विकिपीडिया:आज का आलेख - पुरालेख/२००९/दिसंबर

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१ दिसंबर २००९[संपादित करें]

Cerebral angiography, arteria vertebralis sinister injection.JPG
एंजियोग्राफी रक्त वाहिकाओं का एक्सरे अध्ययन होता है जो रक्त वाहिकाओं में अवरोध होने की स्थिति में या हृदय रोग, किडनी संक्रमण, ट्यूमर, खून का थक्का जमना आदि की जांच करने में किया जाता है। एंजियोग्राम में रेडियोधर्मी तत्व या डाइ का प्रयोग करके रक्त वाहिकाओं को एक्स रे द्वारा देखा जाता है। एंजियोग्राफी के बाद बीमारी से ग्रसित धमनियों को एंजियोप्लास्टी द्वारा खोला भी जाता है। इस उपचार से रोगी की हृदय की रक्तविहीन मांसपेशियों में खून का प्रवाह बढ़ जाता है और रोगी को तुरंत लाभ हो जाता है एवं हृदयाघात की संभावना में भारी कमी आ जाती है। एंजियोग्राफी दो यूनानी शब्दों एंजियॉन मतलब वाहिकाओं और ग्रेफियन यानि रिकॉर्ड करना से मिलकर बना है। यह तकनीक १९२७ में पहली बार पुर्तगाली फिजीशियन और न्यूरोलॉजिस्ट इगास मोनिज ने खोजी थी। १९४९ में उन्हें इस कार्य के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। विस्तार में...

२ दिसंबर २००९[संपादित करें]

Universe expansion2.png
ब्रह्मांड का जन्म एक महाविस्फोट (बिग बैंग) के परिणामस्वरूप हुआ। इसी को बिग बैंग सिद्धान्त या महाविस्फोट का सिद्धान्त कहते हैं। जिसके अनुसार से लगभग बारह से चौदह अरब वर्ष पूर्व संपूर्ण ब्रह्मांड एक परमाण्विक इकाई के रूप में था। उस समय मानवीय समय और स्थान जैसी कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं थी। बिग बैंग प्रतिरूप के अनुसार लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्वइस धमाके में अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ। यह ऊर्जा इतनी अधिक थी जिसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है। सारी भौतिक मान्यताएं इस एक ही घटना से परिभाषित होती हैं जिसे बिग बैंग सिद्धांत कहा जाता है। बिग बैंग नामक इस महाविस्फोट के धमाके के मात्र 1.43 सेकेंड अंतराल के बाद समय, अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आ चुकी थीं। भौतिकी के नियम लागू होने लग गये थे। 1.34वें सेकेंड में ब्रह्मांड 1030 गुणा फैल चुका था और क्वार्क, लैप्टान और फोटोन का गर्म द्रव्य बन चुका था। विस्तार में...

३ दिसंबर २००९[संपादित करें]

बेन्डिक्स-टेक्निको का १-बैरेल वाला डाउनड्राफ्ट कार्ब्युरेटर मॉडल BXUV-3
कार्ब्युरेटर एक ऐसी यांत्रिक युक्ति है जो आन्तरिक दहन इंजन के लिये हवा और द्रव्य ईंधन को मिश्रित करती है। कार्ब्युरेटर शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच शब्द कार्ब्योर से हुई है, जिसका अर्थ है कार्बाइड। ईंधन रासायनिकी के अनुसार, कार्ब्युरेटर ईंधन में कार्बन की मात्रा को वाष्पशील हाइड्रोकार्बन से क्रिया करने के बाद बढ़ाता है। सामान्यतया यह ईंधन को हवा में मिश्रित करने का काम करता है। इसका आविष्कार कार्ल बेन्ज़ ने सन १८८५ के पहले किया था। बाद में १८८६ में इसे पेटेंट भी कराया गया। कार्ल बेन्ज़ मर्सिडीज़ बेन्ज़ के संस्थापक हैं। इसका अधिक विकास हंगरी के अभियांत्रिक जैनोर सोएन्स्का और डोनैट बैन्की ने १८९३ में किया था। बर्मिंघम, इंगलैंड के फ्रेड्रिक विलियम लैंकेस्टर ने कार्ब्युरेटर का परीक्षण कारों पर किया और १८९६ में उसने अपने भाई के साथ इंगलैंड की प्रथम पेट्रोल कार बनाई।  विस्तार में...

