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लेकिन वाइगोत्स्की का कहना है कि खेल में बच्चे केवल मनमाना व्यवहार नहीं करते। ‘मम्मी-मम्मी के खेल में और ‘टीचर-टीचर’ के खेल में बच्चे अन्तर करते हैं। हर भूमिका के अनुसार भिन्न मुद्राएं, भिन्न वेषभूषा, यहां तक कि भाषा भी भिन्न होती है। खेल के आरंभिक चरणों में वे इन अन्तरों से अवगत नहीं होते, लेकिन चार वर्ष की उम्र के अधिकांश बच्चे दिखा देते हैं कि वे किसी भूमिका के निर्वाह में होने वाली ग़लतियों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होते हैं और अक्सर एक दूसरे को सुधारते भी हैं, मम्मी ब्रीफकेस लेकर चलती हैं, ’‘तुम टीचर हो तो बच्चों को बैठना पड़ेगा,’’ ‘‘टीचर किताब को ऐसे पढ़ती हैं’’ इत्यादि। बच्चे मज़ाक की तरह भूमिका के नियमों का उल्लंघन भी करते हैं। तीन वर्ष का टोबी ऊंची कुर्सी पर चढ़कर कहता है, ‘‘अब मैं डैडी हूं।’’ फिर वह ठहाका लगा कर हंसता और कहता है, "डैडी अब अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठ नहीं सकते।"
 
==विकास पर खेल का प्रभाव==
पश्चिम में हाल के अनुसंधनों का जो सारांश स्मालेनस्की और शेफात्या ने दिया है उसके संकेत के अनुसार नाटकीय खेल के विकास से संज्ञानात्मक और सामाजिक विकास के अलावा स्कूल संबध कौशलों को भी लाभ पहुँचता है। उदाहरण के लिए शाब्दिक अभिव्यक्ति, शब्द-भण्डार, समझ, अवधान की अवधि, कल्पनाशीलता, एकाग्रता, आवेश पर नियंत्रण, जिज्ञासा, समस्या-समाधान की और अधिक युक्तियां, सहयोग, सहानुभूति और सामूहिक भागीदारी इनमें शामिल हैं। वाइगोत्स्कीवादियों ने उन क्रियातंत्रों की जांच की है जिनके द्वारा खेल विकास को प्रभावित करता हैं। उदाहरण के लिए मैन्यूल के और इस्तोमिना ने देखा है कि अधिगम की अन्य गतिविधियों की अपेक्षा खेल के दौरान बच्चों के मानसिक कौशल उच्चतर स्तर पर होते हैं। वाइगोत्स्की ने इसे '''निकट विकास क्षेत्र''' (निविक्षे/ Zone of Proximal Development - ZPD ) के उच्चतर स्तर की तरह पहचाना है। [[मैन्यूल]] के ने पाया कि बाकी की अपेक्षा खेल के समय बच्चों का आत्म-नियंत्रण उच्चतर स्तर पर होता है। एक लड़के को जब खेल में निगरानी रखने का काम दिया गया तो वह जितनी देर तक ध्यान को एकाग्र रखते हुए अपनी जगह पर टिका रहा उतनी देर तक वह शिक्षक द्वारा बताए काम पर ध्यान नहीं रख पाता। [[इस्तोमिना]] ने तुलना करके देखा कि प्रयोगशाला में एक समतुल्य स्थिति की अपेक्षा बच्चे ‘किराने की दुकान’ का खेल खेलते समय कितनी चीजें याद रख पाते हैं। बच्चों को शब्दों की एक सूची याद करने के लिए दी गयी थी। खेल की नाटकीय स्थिति में, किराने की दुकान का खेल खेलते समय बच्चों को यह सूची दी गयी और प्रयोगशाला में परीक्षा की स्थिति में मैन्यूल के ने पाया कि नाटकीय खेल की स्थिति में बच्चों को ज्यादा संख्या में चीजें याद रहीं।
 
वाइगोत्स्की के अनुसार खेल विकास को तीन तरीके से प्रभावित करता है :
 
*(१) खेल बच्चे के निकट-विकास-क्षेत्र का निर्माण करता है।
 
*(२) खेल कार्य और वस्तुओं को विचार से अलग करने का काम करता है।
 
*(३) खेल आत्मनियंत्रण के विकास में सहायक होता है।
 
===निकट विकास क्षेत्र का निर्माण===
वाइगोत्स्की के अनुसार खेल बच्चे के लिए निकट-विकास-क्षेत्र का निर्माण भी करता है। खेल में बच्चा हमेशा अपनी आयु से अधिक और अपने दैनिक व्यवहार के स्तर से ऊपर उठकर बर्ताव करता है, मानो खेल के दौरान वह खुद अपने कद से हाथ भर ऊँचा हो गया हो। खेल के भीतर विकास की सारी प्रवृŸायां, मानो आतशी शीशे के फोकस में, सारभूत रूप से मौजूद रहती हैं ; मानो बच्चा अपने सामान्य स्तर से ऊपर छलांग लगाने को तत्पर हो। खेल और विकास के संबंध की तुलना शिक्षा और विकास के संबंध से की जा सकती है। खेल विकास का स्त्रोत है और निविक्षे की रचना करता है।
 
