वार्ता:संस्कृत भाषा

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यह पृष्ठ संस्कृत भाषा लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें।

लेखन संबंधी नीतियाँ

मेरे विचार से यहाँ जो कडियाँ जोडी गयीं हैं वे बहुत ही प्रासंगिक हैं। इसलिये इनका यहाँ रहना उचित है।

अनुनाद सिंह ०३:५७, २७ सितंबर २००७ (UTC)

आधुनिकक्षा+भिक्षु[संपादित करें]

  • हे जन्,गन्,कल्याण__
                         हे विधुत्य्देव्+देवी 
                             निवेदन्     
                         हम उत्त्‍तर् पक्षिम देशो मे वयाकुल् हुए!
                         अब, प्रिक्षा हुई धन्प्राप्ति कि प्रदान्ता से
                             अनेक कार्य निभाने कि क्ष्मत प्रदानकर्

                             ह्म्तुम्हारे जनवासी थे!प्रन्तु अब वनवासी
 मत्लव विदेशवासी=प्र्वासी होने के नाते! मोह तो आपजन् से वहुत था१
 मोह की कमी का कारण आप यामी हे
                                     
                              सन्जीव्य्