"आस्तिकता": अवतरणों में अंतर

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[[भारतीय दर्शन]] में [[ईश्वर]], ईश्वराज्ञा, परलोक, आत्मा आदि अदृष्ट पदार्थों के अस्तित्व में, विशेषत: ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास का नाम '''आस्तिकता''' है। पाश्चात्य दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास का ही नाम '''थीज्म''' है।
 
== ईश्वर की विविध प्रकार की कल्पनाएँ ==
संसार के विश्वासों के इतिहास में ईश्वर की कल्पना अनेक रूपों में की गई है और उसके अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए अनेक युक्तियां दी गई हैं। उनमें मुख्य ये हैं :
 
(5) '''अजातवाद, अजातिवाद अथवा जगद्रहित शुद्ध ब्रह्मवाद'''-(अकास्मिज्म) इस मत के अनुसर ईश्वर के अतिरिक्त और कोई सत्ता ही नहीं है। सर्वत्र ब्रहा ही ब्रह्म है। जगत् नाम की वस्तु न कभी उत्पन्न हुई, न है और न होगी। जिसको हम जगत् के रूप में देखते हैं वह कल्पना मात्र, मिथ्या भ्रम मात्र है जिसका ज्ञान द्वारा लोप हो जाता है। वास्तविक सत्ता केवल विकाररहित शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म की ही है जिसमें सृष्टि न कभी हुई, न होगी।
 
== ईश्वर एक है या अनेक? ==
आस्तिकता के अंतर्गत एक यह प्रश्न भी उठता है कि ईश्वर एक है अथवा अनेक। कुछ लोग अनेक देवी देवताओं को मानते हैं। उनको [[बहुदेववादी]] (पोलीथीस्ट) कहते हैं। वे एक देव को नहीं जानते। कुछ लोग जगत् के नियामक दो देवों को मानते हैं - एक भगवान् और दूसरा शैतान। एक अच्छाइयों का स्रष्टा और दूसरा बुराइयों का। कुछ लोग यह मानते हैं कि बुराई भले भगवान की छाया मात्र है। भगवान् एक ही है, शैतान उसकी मायाशक्ति का नाम है जिसके द्वारा संसार में सब दोषों का प्रसारहै, पर जो स्वयं भगवान् के नियंत्रण में रहती है। कुछ लोग मायारहित शुद्ध ब्रह्म की सत्ता में विश्वास करते है। उनके अनुसार संसार शुद्ध ब्रह्म का प्रकाश है, उसमें स्वयं कोई दोष नहीं है। हमारे अज्ञान के कारण ही हमको दोष दिखाई पड़ते हैं। पूर्ण ज्ञान हो जाने पर सबको मंगलमय ही दिखाई पड़ेगा। इस मत को '''शुद्ध ब्रह्मवाद''' कहते हैं। इसी को [[अद्वैतवाद]] अथवा ऐक्यवाद (मोनिज्म) कहते हैं।
 
== आस्तिकता के पक्ष में युक्तियाँ ==
पाश्चात्य और भारतीय दर्शन में आस्तिकता को सिद्ध करने में जो अनेक युक्तियां दी जाती हैं उनमें से कुछ ये हैं :
 
[[अनीश्वरवाद|नास्तिकों]] ने इन सब युक्तियों को काटने का प्रयत्न किया है।
 
== इन्हें भी देखें ==
* [[ईश्वरवाद]]
 
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