधियों की यह एक विशिष्ट चिन्तन प्रक्रिया है और उनके तर्कपूर्ण सिद्धान्त ही दर्शन है। इस प्रकार आध्यात्मिकता यदि सामान्य चिन्तन है तो षडदर्शन ब्रह्म जीव, जगत आदि का विशिष्ट चिन्तन । अतः दार्शनिक चिन्तन भी तीन मुख्य दिशाएँ हैं - ब्रह्म - जीव - जगत। गुप्त जी का दर्शन उनके कलाकार के व्यक्तित्व पक्ष का परिणाम न होकर सामाजिक पक्ष का अभिव्यक्तिकरण है। वे बहिर्जीवन के दृष्टा और व्याख्याता कलाकार हैं, अन्तर्मुखी कलाकार नहीं। कर्मशीलता उनके दर्शन की केन्द्रस्थ भावना है। साकेत में भी वे राम के द्वारा कहलाते हैं-
 
: ''सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
: ''इस भुतल को ही स्वर्ग बनाने आया ।२२।
 
राम अपने कर्म के द्वारा इस पृथ्वी को ही स्वर्ग जैसी सुन्दर बनाना चाहते हैं। राम के वनगमन के प्रसंग पर सबके व्याकुल होने पर भी राम शान्त रहते हैं, इससे यह ज्ञान होता है कि मनुष्य जीवन में अनन्त उपेक्षित प्रसंग निर्माण होते हैं अतः उसके लिए खेद करना मूर्खता है। राम के जीवन में आनेवाली सम तथा विषम परिस्थितियों के अनुकूल राम की मनःस्थिति का सहज स्वाभाविक दिग्दर्शन करते हुए भी एक धीरोदात्त एवं आदर्श पुरुष के रूप में राम का चरित्रांकन गुप्त जी ने किया है। लक्ष्मण भी जीवन की प्रत्येक प्रतिक्रिया में लोकोपकार पर बल देते हैं। उनकी साधना 'शिवम्' की साधना है। अतः वे अत्यन्त उदारता से कहते हैं-
 
: ''मैं मनुष्यता को सुरत्व की
: ''जननी भी कह सकता हूँ
: ''किन्तु पतित को पशु कहना भी
: ''कभी नहीं सह सकता हूँ ।२३।
 
===रहस्यात्मकता एवं आध्यात्मिकता===
गुप्त जी के परिवार में [[वैष्णव]] [[भक्ति]] भाव प्रबल था। प्रतिदिन पूजा-पाठ, भजन, गीता पढ़ना आदि सब होता था। यही कारण है कि गुप्त जी के जीवन में भी यह आध्यात्मिक संस्कार बीज के रूप में पड़े हुए थे जो धीरे-धीरे अंकुरित होकर रामभक्ति के रूप में वटवृक्ष हो गया।
 
'साकेत' की भूमिका में निर्गुण परब्रह्म सगुण साकार के रूप में अवतरित होता है । आत्मश्रय प्राप्त कवि के लिए जीवन में ही मुक्ति मिल जाने से मृत्यु न तो विभीषिका रह जाती है और न उसे भय या शोक ही दे सकती है।
गुप्त जी ने ‘साकेत' में राम के प्रति अपनी भक्ति भावना प्रकट की है। ‘साकेत' में मुख्य रूप से उनका प्रयोजन [[उर्मिला]] की व्यथा को चित्रित करना था। पर साथ में ही राम की भक्ति भावना के गुण गाने में पीछे नहीं हटे। साकेत में हम जिस रामचरित के दर्शन करते हैं उसमें आधुनिकता की छाप अवश्य है, किन्तु उसकी आत्मा में राम के आधि दैविक रूप की ही झाँकी है और ‘साकेत' की मूल प्रेरणा है। जिस युग में राम के व्यक्तित्व को ऐतिहासिक महापुरुष या मर्यादा पुरुषोत्तम तक सीमित मानने का आग्रह चल रहा था गुप्त जी की वैष्णव भक्ति ने आकुल होकर पुकार की थी।
 
: ''राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?
: ''विश्व में रमे हुए नहीं सभी कही हो क्या?
: ''तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे,
: ''तुम न रमो तो मन तुम में रमा करे ।
 
'साकेत' पूजा का एक फूल है, जो आस्तिक कवि ने अपने इष्टदेव के चरणों पर चढ़ाया है। राम के चित्रांकन में गुप्त जी ने जीवन के रहस्य को उद्घाटित किया है। राम के जन्म हेतु उन्होंने कहा है-
: ''किसलिए यह खेल प्रभु ने है किया ।
: ''मनुज बनकर मानवी का पय पिया ॥
: ''भक्त वत्सलता इसी का नाम है।
: ''और वह लोकेश लीला धाम है ।१६।
 
