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विजयराघवाचार्य

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चक्रवर्ती विजयराघवाचारी
जन्म चक्रवर्ती विजयराघवाचारियार
18 जून 1852
पोन विलैन्धा, चेंगलपट्टु जिला, मद्रास प्रेसिदेन्सी
मौत 19 अप्रैल 1944(1944-04-19) (उम्र 91 वर्ष)
पेशा राजनेता

चक्रवर्ती विजयराघवाचार्य (Chakravarti Vijayaraghavachariar ; 18 जून 1852 – 19 अप्रैल 1944) भारत के एक राजनेता थे। वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे। उन्हें 'दक्षिण भारत का सिंह' कहा जाता है। उनकी ख्याति तब हुई जब उअन्के ऊपर सलेम (अब तमिलनाडु में है) में हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़काने के झूठे आरोप लगाये गये थे और उनके विरुद्ध उन्न्होंने अपील करके लड़ाई जीती। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ी और अंततः स्वयं को निर्दोष सिद्ध किया। इस विजय ने उन्हें 'दक्षिण भारत का सिंह' की उपाधि दिलवायी।

उन्होंने 1882 में सलेम नगर परिषद के सदस्य के रूप में राजनीति में प्रवेश किया। राष्ट्रीय मीडिया में उनकी प्रमुखता और सिविल सेवक और सुधारक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम के साथ उनकी मित्रता के कारण उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पाअरम्भिक सत्रों में आमंत्रित किया गया। 1920 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे।

स्वराज संविधान के निर्माण में उन्होंने महती भूमिका निभायी। वे कांग्रेस की प्रचार समिति के सदस्य थे और इस प्रकार उन्होंने जनता के बीच पार्टी की विचारधाराओं का प्रसार किया। सन 1931 में वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी चुने गये थे।

आरम्भिक जीवन

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विजयराघवचार्य का जन्म 18 जून 1852 को मद्रास प्रेसीडेंसी के हैदराबाद जिले के नालगोंधा गांव में एक अयंगर ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता, सदागोपचार्य, एक पुजारी थे। उन्होंने अपने बेटे को एक रूढ़िवादी धार्मिक आस्तिक के रूप में पाला। बहुत कम उम्र में, विजयराघवचार्य को अपने गांव के एक स्कूल में भेजा गया जहां उन्होंने संस्कृत और वेदों का अध्ययन किया। उनकी अंग्रेजी शिक्षा बारह वर्ष की उम्र में शुरू हुई। उन्होंने अमरावती मंडल हाई स्कूल में प्रवेश लिया और 1870 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, वे मद्रास प्रेसीडेंसी में दूसरे स्थान पर रहे। अगले वर्ष वे मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रविष्ट हुए, 1875 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, और उसी वर्ष वहां व्याख्याता नियुक्त हुए। उन्हें मैंगलोर के गवर्नमेंट कॉलेज में स्थानांतरित कर दिया गया और तीन वर्ष बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में, वह सलेम म्युनिसिपल कॉलेज में अंग्रेजी और गणित के व्याख्याता के रूप में शामिल हुए।

अधिवक्ता के रूप में करीयर

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सलेम म्युनिसिपल कॉलेज में अपने समय के दौरान विजयराघवचार्य ने औपचारिक कक्षाओं में भाग लिये बिना निजी तौर पर कानून की परीक्षा दी और 1881 में एक अधिवक्ता के रूप में अर्हता प्राप्त की।

सलेम दंगा

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यह भी देखेंः सलेम दंगा (1882)

1882 में सलेम शहर में एक दंगा भड़क गया। विजयराघवाचार्य पर हिंसा भड़काने का आरोप लगा, उन्हें दस वर्ष के कारावास का दण्ड दिया गया। उन्होंने न्यायालय में उन परलगे आरोपों का सामना किया और अंततः अपनी निर्दोषता सिद्ध की। बाद में, वकालत में अपनी दक्षता के माध्यम से उन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल में दंगों के दोषी अन्य लोगों को रिहा करने की लॉर्ड रिपन से याचना की जिसमें उन्हें सफलता मिली।