खेल की केवल विषयवस्तु ही निकट विकास क्षेत्र को परिभाषित नहीं करती है। खेलने के लिए बच्चा जिस मानसिक प्रक्रिया में संलग्न होता है वह निविक्षे की रचना करती है। बच्चा निकट विकास क्षेत्र के उच्चतर स्तर पर काम कर सके इसके लिए कल्पित स्थितियों से प्राप्त भूमिकाएं, नियम तथा प्रेरणा सहायक सिद्ध होते हैं।
 
यदि हम खेल और खेल के बाहर की स्थितियों में बच्चे के व्यवहारों की तुलना करेंगे तो हमें निकट विकास क्षेत्र (निविक्षे) के उच्चतर तथा निम्नतर स्तर दिखाई देंगे। खेल के बाहर या वास्तविक जीवन की स्थिति में, एक जनरल स्टोर में लुई एक टॉफी चाहता है। उसकी माँ मना कर देती है। वह रोने लगता है। वह अपने व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर पाता है। टॉफी की चाह के लिए उसकी प्रतिक्रिया स्वतःचलित है। वह कहता भी है, मुझसे रुलाई रुक नहीं रही है। खेल में वह अपने व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है क्योंकि वह परिवार की कल्पित स्थिति को नियंत्रित कर सकता है। वह जनरल स्टोर जाने और न रोने का नाटक कर सकता है। वह रोने और रुलाई रोक लेने का नाटक कर सकता है। वास्तविक स्थिति की अपेक्षा नाटक उसे ऐसे उच्चतर स्तर पर काम करने का अवसर दे सकता है।
 
उदाहरण के लिए पांच साल की जेसिका अपनी कक्षा में समूह के साथ दायरे में बैठने के समय दिक्कत महसूस करती है। वह अन्य बच्चों पर लदती और साथवाले बच्चे से बात करती रहती है। शिक्षक के शाब्दिक इशारों और मदद के बावजूद वह तीन मिनट से अधिक सीधी बैठ ही नहीं सकती। इसके विपरीत जब वह अपने दोस्तों के साथ स्कूल-स्कूल खेल रही होती है तब वह दायरे में बैठने वाले अभ्यास में काफी देर स्थिर बैठ लेती है। अच्छी छात्रा होने का नाटक करते समय वह ध्यान को एकाग्र करके दिलचस्पी लेने का नाटक दस मिनट तक कर सकती है। इस प्रकार खेल उसे भूमिकाएं, नियम और स्थिति प्रदान करता है जो उसके लिए उच्चतर स्तर पर ध्यान एकाग्र करना और दिलचस्पी लेना संभव बनाता है, जैसा कि वह इस अवलम्ब के बिना नहीं कर पाती।
 
यदि बच्चे को खेल का अनुभव नहीं मिलता तो हमारे विचार से उसके संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा सामाजिक विकास को हानि पहुंचेगी। वाइगोत्स्की के शिष्यों लियोन्त्येव (Dmitry Leontiev) और एलकोनिनने (Daniil El'konin) उनके इस विचार को परिष्कृत करके यह अवधारणा बनाई कि खेल एक प्रमुख गतिविधि है। उनका कहना है कि तीन से छः वर्ष के बच्चों के विकास के लिए खेल एक अत्यन्त महत्वपूर्ण गतिविधि है। इस दौर में बच्चे विभिन्न गतिविधियों से लाभ पाते हैं किन्तु, लियोन्त्येव और एलकोनिन का विश्वास था कि इस आयु के लिए खेल की भूमिका अनूठी है जिसका स्थान अन्य कोई गतिविधि नहीं ले सकती है।
 
‘‘एक आतशी शीशे के फोकस में ’’ कहने से वाइगोत्स्की का तात्पर्य था कि अधिगम की तथा अन्य गतिविधियों की अपेक्षा खेल में नई विकासमान दक्षताएं पहले प्रकट होती हैं। अतः चार साल की उम्र में बच्चे की आगामी संभावनाओं की भविष्यवाणी के लिए खेल जितना उपयुक्त है उतना अक्षर पहचानने जैसी अकादमिक गतिविधियां नहीं। चार साल के बच्चे के खेल में हम एक उच्चतर स्तर पर उसकी ध्यान, प्रतीकन और समस्या के समाधान की क्षमताओं का निरीक्षण कर सकते हैं। हम वस्तुतः आगामी कल के बच्चे को देख रहे होते हैं।
 
=== विचार को कार्य और वस्तु से अलग करना===
खेल में बच्चे बाहरी यथार्थ की अपेक्षा आन्तरिक विचार के अनुसार कार्य करते हैं। ''बच्चा एक चीज़ देखता है, पर जो देखता है उसकी तुलना में भिन्न प्रकार से व्यवहार करता है। एक स्थिति आ जाती है जब बच्चा अपने देखे हुए से स्वतंत्र होकर व्यवहार करने लगता है।''
 
