"ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस" के अवतरणों में अंतर

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फेल की योजना महत्वाकांक्षी थी। शैक्षिक और धार्मिक कार्य सम्बन्धी योजनाओं के अलावा 1674 में उन्होंने एक ब्रॉडशीट कैलेण्डर को छापना शुरू किया जिसे ऑक्सफोर्ड अल्मानक के नाम से जाना जाता था। आरंभिक संस्करणों में ऑक्सफोर्ड के प्रतीकात्मक विचारों के दर्शन हुए लेकिन 1766 में इनसे शहर या विश्वविद्यालय के यथार्थवादी अध्ययन का मार्ग प्रशस्त हुआ।<ref> हेलेन एम. पैटर, ''दी ऑक्सफोर्ड एल्मानेक्स'' (ऑक्सफोर्ड, 1974)</ref> अल्मानक को फेल के समय से आज तक बिना किसी रूकावट के लगातार हर साल छापा जाता है।<ref> बार्कर पी. 22</ref>
 
इस काम की शुरुआत के बाद फेल ने विश्वविद्यालय की छपाई के लिए पहले औपचारिक कार्यक्रम की शुरुआत की. 1675 से इस दस्तावेज ने सैकड़ों रचनाओं की परिकल्पना की जिसमें [[यूनानी भाषा|यूनानी]] में बाइबल, कॉप्टिक गोस्पेल्स के संस्करण और चर्च फादर्स की रचनाएं, अरबी और सिरियक में पाठ्य पुस्तकें, शास्त्रीय दर्शन के व्यापक संस्करण, कविता, गणित, ढेर सारी मध्ययुगीन छात्रवृत्तियां और "अब तक प्रचलित अन्य किसी भी रचना से अधिक परिपूर्ण कीड़ों का एक इतिहास" भी शामिल है।<ref> कार्टर पी. 63</ref> हालांकि इनमें से कुछ प्रस्तावित शीर्षकों को फेल के जीवनकाल में देखा गया था लेकिन फिर भी बाइबल की छपाई उनके दिमाग में सबसे पहले था। स्क्रिप्चर का सम्पूर्ण भिन्नरूप यूनानी पाठ्य पुस्तक असंभव साबित हुआ लेकिन 1675 में ऑक्सफोर्ड ने फेल के शाब्दिक परिवर्तनों और वर्तनी के साथ आठ पृष्ठों वाले एक किंग जेम्स संस्करण को मुद्रित किया। इस काम से स्टेशनर्स कंपनी के साथ संघर्ष में वृद्धि हो गई.गई। जवाबी कार्रवाई में फेल ने तीन दुष्ट स्टेशनर्स मोसेस पिट, पीटर पार्कर और थॉमस गाई को विश्वविद्यालय के बाइबल को छापने का काम पट्टे पर दे दिया जिनकी तीक्ष्ण वाणिज्यिक प्रवृत्तियां ऑक्सफोर्ड के बाइबल व्यापार को उत्तेजित करने में काफी महत्वपूर्ण साबित हुई.<ref> बार्कर पी. 24</ref> बहरहाल उनकी भागीदारी के फलस्वरूप ऑक्सफोर्ड और स्टेशनर्स के बीच एक लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई और यह मुकदमेबाजी फेल के शेष जीवन तक चलती रही. 1686 में उनका देहांत हो गया।<ref> कार्टर चैप्टर. 8</ref>
 
== 18वीं सदी: क्लेयरेंडन भवन और ब्लैकस्टोन ==
प्रेस में आमूल परिवर्तन करने के लिए विश्वविद्यालय के कामकाज पर 1850 के रॉयल कमीशन और एक नए सचिव बार्थोलोम्यू प्राइस को लगाया गया।<ref> बार्कर पीपी. 45-7</ref> 1868 में नियुक्त होने वाले प्राइस ने पहले ही विश्वविद्यालय को सुझाव दिया था कि व्यवसाय की "चौकस अधीक्षण" के लिए एक कुशल कार्यकारी अधिकारी की जरूरत थी जिसमें अलेक्जेंडर मैकमिलन के साथ की जाने वाली सौदेबाजी भी शामिल थी जो 1863 में ऑक्सफोर्ड की छपाई के प्रकाशक बन गए और 1866 में सस्ते और प्राथमिक स्कूली पुस्तकों की क्लेयरेंडन प्रेस श्रृंखला का निर्माण करने में प्राइस की मदद की - शायद ऐसा पहली बार हुआ था जब ऑक्सफोर्ड ने क्लेयरेंडन छपाई का इस्तेमाल किया।<ref> सटक्लिफ पीपी. 19-26</ref> प्राइस के नेतृत्व में प्रेस ने अपना आधुनिक आकार लेना शुरू कर दिया. 1865 तक डेलीगेसी (प्रतिनिधित्व/नुमाइंदगी) का सर्वकालिक होना बंद हो गया और इसकी जगह पांच सर्वकालिक और पांच कनिष्ट पदों का विकास हुआ जिन्हें विश्वविद्यालय की तरफ से होने वाली नियुक्ति के माध्यम से भरा जाता था और इसके साथ ही साथ वाइस चांसलर एक पदेन डेलीगेट होता था: जो गुटबाजी के लिए एक कांचगृह था जिसकी रखवाली और नियंत्रण प्राइस ने बड़ी चतुराई से की.<ref> सटक्लिफ पीपी. 14-15</ref> विश्वविद्यालय ने अपने शेयरों को फिर से खरीद लिया क्योंकि उनके धारक या तो रिटायर हो गए थे या उनका देहांत हो गया था।<ref> बार्कर पी. 47</ref> खातों के पर्यवेक्षण का काम 1867 में नवनिर्मित वित्त समिति को दे दिया गया।<ref> सटक्लिफ पी. 27</ref> कार्य की प्रमुख नई लाइनों की शुरुआत हुई. उदाहरण के लिए, 1875 में डेलीगेटों (प्रतिनिधोयों/नुमाइंदों) ने फ्रेडरिक मैक्स मुलर के संपादकत्व के तहत ''सैक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट'' श्रृंखला को अनुमोदित किया जिससे एक व्यापक पाठकत्व को धार्मिक विचारों की एक बहुत बड़ी श्रृंखला प्राप्त हुई.<ref> सटक्लिफ पीपी. 45-6</ref>
 
प्राइस ने समान रूप से ओयूपी को इसके खुद के अधिकार में प्रकाशन की तरफ स्थानांतरित किया। 1863 में पार्कर के साथ प्रेस का रिश्ता खत्म हो गया और 1870 में कुछ बाइबल रचनाओं के लिए लन्दन में एक छोटे से जिल्दसाजीखाना को ख़रीदा गया।<ref> सटक्लिफ पीपी 16, 19. 37</ref> मैकमिलन का अनुबंध 1880 में समाप्त हो गया और उसे फिर से नवीकृत नहीं किया गया। इस समय तक, लन्दन के पैटर्नोस्टर रो में बाइबल के भण्डारण के लिए ऑक्सफोर्ड का एक गोदाम भी था और 1880 में इसके प्रबंधक हेनरी फ्राउड को विश्वविद्यालय के प्रकाशक का औपचारिक ख़िताब दिया गया। फ्राउड को पुस्तक व्यापार से न कि विश्वविद्यालय से फायदा हुआ और वे कई लोगों के लिए एक पहेली बनकर रह गए.गए। ऑक्सफोर्ड के स्टाफ मैगजीन "द क्लेयरेंडनियन" के एक मृत्युलेख के अनुसार "यहाँ ऑक्सफोर्ड में हममें से कुछ लोगों के पास ही उनका व्यक्तिगत ज्ञान था".<ref> दी क्लेयरेंडूनियन, 4, संख्या 32, 1927, पी. 47</ref> उसके बावजूद, व्यवसाय में पुस्तकों की नई लाइनों को शामिल करके, 1881 में [[नया नियम|न्यू टेस्टामेंट]] के संशोधित संस्करण के विशाल प्रकाशन की अध्यक्षता करके<ref> सटक्लिफ पीपी. 48-53</ref> और 1896 में ब्रिटेन के बाहर [[नया यॉर्क|न्यूयॉर्क]] में प्रेस का पहला कार्यालय स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर फ्राउड ओयूपी के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन गए.गए।<ref> सटक्लिफ पीपी. 89-91</ref>
 
