विद्यानंद

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आचार्य श्री विद्यानन्द जी मुनिराज[1] (जन्म 22 अप्रैल 1925)[2] जैन संप्रदाय के एक वरिष्ठ मुनि आचार्य, प्रमुख विचारक, दार्शनिक, लेखक, संगीतकार, संपादक, संरक्षक[3] और एक बहुमुखी जैन धर्म साधु हैं जिन्होंने अपना समस्त जीवन जैन धर्म द्वारा बताए गए अहिंसा (अहिंसा) व अपरिग्रह (अपरिग्रह) के मार्ग को समझने व समझाने में समर्पित किया है। [4][5] वह आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के परम शिष्य हैं और उन्हीं की प्रेरणा एवम् मार्गदर्शन से कई कन्नड भाषा में लिखे हुए प्राचीन ग्रंथों का सरल हिन्दी व संस्कृत में अनुवाद कर चुके हैं। [6] उन्होंने जैन धर्म से संबंधित कई किताबें और लेख भी प्रकाशित किए हैं।[7]

कन्नौज, (उत्तर प्रदेश) में स्थित दिगम्बर जैन 'मुनि विद्यानन्द शोधपीठ' की स्थापना उन्हीं के नाम पर की गई है जो की आज भी भाषा सम्बन्धित शोध का केन्द्र बिन्दु है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवम् विद्वान साहू शांति प्रसाद जैन और डॉ जय कुमारजी उपाध्याय उन्हीं के परम शिष्यों में से है। दिल्ली स्थित 'अहिंसा स्थल' की स्थापना भी उन्ही के करकमलों द्वारा की गई है।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

कर्नाटक के सीमान्त ग्राम शेडवाल में 22 अप्रैल, 1925 को एक शिशु का जन्म हुआ। शेडवाल ग्राम के वासियों व शिशु की माता सरस्वती देवी और पिता कल्लप्पा उपाध्ये ने कल्पना भी न की होगी कि एक भावी निग्र्रन्थ सारस्वत का जन्म हुआ है। यही शिशु सुरेन्द्र कालान्तर में आगे चलकर अलौकिक पुरुष मुनि विद्यानन्द बने।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब सम्पूर्ण विश्व कलह, क्लेश, अज्ञान, हिंसा और अशान्ति की समस्याओं से जूझ रहा था, ठीक उसी समय मानवता व विश्वधर्म अहिंसा की पताका लेकर आगे बढ़े।

अभिषि सम्पन्नता भरे जैन ब्राह्मण परिवार के शिशु सुरेन्द्र का बचपन सामान्य था। सातगौंडा पाटिल उनके बालसखा थे। वेदगंगा और दुधगंगा नदियों में क्रीड़ा में संलग्न दोनों बालसखा अच्छे तैराक बन गए। नदियों का कुशल तैराक सुरेन्द्र संसार सागर का कुशल तैराक सिद्ध हुआ। दानवाड़ में शिक्षा के दौरान सुरेन्द्र की रुचि पढ़ाई लिखाई की अपेक्षा खेल कूद में अधिक रही। खिलाड़ीपन की भावना और नेतृत्व क्षमता के कारण सुरेन्द्र अपने साथियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। चुनौतियों और खतरों से जूझने वाले सुरेन्द्र में स्वाभिमान व संकल्पशक्ति भी कूट-कूट कर भरी हुई थी।

भाषाओं के अध्ययन में सुरेन्द्र की गहरी रुचि रही। दानवाड़ में उसकी प्रारम्भिक शिक्षा मराठी के माध्यम से हुई। इसके बाद उसे शेडवाल के स्कूल में भर्ती किया गया जहाँ शिक्षा का माध्यम कन्नड था। उन्हें कन्नड़ स्कूल से हटा कर शांति सागर आश्रम में भर्ती करा दिया। वहाँ शिक्षा का माध्यम मराठी था, अतः सुरेन्द्र की प्रतिभा निखर आई। आश्रम ने उसके व्यक्तित्व को परिपक्व किया। उसमें अनूठी कर्तव्यनिष्ठा जागी। पीडि़तों और दुखीजनों की मदद करना उसके स्वभाव में शामिल था।