चूंकि खेल में एक वस्तु को दूसरी का स्थानापन्न बनाने की आवश्यकता होती है, बच्चा, वस्तु के विचार या अर्थ को वस्तु से अलग करने की शुरूआत कर देता है। जब वह एक ब्लॉक को नाव की तरह इस्तेमाल करता है तो ‘नावपन’ का विचार वास्तविक नौका से अलग हो जाता है। जब ब्लॉक को एक नौका बनाना हो तो वह नौका की जगह ले लेता हैं। जैसे-जैसे प्रीस्कूल के बच्चे बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे इस तरह स्थानापन्न बनाने की उनकी क्षमता में लचीलापन बढ़ता जाता है। अंततः एक साधारण इशारे से या ‘मान लो’ कहने भर से वस्तुओं को प्रतीकों में बदला जा सकता है। अर्थ का वस्तु से पृथक्करण अमूर्त विचार तथा अमूर्त चिन्तन की तैयारी है। अमूर्त चिन्तन में हम वास्तविक जगत की ओर इशारा किये बिना अपने विचारों तथा अवधारणाओं का मूल्यांकन, इस्तेमाल तथा संचालन करते है। वस्तु को अवधारणा से अलग करने की यह क्रिया लेखन की ओर संक्रमण की तैयारी है, जहां शब्द अपने द्वारा सूचित वस्तु जैसा कुछ नहीं होता। अंत में व्यवहार वस्तु द्वारा संचालित नहीं रह जाता, अब वह प्रतिक्रियात्मक नहीं है। वस्तुओं का प्रयोग दूसरी अवधारणाओं को समझने के लिए उपकरण के रूप में किया जा सकता है। ब्लॉकों का प्रयोग ब्लॉकों की तरह न करके बच्चा उनका प्रयोग किसी समस्या के समाधान के लिए, जैसे गणित में सहायता सामग्री की तरह करने लगता है।
 
=== आत्म-नियंत्रण का विकास===
चूंकि खेल-विशेष की विषयवस्तु के अनुसार भूमिकाओं और नियमों का निर्वाह करना होता है अतः बच्चों के लिए अपने व्यवहार पर रोक और नियंत्रण जरूरी होता है। खेल में बच्चे मनमानी नहीं कर सकते, उन्हें स्थिति के अनुसार कार्य करना होगा। ढाई वर्ष का लुई घर-घर खेल रहा है और किसी शिशु की तरह रो रहा है। शिशु की तरह भूमिका होने में यह निहित है कि रोते हुए लुई को पिता जब पुचकारे तो वह चुप हो जाए। उसका व्यवहार चोट की प्रतिक्रिया में नहीं है। वह खेल की स्थिति से निकला है इस रुलाई में उसी समझ-बूझ की आवश्यकता है जिसका प्रयोग उच्चतर मानसिक कार्यां में किया जाता हैं अतः खेल वह संदर्भ प्रदान करता है जिसमें लुई समझे-बूझे व्यवहार का अभ्यास कर सकता है ; इससे प्रकट होता है कि वह अपने व्यवहार पर काबू पा सकता है। अन्य संदर्भों की अपेक्षा खेल में अधिक महत्वपूर्ण ढंग से नियंत्रण और समझ-बूझ की आवश्यकता होती है, अतः खेल उच्चतर मानसिक कार्यों के लिए निविक्षे का निर्माण करता है।
 
;खेल का विकास-मार्ग
वाइगोत्स्की के सभी विद्यार्थियों में से केवल एकलोनिन ने ही अपने शोध को खेल पर केन्द्रित किया। शोध के द्वारा इन्होंने बडे़ बच्चों की अधिगम की गतिविधियों के विकास और खेल के बीच संबंध दिखाने का प्रयास किया। एलकोनिन ने लियोन्त्येव की प्रमुख गतिविधियों की अवधारणा को विस्तृत किया और उन विशेषताओं को भी चिह्नित किया जो खेल को एक प्रमुख गतिविधि बनाती हैं।
 
==शिशु और खेल==
एलकोनिन के अनुसार एक से तीन वर्ष तक के छोटे बच्चों के खेल की जड़ें हस्त-संचालन और उसके द्वारा अन्य उपकरणों के प्रयोग की गतिविधियों में होती है। हस्त-प्रयोग के द्वारा बच्चे वस्तुओं की विशेषताओं की तलाश करते हैं और बने बनाएं से उनका इस्तेमाल करना सीखते हैं। इसके बाद बच्चे रोज़मर्रा इस्तेमाल की वस्तुओं का कल्पित स्थितियों में इस्तेमाल करना सीखते हैं। इस प्रकार खेल का जन्म हो जाता है। उदाहरण के लिए दो वर्ष की लीला एक चम्मच उठाती है और उससे खाने का प्रयास करती है। वह चम्मच का इस्तेमाल केवल मेज़ पर पटकने के लिए नहीं, चम्मच की तरह रूढ़ तरीके से करना सीख रही है। खेल का पहला चिह्न तब उभरता है जब अट्ठारह महीने का जॉन चम्मच से अपने भालू को खिलाता है या खुद खाने का बहाना करता है। बच्चे के द्वारा दैनिक प्रयोग की साधारण वस्तुओं की छानबीन से खेल की शुरूआत होती है।
 