४ दिसंबर २००९[संपादित करें]

ऑक्सीटोसिन हार्मोन का चित्र
हार्मोन जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं जो सजीवों में होने वाली विभिन्न जैव-रसायनिक क्रियाओं, वृद्धि एवं विकास, प्रजनन आदि का नियमन तथा नियंत्रण करता है। ये कोशिकाओं तथा ग्रन्थियों से स्त्रावित होते हैं। हार्मोन साधारणतः अपने उत्पत्ति स्थल से दूर की कोशिकाओं या ऊतकों में कार्य करते हैं इसलिए इन्हें रासायनिक दूत भी कहते हैं। इनकी सूक्ष्म मात्रा भी अधिक प्रभावशाली होती है। इन्हें शरीर में अधिक समय तक संचित नहीं रखा जा सकता है अतः कार्य समाप्ति के बाद ये नष्ट हो जाते हैं एवं उत्सर्जन के द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं। हार्मोन की कमी या अधिकता दोनों ही सजीव में व्यवधान उत्पन्न करती हैं। पौधों एवं जन्तुओं दोनो के अपने अपने हार्मोन होते हैं। पौधों में पाए जाने वाले हार्मोन को वनस्पति हार्मोन या पादप हार्मोन कहते हैं। ये जटिल कार्बनिक यौगिक पौधों के एक भाग में निर्मित होकर अन्य भागों में स्थानान्तरित हो जाते हैं तथा उन अंगों की वृद्धि, जैविक क्रियाओं पर नियन्त्रण एवं उनके बीच समन्वय स्थापित करते हैं। विस्तार से पढ़ें

५ दिसंबर २००९[संपादित करें]

उपेन्द्र नाथ अश्क (१९१०- १९ जनवरी १९९५) हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार व उपन्यासकार हैं। उपेन्द्रनाथ 'अश्क' का जन्म जालन्धर पंजाब में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा जालन्धर में होते होते वे ११ वर्ष की आयु से ही पंजाबी में तुकबंदिया करने लगे थे। बी.ए. करने के बाद उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया तथा कानून की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ पास की। अश्क जी ने अपना साहित्यिक जीवन उर्दू लेखक के रूप में शुरू किया था किन्तु बाद में वे हिन्दी के लेखक के रूप में ही जाने गए। १९३२ में मुंशी प्रेमचन्द्र की सलाह पर उन्होंने हिन्दी में लिखना आरम्भ किया। १९३३ में दूसरा कहानी संग्रह 'औरत की फितरत' प्रकाशित हुआ जिसकी भूमिका मुंशी प्रेमचन्द ने लिखी।विस्तार से पढ़ें

६ दिसंबर २००९[संपादित करें]

अरुणा सीतेश
डा. अरुणा सीतेश (३१ अक्तूबर १९४५-१९ नवंबर २००७) हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार थीं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९६५ में अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. किया और स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। १९७० में उन्होंने यहीं से डी. फ़िल की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध इंद्रप्रस्थ कॉलेज में प्राध्यापिका के पद से उन्होंने अपने कार्य-जीवन का प्रारंभ किया। बाद में वे क्रमशः रीडर तथा प्राधानाचार्या के पद पर आसीन हुईं। अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका और प्रख्यात शिक्षाविद डॉ॰ अरुणा सीतेश १० वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित इन्द्रप्रस्थ महिला कालेज में प्रधानाचार्या के पद पर कार्यरत रहीं। चाँद भी अकेला है, वही सपने, कोई एक अधूरापन, लक्ष्मण रेखा और छलांग उनकी कुछ प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। इनमें से ‘छलांग’ कहानी-संग्रह अपने समय में काफी चर्चित रहा। उन्होंने विष्णु प्रभाकर तथा मोहन राकेश के नाटकों का अंग्रेज़ी अनुवाद भी किया।विस्तार से पढ़ें

७ दिसंबर २००९[संपादित करें]

रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी (२८ अगस्त १८९६ - ३ मार्च १९८३) का जन्म गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश में कायस्थ परिवार में हुआ। इनका मूल नाम रघुपति सहाय था। रामकृष्ण की कहानियों से शुरुआत के बाद की शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई। २९ जून, १९१४ को उनका विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। कला स्नातक में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान पाने के बाद आई.सी.एस. में चुने गये। १९२० में नौकरी छोड़ दी तथा स्वराज्य आंदोलन में कूद पड़े तथा डेढ़ वर्ष की जेल की सजा भी काटी। । जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव की जगह दिला दी। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद कांग्रेस का पद छोड़ दिया। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३० से लेकर १९५९ तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे।विस्तार से पढ़ें