वास्तव में सुरेन्द्र का व्यक्तित्व आरम्भ से ही विलक्षण था। दूसरों को सुख सुविधा देने में आनन्द आता था। उम्र में अपने से छोटों को मदद करना, रोगियों की देखभाल करना तथा दीन दुखियों को ढाढस बँधाना सदैव ही उसे ऐसे काम अच्छे लगते थे। नियति सुरेन्द्र को जीवन पथ पर अभीष्ट दिशा की ओर ले जा रही थी। सुरेन्द्र को मात्र भौतिक उपलब्धियों से कभी सन्तोष नहीं हुआ। उसके मन में चलने वाला अन्तद्र्वन्द्व उसे किसी बड़े उद्देश्य की दिशा में बढ़ने का स्मरण कराता रहता था।

अपने असली लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाने की उनकी इच्छा अडिग थी। धर्म की तरफ उसकी रुझान और वैराग्य वृत्ति छुटपन में भी स्पष्ट नजर आती थी। आजीविका की तलाश में वह पुणे पहुँचे। वहाँ उन्हें अपने मौसा जी की मदद से अमिन्यूशन बनाने वाले कारखाने में काम मिल गया। इसे भाग्य की विडम्बना नहीं तो क्या कहा जाए कि जिसे भविष्य में अहिंसा का उपदेश देना था, उनहे अपनी आजीविका के लिए हथियारों के कारखाने पर निर्भर होना पड़ा। कुछ दिनों बाद ही उन्हें एक बिस्कुट फैक्ट्री में काम मिल गया। पुणे में रहते हुए, सुरेन्द्र व्यापक वैचारिक सम्पर्क में आए। राष्ट्र के मुक्ति युद्ध में शामिल हो गए। वह गांधीजी के विचारों से प्रभावित हुए और ये विचार उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गए।

बीमारी के कारण वह शेडवाल पहुँच गये वहाँ उनका सारा समय चिन्तन मनन में बीतने लगा। गन्तव्य को पहचानने और अंधकार को चीरकर प्रकाश में आने की तड़प उनमें थी। नये कर्तव्य पथ और उदात्त जीवन शैली की खोज के लिए उनके मन द्वारा भी खोज का अनवरत क्रम जारी था। सन् 1942 में जब भारत छोड़ो का देशव्यापी आन्दोलन चला तो सुरेन्द्र भी इसके आह्वान से अछूते नहीं रह सके। संसार के अनुभवों ने, जो प्रायः कड़वे थे, उन्हें अनासक्ति की ओर मोड़ दिया। वैराग्य और ज्ञान के पथ पर सुरेन्द्र की निर्णायक यात्रा शुरू हो गई, यह सन् 1945 की बात थी। अगले ही वर्ष (1946 ई.) में एक अद्भुत संयोग हुआ। संयममूर्ति ज्ञानसूर्य महामुनि आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी ने शेडवाल में वर्षायोग किया। आत्मिक शान्ति के इस मनोज्ञ अवसर से मानो सुरेन्द्र का पुनर्जन्म ही हुआ।

सुरेन्द्र प्रतिदिन मुनिश्री के वचन सुनते और आत्मा के आनन्द में निमग्न हो जाते। आधुनिक वेशभूषा में रहने वाले इस क्रांतिकारी युवक ने सादगी को अपना जीवन क्रम बना लिया। परिचित, मित्र व परिजन इस परिवर्तन को देखकर चिंतित हुए परन्तु कोई भी सुरेन्द्र के मन की थाह नहीं पा सका।

नियमित रूप से ज्ञान साधना के लिए आने वाले इस सुन्दर युवक की तरफ आचार्यश्री महावीरकीर्ति जी का ध्यान जाना स्वाभाविक था। सुरेन्द्र की ज्ञान पिपासा और तर्कणा शक्ति ने उन्हें प्रभावित किया। वे बड़े प्रेमपूर्वक सुरेन्द्र से चर्चा करते और उसके विचारों को सुनकर हर्षित होते। एक दिन बातों ही बातों में सुरेन्द्र ने मुनिश्री के सामने मुनि दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की।

क्षुल्लक दीक्षा[संपादित करें]