व्यवहार के खेल बनने के लिए जरूरी है कि बच्चा अपने कार्य को शब्दों में एक पहचान दे। व्यवहार को हस्तप्रयोग से खेल में बदलने के लिए भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। शिक्षक बच्चे से पूछता है, अपने भालू को खाना खिलाओगे ?’’ इस तरह वह खेल की तरफ संक्रमण में उस बच्चे की मदद करता है जिसने अभी-अभी चम्मच उठाया है। बीस महीने की जोड़ी अपनी खिलौना टंक को पीछे से धकेलती और उसकी आवाज सुनती है। उसकी शिक्षिका कहती है, ‘‘अपना टंक चला कर इधर क्यों नहीं ले आती? लाकर पेटोंल भर लो। ‘‘जोड़ी सुनती है और अपने टंक को चला कर शिक्षिका के पास ले जाती है जो उसमें पेटोंल भरने का अभिनय करती हैं। शिक्षिका के साथ शब्दों और हरकतों के इस आदान-प्रदान के बिना जोड़ी केवल टंक के पहियों की आवाज और गति की छानबीन ही करती रह जाती। शिक्षिका के व्यवहार ने एक नया निविक्षे तैयार करके बच्चों के व्यवहार को हस्त-प्रयोग से आगे एक और अधिक परिष्कृत स्तर तक पहुंचा दिया।
 
इस स्तर पर बच्ची कोई और होने का बहाना कर सकती है या वस्तु को एक प्रतीकात्मक तरीके से इस्तेमाल कर सकती है। पियाजे की तरह एलकोनिन ने भी प्रतीकात्मक कार्य को एक वस्तु का दूसरी वस्तु के पर्याय के रूप में प्रयोग कह कर परिभाषित किया है। खेल का दर्जा पाने के लिए वस्तुओं की छानबीन में प्रतीकात्मक प्रस्तुति का शामिल होना आवश्यक है। जब एक बच्चा किसी वस्तु को दबाता, गिराता या मेज़ पर पटकता है तो वह वस्तु के साथ हाथों का प्रयोग कर रहा है। इसे खेल नहीं कहा जा सकता। अगर वह किसी वस्तु को बŸाख मान कर उसे मेज़ पर तैरा रहा हो और उसे डबलरोटी के टुकड़े खिला रहा हो तो वह खेल है।
 
===प्रीस्कूल और किण्डरगार्टन में खेल===
एलकोनिन के अनुसार प्रीस्कूल के आरंभिक वर्षों में खेल वस्तु की ओर उन्मुख होता है। खेल के केन्द्र में वस्तु होती है और आदान-प्रदान में खेलने वालों की भूमिकाएं गौण होती हैं। तीन साल के जोन और टोमैजो घर-घर खेलते समय एक दूसरे से यह तो कहते हैं कि ‘हम घर-घर खेल रहे हैं, लेकिन अपने परिवार के वयस्कों की भूमिकाओं का नाटक नहीं करते। व प्लेटें धोते हैं, गैस पर रखे पतीले, चमचे हिलाते हैं और एक दूसरे से ज्यादा बात नहीं करते।
 
इसकी तुलना में प्रीस्कूल और किण्डरगार्टन के बड़े बच्चों के खेल के साथ कीजिए जो अधिक समाजोन्मुख होता है। पांच वर्ष के बच्चों के लिए पतीले में चमचा चलाना और प्लेटें धोना उन जटिल भूमिकाओं के लिए एक संदर्भ बन जाता है , जिनका वे अभिनय करते हैं। उनका खेल वस्तु-केन्द्रित नहीं होता है, धोने और चमचा चलाने की क्रियाओं का संक्षेपण या केवल कथन भी हो सकता हैं। समाजोन्मुख खेल में भूमिकाएं बातचीत में तय की जाती और अधिक लम्बी अवधि तक अभिनीत की जाती है। बच्ची जो पात्र खेल रही है, वही बन जाती है। इस प्रकार का खेल चार से छः वर्ष तक के बच्चों के लिए सामान्य है लेकिन किसी न किसी रूप में प्रीस्कूल की पूरी अवधि में चलता रहता है। वाइगोत्स्कीय ढांचे में समाजोन्मुखी खेल में दूसरे बच्चों का शामिल होना अनिवार्य नहीं है। बच्चा वह खेल भी खेल सकता है जिसे ‘निर्देशक का खेल’ कहा जाता हैं निर्देशक के खेल में बच्चा अपने काल्पनिक साथियों अथवा खिलौनों के साथ खेल का निर्देशन व अभिनय करता है। रुईभरे खिलौनों और गुड़ियों को लेकर आइज़क सिम्फनी ऑर्केस्टां के संचालन का नाटक करता है। माया स्कूल-स्कूल खेलती है। एक पल वह शिक्षक होती है और दूसरे पल अपने विद्यार्थी भालू की ओर से बोलती है। कुछ पश्चिमी शोधकर्ताओं (जैसे पार्टन, 1932) के विपरीत वाइगोत्स्की एकान्त में खेले गये सभी खेलों को अपरिपक्व नहीं मानते हैं। अकेले खेलते हुए बच्चा यदि वहां अन्य लोगों के मौजूद होने का बहाना करता है तो निर्देशक का खेल कल्पित सामाजिक खेल के समकक्ष होता है। पियाजे के विपरीत वाइगोत्सकीवादी यह नहीं मानते कि सात या आठ वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते समाजोन्मुख खेल समाप्त हो जाते हैं। दस या ग्यारह साल तक के बच्चे भी इनको खेलते हैं किन्तु एक प्रमुख गतिविधि के रूप में इनका महत्व धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है। बच्चे जैसे जैसे बड़े होते हैं वैसे-वैसे वे अपने समाजोन्मुख खेलों के लिए और अधिक स्पष्ट नियम विकसित कर लेते हैं। छः साल का फ्रैंक कहता है, ‘‘यह बुरा आदमी है और बुरा आदमी हमेशा अच्छे आदमी को पकड़ने आता है।’’ मेरी जवाब देती है, ‘‘लेकिन वह पकड़ नहीं पाएगा क्योंकि अच्छे लोग ज्यादा तेज़ और उनके हवाईजहाज बेहतर होते हैं, इसलिए वे निकल जाएंगे। ‘‘बड़े होने के साथ-साथ बच्चे भूमिकाएं और कार्य (नियम) तय करने में ज्यादा समय लगाने लगते हैं और उसके बनिस्बत कथा (कल्पित स्थिति ) को अभिनीत करने में कम। वस्तुतः छः वर्ष के बच्चे कथा पर विचार-विमर्श करने में कई मिनट खर्च करते हैं और उसको अभिनीत करने में केवल कुछ सेकेण्ड।
 
