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सलीम तृतीय [[मुस्तफ़ा तृतीय]] और महरशाह सुल्तान के बेटे थे। उनकी माँ [[जॉर्जिया]] में पैदा हुई और [[वालिदा सुल्तान]] के ओहदे संभालती हुई वे हुकूमती शालाओं के सुधार आंदोलन में शामिल थीं। सलीम तृतीय के पिता सुल्तान मुस्तफ़ा तृतीय बहुत शिक्षित थे और उनका मानना था कि साम्राज्य में सुधार आंदोलन चलाना निहायत ज़रूरी थी। शिक्षित और क़ाबिल सिपाहियों के साथ उन्होंने एक ताक़तवर सेना बनाने की कोशिश की। उन्होंने सेना पर ज़ोर दिया क्योंकि उनका डर था कि रूसी साम्राज्य की ओर से उस्मानिया पर आक्रमण हो जाएगा। रूसियों और उस्मानियों के 1774 युद्ध के दौरान [[दिल का दौरा|दिल के दौरे]] की वजह से उनकी मौत हुई। सुल्तान मुस्तफ़ा जानते थे कि सेना में सुधार लाने की निहायत ज़रूरत थी। उन्होंने नई सैन्य विधियाँ क़ायम की और उन्होंने नई समुद्री और तोपख़ाने अकादमियों की स्थापना की।
 
सुल्तान मुस्तफ़ा पर [[रहस्यवाद]] का गहरा असर रहा। उनके भविष्यवक्तों के मुताबिक़ उनके बेटे सलीम जहान पर फ़तेह करेंगे और इसकी ख़ुशी में उन्होंने सात दिनों की शानदार दावत का इंतज़ाम किया। राजमहल में ही सलीम की शिक्षा हुई। सुल्तन मुस्तफ़ा ने सलीम को अपने वलीअहद के तौर पर नियुक्त किया लेकिन मुस्तफ़ा की मौत के बाद सलीम के चाचा [[अब्दुल हमीद प्रथम]] तख़्त पर बिठाया गया था।
 
अब्दुल हमीद की मौत के बाद 7 अप्रैल 1789 को, 27 सालों से कम सालों की उम्र में सलीम तख़्त पर आसीन हुए। सलीम तृतीय [[साहित्य]] और सुलेखन के प्रेमी थे। उन्होंने कई कविताएँ रची, ख़ासकर [[क्रीमिया]] पर [[रूस]] की फ़तेह के बारे में। वे एक कवि थे और ललित कलाओं के शौक़ीन थे। सुल्तान सलीम तृतीय एक आधुनिकतावादी और सुधारवादी शासक थे।

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