"राजा": अवतरणों में अंतर

नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
14 बाइट्स जोड़े गए ,  4 वर्ष पहले
 
राजारहित इस विश्व में भयाक्रान्त प्राणियों के द्वारा आत्म रक्षार्थ इधर-उधर भ्रमण करने पर, परमात्मा ने इस संसार की रक्षा के लिए [[इन्द्र]], [[वायु]], अष्ट [[लोकपाल|लोकपालों]] की चिरन्तन शक्ति को संग्रहीत करके उन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पालक राजा की सृष्टि की।
: ''अराजके हि सर्वस्मिन् सर्वतो विद्वते भयात्। रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानसृजत् प्रभुः ॥ (शुक्रनीति - 1/71)
: ''रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानसृजत् प्रभुः ॥'' (शुक्रनीति - 1/71)
: ''इन्द्रानिलयमार्काणाभग्नेश्च वरूणस्य च । चन्द्राक्तिशयोश्चापि मात्रा निर्हत्य शाश्वतीः ॥ (शुक्रनीति - 1/72)
: ''इन्द्रानिलयमार्काणाभग्नेश्च वरूणस्य च ।
: ''इन्द्रानिलयमार्काणाभग्नेश्च वरूणस्य च । चन्द्राक्तिशयोश्चापि मात्रा निर्हत्य शाश्वतीः ॥'' (शुक्रनीति - 1/72)
 
राज्य की सप्तप्रकृतियों में राजा का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। आचार्य [[चाणक्य]] ने तो राजा को सप्ताङ्ग राज्य का मूल मानते हुए उसे राज्य ही मान लिया है।

नेविगेशन मेन्यू