वार्ता:वैश्य

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

यह पृष्ठ वैश्य लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें।

लेखन संबंधी नीतियाँ

अयोध्यावासी वैश्य कौन[संपादित करें]

  • अयोध्यावासी वैश्य कौन*
*
  • "जिस वैश्य समाज का मूल स्थान अयोध्या हो, अर्थात किसी भी समय जिनके पूर्वज अयोध्या से प्रवासित/निर्वासित होकर देश के किसी भी भाग में निवास करते हो और वे किसी भी उपनाम से पहचाने जाते हो वे सभी अयोध्यावासी वैश्य हैं।"*
          संपूर्ण देश में निवास कर रहे अयोध्यावासी वैश्य का इतिहास त्रेता युग से प्रारंभ होता है सम्राट दशरथ द्वारा प्रभु श्री राम को बनवास दिए जाने पर अयोध्या की प्रजा दुखी हो गई। विशेषकर वैश्य समाज में व्याकुलता आ गई । तुलसीदासजी ने लिखा है *"भयऊ विकल बड़ वणिक समाजू। बिनु रघुवीर अवध नहि काजू।।*  उन्होंने भी प्रभु श्री राम के साथ वन जाने का निर्णय किया।  एक रात जब प्रभु श्री राम चुपचाप सीता जी व लक्ष्मण जी के साथ चले गए तो अयोध्यावासी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए और उन्होंने विचार किया कि *"जहां राम तह अवध है , नहीं अवध विन राम । बिना राम वन अवध है, अवध बचा क्या काम।।* और इस प्रकार अपने अपने अनुमान से चारों दिशाओं में ढूंढने निकल पड़े। जगह-जगह बसते गए और इस प्रकार सारे देश में अयोध्यावासी वैश्यों का प्रचार हुआ ।
  • आदि पुरुष महाराजा मणिकुंडल कौन?*
   अयोध्या  वासियों की टोलियां प्रभु श्री राम को ढूंढते आगे बढ़ रही थी। परंतु राम जी का पता नहीं लग रहा था। टोलियां थक कर जहां पहुंच जाती थी वहीं पर ठिकाना बना लेती थी । परंतु नगर सेठ मणि कौशल व उनके राम भक्त पुत्र मणि कुंडल आगे बढ़ते गए वह चलते-चलते दक्षिण भारत के *भौवन* नामक नगर पहुंचे गए, तब तक बालक *मणि कुंडल* युवा हो गए थे वहां मणिकुंडल की मित्रता गौतम नामक ब्राम्हण मित्र से हुई उसने मणि कुंडल जी से प्रभु श्री राम को ढूंढने एवं व्यापार करने दूसरे नगर चलने का आग्रह किया । माता पिता की आज्ञा लेकर मणि कुंडल जी गौतम के साथ चल दिए दूसरे नगर पहुंचकर गौतम ने मणि कुंडल जी को दुराचार एवं व्यसनों हेतु प्रेरित किया । मणि कुंडल जी ने इन्हें धार्मिक एवं अनैतिक कृत्य कहते हुए मानने से इनकार किया इस पर गौतम ने शर्त लगाई और छल प्रपंच कर उनका धन ले लिया। धन लेने के बाद वह मणि कुंडल जी से पीछा छुड़ाने का प्रयास करने लगा आगे चलकर गोदावरी नदी के किनारे एकांत स्थान पर गौतम ने मणि कुंडल जी पर हमला कर उनके नेत्र , हाथ और पैर क्षत-विक्षत कर दिए तथा धन लेकर चला गया । 
