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वाराणसी में तीन सार्वजनिक एवं एक मानित विश्वविद्यालय हैं:
# '''[[बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय]]''' जिसकी स्थापना १९१६ में पं.[[मदन मोहन मालवीय]] ने [[एनी बेसेंट]] के सहयोग से की थी। इसका १३५०&nbsp;एकड़ (५.५&nbsp;वर्ग कि॰मी॰) में फैला परिसर [[काशी नरेश]] द्वारा दान की गई भूमि पर निर्मित है। इस विश्वविद्यालय में [[भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान]] (आई.आई.टी-बी.एच.यू) एवं आयुर्विज्ञान संस्थान विश्व के सर्वोच्च तीन एवं एशिया सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक हैं। यहां १२८ से अधिक स्वतंत्र शैक्षणिक विभाग हैं।<ref name=surfBHU>{{cite web |url=http://www.surfindia.com/travel/uttar-pradesh/banaras-hindu-university.html |title=Banaras Hindu University |accessdate=2006-08-18 |publisher=SurfIndia}}</ref>
# '''[[संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय]]:''' [[भारत के गवर्नर जनरल]] [[लॉर्ड कॉर्नवालिस]] ने इस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना १७९१ में की थी। ये वाराणसी का प्रथम महाविद्यालय था। <references/> इस महाविद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य संस्कृत प्राध्यापक जे म्योर, [[भारतीय सिविल सेवा|आई.सी.एस]] थे। इनके बाद जे.आर.बैलेन्टियन, आर.टी.एच.ग्रिफ़िथ, डॉ॰जी.थेवो, डॉ॰आर्थर वेनिस, डॉ॰गंगानाथ झा और गोपीनाथ कविराज हुए। [[भारतीय स्वतंत्रता]] उपरांत इस महाविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाकर वर्तमान नाम दिया गया।<ref>आचार्य [[बलदेव उपाध्याय]], काशी की पांडित्य परंपरा। विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी। १९८३</ref>
# '''[[महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ]]''' एक मानित राजपत्रित विश्वविद्यालय है। इसका नाम भारत के राष्ट्रपिता [[महात्मा गांधी]] के नाम पर है और यहां उनके सिद्धांतों का पालन किया जाता है।
# '''''[[केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय]]''''' [[सारनाथ]] में स्थापित एक मानित विश्वविद्यालय है। यहां परंपरागत तिब्बती पठन-पाठन को आधुनिक शिक्षा के साथ वरीयता दी जाती है।<ref name=cihts>{{cite web |url=http://www.varanasicity.com/education/tibetan-university.html |title=[[सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज]] |accessdate=१८ अगस्त २००६|publisher=वाराणसी सिटी}}</ref> [[उदय प्रताप कॉलिज]], एक स्वायत्त महाविद्यालय है जहां आधुनिक बनारस के उपनगरीय छात्रों हेतु क्रीड़ा एवं विज्ञान का केन्द्र है। वाराणसी में बहुत से निजी एवं सार्वजनिक संस्थान है, जहां हिन्दू धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था है। प्राचीन काल से ही लोग यहां दर्शन शास्त्र, संस्कृत, खगोलशास्त्र, सामाजिक ज्ञान एवं धार्मिक शिक्षा आदि के ज्ञान के लिये आते रहे हैं। भारतीय परंपरा में प्रायः वाराणसी को ''सर्वविद्या की राजधानी'' कहा गया है।<ref name=varanasicityedu>{{cite web |url=http://www.varanasicity.com/education/index.html
 
इन विश्वविद्यालयों के अलावा शहर में कई स्नातकोत्तर एवं स्नातक महाविद्यालय भी हैं, जैसे अग्रसेन डिगरी कॉलिज, हरिशचंद्र डिगरी कॉलिज, आर्य महिला डिगरी कॉलिज, एवं स्कूल ऑफ मैनेजमेंट।
==बाहरी कड़ियाँ==
 
== संस्कृति ==
[[चित्र:Varanasiganga.jpg|right|thumb|250px|वाराणसी में लाखों हिन्दू तीर्थयात्री प्रतिवर्ष आते हैं।]]
 
;'''अन्य'''
::[[आंबेर]] के [[मान सिंह]] ने '''मानसरोवर घाट''' का निर्माण करवाया था। [[दरभंगा]] के महाराजा ने '''दरभंगा घाट''' बनवाया था। गोस्वामी [[तुलसीदास]] ने '''तुलसी घाट''' पर ही हनुमान चालीसा</ref><ref>[https://shabd.in/post/85395/shiv-ki-nagri-kashi काशी : शिव की नगरी]। शब्दनगरी। १७ जुलाई २०१८। अभिगमन तिथि:८ अगस्त २०१८</ref> और रामचरितमानस की रचना की थी। बचरज घाट पर तीन जैन मंदिर बने हैं और ये जैन मतावलंबियों का प्रिय घाट रहा है। [[१७९५]] में '''नागपुर''' के भोसला परिवार ने '''भोसला घाट''' बनवाया। घाट के ऊपर [[लक्ष्मी नारायण]] का दर्शनीय मंदिर है। '''राजघाट''' का निर्माण लगभग दो सौ वर्ष पूर्व [[जयपुर]] महाराज ने कराया।
 
=== मंदिर ===
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