विकिपीडिया:आज का आलेख - पुरालेख/२०१०/मार्च

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१ मार्च २०१०[संपादित करें]

होली खेलते राधा और कृष्ण
होली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से है। यह कितना पुराना है इसके विषय में ठीक जानकारी नहीं है लेकिन इसके विषय में इतिहास पुराणसाहित्य में अनेक कथाएँ मिलती है। इन कथाओं पर आधारित साहित्य और फ़िल्मों में अनेक दृष्टिकोणों से बहुत कुछ कहने के प्रयत्न किए गए हैं लेकिन हर कथा में एक समानता है कि असत्य पर सत्य की विजय और दुराचार पर सदाचार की विजय और विजय को उत्सव मनाने की बात कही गई है। होली का त्योहार राधा और कृष्ण की पावन प्रेम कहानी से भी जुडा हुआ है। वसंत के सुंदर मौसम में एक दूसरे पर रंग डालना उनकी लीला का एक अंग माना गया है। मथुरा और वृन्दावन की होली राधा और कृष्ण के इसी रंग में डूबी हुई होती है। ...विस्तार से पढ़ें...

२ मार्च २०१०[संपादित करें]

गाजर की कांजी
कांजी उत्तर भारत का वसंत ऋतु का सर्वाधिक लोकप्रिय पेय है। यह एक किण्वित पेय है जो प्राय: गाजर (लाल या काली) और चुकन्दर से बनाया जाता है। कुछ लोग इसमें दाल के बड़े डालकर भी बनाते हैं। गाजर की कांजी बहुत ही स्वादिष्ट और पाचक होती है। यह खाने से पहले भूख को बढ़ा देती है। इसका उपयोग गर्मी और सर्दी दोनों मौसम में कर सकते हैं। कांजी कई रुपों में पी जाती है पर बनाने का ढंग एक सा ही है। इसका पानी तैयार करने के लिए पानी के अतिरिक्त राई, नमक और लाल मिर्च के अलावा आधा किलो धुली और छिली हुई काली या लाल गाजर के टुकड़े चाहिए होते हैं। यह उत्तर भारत में होली के अवसर पर बनाया जाने वाला एक विशेष व्यंजन है। मानव शरीर में अच्छे और बुरे दोनो तरह के जीवाणु होते हैं। कांजी तथा अन्य किण्वित खाद्य पदार्थ शरीर में अच्छे जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि करते हैं। इससे पाचन शक्ति में लाभ होता है और साथ ही रोगों से लड़नें की क्षमता प्राप्त होती है। विस्तार में...

३ मार्च २०१०[संपादित करें]

धातु संसूचक (अंग्रेज़ी:मेटल डिटेक्टर) का प्रयोग धातु से जुड़े सामानों का पता लगाने में किया जाता है। इसके अलावा बारूदी सुरंगों का पता लगाने, हथियारों, बम, विस्फोटक आदि का पता लगाने जैसे कई कामों में भी किया जाता है। एक सरलतम धातु संसूचक में एक विद्युत दोलक होता है जो प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न करता है। यह धारा एक तार की कुंडली में से प्रवाहित होकर अलग चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। इसमें एक कुंडली का प्रयोग चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए किया जाता है। चुंबकीय पदार्थ के होने पर चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इसको मापा जाता है। इसमें लगे माइक्रोप्रोसेसर धातु की प्रकार का पता लगाते हैं। धातु संसूचक वैद्युत चुंबकत्व के सिद्धांत पर काम करते हैं। अलग-अलग कार्यो के प्रयोग के अनुसार धातु संसूचकों की संवेदनशीलता अलग होती है। विस्तार में...

४ मार्च २०१०[संपादित करें]

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जयपुर इंडियन ऑयल डिपो अग्निकांड गुरूवार २९ अक्टूबर २००९ को हुआ था। इस अग्निकाण्ड में राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर शहर के निकट स्थित सांगानेर में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के तेल भण्डार डिपो में भीषण आग लग गई जिसमें कंपनी को जहाँ करोड़ों की हानि हुई, वहीं इस दुर्घटना में ११ लोगों की मृत्यु भी हो गयी। सांय ७ बजे के करीब इंडियन ऑयल डिपो में कर्मचारियों द्वारा पास ही के अन्य भण्डारण व्यवस्था को तेल की आपूर्ति करने के लिए दो टैंको के बीच की तेल पाइपलाइन के वाल्व खोले गये। भूलवश उन्होंने जिस टैंक में तेल पूरा भरा था, वह टैंक उस के कारण उच्च दबाव में था के वाल्व पहले खोले व आगे के बाद में। इसी कारण बीच के वाल्व में एकदम से तेज रिसाव हुआ व पेट्रोल का फव्वारा छूट पड़ा। इससे हर तरफ पेट्रोल तेजी से फैल गया व ज्वलनशील पदार्थ की गैस इलाके में फैल गयी। विस्तार में...