मुनिश्री महावीर कीर्ति जी प्रसन्न तो हुए, किन्तु 21 वर्ष की तरुणावस्था को देखकर किंचित् झिझके और बोले-मातापिता की अनुमति प्राप्त कर लो, काम आसान हो जाएगा। ग्रामवासियों के लिए उनका अन्तिम उपदेश चल रहा था। लोगों के मन में एक ही प्रश्न करवट ले रहा था कि सुरेन्द्र अब क्या करेंगे? मुनिजी की पदयात्रा शुरू हुई और लोगों ने देखा कि शिष्य सुरेन्द्र उनके अनुगामी हुए। लोगों ने सुरेन्द्र को समझाया, प्रश्न किए परन्तु उगते हुए सूरज को कोई भला हथेली से रोक सकता है? वे तमदड्डी पहुँचे। उन्होंने आचार्यश्री महावीरकीर्तिजी से पुनः दीक्षा प्रार्थना की। फाल्गुन सुदी तेरस 1946 को उनकी वर्णी दीक्षा क्षुलक पार्श्वकिर्ती के नाम से सम्पन्न हुई। सन् 1946 कुंडपुर से 1962 तक वे शिमोगा में अपने 17 चातुर्मास पूर्ण करने के उपरांत उन्होंने दिगम्बर मुनि दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की।

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अपने जैन दर्शन एवम् शास्त्र व्याख्यान के लिए लोकप्रिय अनुयायियों धर्मावलबियों को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने क्षुलक पार्श्वकिर्ति जी महाराज को एक पालकी में बिठाकर अपने कंधों पर उठाकर एक जुलूस के रूप में नगर भ्रमण कराया।

undapur में वर्ष 1946 तक में शिमोगा वह पूर्ण 17 chaturmas से पहले जा रहा है अंत में शुरू के रूप में मुनि Vidyanand द्वारा आचार्य Deshbhushan जी में वर्ष 1963. उन्होंने इतना लोकप्रिय बनने के लिए अपने व्याख्यान और ब्रीफिंग पर जैन शास्त्रों कि उसकी 15 Chaturmas में Belgam था उत्साह के साथ मनाया जाता है और अपने अनुयायियों को पालकी में उसे पर वहाँ कंधों लिया और उसे शहर के चारों ओर उसे लागू करने के लिए जनता के लिए वर्ष 1960 में.

मुनि दीक्षा[संपादित करें]

17 साल के कठोर तप एवम् जैन आचार्य संघ के अनुशासन और मार्गदर्शन में दिल्ली के चाँदनी चौक क्षेत्र की लच्छूमल जी धर्मशाला, 10 जुलाई 1963 का पावन दिन, पूज्य आचार्यरत्नश्री देषभूषणजी महाराज के समक्ष क्षुल्लक पाश्र्वकीर्ति ने मुनि दीक्षा प्रदान करने के लिए प्रार्थना की तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। 22 जुलाई 1963 दिल्ली जैन पंचायत के पंच, साहू शान्तिप्रसाद जी एवं श्रीमती रमारानी जैन के सहियोग से क्षुल्लक पाश्र्वकीर्ति ने पुनः अपने संकल्प को अपेक्षाकृत अधिक दृढ़ता के साथ दोहराया तो अचर्यारतन श्री देषभूषण जी महाराज ने शुभ नक्षत्र एवम् महुरत देख कर बृहस्पतिवार, 25 जुलाई 1963 को क्षुल्लक पार्श्वकीर्ति जी को एक भव्य आयोजन कर विधि विधान पूर्वक मुनि विद्यानन्द के रूप में दीक्षा दी और अपने संघ में समिलित कर लिया।

पार्श्व कीर्ति के साथ आचार्य रत्न श्री देशभुषण जी

अलंकरण[संपादित करें]

श्वेतपिचिका आचार्य मुनि श्री विद्यानन्द जी, 2010[संपादित करें]

24 जुलाई, 2010 को सिद्धान्तचक्रवर्ती परमपूज्य आचार्यश्री विद्यानन्द जी मुनिराज ने कुन्दकुन्द भारती में आयोजित एक धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि- प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के समय से यह मुनि परम्परा निर्बाध रूप से चली आ रही है। साधु और श्रावक एक दूसरे के पूरक हैं। निश्चय और व्यवहार धर्म यह दो अलग अलग हैं। सूतक और पातक पालना व्यवहार धर्म है।