              संयोगवश उस स्थान पर भगवान योगेश्वर( विष्णु ) का सिद्ध मंदिर था, जहां पर विभीषण प्रत्येक शुक्ल एकादशी को दर्शन करने आते थे मणि कुंडल जी रात भर तड़पते रहे ।प्रातः काल एकादशी थी, लंकापति विभीषण (रावण वध हो चुका था विभीषण लंका के राजा बन चुके थे) अपने पुत्र वैभिषणि के साथ यहां आए तो मणिकुण्डल  जी को  घायल अवस्था में तड़पते देखा। यह जानकर कि वह राम भक्त हैं, और सत्य आस्था के कारण उनकी यह दशा हुई है उन्होंने  विशल्यकरणी औषधि जो संजीवनी बूटी पर्वत ले जाते समय यहां गिर गई थी और उग आई थी , तथा दिव्य मंत्रों से उनका उपचार किया स्वस्थ होकर और विभीषण से यह जानकर कि प्रभु श्री राम बनवास पूर्ण कर अयोध्या में राज्य का संभाल चुके हैं , मणिकुण्डल  जी ने अपना जीवन परोपकार हेतु समर्पित कर दिया चलते चलते वह महापुर राज्य पहुंचे, उस समय वहां की राजकुमारी मरणासन्न स्थिति में थी वैद्य हकीम तांत्रिकों ने जवाब दे दिया था तब मणि कुंडल जी ने उन्हीं दिव्य मंत्र एवं विशल्यकरणीऔषधि से राजकुमारी को स्वस्थ किया। इस पर राजा महाबली ने उन्हें आधा राज्य  देने का आग्रह किया । परंतु मणिकुण्डल जी ने इसे विनम्रता पूर्वक मना कर दिया  इससे राजा की श्रद्धा बढ़ गई और अंततः उन्होंने राजकुमारी से मणि कुंडल जी का विवाह कर पूरा राज पाठ उन्हें सौंप दिया । इस प्रकार वे महापुर के राजा बने । राजा बनने के बाद वह अपने माता-पिता और रानी महा रूपा के साथ प्रभु श्री राम के दर्शन करने अयोध्या गए।
           अयोध्या से प्रभु श्री राम के साथ वन गमन करने के कारण ही हमारा समाज अयोध्यावासी वैश्य कहलाया। मणि कुंडल जी इसी टोली के नायक व महामानव थे । साथ ही मणिकुंडल जी अयोध्यावासी वैश्योक्तपन्न विश्व के प्रथम एवं एकमात्र राजा थे ।इसी कारण महाराजा मणि कुंडल जी अयोध्यावासी वैश्य के आदि पुरुष के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी राम भक्ति एवं कुशल प्रशासक छवि पर अयोध्यावासी वैश्य समाज को गर्व है । यह अलग अलग जगह अलग अलग उपनाम यथा गुप्ता, वैश्य,कौशल,कश्यप, अवधिया,अवधवाल, अवधबनिया, आदर्शी,महतो, मोदी,बघेल,परदेशी इत्यादि उपनाम लिखता है।

महाराजा मणि कुंडल जी की मूर्तियां श्री अयोध्यावासी वैश्य पंचायती राम जानकी मंदिर अयोध्या , श्री अयोध्यावासी वैश्य धर्मशाला एवं मंदिर चित्रकूट, श्री मणि कुंडल वाटिका कानपुर, श्री दाऊजी मंदिर मैनपुरी , श्री शिव मंदिर टिकैतनगर बाराबंकी, श्रीमणि कुंडल मंदिर सिवनी मध्य प्रदेश के साथ-साथ नवाबगंज फर्रुखाबाद , बरघाट गोपालगंज ,भिखना पुर, सतना, सिधौली , नैमिषारण्य इत्यादि स्थानों पर स्थापित है। अयोध्यावासी वैश्य समाज और महाराजा मणिकुण्डल जी के बारे में ब्रह्म पुराण ,वैश्यानाम गौरव, अयोध्यावासी वैश्य का इतिहास एवं वैश्य समुदाय का इतिहास,जातिभास्कर,जातिअन्वेषण ग्रन्थ मणिकुण्डल कवितावली इत्यादि मे वर्णन मिलताहै। Aniket004 (वार्ता) 18:56, 25 सितंबर 2020 (UTC)