उन्होंने सलेम की नगर परिषद की सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने पर आपत्ति जताई। वे दंगा की अवधि के दौरान इसके सदस्य थे। उनकी अपील के परिणामस्वरूप, उन्हें न केवल नगर परिषद में बहाल किया गया, बल्कि उन्हें परिषद से हटाने के लिए नाममात्र क्षति के रूप में भारत के राज्य सचिव से 100 रुपये की राशि भी प्राप्त हुई। उन्होंने उन गवाहों के खिलाफ भी कार्रवाई की, जिन्होंने उनके खिलाफ झूठी गवाही दी थी, और उन्हें दोषी ठहराया।

1882 के सलेम दंगों ने विजयराघवचार्य को रातोंरात प्रसिद्ध कर दिया। दंगा मामले को भारतीय राष्ट्रीय मीडिया में अत्यधिक प्रचारित किया गया और समाचार पत्रों ने उन्हें नागरिक स्वतंत्रता के एक महान चैंपियन के रूप में सम्मानित किया। इस प्रकार उन्हें "दक्षिण भारत का शेर" और "सलेम का नायक" कहा जाने लगा।

राजनीति में प्रवेश

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विजयराघवचार्य का सार्वजनिक जीवन में प्रवेश 1882 में सलेम नगर परिषद की सदस्यता के साथ शुरू हुआ। 1895 में उन्हें मद्रास विधान परिषद के लिए चुना गया, जिसमें उन्होंने 1901 तक छह साल तक सेवा की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

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जब 1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तो विजयराघवचारी विशेष आमंत्रित के रूप में इस अधिवेशन में शामिल हुए। वे कांग्रेस के संस्थापक ए. ओ. ह्यूम के निकट सहयोगी थे। दिसंबर 1885 से पहले ही विजयराघवचार्य ने ह्यूम को सुझाव दिया था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय संगठन को दृष्टिकोण में राजनीतिक होना चाहिए तथा जनता की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने महसूस किया कि तभी इस तरह के एक निकाय का प्रभाव पूरे देश में फैल सकता है। उन्होंने कांग्रेस के बंबई सत्र में भाग लिया और 1887 में वह उस समिति के सदस्यों में से एक थे जिसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संविधान का मसौदा तैयार किया था। उनका कांग्रेस में बहुत प्रभाव था, और कांग्रेस के इतिहास में अधिकांश शुरुआती नाम उनके मित्र या सहकर्मी थे। शुरुआती दिनों में उनके परामर्श और नेतृत्व की कांग्रेस में बहुत मांग थी। लखनऊ में 1899 में हुए कांग्रेस के पंद्रहवें सत्र में उन्हें कांग्रेस की प्रचार समिति का सदस्य बनाया गया था। इस समिति के माध्यम से उनका व्यापक राष्ट्रीय प्रभाव रहा और उन्होंने देश भर में कांग्रेस के संदेश को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस समिति के कार्यों का ही परिणाम था कि आम जनता कांग्रेस के साथ जुड़ी।

कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ संबंध

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कांग्रेस में विजयराघवचार्य के करीबी सहयोगियों में दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, डॉ. अंसारी, मौलाना आजाद, हकीम अजमल खान, लाला लाजपत राय, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई और मोतीलाल नेहरू आदि थे।

महात्मा गांधी की अहिंसक विचारधाराओं के आगमन के साथ, कांग्रेस के पुराने उदारवादियों और नए चरमपन्थियों के बीच वैचारिक दरार आ गई। विजयराघवचार्य एक राष्ट्रवादी थे और नरमपन्थी कांग्रेस की नीति उन्हें पसन्द नहीं थी। इसलिए, सूरत सत्र के बाद कांग्रेस के विभाजन के बाद वह कांग्रेस से अलग ही रहे। फिर भी, बाद में गांधी के संदेश को ले जाने के लिए वे कांग्रेस में शामिल हो गए।

उनके राजनीतिक करियर का शिखर तब आया जब 1920 में उन्हें नागपुर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र की अध्यक्षता करने के लिए चुना गया, जहां अहिंसक असहयोग के माध्यम से पूर्ण स्वराज की गांधी की वकालत पर बहस हुई और इसे स्वीकार कर लिया गया। उन्होंने अपनी शक्तिशाली वाणी से चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू को उनके द्वारा तैयार किए गए परिषद प्रवेश कार्यक्रम के प्रश्न पर कई शब्दों में लड़ाई लड़ी। वह 1929 में देश का दौरा करने वाले साइमन कमीशन के विरोध में भी अग्रणी थे। उन्होंने कांग्रेस के लिए संविधान तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू के तहत मिलने वाली समिति में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने साइमन आयोग के बाद जारी भारतीय गतिरोध में हस्तक्षेप करने और मध्यस्थता करने के लिए लीग ऑफ नेशंस से अपील की। उन्होंने लीग ऑफ नेशंस को मानवता की आशा माना।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए संविधान