=== क्रीड़ाएँ===
यह खेल का एक भिन्न प्रकार है जो पाँच वर्ष के आसपास उभरता है। यह कल्पित स्थिति वाले खेल से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें कल्पित स्थिति प्रच्छन्न रहती हैं तथा नियम प्रकट और विस्तृत रहते हैं।
 
उदाहरण के लिए शतरंज के खेल में एक काल्पनिक स्थिति रची जाती है क्यों ? क्योंकि उसमें घोड़ा, हाथी, राजा, रानी और इसी तरह सब अन्य केवल एक खास निश्चित प्रकार से ही चल सकते हैं। गोटियों के ऊपर से जाने और गोटियाँ मारने के नियम पूरी तरह से शतरंज की अपनी अवधारणाएं हैं। यद्यपि शतरंज के खेल में वास्तविक जीवन के संबंधों का कोई सीधा स्थानापन्न नहीं है लेकिन फिर भी, यह एक प्रकार की काल्पनिक स्थिति ही है।’’
 
दूसरा उदाहरण फुटबॉल का खेल है। इस खेल के खिलाड़ियों के लिए गेंद को हाथ से छूना मना है। फुटबाल इस अर्थ में एक काल्पनिक स्थिति है कि वास्तविक जीवन में वही खिलाड़ी गेंद को घुमाने के लिए हाथों का प्रयोग कर सकता है लेकिन फुटबॉल के खेल में खिलाड़ियों की सहमति से तय है कि वे अपने हाथों का प्रयोग नहीं करेंगे, उसी तरह जैसे नाटकीय खेल के पहले बच्चे तय कर लेते हैं कि वे खेल के दौरान क्या कर सकते हैं। और क्या नहीं कर सकते।
 
भूमिकाओं और नियमों के बीच सन्तुलन के स्वरूप को देखते हुए क्रीड़ाएं समाजोन्मुख खेलों से भिन्न हैं। समाजोन्मुख खेल में भूमिकाएं प्रकट हैं, नियम प्रच्छन्न। बच्चे भूमिकाओं और उनकी अपेक्षाओं पर बात करते हैं लेकिन नियमभंग से खेलभंग नहीं होता। बच्चा तयशुदा अनुक्रम से भिन्न भी कुछ कर बैठता है तो उससे खेल में गड़बड़ नहीं होती। इसके विपरीत क्रीड़ा में नियम स्पष्ट होते हैं। नियम तोड़ कर क्रीड़ा चल नहीं सकती।
 
=== क्या सभी खेल एक प्रमुख गतिविधि हैं?===
सभी खेलों को एकप्रमुख गतिविधि नहीं माना जा सकता क्योंकि हर प्रकार के खेलों में व्यवहार, विकास को प्रोत्साहित नहीं करता। आगामी अधिगम के लिए बच्चे को तैयार करने वाले खेल की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं :-
 
*(1) प्रतीकात्मक प्रस्तुति और प्रतीकात्मक कार्य
 
*(2) परस्पर गुँथी हुई जटिल अन्तर्वस्तु
 
*(3) गुँथी हुई जटिल भूमिकाएं
 
*(4) समय का विस्तारित ढांचा (अनेक-दिवसीय-अवधि)
 
तीन साल की उम्र के बच्चों में इन लक्षणों में से कुछ के उभार की शुरूआत ही होती है परन्तु किण्डरगार्टन से बाहर आने तक बच्चे में ये सारे लक्षण विकसित हो जाने चाहिए।
 
वाइगोत्सकी और एलकोनिन के अनुसार, ''विस्तारित अवधि तक जारी रहने वाला नाटक अधिक आत्मनियंत्रण, आयोजन और स्मृति की मॉंग करके बच्चे को निकट विकास क्षेत्र के उच्चतम स्तरों की ओर धकेलता है।''
 
==== प्रतीकात्मक प्रस्तुति और प्रतीकात्मक कार्य====
खेल के उच्चतर स्तर पर बच्चे वस्तुओं और कार्यां का प्रयोग किन्हीं अन्य वस्तुओं और कार्यों के स्थानापन्न की तरह प्रतीकात्मक ढंग से करते हैं। इस स्तर पर खेलने वाले बच्चे जरुरत का ठीक वही खिलौना या वस्तु न मिले तो अपना खेल बन्द नहीं कर देते। वे केवल किसी और वस्तु को स्थानापन्न की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं। यहां तक कि वे बिना किसी भौतिक स्थानापन्न के, उस वस्तु के मौजूद होने का बहाना भी करने को राजी हो सकते हैं। इस स्तर पर वे कार्यां के साथ भी प्रतीकात्मक व्यवहार करते हैं। इमारत के गिरने का खेल खेलने के लिए वे किसी ढाँचे को गिराए बिना ही इमारत को गिरा हुआ मान सकते हैं। उन्हें बस यह कहने की जरूरत है, ‘मान लो’ गिर गयी। इस तरह के आविष्कार को बढ़ावा देने वाली स्थितियां खेल को और भी प्रोत्साहित करेंगी।
 