८ दिसंबर २००९[संपादित करें]

पुरस्कार-प्रतीकः वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा
ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है। भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई २२ भाषाओं में से किसी भाषा में लिखता हो इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में पांच लाख रुपये की धनराशि, प्रशस्तिपत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा दी जाती है। १९६५ में १ लाख रुपये की पुरस्कार राशि से प्रारंभ हुए इस पुरस्कार को २००५ में ७ लाख रुपए कर दिया गया। २००५ के लिए चुने गए हिन्दी साहित्यकार कुंवर नारायण पहले व्यक्ति थें जिन्हें ७ लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार १९६५ में मलयालम लेखक जी शंकर कुरुप को प्रदान किया गया था।

९ दिसंबर २००९[संपादित करें]

ड्यूटेरियम का ट्राइटियम से संलयन- जिसके परिणामस्वरूप हीलियम-४ बनता है व एक मुक्त न्यूट्रॉन निकलता है। इस अभिक्रिया में १७.५९ मेगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा निकलती है।
जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनो नाभिको के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है। जिसे ऐल्बर्ट आइनस्टाइन के समीकरण E = mc2 से ज्ञात करते हैं। तारों के अन्दर यह क्रिया निरन्तर जारी है। सबसे सरल संयोजन की प्रक्रिया है चार हाइड्रोजन परमाणुओं के संयोजन द्वारा एक हिलियम परमाणु का निर्माण।

१० दिसंबर २००९[संपादित करें]

प्रफुल्ल चाकी
क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी (बांग्ला: প্রফুল্ল চাকী) (१० दिसंबर १८८८ - १ मई १९०८) का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रफुल्ल का जन्म उत्तरी बंगाल के बोगरा गाँव (अब बांग्लादेश में स्थित) में हुआ था। जब प्रफुल्ल दो वर्ष के थे तभी उनके पिता जी का निधन हो गया। उनकी माता ने अत्यंत कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन पोषण किया। विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल का परिचय स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ। प्रफुल्ल ने स्वामी विवेकानंद के साहित्य का अध्ययन किया और वे उससे बहुत प्रभावित हुए। अनेक क्रांतिकारियों के विचारों का भी प्रफुल्ल ने अध्ययन किया इससे उनके अन्दर देश को स्वतंत्र कराने की भावना बलवती हो गई। बंगाल विभाजन के समय अनेक लोग इसके विरोध में उठ खड़े हुए। अनेक विद्यार्थियों ने भी इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

११ दिसंबर २००९[संपादित करें]

ShikaraVI.jpg
डल झील श्रीनगर, कश्मीर में एक प्रसिद्ध झील है। १८ किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई यह झील तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी हुई है। जम्मू-कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसमें सोतों से तो जल आता है साथ ही कश्मीर घाटी की अनेक झीलें आकर इसमें जुड़ती हैं। इसके चार प्रमुख जलाशय हैं गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल तथा नागिन। लोकुट डल के मध्य में रूपलंक द्वीप स्थित है तथा बोड डल जलधारा के मध्य में सोनालंक द्वीप स्थित है। भारत की सबसे सुंदर झीलों में इसका नाम लिया किया जाता है। पास ही स्थित मुगल वाटिका से डल झील का सौंदर्य अप्रतिम नज़र आता है। पर्यटक जम्मू-कश्मीर आएँ और डल झील देखने न जाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता। विस्तार से पढ़ें...

१२ दिसंबर २००९[संपादित करें]

Voyager 1 entering heliosheath region.jpg
सौर वायु (अंग्रेज़ी:सोलर विंड) सूर्य से बाहर वेग से आने वाले आवेशित कणों या प्लाज़्मा की बौछार को नाम दिया गया है। ये कण अंतरिक्ष में चारों दिशाओं में फैलते जाते हैं। इन कणों में मुख्यत: प्रोटोन्स और इलेक्ट्रॉन (संयुक्त रूप से प्लाज़्मा) से बने होते हैं जिनकी ऊर्जा लगभग एक किलो इलेक्ट्रॉन वोल्ट (के.ई.वी) हो सकती है। फिर भी सौर वायु प्रायः अधिक हानिकारक या घातक नहीं होती है। यह लगभग १०० ई.यू (खगोलीय इकाई) के बराबर दूरी तक पहुंचती हैं। खगोलीय इकाई यानि यानि एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट्स, जो पृथ्वी से सूर्य के बीच की दूरी के बराबर परिमाण होता है। १०० ई.यू की यह दूरी सूर्य से वरुण ग्रह के समान है जहाँ जाकर यह अंतरतारकीय माध्यम (इंटरस्टेलर मीडियम) से टकराती हैं। विस्तार से...

