"लोक संगीत" के अवतरणों में अंतर

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संगीतमयी प्रकृति जब गुनगुना उठती है लोकगीतों का स्फुरण हो उठना स्वाभाविक ही है। विभिन्न ॠतुओं के सहजतम प्रभाव से अनुप्राणित ये लोकगीत प्रकृति रस में लीन हो उठते हैं। पावसी संवेदनाओं ने तो इन गीतों में जादुई प्रभाव भर दिया है पावस ॠतु में गाए जाने वाले बारह मासा, छैमासा तथा चौमासा गीत इस सत्यता को रेखांकित करने वाले सिद्ध होते हैं।
 
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