"ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस" के अवतरणों में अंतर

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== प्रारंभिक इतिहास ==
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़ा पहला प्रिंटर थियोडेरिक रूड था. विलियम काक्सटन के एक व्यवसायिक सहयोगी रूड संभवतः एक नए उद्यम के रूप में अपनी लकड़ी की प्रिंटिंग प्रेस को कोलोन से ऑक्सफोर्ड लेकर आये थे, और लगभग 1480 और 1483 के बीच शहर में काम किया था. 1478 में ऑक्सफोर्ड में छापी गई पहली पुस्तक, रुफिनस के ''एक्स्पोजिशियो इन सिम्बोलम एपोस्टोलोरम'' के एक संस्करण को एक अन्य बेनाम प्रिंटर द्वारा छापा गया था. यह बात सब को मालूम है कि इसे रोमन अंकों में गलती से "1468" के रूप में दिनांकित किया गया था जो जाहिर तौर पर काक्सटन से पहले का समय है. रूड की छपाई में जॉन एंकिविल का ''कम्पेंडियम टोटियस ग्रामाटिका'' शामिल था जिसने [[लातिन भाषा|लैटिन]] [[व्याकरण]] की पढ़ाई के लिए नए मानक स्थापित किए.<ref> बार्कर पी. 4; कार्टर पीपी. 7-11</ref>
 
रूड के बाद विश्वविद्यालय से जुड़ी छपाई लगभग आधी सदी तक छिटपुट रूप में होती रही. रिकॉर्ड या जीवंत कार्य बस कुछ गिने-चुने रूपों में हैं और ऑक्सफोर्ड की छपाई को 1580 के दशक तक कोई मजबूत आधार नहीं मिला था: इसने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रयासों का अनुसरण किया जिसने 1534 में अपने प्रेस का लाइसेंस प्राप्त किया था. क्राउन (राजा) और स्टेशनर्स कंपनी द्वारा [[लंदन|लन्दन]] के बाहर छपाई करने पर लगाई गई बाध्यताओं के प्रतिक्रियास्वरुप ऑक्सफोर्ड ने विश्वविद्यालय में प्रेस चलाने का औपचारिक अधिकार प्राप्त करने के लिए एलिजाबेथ प्रथम से याचना की. चांसलर रॉबर्ट डूडले, अर्ल ऑफ लीसेस्टर ने ऑक्सफोर्ड के मामले की वकालत की. प्रिंटर जोसेफ बार्न्स द्वारा काम शुरू करने के बाद से कुछ शाही अनुमति प्राप्त की गई और स्टार चैंबर के हुक्मनामे में 1586 में "यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड" में प्रेस के कानूनी वजूद का उल्लेख किया गया.<ref> कार्टर पीपी. 17-22</ref>
== 17वीं सदी: विलियम लॉड और जॉन फेल ==
 
ऑक्सफोर्ड के चांसलर आर्कबिशप विलियम लॉड ने 1630 के दशक में विश्वविद्यालय की छपाई की कानूनी स्थिति को समेकित किया. लॉड ने एक विश्वस्तरीय एकीकृत प्रेस की परिकल्पना की. ऑक्सफोर्ड इसे विश्वविद्यालय की संपत्ति पर स्थापित करेगा, इसकी कार्यवाहियों को नियंत्रित करेगा, इसके कर्मचारियों की नियुक्ति करेगा, इसके छपाई कार्य का निर्धारण करेगा, और इससे प्राप्त होने वाली राशि का लाभ उठाएगा. इस मकसद से उन्होंने चार्ल्स प्रथम से उन अधिकारों की याचना की जिसकी सहायता से ऑक्सफोर्ड स्टेशनर्स कंपनी और किंग्स प्रिंटर से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होगा और इसकी सहायता के लिए शाही अनुदान का एक उत्तराधिकार प्राप्त किया. इन सबकों 1636 में ऑक्सफोर्ड के "ग्रेट चार्टर" में शामिल किया गया जिसके तहत विश्वविद्यालय को "हर तरह की किताबें" छापने का अधिकार दिया गया. लॉड ने क्राउन से ऑक्सफोर्ड में स्क्रिप्चर के किंग जेम्स या प्राधिकृत संस्करण को छापने का "विशेषाधिकार" भी प्राप्त किया.<ref> कार्टर चैप्टर. 3</ref> इस "विशेषाधिकार" से अगले 250 सालों में काफी प्रतिफल प्राप्त हुआ हालांकि शुरू में यह प्रसुप्तावस्था में था. स्टेशनर्स कंपनी इसके व्यापार के खतरे से बहुत चिंतित थी और ऑक्सफोर्ड के साथ एक "सहनशीलता नियम" स्थापित करने में इसका कुछ समय बर्बाद चला गया. इसके तहत स्टेशनर्स ने विश्वविद्यालय को अपने सम्पूर्ण मुद्रण अधिकारों का इस्तेमाल न करने के लिए एक वार्षिक किराए का भुगतान किया - ऑक्सफोर्ड ने उन पैसों का इस्तेमाल छोटे प्रयोजनों के लिए नए मुद्रण उपकरण खरीदने के लिए किया.<ref> बार्कर पी. 11</ref>
 