१३ दिसंबर २००९[संपादित करें]

डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल का एक छायाचित्र
डा. पीतांम्बरदत्त बड़थ्वाल ( १३ दिसंबर, १९०१-२४ जुलाई, १९४४) हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध विद्यार्थी थे। उन्होंने अनुसंधान और खोज परंपरा का प्रवर्तन किया तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास की परंपरा को आगे बढा़ते हुए हिन्दी आलोचना को मजबूती प्रदान की। उन्होंने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिये भाषा को अधिक सामर्थ्यवान बनाकर विकासोन्मुख शैली को सामने रखा। अपनी गंभीर अध्ययनशीलता और शोध प्रवृत्ति के कारण उन्होंने हिन्दी मे प्रथम डी. लिट. होने का गौरव प्राप्त किया। हिंन्दी साहित्य के फलक पर शोध प्रवृत्ति की प्रेरणा का प्रकाश बिखेरने वाले बड़थ्वालजी का जन्म तथा मृत्यु दोनो ही उत्तर प्रदेश के गढ़वाल क्षेत्र में लैंस डाउन अंचल के समीप पाली गाँव में हुए। बड़थ्वालजी ने अपनी साहित्यिक छवि के दर्शन बचपन में ही करा दिये थे। बाल्यकाल मे ही वे 'अंबर'नाम से कविताएँ लिखने लगे थे। विस्तार से पढ़ें...

१४ दिसंबर २००९[संपादित करें]

दीपक शर्मा (जन्म ३० नवंबर १९४६) हिन्दी की जानी मानी कथाकार हैं। उन्होंने चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। उनके पिता आल्हासिंह भुल्लर पाकिस्तान के लब्बे गाँव के निवासी थे तथा माँ मायादेवी धर्मपरायण गृहणी थीं। १९७२ में उनका विवाह श्री प्रवीण चंद्र शर्मा से हुआ जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में वरिष्ठ प्रवक्ता दीपक शर्मा की लगभग २५० कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें १४ कथा-संग्रहों में संकलित किया गया हैं जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं– हिंसाभास, दुर्गभेद, परखकाल, रण-मार्ग, बवंडर, उत्तरजीवी, आतिशी शीशा, आपदधर्म तथा अन्य कहानियाँ, चाबुक सवार और रथक्षोभ। विस्तार से पढ़ें...

१५ दिसंबर २००९[संपादित करें]

Saturn from Cassini Orbiter (2004-10-06).jpg
शनि सौर्यमंडल का एक सदस्य ग्रह है। यह सूरज से छटे स्थान पर है और सौर्यमंडल में बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह हैं। इसके कक्षीय परिभ्रमण का पथ १४,२९,४०,००० किलोमीटर है। शनि के ६० उपग्रह् हैं। जिसमें टाइटन सबसे बड़ा है। टाइटन बृहस्पति के उपग्रह गिनिमेड के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह् है। शनि ग्रह की खोज प्राचीन काल में ही हो गई थी। गैलिलियो ने सन् १६१० में दूरबीन से इस ग्रह का आविष्कार किया। शनि ग्रह की रचना ७५% हाइड्रोजन और २५% हीलियम से हुई है। पानी, मीथेन, अमोनिया और पत्थर बहुत कम मात्रा में यहाँ पाए जाते हैं। शनि ग्रह के चारों ओर भी कई छल्ले हैं। यह छल्ले बहुत ही पतले होते हैं। हालांकि यह छल्ले चौड़ाई में २५०,००० किलोमीटर है लेकिन यह मोटाई में एक किलोमीटर से भी कम हैं। इन छल्लों के कण मुख्यत: बर्फ और बर्फ से ढ़के पथरीले पदार्थों से बने हैं। विस्तार से पढ़ें...