प्राइस ने ओयूपी को रूपांतरित किया। 1884 में जब वे सचिव के पद से रिटायर हुए तब डेलीगेटों ने व्यवसाय के अंतिम शेयरों को वापस खरीद लिया.लिया।<ref> सटक्लिफ पी. 64</ref> पेपर मिल, छापेखाने, जिल्दखाना और गोदाम सहित प्रेस पर अब पूरी तरह से विश्वविद्यालय का स्वामित्व था। स्कूली किताबों और आधुनिक विद्वानों के ग्रंथों जैसे [[जेम्स क्लर्क माक्सवेल|जेम्स क्लेर्क मैक्सवेल]] के [[मैक्सवेल के समीकरण|''ए ट्रीटाइज़ ऑन इलेक्ट्रिसिटी एण्ड मैग्नेटिज्म'']] (1873) के शामिल होने से इसका उत्पादन बढ़ गया था जो [[अल्बर्ट आइंस्टीन|आइंस्टीन]] के विचार का मूल सिद्धांत साबित हुआ।<ref> बार्कर पी. 48</ref> इसकी परंपरा और कार्य की गुणवत्ता को छोड़े बिना इसे सरलतापूर्वक स्थापित करके प्राइस ने ओयूपी को एक सतर्क और आधुनिक प्रकाशक के रूप में परिवर्तित करना शुरू कर दिया. 1879 में उन्होंने प्रकाशन का काम भी अपने हाथ में ले लिया जिसके फलस्वरूप वह प्रक्रिया अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई अर्थात् विशाल परियोजना का आगमन हुआ जो ''ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' (ओईडी) बना.<ref> सटक्लिफ पीपी. 53-8</ref>
 
जेम्स मुर्रे और फिलोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा ऑक्सफोर्ड को प्रदान किया गया "न्यू इंगलिश डिक्शनरी" एक शानदार शैक्षिक और देशभक्ति का काम था। लंबी बातचीत के फलस्वरूप एक औपचारिक अनुबंध की स्थापना हुई. मुर्रे को एक रचना को सम्पादित करना था जिसमें लगभग 10 साल का समय लगने वाला था और जिसकी लागत लगभग 9000 पाउंड थी।<ref> सटक्लिफ पीपी. 56-7</ref> दोनों आंकड़े बहुत ज्यादा आशावादी लग रहे थे। यह डिक्शनरी 1884 में मुद्रित रूप में दिखाई देने लगी लेकिन पहला संस्करण मुर्रे की मौत के 13 साल बाद 1928 तक पूरा नहीं हुआ जिसकी लागत लगभग 375000 पाउंड थी।<ref> साइमन विनचेस्टर, ''दी मीनिंग ऑफ एवरीथिंग - दी स्टोरी ऑफ़ दी ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' (ऑक्सफोर्ड, 2003)</ref> यह विशाल वित्तीय बोझ और इसके निहितार्थ प्राइस के उत्तरिधिकारियों के कंधे पर आ गया।
कन्नान को अपनी नई भूमिका में सार्वजनिक बुद्धि का बहुत कम अवसर मिला था। एक अत्यधिक गुणी क्लासिस्ट के रूप में वे व्यवसाय के प्रमुख बने जो पारंपरिक दृष्टि से सफल था लेकिन अब अज्ञात इलाके में आगे बढ़ रहा था।<ref> सटक्लिफ पी. 109</ref> खुद-ब-खुद विशेषज्ञ शैक्षिक रचनाओं और अनिर्भरशील बाइबल व्यापार डिक्शनरी की बढ़ती लागत और यूनिवर्सिटी चेस्ट के लिए प्रेस के योगदानों से जुड़ी जरूरतों को पूरा न कर सका. इन मांगों को पूरा करने के लिए ओयूपी को बहुत ज्यादा राजस्व की जरूरत थी। कन्नान ने इस लक्ष्य को पाने का बीड़ा उठाया. विश्वविद्यालय की राजनीति और जड़ता को चौंकाते हुए उन्होंने फ्राउड और लन्दन कार्यालय को सम्पूर्ण व्यवसाय का वित्तीय इंजन बनाया. फ्राउड ने 1906 में वर्ल्ड्स क्लासिक्स को अधिग्रहित करते हुए ऑक्सफोर्ड को लोकप्रिय साहित्य के मार्ग पर चलाना शुरू किया। उसी वर्ष उन्होंने बच्चों के साहित्य और चिकित्सा पुस्तकों के प्रकाशन में मदद करने के लिए होडर एण्ड स्टफटन के साथ एक तथाकथित "संयुक्त उद्यम" में प्रवेश किया।<ref> सटक्लिफ पीपी. 141-8</ref> कन्नान ने फ्राउड के सहायक के रूप में अपने ऑक्सफोर्ड शागिर्द सहायक सचिव हम्फ्री एस. मिलफोर्ड को नियुक्त करके इन प्रयासों की निरंतरता को सुनिश्चित किया। 1913 में फ्राउड के रिटायर होने के बाद मिलफोर्ड प्रकाशक बने और 1945 में रिटायर होने तक आकर्षक लन्दन व्यवसाय और इसे रिपोर्ट करने वाले शाखा कार्यालयों का शासन कार्य संभाला.<ref> सटक्लिफ पीपी. 117, 140-4, 164-8</ref> प्रेस की वित्तीय स्थिति को देखते हुए कन्नान ने विद्वानों के पुस्तकों या यहां तक कि डिक्शनरी को असंभव देयताओं के रूप में महत्व प्रदान करना बंद कर दिया. उन्होंने टिप्पणी की कि "मुझे नहीं लगता कि विश्वविद्यालय हमें बर्बाद करने के लिए पर्याप्त पुस्तकों का निर्माण कर सकता है".<ref> सटक्लिफ पी. 155</ref>
 