==== गुँथी हुई जटिल विषयवस्तु ====
उच्चतर खेल में अनेक विषयवस्तु हो सकती हैं, जो आपस में गुँथ कर एक संपूर्ण इकाई बन जाती हैं । खेल के प्रवाह में बच्चे बिना किसी रुकावट के दूसरे लोगों, खिलौनों और विचारों को शामिल कर लेते हैं। असम्बद्ध सी दिखने वाली विषयवस्तुओं का एकीकरण भी वे अपनी कल्पित स्थिति में कर लेते हैं। उदाहरण के लिए एम्बुलेंस की मरम्मत का खेल खेलते समय वे अचानक किसी मिस्त्री की तबियत बिगड़ जाने का खयाल भी उसमें जोड़ सकते हैं। अब डाक्टर को बुलाना होगा या मिस्त्री को अस्पताल ले जाना होगा। इस तरह वे गैरेज की विषयवस्तु को अस्पताल की विषयवस्तु के साथ गूँथ देते हैं।
 
==== गुँथी हुई जटिल भूमिकाएँ ====
उच्चतर स्तर पर खेल में बच्चे एक ही समय में अनेक भूमिकाएँ अपना सकते हैं, उनको समन्वित कर सकते हंै। निम्नतर स्तर पर वे एक ही विषयवस्तु से जुडी ़ रूढ़ भूमिकाएँ करते हैं जैसे मम्मी की भूमिका में वे शिशु को दूध पिलाते, प्लेटें धोते हैं। खेल जब उच्चतर स्तर पर आ जाता है तो माँ काम के लिए दफ़्तर जाती है, बीमार बच्चे को लेकर अस्पताल जाती है, फिर डाक्टर बन कर बच्चे का इलाज करती है, इसके बाद रोता हुआ बच्चा भी बन जाती है और इस सबके बाद माँ की अपनी मूल भूमिका में वापस लौट आती है।
 
====संयम का विस्तारित ढाँचा====
उच्चतर स्तर पर खेल में समय के विस्तारित ढाँचे से खेल के दो पक्ष प्रकट होते हैं। एक तो यह कि बच्चा कितने समय तक खेल को चला सकता है। विभिन्न भूमिकाओं के निर्वाह को बच्चा जितने ही लम्बे समय तक बनाए रख सकता है, खेल का स्तर उतना ही उच्च होता है। दूसरे, यह कि खेल एक दिन से अधिक चलता है या नहीं। बड़े बच्चे, युद्ध या अस्पताल का वही खेल कई-कई दिनों तक लगातार खेल सकते हैं। चार साल का बच्चा भी मदद के द्वारा एक खेल को कई दिन तक खेल सकता है। आरंभिक बाल्यकाल के शिक्षक खेल को विस्तारित अवधि तक नहीं चलाते। वे खेल को अधिकतर एक दिन के लिए सीमित रखते हैं। वाइगोत्स्की और एलकोनिन, के अनुसार विस्तारित अवधि तक जारी रहने वाला नाटक अधिक आत्मनियंत्रण, आयोजन और स्मृति की माँग करके बच्चे को निविक्षे के उच्चतम स्तरों की ओर धकेलता है।
 
==खेल की समृद्धि==
शिक्षक को जब खेल में मदद करने की सलाह देते हैं तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे स्वयं बच्चों के साथ खेलें या उनके समूह का एक सदस्य बन कर खेल का संचालन करें। याद, रखें, खेल के लिये बच्चे का सक्रिय और उत्साहित होना जरूरी है। बच्चे विभिन्न कारणों से खेलते हैं। वैसा वयस्कों के साथ उनके आदान-प्रदान में नहीं होता है। एक वयस्क के साथ आदान-प्रदान बच्चे को अधीनता की भूमिका में रख देता है। शिक्षक चाहे जो भी करे, बच्चा एक बच्चा ही बना रहता है। खेल में बच्चे अनेक भूमिकाएँ अपनाते और आजमाते हैं। शिक्षक यदि खेल में कुछ ज्यादा ही अगुआई करता है तो बच्चे को कभी इस बात का मौका नहीं मिलता कि नाटक (pretend) करें।
 
इसका एक और नुकसान यह है कि शिक्षक को भी इस बात की झलक नहीं मिलेगी कि हर बच्चे के निविक्षे में क्या मौजूद है। शिक्षक के कार्यां में बच्चे के ही पक्ष को उजागर करने की प्रवृत्ति होती है। पीछे हटकर बच्चे को अपने साथियों के साथ आदान-प्रदान करते देखकर ही शिक्षक यह समझ पाएगा कि भिन्न सामाजिक संदर्भों में उसकी संभावनाएँ क्या हैं। भिन्न सामाजिक संदर्भ शिक्षक को बच्चे का वह पक्ष दिखाएंगे जिसका उसको अन्य किसी तरह से पता नहीं चल सकता है।
 