५ मार्च २०१०[संपादित करें]

परिषद का बैठक कक्ष
संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ईकोसॉक) संयुक्त राष्ट्र संघ के कुछ सदस्य राष्ट्रों का एक समूह है, जो सामान्य सभा को अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं सामाजिक सहयोग एवं विकास कार्यक्रमों में सहायता करता है। यह परिषद सामाजिक समस्याओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय शांति को प्रभावी बनाने में प्रयासरत है। परिषद की स्थापना १९४५ में मात्र १८ सदस्य सहित हुई थी जो १९७१ में बढ़कर ५४ हो गई। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। एक-तिहाई सदस्य प्रतिवर्ष पदमुक्त होते हैं, यानि प्रतिवर्ष १८ सदस्य बदले जाते हैं। पदमुक्त होने वाला सदस्य पुन: निर्वाचित भी हो सकता है। आर्थिक तथा सामाजिक परिषद में प्रत्येक सदस्य राज्य का एक ही प्रतिनिधि होता है। अध्यक्ष का कार्यकाल एक वर्ष के लिए होता है, और उसका चयन ईसीओएसओसी के छोटे और मंझोले प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। वर्तमान में इसके अध्यक्ष सिल्वी ल्सूकस है। १८९२ में आर्थिक और सामाजिक परिषद के अधिकारों को बढ़ाया गया।  विस्तार में...

६ मार्च २०१०[संपादित करें]

फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल
फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल (१२ मई १८२०-१३ अगस्त १९१०) को आधुनिक नर्सिग आन्दोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया व सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल "द लेडी विद द लैंप" (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में हुआ था, लेकिन उच्च कुल में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना। नर्सिग के अतिरिक्त लेखन और अनुप्रयुक्त सांख्यिकी पर उनका पूरा ध्यान रहा। फ्लोरेंस का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्रीमिया के युद्ध में रहा। अक्टूबर १८५४ में उन्होंने ३८ स्त्रियों का एक दल घायलों की सेवा के लिए तुर्की भेजा। इस समय किए गए उनके सेवा कार्यो के लिए ही उन्होंने लेडी विद द लैंप की उपाधि से सम्मानित किया गया। विस्तार में...

७ मार्च २०१०[संपादित करें]

केदारनाथ हिमालय पर्वतमाला में बसा भारत के उत्तरांचल राज्य का एक कस्बा है। यह रुद्रप्रयाग की एक नगर पंचायत है। यह हिन्दू धर्म के अनुयाइयों के लिए पवित्र स्थान है। यहाँ स्थित केदारनाथ मंदिर का शिव लिंग १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है और हिन्दू धर्म के उत्तरांचल के चार धाम और पंच केदार में गिना जाता है। श्रीकेदारनाथ का मंदिर ३,५९३ फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इस बारे में आज भी पूर्ण सत्य ज्ञात नहीं हैं। सतयुग में शासन करने वाले राजा केदार के नाम पर इस स्थान का नाम केदार पड़ा। राजा केदार ने सात महाद्वीपों पर शासन और वे एक बहुत पुण्यात्मा राजा थे। उनकी एक पुत्री थी वृंदा जो देवी लक्ष्मी की एक आंशिक अवतार थी। वृंदा ने ६०,००० वर्षों तक तपस्या की थी। वृंदा के नाम पर ही इस स्थान को वृंदावन भी कहा जाता है।  विस्तार में...

८ मार्च २०१०[संपादित करें]

रूमी दरवाज़ा, लखनऊ
लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है। लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहजीब वाली बहुसांस्कृतिक खूबी, दशहरी आम, लखनवी पान, चिकन और नवाबों के लिये जाना जाता है। २००६ मे इसकी जनसंख्या २,५४१,१०१ तथा साक्षरता दर ६८.६३% थी। लखनऊ जिला अल्पसंख्यकों की घनी आबादी वाला जिला है और प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। शहर के बीच से गोमती नदी गुजरती है, जो लखनऊ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। यहां के नवाबी वातावरण में उर्दु शायरी, कथक और अवधी व्यंजन भी खूब विकसित हुए हैं। यहां बहुत से दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें इमामबाड़े,कई उद्यान, रूमी दरवाज़ा, छतर मंजिल, तारामंडल, आदि कुछ हैं। लखनऊ शहर आधुनिक युग के साथ प्रगति पर अग्रसर है, जिसमें में ढेरों विद्यालय,अभियांत्रिकी, प्रबंधन, चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान हैं। विस्तार में...

