विदिशा के दर्शनीय स्थल

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विदिशा मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी है। ऐतिहासिक नगरी होने के कारण विदिशा की प्राचीन इमारते और स्थापत्य दर्शनीय हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ प्राकृतिक स्थल और धार्मिक महत्व के स्थान भी देखने के योग्य हैं। विदिशा के निकटवर्ती छोटे छोटे नगर अपने में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर समेटे हुए हैं। अतः इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए इनको देखना भी रुचिकर है।

प्राकृतिक स्थल[संपादित करें]

लोह्याद्रि (लुहांगी) गिरिश्रेणी

विदिशा नगर के मध्य रेलवे स्टेशन के निकट ही अत्यन्त कठोर बलुआ पत्थर से निर्मित यह स्थान १७० फीट ऊँचा है। इसे अब "राजेन्द्र गिरि' के नाम से जाना जाता है। यह अत्यंत मनोरम स्थान है। इसके चारों ओर रायसेन का किला, साँची की पहाड़ियाँ, उदयगिरि की श्रेणियाँ, वैत्रवती नदी व उनके किनारों पर लगी वृक्षों की श्रृंखलाएँ अत्यंत सुदर दिखती है। पहले की तरह आज भी यहाँ मेला लगता है। इस स्थान का इतिहास महाभारत कालीन है। अश्वमेघ-यज्ञ के समय पाण्डवों ने इस पहाड़ी पर अधिपत्य कर लिया था। जब यहाँ के राजा ने अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया, तब उसके रक्षार्थ आये कृष्ण, भीम व कर्ण के पुत्रों ने राजा से युद्ध कर उन्हें पराजित किया।

चरणतीर्थ

विदिशा में स्थित सिद्ध महात्माओं की तपस्थली रही, यह भूमि पर्यटन की दृष्टि से सुंदर स्थान है। एक अवधारणा के अनुसार भगवान राम के चरण पड़ने के कारण इस तीर्थ का नाम चरणतीर्थ पड़ा, लेकिन साहित्यिक प्रमाण बताते हैं कि अयोध्या से लंका जाने के मार्ग में यह स्थान नहीं था। यह धारणा पूर्णरुपेण मि है। कुछ विद्वानों के मतानुसार यह स्थान भृगुवंशियों का केंद्र स्थल था। इस कुंड में च्वयन ॠषि ने तपस्या की थी। पहले इसका नाम च्वयनतीर्थ था, जो कालांतर में चरणतीर्थ के नाम से जाना जाने लगा।

स्थापत्य[संपादित करें]

किला

यह किला पत्थरों के बड़े-बड़े खंडों से बना हुआ है। इसकी चारों तरफ बड़े-बड़े दरवाजे का प्रावधान था। चारों तरफ स्थित किले की मोटी दीवार पर जगह-जगह पर तोप रखने की व्यवस्था थी। किले के दक्षिण पूर्व के दरवाजे की तरफ अभी भी कुछ तोपें देखी जा सकती है। इस किला का निर्माणकाल स्पष्ट नहीं है। फणनीसी दफ्तर के रिकार्ड के अनुसार इसे औरंगजेब द्वारा बनवाया गया कहा गया है, लेकिन कई विद्धानों का यह मानना है कि किला बहुत प्राचीन है। एक संभावना के अनुसार इसे ई. पू. सदी के पशुओं के एक धनी व्यापारी साह भैंसा साह ने बनवाया था। इसी वंश के साह की पुत्री से अशोक का विवाह हुआ था।

विजय मंदिर

किले की सीमा के अंदर पश्चिम की तरफ अवस्थित इस मंदिर के नाम पर ही विदिशा का नाम भेलसा पड़ा। सर्वप्रथम इसका उल्लेख सन् १०२४ में महमूद गजनी के साथ आये विद्धान अलबरुनी ने किया है। अपने समय में यह देश के विशालतम मंदिरों में से एक माना जाता था। साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार यह आधा मील लंबा- चौड़ा था तथा इसकी ऊँचाई १०५ गज थी, जिससे इसके कलश दूर से ही दिखते थे। दो बाहरी द्वारों के भी चिंह मिले हैं। सालों भर यात्रियों का मेला लगा रहता था तथा दिन- रात पूजा आरती होती रहती थी। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण चालुक्य वंशी राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति ने अपनी विदिशा विजय के उपरांत किया। नृपति के सूर्यवंशी होने के कारण भेल्लिस्वामिन (सूर्य) का मंदिर बनवाया गया। इस भेल्लिस्वामिन नाम से ही इस स्थान का नाम पहले भेलसानी और कालांतर में भेलसा पड़ा। अपनी विशालता, प्रभाव व प्रसिद्धि के कारण यह मंदिर हमेशा से मुस्लिम शासकों के आँखों का कांटा बना रहा। कई बार इसे लूटा गया और तोड़ा गया और वहाँ के श्रद्धालुगणों ने हर बार उसका पुननिर्माण कर पूजनीय बना डाला।

