विकिपीडिया वार्ता:लघु पथ

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रचना       सोच ही सूर -असूर        लेखिका  सुशीला  रोहिला सोनीपत हरियाणा
        9467520190

जिन्दगी कर्मों का बंधन है मानव आता जाता यही है जिसकी गोद में पल कर बड़ा हुआ भाषा का मिला ज्ञान है ईश्वर की है निर्मल रचना प्रकृति ना किया फर्क है ।

बसेरा जहाँ है तेरा 
 वहां का ही वापसी है 

जिन्दगी कर्मों का बंधन है- ----

 पढ लिख हुआ विद्वान 
 नभ-धरा का ज्ञान है 
 ऊच- नीच में  बंट गया मानव
 टुकड़ों में बाँटा धर्म है ।
सोच तेरे ने ही किया फर्क है
पद प्रतिष्ठा का अभिमान है 
 जिन्दगी कर्मों का बंधन है- ---
 

खौफ का तेरा आकार है

सोच ने बनाया शैतान है
 मन का आत्मा से हो मिलन
 परिवर्तन का होगा सवेरा
देखना हो अगर दिन सुनहरा 
मानवता की यही पुकार 
असुर -सूर(देव) बने तो महान है 

जिन्दगी कर्मों का बंधन है- ---। Rohillasushila (वार्ता) 08:54, 22 नवम्बर 2019 (UTC)

आर्टिकल शिक्षा में आत्मविश्वास की दरकार[संपादित करें]

लेखिका सुशीला रोहिला सोनीपत हरियाणा

         मोबाइल नंबर  9467520190

शिक्षक का अर्थ है अपनी दी हुई शिक्षा को सार्थक करना । अपने शिष्यों में अपनी शिक्षा का बीजारोपण करना। शिक्षार्थी आए और सेवार्थी की सद्भावना को बच्चों में जागरूक करना । सेवा की भावना का जागरण कहाँ से शुरू होगा ।जब हम स्वयं सेवा की भावना धारण कर विद्या के मन्दिर में अपने कदम रखेगें ।

सेवा और आज्ञा एक संस्कार युक्त शिक्षा के अंतर्गत समाहित होती है ।आज समाज शिक्षित तो है लेकिन सेवार्थी की भावना का लोप होता जा रहा है । सेवा की भावना का जागरण अध्यात्म को धारण करने से होता।है ।जब हम अध्यात्म को धारण करते है तो निजीस्वार्थ का त्याग हो जाता है । फिर हम लालचवश होकर कागज के चन्द टुकड़ों में नहीं बिकते और नहीं बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते है । उदाहरणके रूप मे जैसे बच्चों को नक्ल करवाना या उनका पेपर स्वयं करना । ओपन के बोर्ड से बच्चों के अन्दर शिक्षा में गिरावट आती है ।वे मेहनत करके परीक्षा नहीं देना चाहते । शिक्षा का व्यापार छल- कपट और आतंकवाद , रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, उग्रवाद और आचारहीनता को ही सिखाता है ।

आग्रह मै एक शिक्षिका हूँ तथा अथ्यात्म को धारण कर सत्य के आधार पर विश्लेषण कर सभी अध्यापकवर्ग को अपने विचार बिन्दु से अवगत कर आप तक पहुँचा कर शिक्षा में परिवर्तन लाने का प्रयास कर रहीं हूँ । यह तभी संभव होगा जब भारत का हर शिक्षक तथा शिक्षिका अपने अध्यापन में परा विद्या ( आत्मिक विद्या) का भी आश्रय ग्रहण करे । यह विद्या हमारे जितने भी महपुरूष, पीर पैगम्बर हुए भौतिक विधा से परा विद्या का समन्वय कर अपने जीवन का कल्याण कर राष्ट्र की सेवा में समर्पित हूए।

आओ सभी मिलकर यह अभियान चलाए

आत्मा विद्या का ले सहारा शिक्षा को महान बनाए
 भावी पीढ़ी का भविष्य हो उज्ज्वल 
 नेक इरादा लेकर बुलंदियो को छुए
 संकल्प लेकर साथ-साथ  चले 

भारत माता को विश्व गुरु बनाएँ । Rohillasushila (वार्ता) 11:18, 22 नवम्बर 2019 (UTC)