९ मार्च २०१०[संपादित करें]

प्रथम पीढ़ी के सैटा पोर्ट
सैटा हार्ड ड्राइव को कम्प्यूटर से जोड़ने का एक तरीका होता है। यह पैटा का प्रतिस्थापन है। सैटा के आने से पहले पैटा को ऐटा या आई॰डी॰ई (ATA) ही कहते थे। सैटा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जो इसे पैटा से भिन्न करती है वो है इसके केबल। सैटा हार्ड ड्राइव को कम्प्यूटर से जोड़ने के लिए पतले केबल का उपयोग करता है। पैटा अभी भी सैटा से अधिक उपयोग में लाया जाता है, किन्तु अब नए कम्प्यूटरों में सैटा लगा हुआ मिलता है। २००५ के बाद के कम्प्यूटरों में सैटा इंटरफ़ेस लग कर आ रहा है। पैटा में 'P' का अर्थ है पैरेलल (यानि समानांतर) और इसे कम्प्यूटरों में कई तारों के रूप में देखा जा सकता है जो रिबन केबल में एक ही दिशा की ओर समानांतर जाती हैं और हार्ड ड्राइव से जुड़ती हैं।सैटा और पैटा में बहुत सी भिन्नताएं होती हैं। सैद्धांतिक रूप से सैटा पैटा से तीव्र होता है।  विस्तार में...

१० मार्च २०१०[संपादित करें]

उत्तरी ध्रुव को घेरे देश
उत्तरी ध्रुव हमारे ग्रह पृथ्वी का सबसे सुदूर उत्तरी बिन्दु है। यह वह बिन्दु है जहाँ पर पृथ्वी की धुरी घूमती है। यह आर्कटिक महासागर में पड़ता है, और यहाँ अत्यधिक ठंड पड़ती है क्योंकि लगभग छः महीने यहाँ सूरज नहीं चमकता है। ध्रुव के आसपास का महासागर बहुत ठंडा है और सदैव बर्फ़ की मोटी चादर से ढका रहता है। इस भौगोलिक उत्तरी ध्रुव के निकट ही चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव है, इसी चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव की ओर ही कम्पास की सुई संकेत करती है। उत्तरी तारा या ध्रुव तारा उत्तरी ध्रुव के आकाश पर सदैव निकलता है। यह क्षेत्र आर्कटिक घेरा भी कहलाता है क्योंकि वहां अर्धरात्रि के सूर्य और ध्रुवीय रात का दृश्य भी देखने को मिलता है। उत्तरी ध्रुव क्षेत्र को आर्कटिक क्षेत्र भी कहा जाता है। यहां बर्फ से ढंके विशाल क्षेत्र के अतिरिक्त आर्कटिक सागर भी है। विस्तार में...

११ मार्च २०१०[संपादित करें]

मृदुला गर्ग
मृदुला गर्ग (जन्म:२५ अक्तूबर, १९३८) कोलकाता में जन्मी, हिंदी कई सबसे लोकप्रिय लेखिकाओं में से एक हैं। उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक तथा निबंध संग्रह सब मिलाकर उन्होंने २० से अधिक पुस्तकों की रचना की है। १९६० में अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि लेने के बाद उन्होंने ३ साल तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया है। उनके उपन्यासों को अपने कथानक की विविधता और नयेपन के कारण समालोचकों की बड़ी स्वीकृति और सराहना मिली। उनके उपन्यास और कहानियों का अनेक हिंदी भाषाओं तथा जर्मन, चेक, जापानी और अँग्रेजी में अनुवाद हुआ है। उनका उपन्यास 'चितकोबरा' नारी-पुरुष के संबंधों में शरीर को मन के समांतर खड़ा करने और इस पर एक नारीवाद या पुरुष-प्रधानता विरोधी दृष्टिकोण रखने के लिए काफी चर्चित और विवादास्पद रहा था। विस्तार में...

१२ मार्च २०१०[संपादित करें]

पुस्तक का आवरण पृष्ठ
एक कहानी यह भी पुस्तक में लेखिका मन्नू भंडारी ने अपने लेखकीय जीवन की कहानी उतार दी हैं। यह उनकी आत्मकथा तो नहीं है, लेकिन इसमें उनके भावात्मक और सांसारिक जीवन के उन पहलुओं पर भरपूर प्रकाश पड़ता है जो उनकी रचना-यात्रा में निर्णायक रहे। यह आत्मस्मरण मन्नूजी की जीवन-स्थितियों के साथ-साथ उनके दौर की कई साहित्यिक-सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर भी रोशनी डालता है और नई कहानी दौर की रचनात्मक बेकली और तत्कालीन लेखकों की ऊँचाइयों-नीचाइयों से भी परिचित करता है। साथ ही उन परिवेशगत स्थितियों को भी पाठक के सामने रखता है जिन्होंने उनकी संवेदना को झकझोरा। ये उनकी लेखकीय यात्रा के कोई छोटे मोटे उतार चढ़ावों की ही कहानी नहीं है, अपितु जीवन के उन बेरहम झंझावातों और भूकम्पों की कहानी भी है, जिनका एक झोंका, एक झटका ही व्यक्ति को तहस नहस कर देने के लिए काफ़ी होता है। विस्तार में...