उनके प्रयासों को छापेखाने की कुशलता से काफी मदद मिली. गेल के समय में ही होरेस हार्ट को प्रेस के नियंत्रक के पद पर नियुक्त किया गया लेकिन वे सचिव से कहीं अधिक प्रभावी साबित हुए. असाधारण ऊर्जा और व्यावसायिकता के साथ उन्होंने ऑक्सफोर्ड के मुद्रण संसाधनों में सुधार किया और उनका विस्तार किया और ऑक्सफोर्ड के प्रूफ-रीडरों के लिए पहली शैली वाली गाइड के रूप में ''हार्ट्स रूल्स'' का विकास किया। इसके बाद ये दुनिया भर के छापेखाने में मानक बन गए.गए।<ref> सटक्लिफ पीपी. 113-4</ref> इसके अलावा, उन्होंने वॉल्टन स्ट्रीट में कर्मचारियों के लिए एक सामाजिक क्लब के रूप में क्लेयरेंडन प्रेस इंस्टिट्यूट के निर्माण का सुझाव दिया. जब 1891 में यह संस्थान खुला तब प्रेस के पास इसमें शामिल होने के लिए प्रशिक्षुओं सहित 540 कर्मचारी थे।<ref> सटक्लिफ पी. 79</ref> अंत में मुद्रण में अपनी सामान्य रुचि के फलस्वरूप हार्ट ने "फेल टाइप्स" की सूची बनाई और उसके बाद 1915 में खराब सेहत की वजह से उनकी मौत से पहले उन्होंने प्रेस के लिए ट्यूडर और स्टुअर्ट प्रतिकृति खण्डों की एक श्रृंखला में उनका इस्तेमाल किया।<ref> सटक्लिफ पीपी. 124-8, 182-3</ref> तब तक ओयूपी एक संकीर्ण मुद्रक से विश्वविद्यालय के स्वामित्व वाले एक व्यापक प्रकाशन प्रतिष्ठान में बदल चुका था जिसकी अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति बढ़ती जा रही थी।
 
=== लंदन व्यवसाय ===
फ्राउड को कोई शक नहीं था कि लन्दन में प्रेस का व्यवसाय काफी हद तक बढ़ गया था और बिक्री के आरम्भ के साथ अनुबंध पर नियुक्त किया गया था। सात साल बाद विश्वविद्यालय के प्रकाशक के रूप में फ्राउड एक छाप के रूप में अपने खुद के नाम के साथ-साथ 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' का इस्तेमाल कर रहे थे। यह शैली हाल के दिनों तक कायम थी और प्रेस के लन्दन कार्यालयों से दो प्रकार के छापों की उत्पत्ति हो रही थी। 'विश्वविद्यालय के प्रकाशक' के नाम से जाने जाने वाले अंतिम व्यक्ति जॉन गिल्बर्ट न्यूटन ब्राउन थे जो अपने सहकर्मियों के बीच 'ब्रुनो' के नाम से जाने जाते थे। छापों के द्वारा गर्भित भेद सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण थे। कमीशन (उनके लेखकों द्वारा या किसी पढ़े-लिखे व्यक्तियों के समूह द्वारा भुगतान) पर लन्दन द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों की शैली पर 'हेनरी फ्राउड' या 'हम्फ्री मिलफोर्ड' की छाप थी जिस पर ओयूपी का कोई उल्लेख नहीं था मानो प्रकाशक उन्हें अपने आप जारी कर रहे थे जबकि विश्वविद्यालय के शीर्षक के अधीन प्रकाशकों द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों पर 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' की छाप थी। इन दोनों श्रेणियों को ज्यादातर लन्दन द्वारा नियंत्रित किया जाता था जबकि ऑक्सफोर्ड (व्यावहारिक दृष्टि से सचिव) क्लेयरेंडन प्रेस पुस्तकों की देखभाल करता था। कमीशन किताबों का मकसद लन्दन व्यवसाय के ऊपरी खर्चों को वित्तपोषित करने के लिए कामधेनु गाय की तरह काम करना था क्योंकि प्रेस ने इस प्रयोजन के लिए अलग से किसी संसाधन की व्यवस्था नहीं की थी। फिर भी फ्राउड विशेष रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि उनके द्वारा प्रकाशित सभी कमीशन पुस्तकों को प्रतिनिधियों का अनुमोदन प्राप्त हो. यह विद्वानों या पुराविदों के प्रेसों के लिए कोई असामान्य व्यवस्था नहीं थी।{{citation needed|date=December 2010}}
 
प्राइस ने तुरंत बाइबल के संशोधित संस्करण के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ संयुक्त रूप से निकटवर्ती प्रकाशन के लिए फ्राउड को प्रधानता दी जिसके इस हद तक एक 'बेस्टसेलर' होने की सम्भावना थी जिसे मांग के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए प्रेस के सभी संसाधनों को काम में लगाने की जरूरत पड़ती. यह 1611 के प्राधिकृत संस्करण को अधिक्रमित करते हुए सबसे पुराने मूल यूनानी और हिब्रू संस्करणों से बाइबल ग्रन्थ का एक सम्पूर्ण पुनरानुवाद था। फ्राउड की एजेंसी को ठीक समय पर संशोधित संस्करण के लिए स्थापित किया गया जिसे 17 मई 1881 को प्रकाशित किया गया और प्रकाशन से पहले और तब से एक खतरनाक दर पर इसकी एक मिलियन प्रतियों की बिक्री हुई हालांकि अत्यधिक उत्पादन की वजह से अंत में लाभ में कमी आ गई.गई।{{citation needed|date=December 2010}} हालांकि फ्राउड किसी भी तरह से एक ऑक्सफोर्ड व्यक्ति नहीं थे और ऐसा होने का कोई सामाजिक मिथ्याभिमान नहीं था लेकिन फिर भी वह एक अच्छे व्यवसायी थे जो सतर्कता और उद्यम के बीच के जादूई संतुलन को प्रभावित करने में सक्षम थे। उनके मन में बहुत पहले से ही प्रेस के विदेशी व्यापार को सबसे पहले यूरोप में और उसके बाद लगातार अमेरिका, कनाडा, भारत और अफ्रीका में उन्नत बनाने का विचार हिलोर मार रहा था। अमेरिकी शाखा के साथ-साथ [[एडिनबरा|एडिनबर्ग]], [[टोरंटो]] और [[मेलबॉर्न|मेलबोर्न]] में डिपो स्थापित करने का एकमात्र श्रेय काफी हद तक उन्हीं पर था। फ्राउड ने लेखकों से निपटने, जिल्दसाजी, वितरण और विज्ञापन सहित ओयूपी की छाप वाली किताबों के लिए अधिकांश प्रचालन तंत्रों को नियंत्रित किया और केवल संपादकीय कार्य और छपाई की देखरेख का काम ऑक्सफोर्ड द्वारा किया गया।{{citation needed|date=December 2010}}
 