अनेक महापुरुषों पर संकट आये हैं। भगवान आदिनाथ को भी अशुभ कर्मों ने नहीं छोड़ा और 6 महीने तक आहार की विधि नहीं मिली। अभी कुछ समय पहले ही दिगम्बर साधु समुदाय पर सरकार की ओर से मयूर पंख पर प्रतिबन्ध लगाने की बात को लेकर समाज में चिंता व्याप्त हो गई थी, क्योंकि आदिकाल से दिगम्बर साधु की मुद्रा मयूर पिच्छि एवं कमण्डलु ही है।

जब 2 मई, 2010 में दिगम्बर जैन साधुओं पर संकट आया। सरकार ने मयूर पंख पर प्रतिबन्ध लगाने का अध्यादेश प्रसारित किया, जिस कारण जैन समाज में हड़कम्प मच गया, क्योंकि मयूर पिच्छि तो जैन साधुओं का प्रतीक चिह्न है। ध्यातव्य है कि आचार्यश्री ने मयूर पंखों के प्रतिबंध वाले अध्यादेश के विरोध में माननीया श्रीमती सोनिया गांधी जी, माननीय डाॅ. मनमोहन सिंह (प्रधानमन्त्री), डाॅ. एम . वीरप्पा मोईली (विधि एवं कानून मंत्री) एवं श्री जयराम नरेश (पर्यावरण एवं वन विभाग मंत्री) को पत्र लिखवा कर और पत्रों के साथ आगमों के अनेक प्रमाण, पुरातत्त्वों से प्राप्त अनेक चित्र आदि प्रामाणिक सामग्री भेजकर यह सिद्ध किया कि यह मयूर पंख धार्मिक चिह्न के रूप में मान्य हैं। अतः इस पर से प्रतिबंध हटाना ही उपयुक्त है।

यद्यपि कीसी भी धार्मिक चिह्न पर प्रतिबन्ध लगाना असंवैधानिक है। सरकार ने इसको स्वीकार किया और प्रतिबंध वापस ले लिया। मयूर पंख पर प्रतिबंध की सूचना विदेशों में रहने वाले जैन भक्तों को भी मिली, उन्होंने तत्काल वहाँ से श्वेत मयूर पंख भारत भिजवाये और उनसे निर्मित एक श्वेतपिच्छी तैयार की गई।

उनको श्वेत पिच्छी भेंट की गई और पूज्य उपाध्याय श्री प्रज्ञसागर जी ने कहा कि अब आचार्यश्री जी का नाम श्वेतपिच्छाचार्य होगा। उपस्थित समुदाय ने उसकी अनुमोदना करते हुए श्वेतपिच्छाचार्य के अलंकरण के साथ जयघोष का उच्चारण किया। अब से आचार्यश्री जी का विरूद हुआ श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्द मुनिराज।

आचार्य श्री विद्यानन्द, 1987[संपादित करें]

28 जून, 1987 को एक भव्य आयोजन में आचार्य रत्न श्री देश भूषण जी महाराज ने मुनि विद्यानन्द जी को आचार्य पद प्रदान किया

सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य श्री विद्या नन्द, 1979[संपादित करें]

17 दिसंबर 1979 इंदौर (चतुः संघ) संघ

एलाचार्य श्री विद्यानन्द जी, 1978[संपादित करें]

17 अगस्त 1978 को दिल्ली में भव्य आयोजन के तहत आचार्यरत्न श्री देशभुशन जी ने एलाचार्य उपाधि प्रदान की

उपाध्याय श्री विद्यानन्द जी, 1974[संपादित करें]

8 दिसंबर 1974 में एक आयोजन के तहत दिल्ली में आचार्य रत्न श्री देश भूषण जी ने उपाध्याय के रूप में सम्मानित किया

मुनि श्री विद्यानन्द, 1964[संपादित करें]

आचार्य रत्न श्री देश भूषण जी 25 जुलाई, 1963 को दिल्ली में एक भव्य आयोजन कर अपने संघ में मुनि श्री विद्यानन्द के नामकरण से सम्लित किया

क्षुलक श्री पार्श्वकिर्ती जी, 1946[संपादित करें]

15 अप्रैल 1946, कर्नाटक में अपने वर्षायोग चतुर्मास के अंतर्गत आचार्य महावीर कीर्ति जी ने युवा श्री सुरेन्द्र उपाध्याय को क्षुलक पार्श्वकिर्ती के रूप में ब्रह्मचर्य पूर्ण क्षुलक दीक्षा प्रदान की और अपने संघ में शामिल कर लिया।