१३ मार्च २०१०[संपादित करें]

माघ मेले का दृश्य
माघ मेला हिन्दुओं का सर्वाधिक प्रिय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला है। हिन्दू पंचांग के अनुसार १४ या १५ जनवरी को मकर संक्रांति के दिन माघ महीने में यह मेला आयोजित होता है। यह भारत के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों में मनाया जाता है। नदी या सागर स्नान इसका मुख्य उद्देश्य होता है। धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा पारंपरिक हस्त शिल्प, भोजन और दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की बिक्री भी की जाती है। धार्मिक महत्त्व के अलावा यह मेला एक विकास मेला भी है तथा इसमें राज्य सरकार विभिन्न विभागों के विकास योजनाओं को प्रदर्शित करती है। प्रयाग, उत्तरकाशी, हरिद्वार इत्यादि स्थलों का माघ मेला प्रसिद्ध है। कहते हैं, माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी। पद्म पुराण के महात्म्य के अनुसार-माघ स्नान से मनुष्य के शरीर में स्थित उपाताप जलकर भस्म हो जाते हैं। इस प्रकार माघमेले का धार्मिक महत्त्व भी है। विस्तार में...

१४ मार्च २०१०[संपादित करें]

IMEI का एक उदाहरण
अंतर्राष्ट्रीय मोबाइल उपकरण पहचान संख्या (अंग्रेज़ी:इंटरनेशनल मोबाइल इक्वेपमेंट आईडेंटिटी, लघुरूप: आई.एम.ई.आई) मोबाइल फोन उपकरण में पहचान हेतु एक उपकरणपहचान संख्या होती है। प्रत्येक मोबाइल उपकरण में एक आई.एम.ई.आई नंबर होता है, जो अन्य किसी भी उपकरण से भिन्न होता है। जीएसएम, सीडीएमए और आईडीईएन तथा कुछ सेटेलाइट फोन में भी ये संख्या मिलती हैं। यह संख्या १५ अंकों की होती है, जिसमें मोबाइल फोन उपकरण के मॉडल, मूल और युक्ति (डिवाइस) के सीरियल नंबर के बारे में लिखा होता है। आरंभिक ८ अंकों में ओरिजन और मॉडल के बारे में सूचना होती है। ये संख्या मोबाइल फोन की कंप्लायंस प्लेट में अंकित होती है और इसे देखने के लिए चालू मोबाइल उपकरण में *#06# डायल करना होता है। बंद मोबाइल उपकरण में बैटरी निकालने पर अंदर स्टीकर पर अंकित होता है।  विस्तार में...

१५ मार्च २०१०[संपादित करें]

कंज़्यूमर्स इंटर्नेशनल का प्रतीक
भारत में २४ दिसम्बर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। सन् १९८६ में इसी दिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम विधेयक पारित हुआ था। इसके बाद इस अधिनियम में १९९१ तथा १९९३ में संशोधन किये गए। अधिनियम को १५ मार्च २००३ से लागू किया गया। परिणामस्‍वरूप उपभोक्‍ता संरक्षण नियम ५ मार्च २००४ को अधिसूचित किया गया था। भारत सरकार ने २४ दिसंबर को राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता दिवस घोषित किया है, क्योंकि भारत के राष्ट्रपति ने उसी दिन ऐतिहासिक अधिनियम, १९८६ को स्वीकारा था। इसके अतिरिक्‍त १५ मार्च को प्रत्‍येक वर्ष विश्‍व उपभोक्‍ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। यह दिन भारतीय ग्राहक आन्दोलन के इतिहास में सुनहरे अक्षरो में लिखा गया है। भारत में यह दिवस पहली बार वर्ष २००० में मनाया गया। और आगे भी प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। विस्तार में...

१६ मार्च २०१०[संपादित करें]

वायेजर यान का एक मॉक-अप चित्र
वायेजर द्वितीय एक अमरीकी मानव रहित अंतरग्रहीय शोध यान था जिसे वायेजर १ से पहले २० अगस्त १९७७ को अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। इसका यात्रा पथ कुछ धीमा है, जिसका कारण इसका पथ युरेनस और नेपचून तक पहुंचने के लिये अनुकूल बनाना है। इसके पथ में जब शनि ग्रह आया, तब उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण यह युरेनस की ओर अग्रसर हुआ था और इस कारण यह भी वायेजर १ के समान ही बृहस्पति के चन्द्रमा टाईटन का अवलोकन नहीं कर पाया था। किन्तु फिर भी यह युरेनस और नेपच्युन तक पहुंचने वाला प्रथम यान था। इसकी यात्रा में एक विशेष ग्रहीय परिस्थिति का लाभ उठाया गया था जिसमे सभी ग्रह एक सरल रेखा मे आ जाते है। यह विशेष स्थिति प्रत्येक १७६ वर्ष पश्चात ही आती है। इस कारण इसकी ऊर्जा में बड़ी बचत हुई और इसने ग्रहों के गुरुत्व का प्रयोग किया था।  विस्तार में...