फ्राउड ऑक्सफोर्ड को नियमित रूप से पैसे भेजते थे लेकिन उन्होंने निजी तौर पर महसूस किया कि इस व्यवसाय की पूंजी काफी कम थी और अगर इसे एक वाणिज्यिक आधार नहीं मिला तो यह बहुत जल्द विश्वविद्यालय के संशाधनों को खाली कर देगा. उन्हें खुद एक निर्धारित सीमा तक व्यवसाय में पैसों का निवेश करने की अधिकार था लेकिन पारिवारिक परेशानियों की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे थे। इसलिए विदेशी बिक्री में उनकी रुचि जगी क्योंकि 1880 और 1890 के दशकों तक भारत में पैसा बनाने का अवसर था जबकि यूरपीय पुस्तक बाजार मंदी की मार झेल रहा था। लेकिन प्रेस के फैसले से फ्राउड की दूरी का मतलब था कि जब तक कोई प्रतिनिधि उनकी तरफदारी नहीं करता तब तक वे इस नीति को प्रभावित करने में असमर्थ थे। फ्राउड ने अपना ज्यादातर समय प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए जनादेश के तहत काम करने में बिताया. 1905 में पेंशन के लिए आवेदन करते समय उन्होंने तत्कालीन वाइस चांसलर जे. आर. मैग्राथ को लिखा कि बाइबल वेयरहाउस के प्रबंधक के रूप में उनके सात साल के कार्यकाल में लन्दन व्यवसाय की बिक्री का औसत लगभग 20000 पाउंड और लाभ का परिमाण 1887 पाउंड प्रति वर्ष था। 1905 तक प्रकाशक के रूप में उनके प्रबंधन के तहत बिक्री का परिमाण 200000 पाउंड प्रति वर्ष पहुँच गया था और उनके 29 साल के कार्यकाल में लाभ के परिमाण का औसत 8242 प्रति वर्ष पहुँच गया था।
अपने तरीके से प्रेस की ऐतिहासिक जड़ता के प्रतिरोध के खिलाफ प्रेस को आधुनिकीकरण करने का प्रयास करने वाले प्राइस के पास जरूरत से ज्यादा काम आ गया था और 1883 तक वे अपने काम से इतने थक गए कि वे रिटायर होने की मांग करने लगे. 1882 में बेंजामिन जोवेट विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बन गए थे। प्राइस के उत्तराधिकारी की नियुक्ति में निस्संदेह भाग लेने वाले अनंत समितियों से अधीर होकर जोवेट ने प्रतिनिधियों से अनुमति प्राप्त की और अपने पूर्व छात्र सहायक फिलिप लाइटेल्टन गेल को प्रतिनिधियों का अगला सचिव बनने के लिए राजी किया। गेल प्रतिनिधियों द्वारा निंदात्मक तरीके से एक वाणिज्यिक फर्म माने जाने वाले कैसेल, पेटर एण्ड गैल्पिन नामक एक प्रकाशन फर्म में खुद के लिए एक नाम का निर्माण कर रहे थे। गेल खुद एक कुलीन व्यक्ति थे जो अपने काम से नाखुश थे जहां उन्होंने खुद को 'एक वर्ग: निम्न मध्य' के स्वाद के लिए खानपान का इंतजाम करते हुए पाया और उन्होंने ओयूपी द्वारा आकर्षित पाठकों और ग्रंथों के साथ काम करने के मौके का फायदा उठाया.
 
जोवेट ने गेल को सुनहरे अवसर प्रदान करने का वादा किया जिनमें से कुछ अवसर प्रदान करने का अधिकार उन्हें भी था। उन्होंने गेल की नियुक्ति को लंबी छुट्टी (जून से सितम्बर तक) और मार्क पैटिसन की मौत के समय में ही निर्धारित किया इसलिए संभावित विपक्षी महत्वपूर्ण बैठकों में भाग न ले सके. जोवेट को अच्छी तरह मालूम था कि गेल का विरोध क्यों किया जाएगा क्योंकि उन्होंने कभी प्रेस के लिए काम नहीं किया था और न ही वे कोई प्रतिनिधि (डेलीगेट) थे और उन्होंने शहर में वाणिज्य सम्बन्धी अपने कच्चे ज्ञान से खुद का करियर मिट्टी में मिला दिया था। उनका डर दूर हुआ। गेल ने चातुर्य की एक चिह्नित कमी के साथ तुरंत प्रेस के सम्पूर्ण आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा और अपने लिए स्थायी दुश्मनों को जन्म दे दिया. फिर भी उन्होंने फ्राउड के साथ मिलकर बहुत कुछ किया और 1898 तक प्रकाशन कार्यक्रमों और ओयूपी की पहुंच का विस्तार किया। उसके बाद प्रतिनिधियों के असहयोग की वजह से उनके सामने आने वाली असंभव कार्य परिस्थितियों में उनकी सेहत खराब हो गई.गई। उसके बाद प्रतिनिधियों ने उनकी सेवा की समाप्ति का एक नोटिस भेजा जो उनके अनुबंध का उल्लंघन था। हालांकि उन्हें मुकदमा नहीं करने और चुपचाप चले जाने के लिए राजी किया गया।<ref> रिमी बी. चटर्जी के अध्याय दो को देखें, ''एम्पायर ऑफ दी माइंड: ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इन इंडिया ड्यूरिंग दी राज'' (न्यू डेल्ही: ओयूपी 2006), गेल को हटाने की सम्पूर्ण कहानी के लिए.</ref>
 
शुरू में प्रतिनिधिगण उनके प्रयासों के विरोधी नहीं थे बल्कि उन्हें क्रियान्वित करने के उनके तरीके और जीवन के शैक्षिक ढंग के साथ उनकी सहानुभति के अभाव के विरोधी थे। उनके विचार से प्रेस विद्वानों का एक संघ था और यह हमेशा ऐसा ही रहेगा. गेल की 'कुशलता' का विचार उस संस्कृति का उल्लंघन करता हुआ दिखाई दिया हालांकि बाद में अंदर से काफी हद तक इसी तरह के सुधार कार्यक्रम को व्यवहार में लाया गया।
मिलफोर्ड ने लगभग तुरंत विदेशी व्यापार की जिम्मेदारी ले ली और 1906 तक उन्होंने होडर एण्ड स्टफटन के साथ संयुक्त रूप से भारत और सुदूर पूर्व में एक यात्री को भेजने की योजना बनाना शुरू कर दिया. एन. ग्रेडन (प्रथम नाम अज्ञात) को सबसे पहले 1907 में और उसके बाद 1908 में यात्री के रूप में भेजा गया जब उन्होंने विशेष रूप से भारत, जलडमरूमध्य और सुदूर पूर्व में ओयूपी का प्रतिनिधित्व किया। 1909 में उनकी जगह ए. एच. कोब को रखा गया और 1910 में कोब ने अर्द्ध स्थायी रूप से भारत में ठहरने वाले एक यात्रा प्रबंधक के रूप में कार्य किया। 1911 में ई. वी. रियू को ट्रांस-साइबेरियन रेलवे के माध्यम से पूर्व एशिया भेजा गया जिन्होंने [[चीन]] और [[रूस]] में कई साहसिक कारनामे किए और उसके बाद वे भारत के दक्षिण में आए और पूरे भारत के शिक्षाविदों और अधिकारियों से मिलने में साल का अधिकांश समय बिताया. 1912 में वह फिर से [[मुम्बई|बम्बई]] पहुंचे जिसे अब मुंबई के नाम से जाना जाता है। वहां उन्होंने डॉकसाइड क्षेत्र में कार्यालय किराए पर लिया और पहला विदेशी ब्रांच स्थापित किया।
 
1914 में [[यूरोप]] उथलपुथल में डूबा हुआ था। युद्ध की वजह से सबसे पहले कागज़ में कमी और शिपिंग में नुकसान और गड़बड़ी होने लगी और उसके बाद कर्मचारियों की संख्या में बहुत कमी हो गई क्योंकि उन्हें मैदान में सेवा करने के लिए बुला लिया गया। भारतीय शाखा के अग्रदूतों में से दो अग्रदूतों सहित कई कर्मचारी लड़ाई में मारे गए.गए। मजे की बात यह है कि 1914 से 1917 तक बिक्री अच्छी थी और सिर्फ युद्ध के अंतिम समय में हालत सचमुच जरूरत से ज्यादा खराब हो गई.गई।
 