चातुर मास / वर्षायोग[संपादित करें]

क्षुल्लक पार्श्वकीर्ती[संपादित करें]

  1. कोनूर, बेलगाम, कर्नाटक 1946
  2. हुमचा, कर्नाटक 1947
  3. कुंभोज, महाराष्ट्र 1948
  4. शेडबाल, बेलगाम, कर्नाटक 1949
  5. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1950
  6. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1951
  7. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1952
  8. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1953
  9. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1954
  10. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1955
  11. शेडबाल, बेलगाम कर्नाटक 1956
  12. हूमचा, कर्नाटक 1957
  13. सुजानगढ़, राजस्थान 1958
  14. सुजानगढ़, राजस्थान 1959
  15. बेलगाम, कर्नाटक 1960
  16. कुंदादरी, कर्नाटक 1961
  17. शिमोगा, कर्नाटक 1962

मुनि विद्यानन्द[संपादित करें]

  1. लाल मंदिर, दिल्ली 1963
  2. जयपुर, राजस्थान 1964
  3. फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश 1965
  4. सामंत भद्रा विद्यालय, दिल्ली 1966
  5. मेरठ, उत्तर प्रदेश 1967
  6. कन्नौज, उत्तर प्रदेश 1968
  7. सहारनपुर, उत्तर प्रदेश 1969
  8. श्रीनगर, उत्तराखंड 1970
  9. इंदौर, मध्य प्रदेश 1971
  10. श्री महावीरजी, राजस्थान 1972
  11. मेरठ, उत्तर प्रदेश 1973
  12. जैन बाल आश्रम, दिल्ली 1974

उपाध्याय विद्यानन्द[संपादित करें]

  1. जगध्री, हरियाणा 1975
  2. चांदनी चौक, दिल्ली 1976
  3. कन्नौज, उत्तर प्रदेश 1977
  4. पहाड़ी धीरज, दिल्ली 1978

एलाचार्य विद्यानन्द[संपादित करें]

  1. इंदौर, मध्य प्रदेश के 1979
  2. Shravanabelagola, कर्नाटक 1980
  3. Shravanabelagola, कर्नाटक 1981[7]
  4. Kothli Shantigiri, कर्नाटक 1982
  5. बाहुबली कुमभोज, महाराष्ट्र 1983
  6. तीन मूर्ति, बोरीवली, मुंबई 1984
  7. गोमत गिरी, इंदौर 1985
  8. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली 1986

आचार्य विद्यानन्द[संपादित करें]

  1. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1987
  2. Kothli Shantigiri, कर्नाटक 1988
  3. Kothli Shantigiri, कर्नाटक 1989
  4. बारामती, महाराष्ट्र 1990
  5. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1991
  6. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1992
  7. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली, 1993
  8. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1994
  9. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1995
  10. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 1996
  11. जयपुर, राजस्थान 1997
  12. नई रोहतक रोड, दिल्ली 1998[8]
  13. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली 1999
  14. जैन बाल आश्रम, दिल्ली 2000
  15. अहिंसा स्थल, नई दिल्ली 2001
  16. आर. के. पुरम, नई दिल्ली 2002
  17. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 2003
  18. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली 2004
  19. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 2005
  20. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली 2006
  21. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 2007
  22. रिषभ विहार, नई दिल्ली 2008[9]
  23. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली 2009
  24. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली 2010
  25. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली, 2011
  26. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली 2012
  27. ग्रीन पार्क, नई दिल्ली 2013
  28. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली, 2014
  29. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली 2015
  30. कुंद कुंद भारती, नई दिल्ली 2016

पंच कल्याणक महोत्सव[संपादित करें]

उपलब्धियाँ[संपादित करें]