इसके बावजूद खेल की प्रक्रिया में शिक्षक की मदद की भूमिका महत्वपूर्ण है। कक्षा में खेल के स्तर पर उपयुक्त अवलम्ब प्रदान करने वाले संवेदनशील शिक्षक का बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। खेल में आधार प्रदान करने के लिए शिक्षक निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं :
 
*१. '''इस बात का ध्यान रखें कि बच्चों के पास खेल के लिए पर्याप्त समय हो।''' प्रीस्कूल और छोटे बच्चों को वस्तुओं के आदान-प्रदान के दौरान पथप्रदर्शन और सामाजिक टकराहटों के समाधान के लिए वयस्कों के आस-पास रहते हुए समय चाहिए। इस उम्र के बच्चों को प्रीस्कूल के थोडा ़ बड़े बच्चों की अपेक्षा वयस्क-पथप्रदर्शन की जरूरत अधिक होती है। शिक्षकों को खेल के लिए पर्याप्त समय का ऐसा आयोजन करना चाहिए कि वह इन्हें खेलते हुए देख सके तथा जरूरत पड़ने पर आदान-प्रदान के लिए प्रेरित कर सके।
 
समृद्ध सामाजिक खेल के लिए विषयवस्तुओं और भूमिकाओं के विकास के लिए प्रीस्कूल के बड़े बच्चों को एक ठोस समय की निश्चित अवधि की आवश्यकता होती है। उन्हें हर दिन समय चाहिए ताकि विषयवस्तु को एक दिन से दूसरे दिन तक ले जाया जा सके। खेल के लिए समय भी पर्याप्त -तीस से चालीस मिनट तक - निर्धारित होना चाहिए ताकि खेल निर्बाध रूप से चल सके।
 
किण्डरगार्टन और पहली दूसरी कक्षा में लिए खेल एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। किण्डरगार्टन के बच्चों को आम तौर से स्कूल में खेल के लिए समय नहीं दिया जाता है अतः खेल के लिए मिश्रित आयु समूहों का एक यह नकारात्मक परिणाम हो सकता है कि खेल के भीतर आदान-प्रदान के लिए किण्डरगार्टन के बच्चों का समय कम रह जाएगा। आरंभिक प्राथमिक कक्षाओं में खेल प्रतिदिन के कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हुआ करता। अपेक्षा की जाती है कि बच्चे मध्यावकाश में खेलेंगे। हमारा विश्वास है कि स्कूल के आरंभिक वर्षों में खेल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। खेल के लिए समय मध्यावकाश के अलावा निश्चित किया जाना चाहिए अथवा मध्यावकाश की अवधि को बढ़ा देना चाहिए।
 
*२. '''खेल की योजना बनाने में बच्चों की मदद कीजिए।''' खेल आरंभ होने के पहले बच्चों से पूछिए कि वे क्या करने जा रहे हैं। बच्चों को किसी विशेष योजना के अनुसार चलने की जरूरत नहीं है लेकिन विचारों को मुखर कर लेने से समझ बेहतर होती है और साझे की गतिविधि के लिए परिस्थिति की रचना को प्रोत्साहन मिलता है। खेल के आरंभ से ठीक पहले का समय योजना बनाने के लिए सबसे अच्छा समय है। कहीं-कहीं दिन शुरू करते समय योजनाकाल में दिनभर का कार्यक्रम वर्णित किया जाता है लेकिन चिं क प्रीस्कूल के अधिकांश बच्चों के पास सुविचारित (deliberate ) स्मृति नहीं होती, उनके लिए कई घण्टे पहले का तयशुदा कार्यक्रम याद रखना कठिन होता है। यदि उन्हें शुरू करने के ठीक पहले योजना की याद न दिलाई जाए तो वह योजना और कार्यन्वयन के बीच संब ध् ां नहीं जोड़ पाएंग ।े कहीं-कहीं दिन के अंत में बच्चों से दिन भर के अनुभवों का लेखा-जोखा लिखाया जाता है किन्तु यह अन्तराल भी योजना और कार्य के बीच संब ध् ां जोड न ़े के लिए पर्याप्त नहीं है। दिन के अन्त में दिनभर के कार्य अनकी स्मृति में शायद न बचे हों। यदि आपके कार्यक्रम में योजनाकाल सुबह के समय पर है तो भी खेल के ठीक पहले आपको योजना की याद बच्चों को दिलानी होगी।
 
खेल समाप्त होने के बाद बच्चों से पूछिये कि क्या कल भी वे इसे चलाएंगे और उन्हें यह सोचने को प्रेरित कीजिए कि कल के लिए क्या बचाकर रखें। अगले दिन खेल की शुरूआत के पहले पिछले दिन की योजना और गतिविधियों पर नज़र डालिये। याद रहे, योजना से चिपके रहना अपने आप में एक लक्ष्य नहीं है। यह केवल एक साधन है जो अपने काम में लगे रहने में बच्चों की मदद करता है।
 
*३. '''खेल की प्रगति पर आँख रखिए। खेलते वक्त बच्चे क्या कर रहे हैं, इस पर निगाह रखिए।''' सोचिए कि खेल के दौरान परिपक्व खेल के लक्षणों और उनके कौशलों के विकास के लिए आप क्या सुझाव दे सकते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि आपके सुझाव और उनका हस्तक्षेप कहीं ज्यादा न हो जाएं। खेल लिए, पूछिये, ‘‘ आप डॉक्टर हैं या मरीज ?’’ या, अच्छा, तो ‘‘मेरी‘‘ काम पर जा रही है?’’
 