कमी से राहत मिलने के बजाय 1920 के दशक में सामग्रियों और श्रम की कीमतें आकाश छूने लगी. खास तौर पर कागज़ मिलना मुश्किल हो गया था और उसे व्यापारिक कंपनियों के माध्यम से दक्षिण अमेरिका से मंगाना पड़ता था। 1920 के दशक के अंतिम दौर में अर्थव्यवस्था और बाजारों की हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा. 1928 में प्रेस में छपी सामग्रियों को लन्दन, एडिनबर्ग, [[ग्लासगो]], लीप्ज़िग, टोरंटो, मेलबोर्न, [[केपटाउन|केप टाउन]], बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और शंघाई में पढ़ा जाता था। इनमें से सभी पूर्ण विकसित शाखाएं नहीं थीं: लीप्ज़िग में एक डिपो था जिसे एच. बोहून बीट द्वारा चलाया जाता था और कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में शहरों में छोटे-छोटे क्रियाशील डिपो और कंपनियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के साथ-साथ प्रेस के स्टॉक को बेचने के लिए ग्रामीण स्थिरता की जानकारी रखने वाले शैक्षिक प्रतिनिधियों की एक सेना थी जिनकी एजेंसियों पर प्रेस का कब्ज़ा था जिनमें अक्सर काल्पनिक और हल्की-फुल्की पठनीय सामग्रियां शामिल थीं। भारत में बम्बई, मद्रास और कलकत्ता के शाखा डिपो बड़े स्टॉक सूची के साथ प्रतिष्ठानों को प्रभावित कर रहे थे क्योंकि प्रेसिडेंसियां खुद बड़ी बाजार थीं और वहां शैक्षिक प्रतिनिधि ज्यादातर दूरस्थ व्यापार से निपटते थे। 1929 की मंदी ने अमेरिकास के मुनाफे को धीरे-धीरे खत्म कर दिया और भारत अन्य दिर्ष्टि से एक निराशाजनक तस्वीर का 'एक उज्जवल स्थान' बन गया। बम्बई अफ्रिकास के वितरण और ऑस्ट्रेलेशिया की प्रगतिशील बिक्री का केन्द्र बिंदु था और तीन प्रमुख डिपो पर प्रशिक्षित व्यक्ति बाद में अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के अग्रगामी शाखाओं में स्थानांतरित हो गए.गए।<ref> मिलफोर्ड का लेटरबुक</ref>
 
प्रेस ने [[द्वितीय विश्वयुद्ध]] में [[प्रथम विश्वयुद्ध]] की तरह अनुभव किया, फर्क सिर्फ इतना था कि मिलफोर्ड अब रिटायर होने वाले थे और उन्हें 'युवा व्यक्तियों के गमन से नफरत थी'. इस बार लन्दन में होने वाला हवाई आक्रमण बहुत ज्यादा खतरनाक था और लन्दन व्यवसाय को अस्थायी रूप से ऑक्सफोर्ड स्थानांतरित कर दिया गया था। अब अत्यंत अस्वस्थ हो चुके और कई व्यक्तिगत शोकों में डूबे मिलफोर्ड ने युद्ध के अंत तक रूकने और व्यवसाय को चलाते रहने पर जोर दिया. पहले की तरह सभी चीजों की आपूर्ति कम थी लेकिन यू-नाव संकट ने शिपिंग को दोगुना अनिश्चित बना दिया और पत्र पुस्तिकाएं समुद्र में खो चुके खेपों के मातमी रिकॉर्ड से भरे हुए हैं। कभी-कभी किसी लेखक के साथ-साथ दुनिया के युद्ध के मैदानों में अब विखर चुके कर्मचारियों के भी लापता या मृत होने की खबर दी जाएगी. डोरा, क्षेत्र रक्षा अधिनियम, को आयुध निर्माण के लिए सभी गैर जरूरी धातु को समर्पित करने की जरूरत थी और कई कीमती इलेक्ट्रोटाइप प्लेटों को सरकार के आदेश पर पिघला दिया गया।
जब ओयूपी भारतीय तटों पर पहुंचा तब यहाँ फ्रेडरिक मैक्स मुलर द्वारा सम्पादित ''सैक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट'' की अत्यधिक प्रतिष्ठा पहले से कायम थी और अंत में इसके 50 कष्टकारक खण्डों को पूरा किया गया। हालांकि इस श्रृंखला की वास्तविक खरीदारी अधिकांश भारतीयों की क्षमता से अधिक थी लेकिन फिर भी पुस्तकालयों के खुले सन्दर्भ दराजों में में आम तौर पर भारत सरकार द्वारा उदारतापूर्वक प्रदान किया गया एक सेट उपलब्ध था और भारतीय प्रेस में इन पुस्तकों की काफी चर्चा की जाती थी। हालांकि उनकी खूब आलोचना की गई थी लेकिन फिर भी आम धारणा यह थी कि मैक्स मुलर ने पश्चिम में प्राचीन एशियाई (फ़ारसी, अरबी, [[भारत|भारतीय]] और [[चीन|सिनिक]]) दर्शन को लोकप्रिय बनाकर भारत का उपकार किया था।<ref> ओयूपी द्वारा ''स्केयर्ड बुक्स ऑफ दी ईस्ट'' और उनके हैंडलिंग के एकाउंट के लिए, रिमी बी. चटर्जी के ''एम्पायर ऑफ दी माइंड: ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इन इंडिया ड्यूरिंग दी राज'' के अध्याय 7 को देखें; न्यू डेल्ही: ओयूपी, 2006</ref> यह पूर्व प्रतिष्ठा उपयोगी थी लेकिन शुरू में इंडोलॉजिकल पुस्तकों को बेचने के लिए बम्बई में भारतीय शाखा नहीं थी जिसके बारे में ओयूपी को पहले से ही मालूम था कि केवल अमेरिका में इसकी अच्छी बिक्री होती थी। ब्रिटिश भारत में तेजी से फ़ैल रहे स्कूल और कॉलेज नेटवर्क द्वारा निर्मित विशाल शैक्षिक बाजार की सेवा करने के लिए यह वहां मौजूद था। युद्ध की वजह से उत्पन्न होने वाले अवरोधों के बावजूद इसे 1915 में [[मध्य प्रदेश|सेन्ट्रल प्रोविन्सेस]] के लिए पाठ्य पुस्तकों को मुद्रित करने का एक महत्वपूर्ण ठेका मिल गया और इससे इस कठिन परिस्थिति में इसे अपने भाग्य को स्थिर करने में काफी मदद मिली. ई. वी. रियू ने अपने कॉलअप में और देरी न करते हुए 1917 में प्रबंधन को तैयार करवाया जो उस समय उनकी पत्नी पत्नी नेली रियू के अधीन था जो अपनी दो ब्रिटिश संतान के सहयोग से ''एल्थेनियम'' का संपादन करने वाली एक पूर्व संपादिका थी। ऑक्सफोर्ड से भारत में महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोटाइप और स्टीरियोटाइप प्लेटों को भेजने में बहुत देर हो गई थी और खुद ऑक्सफोर्ड छापाखाना सरकारी मुद्रण आदेशों के बोझ टेल दबा हुआ था क्योंकि साम्राज्य के प्रचार मशीन को काम मिल गया था। एक बार ऑक्सफोर्ड में गैर-सरकारी संरचना घटकर 32 पृष्ठ प्रति सप्ताह हो गई थी।
 