१६ दिसंबर २००९[संपादित करें]

Sarat Chandra Chattopadhyay.jpg
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (१५ सितंबर, १८७६ - १६ जनवरी, १९३८ ) बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। उनका जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक थे। अठारह साल की अवस्था में उन्होंने इंट्रेंस पास किया। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। शरतचन्द्र ललित कला के छात्र थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वह इस विषय की पढ़ाई नहीं कर सके। रोजगार के तलाश में शरतचन्द्र बर्मा गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। कुछ समय बर्मा रहकर कलकत्ता लौटने के बाद उन्होंने गंभीरता के साथ लेखन शुरू कर दिया। बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना शुरू किया। विस्तार से पढ़ें...

१७ दिसंबर २००९[संपादित करें]

नक्की झील महाराजा पैलेस और टोड रॉक
समुद्र तल से १२२० मीटर की ऊंचाई पर स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र पहाड़ी नगर है। सिरोही जिले में स्थित नीलगिरि की पहाड़ियों की सबसे ऊँची चोटी पर बसे माउंट आबू की भौगोलिक स्थित और वातावरण राजस्थान के अन्य शहरों से भिन्न व मनोरम है। यह स्थान राज्य के अन्य हिस्सों की तरह गर्म नहीं है। माउंट आबू हिन्दु और जैन धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां का ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक खूबसूरती सैलानियों को अपनी ओर खींचती है। माउंट आबू पहले चौहान साम्राज्य का हिस्सा था। बाद में सिरोही के महाराजा ने माउंट आबू को राजपूताना मुख्यालय के लिए अंग्रेजों को पट्टे पर दे दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान माउंट आबू मैदानी इलाकों की गर्मियों से बचने के लिए अंग्रेजों का पसंदीदा स्थान था। विस्तार से पढ़ें...

१८ दिसंबर २००९[संपादित करें]

नक्की झील
नक्की झील माउंट आबू का एक सुंदर पर्यटन स्थल है। मीठे पानी की यह झील, जो राजस्थान की सबसे ऊँची झील हैं सर्दियों में अक्सर जम जाती है। कहा जाता है कि एक हिन्दू देवता ने अपने नाखूनों से खोदकर यह झील बनाई थी। इसीलिए इसे नक्की (नख या नाखून) नाम से जाना जाता है। झील से चारों ओर के पहाड़ियों का दृश्य अत्यंत सुंदर दिखता है। इस झील में नौकायन का भी आनंद लिया जा सकता है। नक्की झील के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सूर्यास्त बिंदू से डूबते हुए सूर्य के सौंदर्य को देखा जा सकता है। यहाँ से दूर तक फैले हरे भरे मैदानों के दृश्य आँखों को शांति पहुँचाते हैं। सूर्यास्त के समय आसमान के बदलते रंगों की छटा देखने सैकड़ों पर्यटक यहाँ आते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य का नैसर्गिक आनंद देनेवाली यह झील चारों ओऱ पर्वत शृंखलाओं से घिरी है। विस्तार से पढ़ें...

१९ दिसंबर २००९[संपादित करें]

प्रतिभा देवीसिंह पाटिल
प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (उपनाम:प्रतिभा ताई) (जन्म १९ दिसंबर १९३४) स्वतंत्र भारत के ६० साल के इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति हैं| राष्ट्रपति चुनाव में प्रतिभा पाटिल ने अपने प्रतिद्वंदी भैरोंसिंह शेखावत को तीन लाख से ज़्यादा मतों से हराया। प्रतिभा पाटिल को ६,३८,११६ मूल्य के मत मिले, जबकि भैरोंसिंह शेखावत ३,३१,३०६ मत मिले। इस तरह वे भारत की १३वीं राष्ट्रपति चुन ली गई हैं। उन्होंने २५ जुलाई २००७ को संसद के सेंट्रल हॉल में राष्ट्रपति पद की शपथ ली। महाराष्ट्र के जलगांव जिले में जन्मी प्रतिभा के पिता का नाम श्री नारायण राव था। साड़ी और बड़ी सी बिंदी लगाने वाली यह साधारण पहनावे वाली महिला राजनीति में आने से पहले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रही थी। विस्तार से पढ़ें...