  • सन् १९६६-६७ में जैन भजनों ओर गीतों का ग्रमाफोन रिकॉर्ड डिस्क द्वारा प्रचार एवम् प्रसार।
  • सन् १९७१ में श्रीनगर स्थित दिगम्बर जैन मंदिरों और जिनालयों का जीर्णोद्धार, संग्रक्षण ओर रखरखाव के कार्यों में विशेष योगदान।
  • सन् १९७४ जैन धर्म के स्मारकों, प्रतीक चिन्हों ओर ध्वजा के निर्माण और संकलन में विशेष भूमिका।
  • सन् १९७४ धर्मचक्र प्रवर्तन ।
  • सन् १९७४ में भगवान महावीर के 2500th निर्वाण महोत्सव का भव्य आयोजन ओर निर्वाण वर्ष १९७५ में विभिन्न आयोजनों में प्रमुख भूमिका।
  • संत समागम के उपलक्ष्य में आचार्य श्री तुलसी (Jain monk) एवम् युवा Mahāprajña[10] से विशेष भेंट वार्ता ओर विचार विमर्श।
  • सन् १९७६ में समयसार, द्रव्यसार एवम् छह ढाला आदि धार्मिक ग्रंथों का ऑडियो कैसेट के रूप में प्रचार ओर प्रसार। .
  • सन् १९७७ में समयसार, द्रव्यसार एवम् छह ढाला आदि धार्मिक ग्रंथों पर आधारित प्रवचन एवम् व्याख्यानों का ऑडियो कैसेट के रूप में प्रचार ओर प्रसार।
  • सन् १९७८ में समयसार स्त्रोत पर आधारित श्लोकों का भजनों ओर गीतों के रूपमें संगीतमय ऑडियो कैसेट के रूप में प्रचार ओर प्रसार।
  • सन् १९७८ में आचार्य कुंदकुंद के नाम से कुंदकुंद भारती संस्थान की स्थापना एवम् निर्माण कार्य प्रारंभ करने में विशेष योगदान।
  • सन् १९८० में जन मंगल कलश प्रवर्तन।
  • सन् १९८१ में सहस्त्र शताब्दी समिति के तत्वावधान से श्रवणबेलगोला स्थित बाहुबली महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम आयोजन में प्रमुख योगदान ।.[11]
  • सन् १९८२ में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत श्रवणबेलगोल पर्वत पर स्थित ५७ फुट ऊंची बाहुबली प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक एवम् धर्मस्थल, कर्नाटक में पंचकल्याणक का एक साथ सफलता पूर्वक आयोजन।[12]
  • सन् १९८३-८४ कुंभोज, कोल्हापुर स्थित सिद्धक्षेत्र मैं अवैध अतिक्रमण को हटवाने में शांतिपूर्ण प्रदर्शन एवं समझौता करवाने में प्रमुख भूमिका। 1983~84.
  • सन् १९८६ में गोमटगिरी, इंदौर और फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश मैं भव्य खड़ग आसन जैन प्रतिमायों का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया।
  • सन् १०८७ में कुंदकुंद भारती में भारत धायान साधना केन्द्र की स्थापना।
  • सन् १९८७ में कुंदकुंद भारती परिसर मैं नवनिर्मित भवन का उद्घाटन।
  • सन् १९८८ में आचार्य कुंदकुंद के 2000th दीक्षा जयंती महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन।
  • सन् १९८९ में बावनगजा स्थित भगवान आदिनाथ की ८४ फुट ऊंची खड़ग आसन प्रतिमा का जीर्णोद्धार ओर संगरक्षण के पश्चात महामस्तकाभिषेक महोत्सव का आयोजन।
  • Since 1994 even before Jharkhand acquired Shikharji, leaving the rights of Jains in doubt. Acharya ji is actively monitoring and guiding the community and administration for a worthy resolution.
  • सन् १९९६ में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के द्वारा प्राकृत भाषा में विभिन्न कोर्स या पाठ्यक्रमों की संचालन प्रारंभ करने में विशेष योगदान।
  • सन् १९९८ में श्री महावीरजी अतिक्ष्य क्षेत्र में महामस्तकाभिषेक महोत्सव का आयोजन।
  • सन् १९९८ में कुंदकुंद भारती परिसर मैं खारवेल भवन का शिलान्यास।
  • सन् २००१ में अहिंसा स्थल स्थित भगवान महावीर की प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक महोत्सव आयोजित करवाया।
  • सन् २००१ में युनेस्को द्वारा आयोजित सर्व धर्म सभा में विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत "शांति ओर अहिंसा की परंपरा" पर प्रवचन ओर व्याख्यान। [13]
  • वर्ष 2003 को चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के 131 में जन्म शताब्दी वर्ष को "संयम वर्ष" के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन। .
  • सन 2004 में भगवान महावीर के जन्म स्थल वसोकुंड में विद्याय कुंदनपुर पर बिहार के वैशाली जिले में विशाल मंदिर परिसर की आधारशिला का शिलान्यास कार्यक्रम आयोजित करवाया।
  • सन् २००६ में श्रवणबेलगोला स्थित बाहुबली महामस्तकाभिषेक महोत्सव आयोजन में विशेष मार्गदर्शन और सहयोग।.
  • सन् २००६ में भरत क्षेत्र के अंतर्गत नजफगढ़ दिल्ली में भव्य प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक और पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन।
  • सन् १९९१ में हरियाणा के रानिला पौराणिक क्षेत्र में खुदाई के दौरान निकली भगवान ऋषब्देव की प्राचीन जैन प्रतिमा का एलाचार्य श्रुत सागर जी मुनिराज के सहयोग से प्राणप्रतिष्ठा और पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन। [14][15]
  • सन् २००७ में अहिंसा पर्यावरण साधना मन्दिर के अनावरण कार्यक्रम के दौरान जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी संपूर्णानंद सरस्वती महाराज और बौद्ध धर्म के १७वे दलाई लामा के साथ विचार विमर्श विशेष प्रवचन और व्याखान।[16] [17]
  • सन् २००७ में धर्मस्थल, कर्नाटक में महामस्तकाभिषेक महोत्सव का आयोजन।
  • सन् २००८ में बावनगजा स्थित भगवान आदिनाथ की विशाल एवम् प्राचीन खड़ग आसान प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक और पंचकल्याण महोत्सव का आयोजन। .
  • सन् २००८ में एलाचार्य श्रुत सागर जी और उपाध्याय वसुनंदी जी के साथ मथुरा चौरासी, उत्तर प्रदेश स्थित जम्बू स्वामी की विशाल प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक और पंचकल्याणक महोत्सव का भव्य आयोजन।
  • सन् २०९० में कल्प कतंत्रा पुस्तकालय की कुंदकुंद भारती परिसर में स्थापना। [18] [19]
  • प्राकृत भाषा विदों और विशेषज्ञों के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार की घोषणा।