1919 तक रियू बहुत बीमार हो गए और उन्हें घर ले जाना पड़ा. उनकी जगह जियोफ्री कम्बरलेग और नोएल कैरिंगटन ने ली. नोएल डोरा कैरिंगटन नामक कलाकार के भाई थे और उन्होंने उनसे भारतीय बाजार के लिए ''डॉन किग्जोट'' के अपने ''स्टोरीज रिटोल्ड'' संस्करण की सचित्र व्याख्या भी करवाया था। उनके पिता चार्ल्स कैरिंगटन उन्नीसवीं सदी में भारत में एक रेलवे इंजीनियर थे। भारत में नोएल कैरिंगटन की छः सालों का अप्रकाशित संस्मरण [[ब्रिटिश पुस्तकालय|ब्रिटिश लाइब्रेरी]] के ओरिएंटल एण्ड इंडिया ऑफिस कलेक्शंस में हैं। 1915 तक मद्रास और कलकत्ता में अस्थायी डिपो थे। 1920 में एक उचित शाखा की स्थापना करने के लिए नोएल कैरिंगटन कलकत्ता गए.गए। वहां वे एडवर्ड थॉम्पसन{{dn}} से घुल मिल गए जिन्होंने उन्हें 'ऑक्सफोर्ड बुक ऑफ बंगाली वर्स' का उत्पादन करने की अविकसित योजना में उन्हें शामिल कर लिया.लिया।<ref> रिमी बी. चटर्जी, 'कैनन विदाउट कन्सेन्सस: रवीन्द्रनाथ टैगोर और ऑक्सफोर्ड बुक ऑफ बंगाली वर्स"'. ''बुक हिस्ट्री'' 4:303-33.</ref> मद्रास में बम्बई और कलकत्ता की तरह कभी कोई औपचारिक शाखा स्थापित नहीं हुई क्योंकि वहां डिपो का प्रबंधन दो स्थानीय शिक्षाविदों के हाथों में था।
 
==== पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया ====
कोब ने शंघाई के हेन्जेल एण्ड कंपनी (जिसका संचालन संभवतः किसी प्रोफ़ेसर द्वारा किया जाता था) को उस शहर में ओयूपी का प्रतिनिधित्व करने का काम सौंपा.{{citation needed|date=December 2010}} प्रेस को हेन्जेल से तकलीफ थी जो अनियमित रूप से पत्राचार करते थे। वे एडवर्ड इवांस के साथ भी व्यापार करते थे जो एक अन्य शंघाई पुस्तक विक्रेता था। मिलफोर्ड ने कहा कि 'हमलोग चीन में अब तक जो कुछ कर रहे हैं हमें उससे अधिक करना चाहिए' और 1910 में उन्होंने कोब को शैक्षिक प्राधिकारियों के प्रतिनिधि के रूप में हेन्जेल की जगह किसी और रखने के लिए सुयोग्य प्रतिनिधि की तलाश करने का अधिकार प्रदान किया।{{citation needed|date=December 2010}} उनकी जगह मिस एम. वेर्ने मैक्नीली नामक एक दुर्जेय महिला को रखा गया जो ईसाई ज्ञान प्रचार सोसाइटी की एक सदस्या थीं और एक किताब की दुकान भी चलाती थीं। उन्होंने काफी कुशलतापूर्वक प्रेस के मामलों पर ध्यान दिया और कभी-कभी वह मिलफोर्ड को सम्मानार्थ भेंट स्वरुप सिगारों से भरे डिब्बे भी भेजती थीं। ओयूपी के साथ उनका सहयोग लगभग 1910 से शुरू हुआ था हालांकि उनके पास ओयूपी पुस्तकों के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं थी। सस्ते अमेरिकी किताबों की तुलना में ऑक्सफोर्ड द्वारा आराम से उत्पन्न और महंगे बाइबिल संस्करणों के बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी न होने के बावजूद चीन में व्यापार की प्रमुख वस्तु बाइबल की किताबें थीं जबकि भारत में शैक्षिक किताबों को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त था।
 
1920 के दशक में, भारतीय शाखा की स्थापना की स्थापना हो गई थी और वह चालू हो गई थी तब कर्मचारी सदस्यों के लिए पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया की यात्रा करने के लिए यहां आना-जाना एक रिवाज बन गया। 1928 में मिलफोर्ड का भतीजा आर. क्रिस्टोफर ब्रैडबी वहां गए.गए। वह ठीक उसी समय 18 अक्टूबर 1931 को ब्रिटेन लौट आए जब जापानियों ने मंचुरिया पर हमला कर दिया. मिस एम. वेर्ने मैक्नीली ने राष्ट्र लीग को एक विरोध पत्र लिखा और मिलफोर्ड को एक निराशा पत्र लिखा जिन्होंने उन्हें शांत करने की कोशिश की.{{citation needed|date=December 2010}} जापान ओयूपी के लिए बहुत कम मशहूर बाजार था और जो कुछ थोड़ा बहुत व्यापार होता था वह भी काफी हद तक बिचौलियों के माध्यम से ही होता था। मारुजेन कंपनी अब तक सबसे बड़ी ग्राहक थी और उसके पास मामलों से संबंधित एक विशेष व्यवस्था थी। अन्य व्यवसाय कोबे के सन्नोमिया में आधारित एच. एल. ग्रिफिथ्स नामक एक पेशेवर प्रकाशक प्रतिनिधि के माध्यम से होता था। ग्रिफिथ्स ने प्रेस की तरफ से प्रमुख जापानी स्कूलों और किताबों की दुकानों की यात्रा की और 10 प्रतिशत कमीशन हासिल किया। एडमंड ब्लंडेन कुछ समय तक टोकियो विश्वविद्यालय में रहे थे और विश्वविद्यालय पुस्तक विक्रेता फुकुमोटो स्ट्रोइन के साथ प्रेस का संपर्क स्थापित किया। हालांकि जापान से प्राप्त होने वाला एक महत्वपूर्ण अधिग्रहण ए. एस. हॉर्नबीस एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी था। यह हांगकांग में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पाठ्यक्रम के लिए पाठ्य पुस्तकों का भी प्रकाशन करता है। चीनी भाषी शिक्षण शीर्षकों को ब्रांड कीज प्रेस (啟思出版社) के साथ प्रकाशित किया जाता है।
 
==== उत्तरी अमेरिका ====
 
संयुक्त राज्य अमेरिका में '''ऑक्सफोर्ड बाइबल''' किताबों की बिक्री को सहज बनाने के लिए न्यूयॉर्क शहर के 91 फिफ्थ एवेन्यू में 1896 में उत्तरी अमेरिकी शाखा की स्थापना की गई.गई। बाद में, इसने मैकमिलन के अपने मूल की सभी पुस्तकों के विपणन का काम अपने हाथ में ले लिया.लिया। बिक्री की दृष्टि से 1928 से 1936 तक इस कार्यालय का विकास हुआ और अंत में यह संयुक्त राज्य अमेरिका के अग्रणी विश्वविद्यालय प्रेसन में से एक बन गया। यह विद्वानों और सन्दर्भ पुस्तकों, बाइबल और कॉलेज और मेडिकल पाठ्य पुस्तकों पर विशेष ध्यान देती है। 1990 के दशक में इस कार्यालय को 200 मैडिसन एवेन्यू (एक इमारत जिसे इसने पुतनम पब्लिशिंग के साथ शेयर किया था) से 198 मैडिसन एवेन्यू में स्थानांतरित कर दिया गया जो पहले बी. अल्टमैन कंपनी का मुख्यालय था।<ref> केनेथ टी. जैक्सन, एड: ''दी एन्साइक्लोपीडिया ऑफ न्यूयॉर्क सिटी'' पी. 870.: 1995; येल यूनिवर्सिटी प्रेस; न्यू-यॉर्क हिस्टोरिकल सोसायटी.</ref>
 
