"ब्रह्म": अवतरणों में अंतर

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'''आनन्द ब्रह्म'''-
श्रुतियों में ब्रह्म को आनंद भी कहा है. पहले आनन्द को जान लें. आनन्द का अर्थ सुख या असीम सुख नहीं है. यह वह स्थिति है जहाँ सुख और दुःख का कोई स्थान नहीं है. यह पूर्ण शुद्ध ज्ञान, परम बोध की स्थिति है. कबीर कहते हैं, वहाँ ज्ञान ही ओढ़नी है ज्ञान ही बिछावन है. नूरे ओढ़न नूरे डासन. मूल तत्त्व परम ज्ञान है जिसे आनन्द कहा है. अंतिम स्थिति जिससे बड़ा कुछ भी नहीं है इस स्थिति को जीव अपने में पाकर परम आनंदित हो जाता है. इसलिए ब्रह्म को आनंद कहा है.
 
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