उदयगिरि

उदयगिरि विदिशा से वैसनगर होते हुए पहुँचा जा सकता है। नदी से यह गिरि लगभग १ मील की दूरी पर है। पहाड़ी के पूरब की तरफ पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाई गई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर- मूर्तियों के प्रमाण मिलते हैं, जो भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। उत्खनन से प्राप्त ध्वंसावशेष अपनी अलग कहानी कहते हैं। उदयगिरि को पहले नीचैगिरि के नाम से जाना जाता था। कालिदास ने भी इसे इसी नाम से संबोधित किया है। १० वीं शताब्दी में जब विदिशा धार के परमारों के हाथ में आ गया, तो राजा भोज के पौत्र उदयादित्य ने अपने नाम से इस स्थान का नाम उदयगिरि रख दिया। उदयगिरि में कुल २० गुफाएँ हैं। इनमें से कुछ गुफाएँ ४वीं- ५वीं सदी से संबद्ध है। गुफा संख्या १ तथा २० को जैन गुफा माना जाता है। गुफाओं की प्रस्तर की कटाई कर छोटे- छोटे कमरों के रूप में बनाया गया है। साथ- ही- साथ मूर्तियाँ भी उत्कीर्ण कर दी गई हैं। वर्तमान में इन गुफाओं में से अधिकांश मूर्ति- विहीन गुफाएँ रह गई हैं। ऐसा यहाँ पाये जाने वाले स्थानीय पत्थर के कारण हुआ है। पत्थर के नरम होने के कारण खुदाई का काम आसान था, लेकिन साथ- ही- साथ यह मौसमी प्रभावों को झेलने के लिए उपयुक्त नहीं है।

समीपवर्ती ऐतिहासिक स्थल[संपादित करें]

बेसनगर

बेसनगर मध्यभारत का एक प्राचीन नगर है, जिसे पाली बौद्ध ग्रंथों में वेस्सागर तथा संस्कृत साहित्य में विदिशा के नाम से पुकारा गया है। भिलसा रेलवे स्टेशन से पश्चिम की तरफ करीब २ मील की दूरी पर स्थित, यह स्थान पुरातत्वेत्ताओं की सांस्कृतिक भूमि कही जा सकती है। यह वेत्रवती और बेस नदी से घिरा हुआ है तथा शेष दो तरफ की भूमि पर प्राचीर बनाकर नगर को एक किले का रूप दे दिया था। प्राचीन काल का वैभव संपन्न यह नगर, अब टूटी- फूटी मूर्तियाँ व कलायुक्त भवनों का खंडहर मात्र रह गया है। यहाँ पाये जाने वाले भग्नावशेष ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से ११ वीं शताब्दी तक की कहानी कहते हैं। अब भी इस स्थान पर ही एक तरफ "बेस' नामक ग्राम बचा हुआ है।

हेलिओडोरस का गरुण स्तम्भ -

हेलिओडोरस स्तंभ (Heliodorus pillar) भारत के मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में आधुनिक बेसनगर के पास स्थित पत्थर से निर्मित प्राचीन स्तम्भ है। इसका निर्माण ११० ईसा पूर्व हेलिओडोरस (Heliodorus) ने कराया था जो भारतीय-यूनानी राजा अंतलिखित (Antialcidas) का शुंग राजा भागभद्र के दरबार में दूत था। य स्तम्भ साँची के स्तूप से केवल ५ मील की दूरी पर स्थित है।

यह स्तंभ लोकभाषा में खाम बाबा के रूप में जाना जाता है। एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया, यह स्तंभ ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्तंभ पर पाली भाषा में ब्राम्ही लिपि का प्रयोग करते हुए एक अभिलेख मिलता है। यह अभिलेख स्तंभ इतिहास बताता है। नवें शुंग शासक महाराज भागभद्र के दरबार में तक्षशिला के यवन राजा अंतलिखित की ओर से दूसरी सदी ई. पू. हेलिओडोरस नाम का राजदूत नियुक्त हुआ। इस राजदूत ने वैदिक धर्म की व्यापकता से प्रभावित होकर भागवत धर्म स्वीकार कर लिया।

