विवाहसूक्त

विवाहसूक्त ऋग्वेद संहिता के दसवें मंडल का 85वां सूक्त है।[3] इसमें सूर्य की पुत्री सूर्या और सोम के विवाह की कथा[4] है जिसमें अश्विनी कुमार सहयोगी का कार्य करते हैं। इस सूक्त को सोमसूर्या सूक्त भी कहा जाता है। इस मन्त्र की द्रष्टा ऋषिका सावित्री सूर्या हैं।
इस सूक्त में वर एवं वधू के अखण्ड सौभाग्य की कामना एवं प्रार्थना की गयी है। विवाह संस्कार में वधू को सौभाग्यशालिनी परमकल्याणकारिणी तथा मङ्गल प्रदान करने वाली कहा गया है। सोम, सूर्य आदि देवों की स्तुति भी इन सूक्तों के द्वारा की गयी है। यहां स्त्री के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन है। उसे सास-ससुर की सेवा करने का उपदेश दिया गया है। परिवार का हित करना उसका कर्तव्य है। साथ ही स्त्री को गृहस्वामिनी, गृहपत्नी और 'साम्राज्ञी' कहा गया है। अतः स्त्री को परिवार में आदरणीय बताया गया है।
सूर्या के वर्णन को ऋग्वेद में आलङ्कारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ सूर्य एवं चन्द्र को सूर्या के रथचक्र के रूप में वर्णन किया गया है। सूर्य तो सकल भुवनों का दर्शन करता है और चन्द्रमा, मास, ऋतु एवं सम्वत्सर आदि का निर्माण करता है। सूर्य और चन्द्रमा की स्तुति के द्वारा दीर्घायुष्य की कामना की गयी।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Singh, N. (1992). "The vivaha (marriage) Samskara as a paradigm for religio-cultural integration in Hinduism". Journal for the Study of Religion. 5 (1): 31–40. जेस्टोर 24764135.
- ↑ Vivekananda, Swami (2005). Prabuddha Bharata [Awakened India]. Prabuddha Bharata Press. pp. 362, 594. ISBN 978-81-7823-180-8.
- ↑ वैदिक विवाह परम्परा की सूत्रधार
- ↑ सोम और सूर्या के विवाह की कथा