२० दिसंबर २००९[संपादित करें]

गजानन माधव 'मुक्तिबोध'
गजानन माधव 'मुक्तिबोध' (१३ नवंबर १९१७ - ११ सितंबर १९६४) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। इनके पिता पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर थे और उनका तबादला प्रायः होता रहता था। इसीलिए मुक्तिबोध जी की पढाई में बाधा पड़ती रहती थी। सन १९३० में मुक्तिबोध जी ने मिडिल की परीक्षा, उज्जैन से दी और फेल हो गए। कवि ने इस असफलता को अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटना के रूप में स्वीकार किया है। उन्होंने १९५३ में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ किया और सन १९३९ में इन्होने शांताजी से प्रेम विवाह किया। १९४२ के आस-पास वे वामपंथी विचारधारा को ओर झुक... विस्तार से पढ़ें...

२१ दिसंबर २००९[संपादित करें]

श्रीकांत वर्मा (१८ नवंबर १९३१- १९८६) का जन्म बिलासपुर, मध्य प्रदेश में हुआ। वे गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। ये राजनीति से भी जुडे थे तथा लोकसभा के सदस्य रहे। १९५७ में प्रकाशित भटका मेघ, १९६७ में प्रकाशित मायादर्पण और दिनारम्भ, १९७३ में प्रकाशित जलसाघर और १९८४ में प्रकाशित मगध इनकी काव्य-कृतियाँ हैं। 'झाडियाँ तथा 'संवाद इनके कहानी-संग्रह है। 'बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में एक आलोचनात्मक ग्रंथ है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर तथा रायपुर में हुई तथा नागपुर विश्वविद्यालय से १९५६ में उन्होंने हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे दिल्ली चले गए और वहाँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगभग एक दशक तक पत्रकार के रूप में कार्य किया।... विस्तार से पढ़ें...

२२ दिसंबर २००९[संपादित करें]

गूगल क्रोम एक वेब ब्राउज़र है जिसे गूगल द्वारा मुक्त स्रोत कोड द्वारा निर्मित किया गया है। इसका नाम ग्राफिकल यूज़र इंटरफ़ेस (GUI) के फ्रेम यानि क्रोम पर रखा गया है। इस प्रकल्प का नाम क्रोमियम है तथा इसे बीएसडी लाईसेंस के तहत जारी किया गया है। २ सितंबर, २००८ को गूगल क्रोम का ४३ भाषाओं में माइक्रोसॉफ्ट विंडोज़ प्रचालन तंत्र हेतु बीटा संस्करण जारी किया गया। यह नया ब्राउज़र मुक्त स्रोत लाइनक्स कोड पर आधारित होगा, जिसमें तृतीय पार्टी विकासकर्ता को भी उसके अनुकूल अनुप्रयोग बनाने की सुविधा मिल सकेगी। गूगल क्रोम को बेहतर सुरक्षा, बेहतर गति एवं स्थायित्व को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसका सबसे प्रमुख लक्षण इसकी गति और अनुप्रयोग निष्पादन (एप्लीकेशन परफॉर्मेंस) हैं। इसके बीटा संस्करण को मार्च २००९ में लॉन्च किया गया था।... विस्तार से पढ़ें...

२३ दिसंबर २००९[संपादित करें]

वेब ब्राउज़र एक प्रकार का सॉफ्टवेयर होता है, जो की विश्वव्यापी वेब या स्थानीय सर्वर पर उपलब्ध लेख, छवियों, चल-छित्रों, संगीत, और अन्य जानकारियों इत्यादि को देखने तथा अन्य इन्टरनेट सुविधाओं के प्रयोग करने मैं प्रयुक्त होता है। वेब पृष्ठ एच.टी.एम.एल. नामक कंप्यूटर भाषा मैं लिखे जाते है, तथा वेब ब्राउजर उन एच.टी.एम.एल. पृष्ठों को उपभोक्ता के कंप्यूटर पर दर्शाता है। व्यक्तिगत कंप्यूटरों पर प्रयोग होने वाले कुछ मुख्य वेब ब्राउजर हैं इन्टरनेट एक्स्प्लोरर, मोजिला फ़ायरफ़ॉक्स,सफारी, ऑपेरा, फ्लॉक और गूगल क्रोम, इत्यादि।... विस्तार से पढ़ें...