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इससे पहले 1913 में उन्हें शाही विधान परिषद के लिए चुना गया था। इसके साथ वे 1916 तक जुड़े रहे। दिल्ली में उन्होंने मदन मोहन मालवीय, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे महान नेताओं के साथ घनिष्ठ सहयोग में काम किया।

दिसंबर 1887 में मद्रास में आयोजित कांग्रेस के तीसरे सत्र में बदरुद्दीन तैयबजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संविधान तैयार करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। विजयराघवचार्य इस समिति के प्रमुख सदस्य थे। इन्होंने ही कांग्रेस के संविधान का मसौदा तैयार किया जो भारत के लिए स्वराज संविधान बन गया। उन्होंने इस कार्य को बहुत सावधानी और क्षमता के साथ किया और अपने सभी सहयोगियों की सराहना हासिल की।

उपलब्धियां तथा सामाजिक दृष्टिकोण

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विजयराघवचार्य ने कन्याओं के लिए किशोरावस्था के बाद विवाह की वकालत की और बेटी को अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी का अधिकार भी दिया। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द को अस्पृश्यता विरोधी कार्यों में बहुत सहायता की। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के कारण अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने भी उन्हें अपनी ओर खींचा। 1931 में अकोला में अखिल भारतीय हिंदू महासभा की उन्होंने अध्यक्षता की। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन की मद्रास शाखा के दो उपाध्यक्षों में से एक थे। महात्मा गांधी इसके अध्यक्ष थे और दूसरा उपाध्यक्ष 'द हिंदू' के संपादक एस. कस्तूरी रंग अयंगर थे।

विजयराघवचार्य श्रमिकों और गैर-ब्राह्मणों के हितों के सशक्त समर्थक थे। इससे उनके हृदय की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। अपने प्रिय उद्देश्यों के लिए दान देने में भी वे उदार थे। अछूत विरोधी लीग और इंग्लैंड की कांग्रेस प्रचार संगठन ने अपने शुरुआती दिनों में उनसे उदार वित्तीय सहायता प्राप्त की। उनका जीवन साम्राज्यवाद और आर्थिक और सामाजिक संकट के खिलाफ अथक संघर्ष से भरा था।

साम्राज्यवाद विरोधी होने के बावजूद भारत में साम्राज्यवाद के कुछ प्रतिनिधियों जैसे राज्यपालों और वायसरायों के साथ उनकी आजीवन मित्रता रही। लॉर्ड रिपन, लॉर्ड कर्ज़न, लॉर्ड पेंटलैंड, लॉर्ड और लेडी हार्डिंग, सर कॉनर स्मिथ और सर विलियम मेयर साम्राज्यवादी गुट के उनके मित्र थे। अर्डली नॉर्टन, महान अधिवक्ता, जिन्होंने सलेम दंगों के मामले में बहस की और उन्हें अंडमान में स्थानांतरित होने से बचाया, उनके घनिष्ठ मित्र थे। भारत के तत्कालीन विदेश सचिव एडविन मोंटेगु ने टिप्पणी की कि विजयराघवचार्य एक ऊर्जावान विचारक हैं, लेकिन अव्यावहारिक विचारों वाले।

अंतिम दिन

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यद्यपि दक्षिण भारत में कांग्रेस का नेतृत्व उनके हाथों से चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हाथों में चला गया, लेकिन विजयराघवचार्य मद्रास की पत्रिकाओं में नियमित लिखते रहते थे। 19 अप्रैल 1944 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, उनके मूल्यवान संग्रह को विशेष रूप से निर्मित और उनके नाम पर सलेम में निर्मित स्मारक पुस्तकालय एवं व्याख्यान हॉल में रखा गया था। उनका चित्र भारत की संसद की दीवारों पर लगा है।

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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