ग्रन्थ और लेख[संपादित करें]

अधिकांश किताबें, लेख और संपादकीय द्वारा लिखित आचार्य Vidyanand जी रहे हैं सरल हिंदी हालांकि उनमें से कुछ का उपयोग ठेठ प्राचीन प्राकृत और संस्कृत श्लोक और सूत्र के लिए एक संदर्भ के रूप में उल्लेख किया है कि वेदों और पुराणों मेंहै। उन्होंने यह भी सलाह विद्वानों में उनकी अग्रिम भाषा के अध्ययन के साथ अपने अनुवाद कौशल.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Acharya Shri 108 Vidyanand Ji Maharaj 
  2. Studies in Jaina history and Culture: Disputes and Dialogues p. 352
  3. "Sravan". 
  4. THE GENTLE CONQUERORS 
  5. Jaina Iconography By Jyotindra Jain, Eberhard Fischer, Published 1978 BRILL
  6. Shri Acharyaratna Deshbhooshan Shikshan Prasarak Mandal's Mahavir Mahavidyalaya, Kolhapur, archived from the original on 20 June 2008 
  7. Nitin H.P. "Gallery - Category: Shravanabelagola - Indragiri - Image: Vidyananda cave, Acharya 108 Sri Vidyanandaji Maharaj did his meditation regularly in this cave during the 1981 Mahamasthakabhisheka."
  8. "75th Birthday of Acharya Vidyananda". 
  9. "Jainism Ahimsa News Religious Non-Violence Celebrities Literature Philosophy Matrimonial Institutions". 
  10. "HereNow4U.net :: Books Online - Acharya Tulsi - Fifty Years Of Selfless Dedication - Glimpses Of Greatness - Acharya Tulsi & Celebrities - Acharya Shri Deshbhushan - Muni Vidyanandji".
  11. "Ancient ritual of consecrating Bahubali gives Shravana Belgola a carnival look : Cover Story - इंडिया टुडे". 
  12. "Mangalorean.com - Mangalore News Articles, Classifieds to Around the World". 
  13. "Culture of Peace and Non-Violence".
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