१७ मार्च २०१०[संपादित करें]

कार्य, कार्यस्थल और उपकरण अभिकल्पन विज्ञान
एर्गोनॉमिक्स कार्य, कार्यस्थल और संबंधित उपस्करों के अभिकल्पन का विज्ञान होता है, जो कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक हो। सही इर्गोनॉमिक डिज़ाइन पुनरावृत्त तनाव क्षति यानि आर.एस.आई. जैसी क्षतियों से बचाव में अत्यंत सहायक होता है। इसको समय के साथ विकसित कर प्रयोग किया जा सकता है व बहुत सी स्वास्थ्य संबंधी दीर्घकालीन विकलांगताओं से बचा जा सकता है। ९०% लोगों को अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय रीढ़ की हड्डी में दर्द की शिकायत से जूझना पड़ता है। ऐसे में काम करने के गलत तरीकों और गलत मुद्राओं में बैठने और काम करने से समस्या और भी अधिक बढ़ जाती है। इसमें बहुत अधिक लागत की आवश्यकता नहीं होती है, किन्तु यह वस्तु की अभिकल्पना करने से पूर्व गहन विचार चाहती है और अच्छी अभिकल्पना का अर्थ अधिक उत्पादकता तथा अर्थव्यवस्था है। विस्तार में...

१८ मार्च २०१०[संपादित करें]

डाटाहैण्ड प्रोफ़ैश्नल II कीबोर्ड, दायीं ओर
पुनरावृत्त तनाव क्षति (रेपीटीटिव स्ट्रेन इंजरी, लघुरूप:आर.एस.आई), जिसे रेपीटीटिव मोशन इंजरी, रेपीटीटिव मोशन डिसॉर्डर, क्यूमुलेटिव ट्रॉमा डिसॉर्डर आदि नाम भी मिले हैं, मांसपेशियों और तन्त्रिका तन्त्र में समस्या के कारण होने वाली क्षति होती है। आर.एस.आई होने का प्रमुख कारण बार-बार काम को दोहराने, अत्यधिक मानसिक परिश्रम करने, कंपन, याँत्रिक संपीड़न (मैकेनिकल कंप्रेशन) और बैठने की खराब मुद्रा होता है। इस रोग के रोगियों में मुख्यतः तीन तरह के लक्षण देखने में आते हैं। बाहों में दर्द, सहनशक्ति में कमी और कमजोरी जैसी समस्याएं इस तरह की क्षति में आम होती हैं। शारीरिक के साथ-साथ मानसिक समस्या भी होने लगती हैं। २००८ में हुए एक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि ब्रिटेन के ६८ प्रतिशत कर्मचारी आर.एस.आई की समस्या से पीड़ित हैं जिसमें सबसे आम समस्या पीठ, कंधे, हाथ और कलाई की थी। विस्तार में...

१९ मार्च २०१०[संपादित करें]

एफ़.बी.आई. की सील
फेडरल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन (एफ.बी.आई), संयुक्त राज्य अमेरिका के न्याय विभाग का प्राथमिक अंग है। ये संस्था अपराध जांच और घरेलू खुफिया एजेंसी, दोनों के ही काम करती है। इसका मुख्यालय जे.एडगर हूवर बिल्डिंग, वाशिंगटन डीसी में स्थित है। मुख्यालय के अलावा अमेरिका के कई बड़े शहरों में इसके ५६ अन्य कार्यालय तथा ४०० स्थानीय कार्यालय अमेरिका में कई अन्य स्थानों में हैं। एफबीआई अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है। इसकी स्थापना २६ जुलाई, १९०८ में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट के कार्यकाल में की गई थी। तब इसका नाम ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन हुआ करता था। १९३२ में इसका नाम बदलकर यूनाइटेड स्टेट्स ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन कर दिया गया और अंतत: १९३५ में इसका वर्तमान नाम फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानि एफबीआई रखा गया।  विस्तार में...