==== दक्षिण अमेरिका ====
 
दिसंबर 1909 में कोब लौट आए और उन्होंने उस वर्ष अपनी एशियाई यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया। उसके बाद कोब ने मिलफोर्ड के सामने प्रस्ताव रखा कि दक्षिण अमेरिका के आसपास के वाणिज्यिक यात्रियों को भेजने के लिए प्रेस को कंपनियों के समूह में शामिल किया जाना चाहिए जिस पर मिलफोर्ड सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए.गए। कोब ने स्टीयर (प्रथम नाम अज्ञात) नामक एक व्यक्ति को अर्जेंटीना, ब्राजील, उरुग्वे, चिली और संभवतः अन्य देशों की यात्रा करने का काम सौंपा जिसकी जिम्मेदारी कोब पर थी। होडर एण्ड स्टफटन इस उद्यम से बाहर निकल गया लेकिन ओयूपी ने आगे बढ़कर इसमें अपना योगदान दिया.
 
स्टीयर की यात्रा एक मुसीबत थी और मिलफोर्ड ने उदासी भरे लफ्जों में कहा कि सभी यात्रियों की यात्राओं की तुलना में यह यात्रा 'काफी महंगी और बहुत कम फलदायक साबित हुई'. अपने यात्रा कार्यक्रम के आधे से अधिक हिस्से को पूरा करने से पहले ही स्टीयर लौट आए और वापस लौटते समय वे अपने ग्राहकों के भुगतान को वापस करने में विफल रहे जिसके परिणामस्वरूप प्रेस को 210 पाउंड की एक मोटी रकम से हाथ धोना पड़ा. प्रेस को 'आकास्मिक व्यय' के रूप में अपने पुस्तकों के मूल्य का 80 प्रतिशत चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ा इसलिए पर्याप्त ऑर्डर मिलने के बावजूद उन्हें नुकसान उठाना पड़ा. वास्तव में कुछ ऑर्डर यात्रा से ही प्राप्त हुए थे और जब स्टीयर के नामूनोने का बॉक्स को वापस किया गया तब लन्दन कार्यालय को पता चला कि उन्हें दूसरी परत से नीचे की तरफ नहीं खोला गया था।{{citation needed|date=December 2010}}
हालांकि लंदन कार्यालय में मिलफोर्ड ने संगीत का मजा लिया था और खास तौर पर चर्च और गिरिजाघर के संगीतकारों की दुनिया के साथ उनका संबंध था। 1921 में मिलफोर्ड ने ह्यूबर्ट जे. फॉस को मूल रूप से शैक्षिक प्रबंधक वी. एच. कॉलिंस के एक सहायक के रूप में काम पर रखा था। उस काम में फॉस ने अपनी ऊर्जा और कल्पना का परिचय दिया. हालांकि सटक्लिफ के अनुसार एक साधारण संगीतकार और प्रतिभाशाली पियानोवादक के रूप में फॉस "की रुचि खास तौर से शिक्षा में नहीं थी; संगीत में उनकी गहरी रुचि थी।<ref name="Sutcliffe p. 210"/> उसके बाद बहुत जल्द जब फॉस ने मिलफोर्ड को रेडियो पर अक्सर बजाई जाने वाली रचनाओं के संगीतकारों पर जाने-माने संगीतज्ञों के निबन्धों के समूह को प्रकाशित करने की योजना के बारे में बताया तब मिलफोर्ड ने शायद इसे शिक्षा की तुलना में संगीत से कम संबंधित माना होगा. उस विचार प्रक्रिया का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड मौजूदा नहीं है जिसके द्वारा प्रेस ने संगीत के प्रकाशन के क्षेत्र में कदम रखा होगा. फॉस की मौजूदगी और उनका ज्ञान, योग्यता, उत्साह और कल्पना शायद मिलफोर्ड के दिमाग में एक साथ कई असंबंधित गतिविधियों को जन्म देने वाले उत्प्रेरक का काम किया होगा जिसने विदेशी शाखाओं की स्थापना की तरह एक अन्य नए उद्यम को जन्म दिया होगा.<ref name="Hinnells p. 6"> हिनेल्स पी. 6</ref>
 
हो सकता है कि मिलफोर्ड को पूरी तरह यह बात समझ में नहीं आई होगी कि वह क्या कर रहे थे। 1973 में संगीत विभाग द्वारा पचासवीं सालगिरह पर प्रकाशित पुस्तिका से पता चलता है कि ओयूपी को "संगीत व्यापार का कोई ज्ञान नहीं था और उसके संगीत दुकानों में अपनी रचनाओं को बेचने के लिए कोई प्रतिनिधि भी नहीं था और ऐसा लगता है कि उसे इस बात का भी इल्म नहीं था कि शीट संगीत पुस्तकों से किसी भी तरह से एक अलग चीज थी।"<ref> ऑक्सफोर्ड पी. 4</ref> हालांकि मिलफोर्ड ने जानबूझकर या अनजाने में तीन कदम उठाए जिससे ओयूपी ने एक प्रमुख कार्य का शुभारंभ किया। उन्होंने एंग्लो-फ्रेंच म्यूजिक कंपनी और इसके सभी केन्द्रों, संबंधित वस्तुओं और संसाधनों को खरीद लिया.लिया। उन्होंने संगीत के लिए एक पूर्णकालिक बिक्री प्रबंधक के रूप में नोर्मैन पीटरकिन नामक एक संयमी मशहूर संगीतज्ञ को काम पर रख लिया.लिया। और 1923 में उन्होंने एक अलग प्रभाव संगीत विभाग की स्थापना की जिसके कार्यालय आमेन हाउस में थे और जिसके पहले संगीत संपादक फॉस थे। उसके बाद सामान्य समर्थन के अलावा मिलफोर्ड ने फॉस को बड़े पैमाने पर उनके अपने उपकरणों के हवाले कर दिया.<ref> सटक्लिफ पी. 211</ref>
 