सिरोंज

यह स्थान विदिशा से ५० मील की दूरी पर एक तहसील है। मध्यकाल में इस स्थान का विशेष महत्व था। कई इमारतें व उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ इस बात का प्रमाण है। सिरोंज के दक्षिण में स्थित पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर है। इसे उषा का मंदिर कहा जाता है। इसी नाम के कारण कुछ लोग इसे बाणासुर की राजधानी श्रोणित नगर के नाम से जानते थे। संभवतः यही शब्द बिगड़कर कालांतर में "सिरोंज' हो गया। नगर के बीच में पहले एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जो अब ध्वस्त हो चुकी है, इसे रावजी की हवेली के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण संभवतः मराठा- अधिपत्य के बाद ही हुआ होगा। ऐसी मान्यता है कि यह मल्हाराव होल्कर के प्रतिनिधि का आवास था।

लटेरी

यह स्थान सिरोंज से कुछ मील की दूरी पर विदिशा की एक तहसील का मुख्यालय है। एक समय यह स्थान घनघोर जंगलों के महावन से घिरा हुआ था। यहाँ प्राचीन नंद काल के समय के नंदवंशी अहीर ठाकुर बसे हुए हैं।

उदयपुरा

यह स्थान बीना और विदिशा के बीच, विदिशा से लगभग २० कोस की दूरी पर स्थित है। वर्तमान में एक छोटे से गाँव के रूप में जाने जाना वाला यह स्थान ऐतिहासिक समय में विशेष महत्व का था। धार राज्य के परमारवंशीय राजा उदयदित्य के समय में इसका काफी विकास हुआ। यहाँ मिले कई हिंदु व मुस्लिम स्मारकों का अस्तित्व इस स्थान की प्राचीनता का प्रमाण है।

ग्यारसपुर

संपूर्ण दशार्ण क्षेत्र में ग्यारसपुर को विदिशा के बाद सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान कहा जाता है। यह विदिशा से पूर्वोत्तर दिशा में २३ मील की दूरी पर एक पहाड़ी की उपत्यका में बसा हुआ है। इसके इर्द- गिर्द मिले अवशेषों से पता चलता है कि यहाँ बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण तीनों संप्रदायों का प्रभाव रहा है।

शमसाबाद

शमशाबाद का पुराना नाम होहर (पहाड़ी) था, जिसपर बड़गू ठाकुरों का कब्जा था१ शम्स खाँ ने पहले इनसे मित्रता की तथा बाद में धोखे से मार डाला। इस प्रकार १७ वीं सदी में शम्स खाँ के नेतृत्व में मुसलमानों ने इसपर कब्जा कर लिया। उसी के नाम पर इसका नाम शमशाबाद पड़ा। उसने एक छोटी सी गढ़ी बनाई, जिसकी पूर्वी द्वार नदी की ओर थी तथा इसके उत्तरी द्वार के तरफ कानूनगोओं की हवेली थी। दोनों दरवाजे २० वीं सदी के तीसरे दशक में गिर गये।

सांची

विश्वप्रसिद्ध बौद्ध स्तूपों के लिए जाना जाने वाला साँची, विदिशा से ४ मील की दूरी पर ३०० फीट ऊँची पहाड़ी पर बसा है। प्रज्ञातिष्य महानायक थैर्यन के अनुसार यहाँ के बड़े स्तूप में स्वयं भगवान बुद्ध के तथा छोटे स्तूपों में भगवान- बुद्ध के प्रिय शिष्य सारिपुत (सारिपुत्र) तथा महामौद्ग लायन समेत कई अन्य बौद्ध भिक्षुओं के धातु रखे हुए हैं। निर्माण- कार्य में राजा तथा श्रद्धालु- जनता की सहभागिता रही है।

बढ़ोह

बढ़ोह पठारी वास्तव में पास- पास लगे दो गाँव है। यह कुल्हार रेलवे स्टेशन से १२ मील की दूरी पर पुरब की तरफ एक छोटी- सी पहाड़ी की तलहटी में बसा है। दोनों गाँवों के मध्य में एक रमणीय सरोवर है। बढ़ोह के दक्षिण में एक दूसरा सरोवर है। इस सरोवर के चारों तरफ मिले कई मंदिरों के अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि मध्यकाल में यह एक समृद्ध नगर हुआ करता था तथा निकट स्थित पठारी, जहाँ कई अन्य स्मारक मिले हैं, इसी नगर का एक हिस्सा था। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार इस नगर का प्राचीन नाम बटनगर था। लेकिन इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है। यहाँ के मध्यकालीन के स्थानीय राजा तथा पुराने स्मारकों के निर्माता के बारे में कम जानकारी प्राप्त होती है।

इसके अतिरिक्त भद्दिलपुर, बासौदा तथा मरखेड़ा स्थल भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।