२० मार्च २०१०[संपादित करें]

लैक्टोबैसिलस जीवाणु एक प्रोबायोटिक जीवाणु
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रोबायोटिक वे जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं जिसका सेवन करने पर मानव शरीर में जरूरी तत्व सुनिश्चित हो जाते हैं। प्रोबायोटिक विधि रूसी वैज्ञानिक एली मैस्निकोफ ने २०वीं शताब्दी में प्रस्तुत की थी। इसके लिए उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। ये शरीर में अच्छे जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि कर पाचन क्रिया को बेहतर बनाते हैं।इस विधि के अनुसार शरीर में दो तरह के जीवाणु होते हैं, एक मित्र और एक शत्रु। भोजन के द्वारा यदि मित्र जीवाणुओं को भीतर लें तो वे धीरे-धीरे शरीर में उपलब्ध शत्रु जीवाणुओं को नष्ट करने में कारगर सिद्ध होते हैं। मित्र जीवाणु प्राकृतिक स्रोतों और भोजन से प्राप्त होते हैं, जैसे दूध, दही और कुछ पौंधों से भी मिलते हैं। अभी तक मात्र तीन-चार ही ऐसे जीवाणु ज्ञात हैं जिनका प्रयोग प्रोबायोटिक रूप में किया जाता है। इनमें लैक्टोबेसिलस, बिफीडो, यीस्ट और बेसिल्ली हैं। इन्हें एकत्र करके प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ में डाला जाता है।  विस्तार में...

२१ मार्च २०१०[संपादित करें]

अंतरिक्ष शटल कार्यक्रम का चिह्न
अंतरिक्ष शटल संयुक्त राज्य अमरीका में नासा द्वारा मानव सहित या रहित उपग्रह यातायात प्रणाली को कहा जाता है। यह शटल पुन: प्रयोगनीय यान होता है और इसमें कंप्यूटर डाटा एकत्र करने और संचार के तमाम यंत्र लगे होते हैं। इसमें सवार होकर ही वैज्ञानिक अंतरिक्ष में पहुंचते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों के खाने-पीने और यहां तक कि मनोरंजन के साजो-सामान और व्यायाम के उपकरण भी लगे होते हैं। अंतरिक्ष शटल को स्पेस क्राफ्ट भी कहा जाता है, किन्तु ये अंतरिक्ष यान से भिन्न होते हैं। इसे एक रॉकेट के साथ जोड़कर अंतरिक्ष में भेजा जाता है, लेकिन प्रायः यह सामान्य विमानों की तरह धरती पर लौट आता है। इसे अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए कई बार प्रयोग किया जा सकता है, तभी ये पुनःप्रयोगनीय होता है। इसे ले जाने वाले रॉकेट ही अंतरिक्ष यान होते हैं।  विस्तार में...

२२ मार्च २०१०[संपादित करें]

संपत्ति कर या संपदा कर (अंग्रेज़ी:प्रॉपर्टी टैक्स), वह प्रत्यक्ष कर राशि होती है, जो किसी अचल संपत्ति के स्वामी द्वारा उस संपत्ति के मूल्य के अनुसार अदा किया जाता है। इस कर का अनुमान संपत्ति मूल्य के आधार पर लगता है। इसमें यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि उस संपत्ति से स्वामी को कोई लाभ हुआ है या नहीं। इस प्रकार मूल परिभाषा अनुसार संपत्ति कर नगर पालिकाओं द्वारा अपने अधिकारक्षेत्र में स्थित अचल सम्पत्ति के स्वामियों पर लगाया गया सामान्य कर होता है, जो उस संपत्ति के मूल्य पर आधारित होता है। यह कर मुख्यत: भूमि, भूमि सुधार, मानव द्वारा निर्मित चल वस्तु जैसे घर, मकान, दुकान, भवन इत्यादि पर लागू होता है। इस कर के स्वरूप विभिन्न देशों में भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। विस्तार में...

२३ मार्च २०१०[संपादित करें]

एक त्रिआयामी चित्र
त्रिआयामी चलचित्र एक चलचित्र होता है, जिसकी छवियां आम चलचित्रों से कुछ भिन्न बनती हैं। चित्रों की छाया अंकित करने के लिए विशेष मोशन पिक्चर कैमरे का प्रयोग किया जाता है। ऐसे चलचित्र 1890 में भी हुआ करते थे, लेकिन उस समय के इन चलचित्रों को थिएटर पर दिखाया जाना काफी महंगा काम होता था। मुख्यत: 1950 से 1980 के अमेरिकी सिनेमा में ये फिल्में प्रमुखता से दिखने लगी। सैद्धांतिक त्रि-आयामी चलचित्र प्रस्तुत करने का आरंभिक तरीका एनाजिफ इमेज होता है। मोशन पिक्चर का स्टीरियोस्कोपिक युग 1890 के दशक के अंतिम दौर में आरंभ हुआ जब ब्रिटिश फिल्मों के पुरोधा विलियम ग्रीन ने त्रि-आयामी प्रक्रिया का पेटेंट फाइल किया। फ्रेडरिक युजीन आइव्स ने स्टीरियो कैमरा रिग का पेटेंट 1900 में कराया। इस कैमरे में दो लैंस लगाये जाते थे जो एक दूसरे से तीन-चौथाई इंच की दूरी पर होते थे।  विस्तार में...