लॉड ने प्रेस के आतंरिक संगठन का भी विकास किया. प्रतिनिधि प्रणाली की स्थापना करने के अलावा उन्होंने "आर्कीटाइपोग्राफस" नामक एक व्यापक और विस्तृत पर्यवेक्षी पद का भी निर्माण किया: इस शिक्षाविद पर छापेखाने के प्रबंधन से लेकर प्रूफरीडिंग (त्रुटि-सुधार) तक व्यवसाय से संबंधित प्रत्येक कार्य की देखरेख करने की जिम्मेदारी थी. यह पद काफी हद तक एक व्यावहारिक वास्तविकता के बजाय एक आदर्श था लेकिन अठारहवीं सदी तक शिथिल संरचित प्रेस में इसका वजूद (काफी हद तक एक आराम की नौकरी के रूप में) कायम रहा. व्यावहारिक दृष्टि से ऑक्सफोर्ड का वेयरहाउस-कीपर ही बिक्री, लेखांकन और छापेखाने के कर्मचारियों को काम पर रखने और उन्हें काम पर से निकालने का काम करता था.<ref> कार्टर पीपी 31, 65</ref>
==== पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया ====
 
इस क्षेत्र के साथ ओयूपी की पारस्परिक क्रिया भारत में अपने मिशन का हिस्सा थी क्योंकि उनके कई यात्रियों ने भारत जाने या वहां से आने के रास्ते पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में प्रवेश किया था. 1907 में अपनी पहली यात्रा में ग्रेडन ने 'स्ट्रेट्स सेटलमेंट्स' (काफी हद तक फेडरेटेड मलय राज्य और सिंगापुर), चीन, और जापान की यात्रा की थी लेकिन बहुत ज्यादा यात्रा करने में समर्थ नहीं थे. 1909 में ए. एच. कोब ने शंघाई में शिक्षाओं और पुस्तक विक्रेताओं से भेंट की और देखा कि वहां अक्सर सीधी-सादी छपाई वाली ब्रिटिश पुस्तकों के साथ खास तौर पर अमेरिका से आने वाली सस्ती पुस्तकों से प्रतिस्पर्धा चल रही थी.<ref> देखें रिमी बी. चटर्जी, 'पायरेट्स एंड फिलैन्थ्रपिस्ट: ब्रिटिश पब्लिशर्स और कॉपीराइट इन इंडिया, 1880-1935 स्वप्न कुमार चक्रवर्ती और अभिजीत गुप्ता द्वारा संपादित ''प्रिंट एरियाज़ 2: बुक हिस्ट्री इन इंडिया'' में, (न्यू डेल्ही: परमानेंट ब्लैक, आगामी 2007 में)</ref> 1891 के चेस अधिनियम के बाद उस समय की कॉपीराइट परिस्थिति ऐसी थी कि अमेरिकी प्रकाशक दंड मुक्त होने के लिए ऐसी किताबों को प्रकाशित कर सकते थे हालांकि उन्हें सभी ब्रिटिश प्रदेशों में वर्जित माना जाता था. दोनों प्रदेशों में कॉपीराइट को सुरक्षित करने के लिए प्रकाशकों को एक साथ प्रकाशन करने का इंतजाम करना पड़ा जो इस युग के वाष्प चालित जलयानों के लिए एक अंतहीन प्रचालन सिरदर्द था. किसी भी एक प्रदेश में पूर्व प्रकाशन के लिए दूसरे प्रदेश में कॉपीराइट संरक्षण के लिए कीमत चुकानी पड़ती थी.<ref> देखें साइमन नोवेल स्मिथ, ''इंटरनेशनल कॉपीराइट लॉ एंड दी पब्लिशर इन दी रीजन ऑफ क्वीन विक्टोरिया: दी ल्येल लेक्चर्स, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, 1965-66'', (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस, 1968).</ref>
 
कोब ने शंघाई के हेन्जेल एण्ड कंपनी (जिसका संचालन संभवतः किसी प्रोफ़ेसर द्वारा किया जाता था) को उस शहर में ओयूपी का प्रतिनिधित्व करने का काम सौंपा.{{citation needed|date=December 2010}} प्रेस को हेन्जेल से तकलीफ थी जो अनियमित रूप से पत्राचार करते थे. वे एडवर्ड इवांस के साथ भी व्यापार करते थे जो एक अन्य शंघाई पुस्तक विक्रेता था. मिलफोर्ड ने कहा कि 'हमलोग चीन में अब तक जो कुछ कर रहे हैं हमें उससे अधिक करना चाहिए' और 1910 में उन्होंने कोब को शैक्षिक प्राधिकारियों के प्रतिनिधि के रूप में हेन्जेल की जगह किसी और रखने के लिए सुयोग्य प्रतिनिधि की तलाश करने का अधिकार प्रदान किया.{{citation needed|date=December 2010}} उनकी जगह मिस एम. वेर्ने मैक्नीली नामक एक दुर्जेय महिला को रखा गया जो ईसाई ज्ञान प्रचार सोसाइटी की एक सदस्या थीं और एक किताब की दुकान भी चलाती थीं. उन्होंने काफी कुशलतापूर्वक प्रेस के मामलों पर ध्यान दिया और कभी-कभी वह मिलफोर्ड को सम्मानार्थ भेंट स्वरुप सिगारों से भरे डिब्बे भी भेजती थीं. ओयूपी के साथ उनका सहयोग लगभग 1910 से शुरू हुआ था हालांकि उनके पास ओयूपी पुस्तकों के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं थी. सस्ते अमेरिकी किताबों की तुलना में ऑक्सफोर्ड द्वारा आराम से उत्पन्न और महंगे बाइबिल संस्करणों के बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी न होने के बावजूद चीन में व्यापार की प्रमुख वस्तु बाइबल की किताबें थीं जबकि भारत में शैक्षिक किताबों को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त था.

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