फॉस ने इसका जवाब अविश्वसनीय ऊर्जा के साथ दिया. उन्होंने "सबसे कम संभावित समय में सबसे बड़ी संभावित सूची" का निर्माण किया<ref name="Oxford p. 6"> ऑक्सफोर्ड पी. 6</ref> और लगभग 200 शीर्षक प्रति वर्ष की दर से उसमें शीर्षकों शामिल करना शुरू कर दिया; आठ साल बाद उस सूची में 1750 शीर्षक थे। विभाग की स्थापना के वर्ष में फॉस ने "क्सोफोर्ड कोरल सॉंग्स" श्रृंखला शीर्षक के तहत सस्ती लेकिन अच्छी तरह से सम्पादित और मुद्रित समवेत रचनाओं की एक श्रृंखला का निर्माण करना शुरू कर दिया. डब्ल्यू. जी. व्हिटटेकर के सामान्य संपादकत्व में यह श्रृंखला पुस्तक रूप में या अध्ययन के बजाय संगीत के प्रकाशन के लिए ओयूपी की पहली वचनबद्धता थी। इस श्रृंखला योजना का विस्तार करके इसी तरह की सस्ती लेकिन उच्च गुणवत्ता वाली "ऑक्सफोर्ड चर्च म्यूजिक" और "ट्यूडर चर्च म्यूजिक" (कार्नेगी यूके ट्रस्ट से अपने हाथों में लिया गया) को शामिल किया गया; इनमें से सभी श्रृंखलाएं आज भी जारी हैं। वास्तव में फॉस द्वारा मिलफोर्ड के सामने प्रकाशन हेतु प्रस्तुत निबन्धों की योजना 1927 में ''हेरिटेज ऑफ म्यूजिक'' के रूप में दिखाई दी (अगले तीस सालों में दो और खंड दिखाई दिए होंगे). इसी तरह पर्सी स्कोल्स की ''लिस्नर्स गाइड टू म्यूजिक'' (वास्तव में 1919 में प्रकाशित) को आम जनता को सुनाने के लिए संगीत प्रशंसा पर आधारित पुस्तकों की एक श्रृंखला में से पहली श्रृंखला के रूप में नए विभाग में प्रस्तुत किया गया था।<ref name="Hinnells p. 6"/> ब्रॉडकास्ट और रिकॉर्डेड संगीत के विकास के साथ तालमेल बैठने के लिए
शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फॉस को शायद उन रचनाओं के नए संगीतकारों की तलाश करने की आदत थी जिन रचनाओं को वह विशिष्ट रूप से अंग्रेज़ी संगीत की मान्यता देते थे जो जनता को अधिक प्रिय थी। इस एकाग्रता के फलस्वरूप ओयूपी को दो पारस्परिक सुदृढ़ लाभ प्राप्त हुआ: संभावित प्रतिस्पर्धियों के कब्जे से बचे रहने वाले संगीत प्रकाशन के क्षेत्र में प्रवेश करने का एक मौका और संगीत प्रदर्शन एवं निर्माण के लिए एक शाखा जिसे अब तक खुद अंग्रेजों द्वारा काफी हद तक नजरअंदाज किया जा रहा था। हिनेल्स के प्रस्ताव एके मुताबिक काफी हद तक अज्ञात वाणिज्यिक संभावनाओं वाले संगीत के क्षेत्र में संगीत विभाग का आरंभिक "छात्रवृत्ति एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मिश्रण" इसकी सांस्कृतिक परोपकार (प्रेस की शैक्षिक पृष्ठभूमि को देखते हुए) की भावना और "जर्मन मुख्यधारा के बाहर राष्ट्रीय संगीत" को बढ़ावा देने की इच्छा से प्रेरित था।<ref> हिनेल्स पी. 8</ref>
 
इसका नतीजा यह हुआ कि फॉस ने सक्रिय रूप से इस कार्य को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और राल्फ वौघन विलियम्स, विलियम वॉल्टन, कॉन्स्टन्ट लैम्बर्ट, एलन रॉस्थोर्न, पीटर वॉरलॉक (फिलिप हेसेलटीन), एडमंड रुब्ब्रा और अन्य अंग्रेज़ी संगीतकारों के संगीत के प्रकाशन की इच्छा प्रकट की. जिस सन्दर्भ में प्रेस को "आधुनिक संगीत के इतिहास के सबसे टिकाऊ सज्जन समझौता"<ref name="Oxford p. 6"/> कहा गया उस सन्दर्भ में फॉस ने ऐसी किसी भी संगीत के प्रकाशन की गारंटी दी जिसे वौघन विलियम्स उन्हें प्रदान करना चाहेंगे. इसके अलावा, फॉस ने ओयूपी के केवल संगीत के प्रकाशन और जीवंत प्रदर्शन के अधिकारों को ही नहीं बल्कि रिकॉर्डिंग और ब्रॉडकास्ट के "यांत्रिक" अधिकारों को भी सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाया. यह बात पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी कि उस समय यह सब कितना महत्वपूर्ण साबित हुआ होगा. दरअसल फॉस, ओयूपी और कई संगीतकारों ने पहले परफॉमिंग राईट सोसाइटी में शामिल होने या उसका समर्थन करने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि नई मीडिया के क्षेत्र में होने वाले इस तरह के प्रदर्शन पर इसकी फीस का बुरा असर पड़ेगा. बाद के वर्षों में देखा गया कि इसके विपरीत इस तरह के संगीत, संगीत प्रकाशन के पारंपरिक स्थलों की तुलना में अधिक आकर्षित साबित हुए.<ref> हिनेल्स पी. 18-19; 1936 में ओयूपी शामिल हो गए.गए।</ref>
 
संगीत की पेशकश के परिमाण और विस्तार की दृष्टि से और संगीतज्ञों और आम जनता दोनों के दिलों में इसकी प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगीत के विभाग ने चाहे जैसा भी विकास किया हो, 1930 के दशक में आखिरकार वित्तीय प्रतिफल का सवाल सबसे प्रमुख था। लन्दन प्रकाशक के रूप में मिलफोर्ड ने संगीत विभाग के निर्माण और विकास के वर्षों में इसे अपना पूरा सहयोग दिया था। हालांकि उन पर लगातार होने वाले खर्चों से चिंतित ऑक्सफोर्ड के प्रतिनिधियों का दबाव बढ़ने लगा जो उन्हें एक लाभहीन उद्यम लग रहा था। उनके दृष्टि में आमेन हाउस का संचालन शैक्षिक दृष्टि से सम्मान योग्य और वित्तीय दृष्टि से लाभकारी था। लन्दन कार्यालय "शिक्षा को बढ़ावा देने के खर्च के लिए क्लेयरेंडन प्रेस के लिए पैसा कमाने के स्रोत के रूप में बना रहा."<ref> सटक्लिफ पी. 168</ref> इसके अलावा, ओयूपी अपने पुस्तक प्रकाशनों को अल्पकालीन परियोजनाएं मानता था: प्रकाशित होने के कुछ वर्षों के भीतर न बिकने वाली किसी भी पुस्तक को बाजार से वापस मंगवा लिया जाता था (अनियोजित या छिपे आय के रूप में दिखाने के लिए हालांकि वास्तव में उन्हें बाद में बेच दिया जाता था). इसके विपरीत, प्रदर्शन के लिए संगीत पर संगीत विभाग का दबाव अपेक्षाकृत दीर्घकालीन और निरंतर था जो खास तौर इसका कारण यह था कि इससे होने वाला आय बार-बार के प्रसारण या रिकॉर्डिंग से प्राप्त होता था और इसलिए क्योंकि यह नए और आगामी संगीतज्ञों के साथ अपने रिश्ते को बनाने में लगा हुआ था। प्रतिनिधिगण फॉस के नजरिए से सहमत नहीं थे: "मुझे अभी भी यही लगता है कि यह शब्द 'नुकसान' एक झूठा शब्द है: क्या यह वास्तव में पूंजी का निवेश नहीं है?" यह वाक्य फॉस ने 1934 में मिलफोर्ड को लिखा था।<ref> हिनेल्स पी. 17</ref>

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