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वास्तुकला सिद्धांत

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वास्तुकला के सचित्र फ्रेंच शब्दकोश से वास्तुकला संबंधी चर्चा

वास्तुकला सिद्धांत वास्तुकला के बारे में सोचने, चर्चा करने तथा लिखने की क्रिया को कहा जाता है। यह सिद्धांत वास्तुकला संबंधी सभी विद्यालयों में पढ़ाया जाता है। वास्तुकारों द्वारा इसका अभ्यास भी कराया जाता है। वास्तुकला सिद्धांत के विभिन्न रूप हैं जैसे - व्याख्यान अथवा संवाद, ग्रंथ अथवा पुस्तक तथा शोध परियोजना अथवा प्रतियोगिता प्रविष्टि।

प्राचीन भारत

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वास्तुशास्त्र जिसका शाब्दिक अर्थ है - "वास्तुकला का विज्ञान", वास्तुकला की पारंपरिक भारतीय प्रणाली पर आधारित ग्रंथ है।[1]

मध्यकाल

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वास्तुशास्त्र की परंपरा का पालन करते हुए मध्यकाल में कई विद्वानों ने वास्तुकला संबंधी ग्रंथ लिखे। इनमें थिरुमंगलथ नीलकंठन मुसथ की घरेलू वास्तुकला से संबंधित मनुष्यालय चंद्रिका, धार के भोज का शास्त्रीय भारतीय वास्तुकला पर आधारित काव्य ग्रंथ समरंगना सूत्रधार आदि शामिल हैं।[2]

पुनर्जागरण

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वास्तुकला सिद्धांत पर पहला कार्य सबोना का है जिसने विट्रुवियस को आधुनिक युग की सैद्धांतिक परंपरा के केंद्र में रखा। अल्बर्टी के अनुसार अच्छे वास्तुकला को विट्रुवियन त्रय के द्वारा मान्यता दी जाती है। विट्रुवियन त्रय वास्तुकला के उद्देश्य को परिभाषित करता है। इस त्रभी ने 19वीं शताब्दी तक महत्वपूर्ण बनी रही। ज्यामितिज्ञ गिरार्ड देसार्गेस की असहमतियों के कारण इसमें 17वीं शताब्दी और अंततः ज्ञानोदय युग में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। गिरार्ड की असहमतियाँ शंकु, परिप्रेक्ष्य और प्रक्षेपी ज्यामिति पर उनके शोध पर आधारित थीं।

इन्हें भी देखें

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  1. क्वैक, जोहानेस. डिसैंचैंटिंग इंडिया: ऑर्गेनाइज़्ड रैशनलिज़्म एंड क्रिटिसिज़्म ऑफ़ रिलीजियन इन इंडिया. न्यूयॉर्क: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस. ISBN 978-0-19-981260-8. अभिगमन तिथि: 20 जनवरी 2025.
  2. हार्डी, एडम (2015). "थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ़ टैंपल आर्किटैक्चर इन मिडिवल इंडिया: भोजा'स समरंगनसूत्रधार एंड द भोजपुर लाइन ड्रॉइंग्स" (अंग्रेज़ी भाषा में). इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फ़ॉर द आर्ट्स. अभिगमन तिथि: 20 जनवरी 2025.

बाहरी कड़ियाँ

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