"वरंगल" के अवतरणों में अंतर

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==शासन काल==
रुद्रमादेवी ने 36 वर्ष तक बड़ी योग्यता से राज्य किया। उसे रुद्रदेव महाराज कहकर संबोधित किया जाता था। प्रतापरुद्र (शासन काल 1296-1326 ई.) रुद्रमा दोहित्र था। इसने पाण्डयनरेश को हराकर काँची को जीता। इसने छः बार मुसलमानों के आक्रमणों को विफल किया, किन्तु 1326 ई. में उलुगख़ाँ ने जो पीछे मुहम्मद बिन तुग़लक़ नाम से दिल्ली का सुल्तान हुआ, ककातीय के राज्य की समाप्ति कर दी। उसने प्रतापरुद्र को बन्दी बनाकर दिल्ली ले जाना चाहा था किन्तु मार्ग में ही नर्मदा नदी के तट पर इस स्वाभिमानी और वीर पुरुष ने अपने प्राण त्याग कर दिए। ककातीयों के शासनकाल में वारंगल में हिन्दू संस्कृति तथा संस्कृत की ओर तेलुगु भाषाओं की अभूतपूर्व उन्नति हुई। शैव धर्म के अंतर्गत पाशुपत सम्प्रदाय का यह उत्कर्षकाल था। इस समय वारंगल का दूर-दूर के देशों से व्यापार होता था।
 
वारंगल के संस्ककृत कवियों में सर्वशास्त्र विशारद का लेखक वीरभल्लातदेशिक, और नलकीर्तिकामुदी के रचयिता अगस्त्य के नाम उल्लेखनीय हें। कहा जाता है कि अलंकारशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रतापरुद्रभूषण का लेखक विद्यनाथ यही अगस्त्य था। गणपति का हस्तिसेनापति जयप, नृत्यरत्नावली का रचयिता था। संस्कृत कवि शाकल्यमल्ल भी इसी का समकालीन था। तेलगु के कवियों में रंगनाथ रामायणुम का लेखक पलकुरिकी सोमनाथ मुख्य हैं। इसी समय भास्कर रामायणुम भी लिखी गई। वारंगल नरेश प्रतापरुद्र स्वयं भी तेलगु का अच्छा कवि था। इसने नीतिसार नामक ग्रन्थ लिखा था। दिल्ली के तुग़लक़ वंश की शक्ति क्षीण होने पर 1335-1336 के पश्चात् में कपय नायक ने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। इसकी राजधानी वारंगल में थी। 1442 ई. में वारंगल पर बहमनी राज्य का आधिपत्य हो गया और तत्पश्चात् गोलकुंडा के कुतुबशाही नरेशों का। इस समय शिताब ख़ाँ वारंगल का सूबेदार नियुक्त हुआ। उसने शीध्र ही स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया। किन्तु कुछ समय के उपरान्त वारंगल को गोलकुंडा के साथ ही औरंगज़ेब के विस्तृत मुग़ल साम्राज्य का अंग बनना पड़ा। मुग़ल साम्राज्य के अन्तिम समय में वारंगल की नई रियासत हैदराबाद में सम्मिलित कर ली गई।
 
 
 
==उद्योग और व्यापार==
 
 
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