"कालक्रम विज्ञान": अवतरणों में अंतर

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१५८२ ई. सन्‌ पोप ग्रेगरी ने ई. सन्‌ में दो सुधार किए। प्रथम सुधार यह था कि शताब्दियों के दिनों की व्यवस्था नवीन रूप से की गई, जो आजकल प्रचलित है। व्यवस्था यह हुई कि जिस शताब्दी को ४०० से नि:शेष विभाजित किया जा सके वही अधिवर्ष है; अन्य सब शताब्दियाँ सामान्य वर्ष हैं। यह नियम ज्योतिष के आधुनिक यंत्रों से पाने गए सूक्ष्म सायन (ट्रोपिकल) वर्षमान के अनुसार किया गया है। इस नियम की उपेक्षा से ईसवी सन्‌ के आरंभ से १५८२ ई. सन्‌ तक १० दिन बढ़ाए गए। इस नयी व्यवस्था को नवीन पद्धति और पूर्व की पद्धति को प्राचीन पद्धति कहते हैं। कालक्रमविज्ञान में सन्‌ १५८२ ई. के ४ अक्टूबर तक की घटनाओं को प्राचीन पद्धति से व्यक्त किया जाता है और उसके पश्चात्‌ की घटनाओं को नवीन पद्धति से।
 
== जूलियन दिनांक ==
नई शैली, पुरानी शैली, छूटे हुए दिन, अधिवर्ष आदि की झंझटों से बचने के लिए ज्योतिषी (और कभी-कभी इतिहासज्ञ भी) बहुधा जूलियन दिनांक से समय सूचित करते हैं। इस पद्धति का आंरभ ्फ्ऱेंच ज्योतिषी स्केलियर ने किया था। इस पद्धति में १ जनवरी, सन्‌ ४७१३ ई.पू. से आरंभ करके दिन लगातार गिने जाते हैं और दिन का आरंभ स्थानीय मध्याह्न से होता है। उदाहरणत: जूलियन दिनांक २४,३७,८९२.१२३ का अर्थ है १५ अगस्त, १९६२ के मध्याह्न से ०.१२३व्२४ घेंटे बाद। नाविक पंचांगों में प्रत्येक दिन का जूलियन दिनांक दिया रहता है।
 
। इस स्तंभ के प्रथम पाँच अंक गणितीय पद्धति के हैं। ऐतिहासिक पद्धति से ये अंक अनुक्रम से ४७१३ ई.पू., ३१०२ ई.पू., ३०७६ ई.पू., ५८ ई.पू. और ५८ ई.पू. हैं।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://www.1911encyclopedia.org/Chronology Chronology] 1911 Encyclopaedia Britannica
* [http://my.raex.com/~obsidian/regindex.html Regnal Chronologies]
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