===नारी मात्र की महत्ता का प्रतिपादन===
नारियों की दुरवस्था तथा दुःखियों दीनों और असहायों की पीड़ा ने उसके हृदय में करुणा के भाव भर दिये थे। यही कारण है कि उनके अनेक काव्य ग्रंथों में नारियों की पुनर्प्रतिष्ठा एवं पीड़ित के प्रति सहानुभूति झलकती है। नारियों की दशा को व्यक्त करती उनकी ये पंक्तियां पाठकों के हृदय में करुणा उत्पन्न करती है-
 
: ''अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
: ''आँचल में है दूध और आँखों में पानी॥
 
===पतिवियुक्ता नारी का वर्णन===
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता के विमर्श ने गुप्त जी को साकेत महाकाव्य लिखने के लिए प्रेरित किया। भारत वर्ष में गूंजे हमारी भारती की प्रार्थना करने वाले कवि कालान्तर में, विरहिणी नारियों के दुःख से द्रवित हो जाते हैं। परिवार में रहती हुई पतिवियुक्ता नारी की पीड़ा को जिस शिद्दत के साथ गुप्तजी अनुभव करते हैं और उसे जो बानगी देते हैं, वह आधुनिक साहित्य में दुर्लभ है। उनकी वियोगिनी नारी पात्रों में [[उर्मिला]] (साकेत महाकाव्य), [[यशोधरा]] (काव्य) और [[विष्णुप्रिया]] खण्डकाव्य प्रमुख है। उनका करूण विप्रलम्भ तीनों पात्रों में सर्वाधिक मर्मस्पर्शी बन पड़ा है। उनके जीवन संघर्ष, उदात्त विचार और आचरण की पवित्रता आदि मानवीय जिजीविषा और सोदेश्यता को प्रमाणित करते हैं। गुप्तजी की तीनों विरहिणी नायिकाएं विरह ताप में तपती हुई भी अपने तन-मन को भस्म नहीं होने देती वरण कुन्दन की तरह उज्ज्वल वर्णी हो जाती हैं।
 
साकेत की उर्मिला रामायण और रामचरितमानस की सर्वाधिक उपेक्षित पात्र है। इस विरहिणी नारी के जीवन वृत्त और पीड़ा की अनुभूतियों का विशद वर्णन आख्यानकारों ने नहीं किया है। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी है और अपनी चारों बहनों में वही एक मात्र ऐसी नारी है, जिसके हिस्से में चौदह वर्षों के लिए पतिवियुक्ता होनेे का दु:ख मिला है। उनकी अन्य तीनों बहनों में सीता, राम के साथ, मांडवी भरत के सान्निध्य में तथा श्रुतिकीर्ति शत्रुघ्न के संग जीवन यापन करती हैं। उर्मिला का जीवन वृत्त और उसकी विरह-वेदना सर्वप्रथम मैथिलीशरण गुप्त जी की लेखनी से साकार हुई हैं।
 
गुप्तजी ने अपने काव्य का प्रधान पात्र [[राम]] और [[सीता]] को न बनाकर [[लक्ष्मण]], [[उर्मिला]] और [[भरत]] को बनाया है। गुप्तजी ने साकेत में उर्मिला के चरित्र को जो विस्तार दिया है, वह अप्रतिम है। कवि ने उसे 'मूर्तिमति उषा', 'सुवर्ण की सजीव प्रतिमा', 'कनक लतिका', 'कल्पशिल्पी की कला' आदि कहकर उसके शारीरिक सौन्दर्य की अनुपम झांकी प्रस्तुत की है। उर्मिला प्रेम एवं विनोद से परिपूर्ण हास-परिहासमयी रमणी है।
 
मैथिलीशरण गुप्त को आचार्य [[महावीरप्रसाद द्विवेदी]] का मार्गदर्शन प्राप्त था । आचार्य द्विवेदी उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी रचनाओं में संशोधन करके अपनी पत्रिका '[[सरस्वती (पत्रिका)|सरस्वती]]' में प्रकाशित करते थे। मैथिलीशरण गुप्त की पहली [[खड़ी बोली]] की कविता 'हेमन्त' शीर्षक से सरस्वती (१९०७ ई०) में छपी थी।
 
===प्रकृति वर्णन===
गुप्त जी द्वारा रचित खण्डकाव्य [[पंचवटी]] में सहज वन्य–जीवन के प्रति गहरा अनुराग और प्रकृति के मनोहारी चित्र हैं। उनकी निम्न पंक्तियाँ आज भी कविताप्रेमियों के मानस पटल पर सजीव हैं-
: ''चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
: ''स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
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