२४ दिसंबर २००९[संपादित करें]

वास्को द गामा
डॉम वास्को द गामा (लगभग १४६०-२४ दिसंबर, १५२४) एक पुर्तगाली अन्वेषक, यूरोपीय खोज युग के सबसे सफल खोजकर्ताओं में से एक, और यूरोप से भारत सीधी यात्रा करने वाले जहाज़ों का कमांडर था, जो केप ऑफ गुड होप, अफ्रीका के दक्षिणी कोने से होते हुए भारत पहुँचा। वह जहाज़ द्वारा तीन बार भारत आया। उसकी जन्म की सही तिथि तो अज्ञात है लेकिन यह कहा जाता है कि वह १४९० के दशक में साइन, पुर्तगाल में एक योद्धा था। ८ जुलाई, १४९७ के दिन चार जहाजों सहित उसकी प्रथम भारत यात्रा लिस्बन से आरंभ हुई व २० मई, १४९८ के दिन कालीकट पहुंचे। इसके बाद १५०३ एवं १५३४ में भारत की दो और यात्राएं कीं। उस समय पुर्तगाल की भारत में उपनिवेश बस्ती के वाइसरॉय के रूप में आया, पर वहाँ पहुँचने के कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।

 विस्तार में...

२५ दिसंबर २००९[संपादित करें]

ट्राईटियम डायल वाली घड़ी
ट्राइटियम हाइड्रोजन का एक रेडियोधर्मी समस्थानिक होता है। इसे ट्राइटॉन भी कहते हैं। ट्राइटियम के नाभिक में एक प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन होते हैं, जबकि हाइड्रोजन के सबसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध समस्थानिक प्रोटियम में मात्र एक प्रोटॉन ही होता है और न्यूट्रॉन अनुपस्थित होता है। इस समस्थानिक का नाम एक ग्रीक शब्द से मिलकर बना है, जिसका अर्थ थर्ड या तृतीय होता है। ट्राइटियम की उत्पत्ति हैवी वाटर मॉडरेट रिएक्टर में ड्यूटीरियम माध्यम में न्यूट्रान के टकराव से होती है। इस प्रक्रिया में कुछ मात्रा में ट्राइटियम बनता है। ट्राइटियम का आण्विक भार ३.०१६०४९२ होता है। मानक तापमान और दबाव पर ट्राइटियम गैस रूप में रहता है। ऑक्सीजन से मिश्रित होने पर यह ये तरल रूप धारण करता है, जिसे ट्राइटीकृत जल (ट्राइटिएटेड वाटर) कहते हैं। ये रबड़, प्लास्टिक और कुछ तरह के इस्पातों के लिए पारगम्य होता है।... विस्तार से पढ़ें...

२६ दिसंबर २००९[संपादित करें]

गिरिजाकुमार माथुर
गिरिजा कुमार माथुर (२२ अगस्त १९१९ - १० जनवरी १९९४) का जन्म ग्वालियर जिले के अशोक नगर कस्बे में हुआ। वे एक कवि, नाटककार और समालोचक के रूप में जाने जाते हैं। उनके पिता देवीचरण जी स्कूल में अध्यापक थे तथा साहित्य एवं संगीत के शौकीन थे। वे कविता भी लिखा करते थे। सितार बजाने में प्रवीण थे। माता लक्ष्मीदेवी मालवा की रहने वाली थीं और शिक्षित थीं। गिरिजाकुमार की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता ने घर ही अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल आदि पढाया। इण्टरमीडिएट स्थानीय कॉलेज से करने के बाद १९३६ में स्नातक करने के लिए ग्वालियर गये। १९३८ में उन्होंने बी.ए. किया तथा १९४१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. किया तथा वकालत की परीक्षा पास की। सन १९४० में उनका विवाह दिल्ली में कवयित्री शकुन्त माथुर से हुआ।... विस्तार से पढ़ें...

२७ दिसंबर २००९[संपादित करें]

सुषमा स्वराज
सुषमा स्वराज (जन्म : १४ फरवरी १९५२) भारत की भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गई हैं। सम्प्रति वे भारत की पन्द्रहवीं लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेत्री हैं। इसके पहले वे केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में रह चुकी हैं तथा दिल्ली की मुख्यमंत्री भी रही हैं। वे सन २००९ के लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के १९ सदस्यीय चुनाव-प्रचार-समिति की अध्यक्ष भी रहीं थी। अम्बाला छावनी में में जन्मी सुषमा स्वराज ने एस.डी. कालेज अंबाला छावनी से बीए की डिग्री ली। पढ़ाई समाप्त होने के बाद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में साथ लगने वाली सुषमा ने राजनीति के मैदान में पूरी तरह से कूद जाने का फैसला कर लिया और आपातकाल का पुरजोर विरोध किया। वे सक्रिय राजनीति से जुड़ीं और सुख-दुख सभी तरह के मोड़ देखे।. विस्तार से पढ़ें...