२४ मार्च २०१०[संपादित करें]

यहाँ का चित्र सर्वाधिकार उल्लंघन के कारण हटा दिया गया है।
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) भारत में दूरसंचार पर नियंत्रण हेतु एक स्वायत्त नियामक प्राधिकरण है। इसका गठन १९९७ में भारत सरकार द्वारा किया गया था। इसकी स्थापना भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम १९९७, एवं बाद में इसी अधिनियम के २००० संशोधन के द्वारा यथासंशोधित कर की गई थी, जिसका मिशन भारत में दूरसंचार संबंधित व्यापार को नियमित करना था। भारत का दूर संचार नेटवर्क एशिया की उभरती अर्थ व्यवस्थाओं में दूसरा सबसे और विश्‍व का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। प्राधिकरण का लक्ष्य भारत में दूरसंचार के विकास के लिए ऐसी रीति तथा ऐसी गति से परिस्थितियां सृजित करना तथा उन्हें संपोषित करना है, जो भारत को उभरते हुए वैश्विक समाज में एक अग्रणी भूमिका निभाने में समर्थ बना सके। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। विस्तार में...

२५ मार्च २०१०[संपादित करें]

कार में लगी हैंड्स फ़्री किट
हैंड्स फ्री युक्तियाँ, ऐसे उपकरण होते हैं, जो उपभोक्ता को बिना मोबाइल फोन को हाथ में लिए बात कर पाने में सक्षम कर पाती हैं। ये युक्तियाँ, हैंडबैंड की तरह होती है, जिसमें मुंह के पास एक माइक्रोफोन लगा होता है, जिससे उपभोक्ता अपनी बात कह सकते है और कान के पास लगे दूसरे हैडबैंड से बात सुन सकते है। ये आकार, क्षमता, परास(रेंज), कनेक्शन, फोन और फीचर के अनुसार कई प्रकार की होती हैं। फोन के अनुरूप ढला होना इनका प्रमुखतम कारक होता है। यही इसका मोबाइल फोन के संग प्रयोग होना या न होना निश्चित करता है। हैंड्स फ्री युक्ति की सहायता से फोन से बात करते समय अन्य काम भी कर सकते हैं। बात करते समय कंप्यूटर पर लिख सकते हैं या कागज पर अंकित भी सकते हैं। खासकर गाड़ी ड्राइविंग करते समय भी हैंड्सफ्री युक्ति की सहायता से बात कर सकते हैं। ये युक्तियाँ इन्फ्रा-रेड या ब्लूटूथ द्वारा मोबाइल फोन से जुड़ी रहती हैं। विस्तार में...

२६ मार्च २०१०[संपादित करें]

राही मासूम रज़ा (१ सितंबर, १९२५-१५ मार्च १९९२) का जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे। विस्तार में...

२७ मार्च २०१०[संपादित करें]

बरनावा में लाक्षागृह की गुफा
बरनावा या वारणावत मेरठ से ३५ किलोमीटर दूर और सरधना से १७ कि.मी बागपत जिला में स्थित एक तहसील है। इसकी स्थापना राजा अहिरबारन तोमर ने बहुत समय पूर्व की थी। यहां महाभारत कालीन लाक्षाग्रह चिन्हित है। लाक्षाग्रह नामक इमारत के अवशेष यहां आज एक टीले के रूप में दिखाई देते हैं। महाभारत में कौरव भाइयों ने पांडवों को इस महल में ठहराया था और फिर जलाकर मारने की योजना बनायी थी। किन्तु पांडवों के शुभचिंतकों ने उन्हें गुप्त रूप से सूचित कर दिया और वे निकल भागे। वे यहां से गुप्त सुरंग द्वारा निकले थे। ये सुरंग आज भी निकलती है, जो हिंडन नदी के किनारे पर खुलती है। इतिहास अनुसार पांडव इसी सुरंग के रास्ते जलते महल से सुरक्षित बाहर निकल गए थे। जनपद में बागपत व बरनावा तक पहुंचने वाली कृष्णा नदी का यहां हिंडन में मिलन होता है।< विस्तार में...

२८ मार्च २०१०[संपादित करें]

धुआं उत्सर्जन
यूरोपीय उत्सर्जन मानक (अंग्रेज़ी:यूरोपियन एमिशन स्टेंडर्ड) प्रदूषण संबंधी नियामक हैं जो यूरोप में सभी वाहनों पर लागू किए जाते हैं। यूरोपियन एमिशन स्टेंडर्डस सभी यूरोपियन देशों में एक समान लागू हैं। वर्तमान समय में नाइट्रोजन ऑक्साइड, सभी हाइड्रोकार्बन, गैर-मीथेन हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर संबंधी उत्सर्जन पर कारों, ट्रेनों, ट्रैक्टरों, लॉरियों और इनसे संबंधित मशीनरी पर यह कड़े नियामक लागू होते हैं। इनके विपरीत, समुद्री जहाजों और हवाई जहाजों को इन नियामकों से अलग रखा गया है। प्रत्येक वाहन पर नियामक उसके आकार के अनुसार ही तय किए जाते हैं, अतएव मानकों पर खरे न उतरने वाले वाहनों की बिक्री पर कड़ा निषेध लगा है। विस्तार में...