*४. '''उपयुक्त अवलम्ब और खिलौनों का चुनाव कीजिए।''' वाइगात्स्की के अनुसार शिक्षक को खेल के स्थान पर खिलौने और बहुद्देशीय अवलम्ब जमा करके रखने चाहिए। उदाहरण के लिए रंग बिरंगे कपड़ों के कई बड़े टुकड़े राजकुमारी की एक खास पोशाक से ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं राजकुमारी को संस्कृतियों के खिलौनों का उपयोग। यदि बच्चों को ठीक अवलम्ब न मिले, तो स्वयं खिलौने बनाने के लिए उनको प्रोत्साहित कीजिए वे किसी स्थानापन्न वस्तु का उपयोग कर सकते हैं या वस्तु के मौजूद होने का नाटक कर सकते हैं।
 
*५. '''उन्हें ऐसी विषयवस्तु दीजिये जो एक दिन से दूसरे दिन तक ले जाई जा सके।''' खेल की विषयवस्तुओं को कहानियों, फील्ड-टिंप, कक्षा की गतिविधियों व बच्चों के विचारों में तलाश किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कला की कक्षा में चित्र बनाकर बच्चा चित्रकार होने का नाटक कर सकता है। आरंभ में बच्चों को भूमिकाओं और घटित हुई घटनाओं को याद करने के लिए मदद की जरूरत होती है किन्तु एक बार मदद के बाद वे अक्सर अपने आप खेल को चला ले जाते हैं।
 
*६. '''जिन बच्चों को मदद की जरूरत है, उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर सिखाइए।''' खेल के स्थान से कतराने वाले बच्चों पर निगाह रखिए। इन बच्चों को समूह के साथ जुड़ने, नये साथी को शामिल करने या नये विचारों को स्वीकार करने में मदद की जरूरत हो सकती है।
 
बच्चे के खेल के स्तर को देखिए। अगर वह मुख्यतः वस्तुओं से ही खेल रहा है तो विकास के अगले स्तर तक ले जाने के लिए अवलम्ब लाभप्रद होगा। बच्चे की मदद के लिए शिक्षक उसके खेल को किसी काल्पनिक संदर्भ से जोड़ सकता है। उदाहरण के लिए मिट्टी के केक बनाते हुए बच्चे से पूछा जा सकता है कि ये केक तुम खाने के लिए बना रहे हो या बाजार में बेचोगे? ’ कभी-कभी काल्पनिक खेल की शुरूआत के लिए बस इतना सा इशारा काफी होता है।
 
*७. '''विषयवस्तुओं को एक दूसरे के साथ गूंथने के बारे में सलाह दीजिए और करके दिखाइये।''' एक ही विषयवस्तु पर विभिन्न कहानियां पढ़कर सुनाइये। उदाहरण के लिए जूं से सम्बंधित भालू के बारे में और जंगल में रहनेवाले भालू के बारे में कहानियां सुनाकर यह दिखाया जा सकता है कि एक ही विषयवस्तु कैसे बदल जाती है। अलग-अलग दिखने वाली विषयवस्तुओं को जोड़ने के लिए आप ‘अगर यह होता’ भी खेल सकते हैं। उदाहरण के लिए मीरा स्कूल-स्कूल खेलना चाहती है और टोनी कार-कार खेलना चाहता है। शिक्षक उन्हें यह सुझाव दे सकते हैं कि अगर मीरा की कक्षा फील्ड-टिंप पर जा रही है तो टोनी उसकी मदद के लिए क्या कर सकता है।
 
*८.''' झगड़ों के समाधान के उपयुक्त तरीके गढ़िये।''' खेल में बच्चे सामाजिक झगड़ों का समाधान करना सीखते हैं। शिक्षक को यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि बच्चे इनका समाधान अकेले ही कर लेंगे। दुर्बल सामाजिक कौशल वाले बच्चों को मदद की जरूरत होती है। शिक्षक को बातचीत के ऐसे आदर्श तरीके गढ़ने होंगे जो असहमतियों को निपटाने में सहायक होंगे , जैसे कि ‘‘मुझे लगता है ....’’ , ‘‘मुझे पसन्द नहीं कि .... ’’, या फिर, ‘‘ अगर हम ..। इसकी बजाए .... ? ’’ जिन बाह्य मध्यस्थों की चर्चा यहां की गई है, उनका प्रयोग भी मददगार हो सकता है। एक शिक्षक कक्षा में एक ‘‘कलह-पिटारी’’ या ‘खटपट-झोली’ रखते हैं जिसके भीतर एक सिक्का, एक पासा, विभिन्न लम्बाईयों की तीलियाँं, एक तकली और तुकबन्दियाँ (जैसे एक आलू दो आलू, झगड़ा बन्द दोस्ती चालू) लिखे हुए कार्ड रहते हैं जिनकी मदद से बच्चे अपने झगड़े सुलझा सकते हैं।
 
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