२८ दिसंबर २००९[संपादित करें]

कुँवरपाल सिंह
प्रो. कुँवरपाल सिंह ( -८ नवंबर २००९) हिन्दी के जाने माने विद्वान, संपादक, लेखक और साहित्यकार हैं। उनका जन्म हाथरस जिले के कैलोरा ग्राम के एक किसान परिवार में हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से १९५९ में बी.ए., १९६१ में एम.ए. (हिंदी) तथा १९६९ में पीएच.डी. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत वे १९६६ में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए। १९७७ में रीडर तथा १९८५ में प्रोफ़ेसर पद पर उनकी प्रोन्नति हुई। अपनी सुदीर्घ सारस्वत-यात्रा के अनेक पड़ावों से गुज़रते हुए प्रो. सिंह ने अनेक प्रशासनिक पदों को सुशोभित किया। हिंदी विभाग के अध्यक्ष, कला संकाय के अधिष्ठाता पद के अतिरिक्त वे राजभाषा कार्यावयन समिति के उपाध्यक्ष भी रहे। एन.आर.एस.सी. के प्रोवोस्ट, एम्प्लॉयमेंट एवं गाइडेंस सेंटर के ब्यूरो प्रमुख, जनसंपर्क कार्यालय के प्रभारी तथा विश्वविद्यालय प्रसार व्याख्यान के समन्वयक के रूप में उन्होंने अपने दायित्वों का सफल निर्वाह किया।. विस्तार से पढ़ें...

२९ दिसंबर २००९[संपादित करें]

नितिन गडकरी (जन्म : २७ मई, १९५७), भारत के उद्योगपति और वरिष्ठ राजनेता हैं। वे दिसम्बर, २००९ में भारतीय जनता पार्टी के नौंवें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए हैं। बावन वर्ष की आयु में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनने वाले वे इस पार्टी के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में एक ब्रह्मण परिवार में हुआ। वे कामर्स में स्नातकोत्तर हैं इसके अलावा उन्होंने कानून तथा बिजनेस मनेजमेंट की पढ़ाई भी की है। गडकरी सफल उद्यमी हैं। वह एक बायो-डीज़ल पंप, एक चीनी मिल, एक लाख २० हजार लीटर क्षमता वाले इथानॉल ब्लेन्डिंग संयत्र, २६ मेगावाट की क्षमता वाले बिजली संयंत्र, सोयाबीन संयंत्र और को जनरेशन ऊर्जा संयंत्र से जुड़े हैं।. विस्तार से पढ़ें...

३० दिसंबर २००९[संपादित करें]

हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस
नई दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में महाभारत कालीन श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। यहाँ पर उपस्थित हनुमान जी स्वयम्भू हैं। बालचन्द्र अंकित शिखर वाला यह मंदिर आस्था का महान केंद्र है। इसके साथ बने शनि मंदिर का भी प्राचीन इतिहास है। एक दक्षिण भारतीय द्वारा बनवाए गए कनॉट प्लेस शनि मंदिर में दुनिया भर के दक्षिण भारतीय दर्शनों के लिए आते हैं। प्रत्येक मंगलवार एवं विशेषतः हनुमान जयंती के पावन पर्व पर यहां में भजन संध्या और भंडारे लगाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके साथ ही भागीरथी संस्था के तत्वाधान में संध्या का आयोजन किया गया, साथ ही क्षेत्र में झांकी निकाली जाती है।. विस्तार से पढ़ें...

३१ दिसंबर २००९[संपादित करें]

गुरु द्रोण को गुरुदक्षिणा में अपना अंगुठा भेंट करता एकलव्य
एकलव्य महाभारत का एक पात्र है। वह हिरण्य धनु नामक निषाद का पुत्र था। एकलव्य को अप्रतिम लगन के साथ स्वयं सीखी गई धनुर्विद्या और गुरुभक्ति के लिए जाना जाता है। पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बना। अमात्य परिषद की मंत्रणा से उसने न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलों की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित कर के अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार किया। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निषादपुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया।. विस्तार से पढ़ें...