२९ मार्च २०१०[संपादित करें]

एमोबार्बिटल
नार्को परीक्षण का प्रयोग किसी व्यक्ति के मन से सत्य निकलवाने के लिए किया जाता है। अधिकतर आपराधिक मामलों में ही नार्को परीक्षण का प्रयोग किया जाता है। हालांकि बहुत कम किन्तु यह भी संभव है कि नार्को टेस्ट के दौरान भी व्यक्ति सच न बोले। इस टेस्ट में व्यक्ति को ट्रथ सीरम इंजेक्शन के द्वारा दिया जाता है जिससे व्यक्ति स्वाभविक रूप से बोलता है। ये एक फोरेंसिक परीक्षण होता है, जिसे जाँच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेंसिक विशेषज्ञ की उपस्थिति में किया जाता है। भारत में हाल के कुछ वर्षों से ही ये परीक्षण आरंभ हुए हैं, किन्तु बहुत से विकसित देशों में वर्ष १९२२ में मुख्यधारा का भाग बन गए थे। ये शब्द नार्क से लिया गया है, जिसका अर्थ है नार्कोटिक। हॉर्सले ने पहली बार नार्को शब्द का प्रयोग किया था। १९२२ में नार्को एनालिसिस शब्द मुख्यधारा में आया जब १९२२ में रॉबर्ट हाऊस, टेक्सास में एक ऑब्सेट्रेशियन ने स्कोपोलेमाइन ड्रग का प्रयोग दो कैदियों पर किया था। विस्तार में...

३० मार्च २०१०[संपादित करें]

फोर स्ट्रोक इंजन प्रणाली
वर्तमान युग में कारों, ट्रकों, मोटरसाइकिलोंवायुयानों आदि में प्रयोग होने वाले अन्तर्दहन इंजन प्रायः फोर स्ट्रोक इंजन होते हैं। इनमें ईंधन से यांत्रिक उर्जा में परिवर्तन का चक्र कुल चार चरणों में पूरा होता है। इन चरणों या स्ट्रोकों को क्रमश: इनटेक, संपीडन, ज्वलन, एवं उत्सर्जन कहते हैं। इन चार चरणों (स्ट्रोकों) को पूरा करने में क्रैंकसाशाफ्ट को दो चक्कर लगाने पड़ते हैं। वर्तमान में गाड़ियों में सामान्यत: फोर स्ट्रोक इंजन का प्रयोग ज्यादा होता है। इससे पहले गाड़ियों में टू स्ट्रोक इंजन का प्रयोग हुआ करता था, लेकिन कम माइलेज और जीवन अवधि कम होने के कारण इसका स्थान फोर स्ट्रोक इंजन ने ले लिया। फोर-स्ट्रोक इंजन को सर्वप्रथम यूजेनियो बार्सांटी एवं फेलिस माटुएसी ने १८५४ में पेटेंट कराया था। इसके बाद १८६० में इसका प्रथम प्रोटोटाइप निकाला। विस्तार में...

३१ मार्च २०१०[संपादित करें]

सौर पैनल
सौर ऊर्जा सूर्य से प्राप्त शक्ति को कहते हैं। इस ऊर्जा को ऊष्मा या विद्युत में बदल कर अन्य प्रयोगों में लाया जाता है। उस रूप को ही सौर ऊर्जा कहते हैं। घरों, कारों और वायुयानों में सौर ऊर्जा का प्रयोग होता है। ऊर्जा का यह रूप साफ और प्रदूषण रहित होता है। सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर उसे प्रयोग करने के लिए सौर पैनलों की आवश्यकता होती है। सोलर पैनलों में सोलर सेल होते हैं जो सूर्य की ऊर्जा को प्रयोग करने लायक बनाते हैं। यह कई तरह के होते हैं। जैसे पानी गर्म करने वाले सोलर पैनल बिजली पहुंचाने वाले सोलर पैनलों से भिन्न होते हैं। सौर ऊर्जा को दो तरीकों से प्रयोग हेतु बदला जाता है।
*सौर तापीय विधि: इससे सूर्य की ऊर्जा से हवा या तरल को गर्म किया जाता है। इस विधि का प्रयोग घरेलू कार्यो में किया जाता है।
*प्रकाशविद्युत विधि: इस विधि में सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिए फोटोवोल्टेक सेलों का प्रयोग होता है। फोटोवोल्टेक सेल का रखरखाव अपेक्षाकृत होता है।  विस्तार में...