"ऐतरेय आरण्यक" के अवतरणों में अंतर

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(नया पृष्ठ: '''ऐतरेय आरण्यक''' ऐतरेय ब्राह्मण का अंतिम खंड है। "ब्राह्मण" के ती...)
 
 
==रचयिता एवं रचना-काल==
इन आरण्यकों में प्रथम तीन के रचयिता [[ऋषिऐतरेय ऋषि|ऐतरेय]], चतुर्थ के [[आश्वलायन]] तथा पंचम के [[शौनक]] माने जाते हैं। ऐतरेय आरण्यक के रचनाकाल के विषय में विद्वानों में ऐकमत्य नहीं है। डाक्टर कीथ इसे [[यास्क]]रचित [[निरुक्त]] से अर्वाचीन मानकर इसका समय षष्ठ शती विक्रमपूर्व मानते हैं, परंतु वास्तव में यह निरुक्त से प्राचीनतर है। ऐतरेय ब्राह्मण की रचना करनेवाले महिदास ऐतरेय ही इस आरण्यक के प्रथम तीन अंशों के भी रचयिता हैं। फलत: ऐतरेय आरण्यक को ऐतरेय ब्राह्मण का समकालीन मानना युक्तियुक्त है। इस आरण्यक को निरुक्त से प्राचीन मानने का कारण यह है कि इसके तृतीय खंड का प्रतिपाद्य विषय, जो [[वैदिक व्याकरण]] है, प्रातिशाख्य तथा निरुक्त दोनों के तद्विषयक विवरण से नि:संदेह प्राचीन है।
 
[[श्रेणी:संस्कृत साहित्य]]

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