वार्ता:वर्ग संघर्ष

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लेखन संबंधी नीतियाँ

प्रतिलिपि लेख का पाठ (जिसे स:Rinnie493 और स:Nirali82 ने कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष कि सिद्धांत के नाम से[संपादित करें]

कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष कि सिद्धांत[संपादित करें]

Karl Marx

माक्र्सवाद में, माक्र्सवादी वर्ग सिद्धान्त यह दावा करता है कि वर्ग पदानुक्रम में एक व्यक्ति का स्थान उत्पादन की प्रक्रिया में उसकी भूमिका के द्वारा निर्धारित किया जाता है, और यह तर्क देता है कि राजनैतिक एवं वैचारिक चेतना का निर्धारण वर्गीय स्थान के द्वारा किया जाता है।, माक्र्सवादी वर्ग सिद्धान्त के अन्तर्गत, उत्पादन प्रक्रिया की संरचना वर्ग निर्माण का आधार बनाती है।

माक्र्सवादी वर्ग सिद्धान्त वैकल्पिक स्थानों की एक श्रंखला, मुख्यतः ई.पी. थाॅम्पसन एवं मारियो ट्रोंटी जैसे विद्वानों के लिए खुला रहा है। थाॅम्पसन और ट़ोंटी दोनों सुझाव देते हैं कि उत्पादन प्रक्रिया के अन्तर्गत वर्ग चेतना उत्पादक संबंधों के निर्माण से पहले आती है। इस अर्थ में, माक्र्सवादी में वर्ग सिद्धान्त अक्सर पहले से विद्यमान वर्ग संघर्षों पर चर्चा करता है।

माक्र्सवादी सिद्धान्त का उद्भव[संपादित करें]

माक्र्सवादी वर्ग सिद्धान्त को विभिन्न् दार्शनिक विचारधारा से लिया गया है जैसे, हेगेलियनवाद, स्काॅटिश अनुभववाद और अंग्रेजी-फ्रांसीसी राजनैतिक-अर्थशास्त्र से लिया गया है। माक्र्स के वर्ग के विचार का उद्भव सामाजिक अलगाव और मानवीय संघर्ष से संबंधित व्यक्तिगत रूचियों की श्रंखलाओं से हुआ, और इसलिए वर्ग संरचना का निर्माण तीक्ष्ण ऐतिहासिक चेतना से संबंधित है। “आय की उत्पत्ति” के विचार पर केन्द्रित राजनैतिक-अर्थशास्त्र ने भी माक्र्स के सिद्धान्तों में योगदान किया है, जिसमें समाज को तीन उप-समूहों में विभाजित किया जाता हैः नौकरशाह, पूंजीवादी और मजदूर। यह संरचना डेविड रिकार्डो के पूंजीवादी सिद्धान्त पर आधारित है। माक्र्स ने सत्यापनीय वर्ग संबंधों पर चर्चा के द्वारा इसे बल दिया।

माक्र्स ने वर्ग को सामाजिक प्रतिष्ठा की बजाय उत्पादक संबंधों में निहित होने के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया। उसका राजनैतिक और आर्थिक विचार वितरण के विरूद्ध उत्पादन में रूचि की ओर विकसित हुआ और इसीलिए, यह उसकी वर्ग अवधारणा का केन्द्रिय विषय बन गया।

वर्ग संरचना[संपादित करें]

माक्र्स दो मापदण्डों के आधार पर एक वर्ग को दूसरे से अलग करता हैः उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एवं दूसरों की श्रम शक्ति पर नियंत्रण। इससे, वह बताता है कि आधुनिक समाज में तीन विशिष्ट वर्ग हैंः 1. पूंजीवाद या बुर्जुआ उत्पादन के साधनों के स्वामी हैं और वे दूसरों की श्रम शक्ति को खरीदते हैं

2. मजदूर या साधारण जन, जिनके पास उत्पादन का कोई साधन या दूसरों की श्रम शक्ति को खरीदने की क्षमता नहीं है। इसकी बजाय, वे स्वयं की श्रम शक्ति को बेचते हैं

3. छोटे बुर्जुआ के रूप में जाना जाने वाला एक छोटा, परिवर्तनशील वर्ग जिनके पास उत्पादन के पर्याप्त साधन हैं लेकिन वे श्रम शक्ति को नहीं खरीदते हैं। माक्र्स का साम्यवादी घोषणापत्र छोटे बुर्जुआ को “छोटे पूंजीवादियों” से आगे परिभाषित करने में असफल हो जाता है।

इस प्रकार वर्ग का निर्धारण संपदा संबंधों के द्वारा किया जाता है, न कि आय या प्रतिष्ठा के द्वारा। इन अवयवों का निर्धारण वितरण एवं उपभोग द्वारा किया जाता है, जो वर्गों के उत्पादन एवं शक्ति संबंधों का प्रतिबिम्ब दिखाते हैं।

वर्ग संबंधों की प्रकृतिः संघर्ष[संपादित करें]

“आज तक विद्यमान समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है... स्वतंत्र और गुलाम, अभिजात और साधारण, स्वामी और दास, संघ अध्यक्ष और मजदूर, एक शब्द में, उत्पीड़क और उत्पीडि़त निरन्तर एक-दूसरे के विरोध में खड़े रहे और कभी खुलकर और कभी छिपकर, अबाध रूप से लड़ते रहे जिसका परिणाम या तो वृहद् स्तर पर क्रान्तिकारी समाज के पुनर्निर्माण में हुआ या संघर्षरत वर्गों की तबाही में हुआ... सामंती समाज की तबाही से उगे आधुनिक बुर्जुआ समाज ने वर्ग शत्रुता को समाप्त नहीं किया है। इसकी बजाय उसने नए वर्गों, उत्पीड़न की नई दशाओं और संघर्ष के पुराने स्वरूपों की जगह नए स्वरूपों को स्थापित किया है। परन्तु, पूंजीपतियों के हमारे युग की एक विशेषता हैः इसने वर्ग शत्रुता को सरल कर दिया है। समाज वृहद् स्तर पर दो बड़ी शत्रु छावनियों में विभाजित हो रहा हैः पूंजीपतियों और श्रमजीवियों के दो बड़े वर्गों में, जो सीधे एक-दूसरे का सामना करते हैं।” - साम्यवादी घोषणापत्र

माक्र्स ने संघर्ष को इतिहास के मुख्य पे्ररक बल और सामाजिक प्रक्षेप पथों के मुख्य निर्धारक के रूप में स्थापित किया। (किंग्स्टन) परन्तु वर्ग संघर्ष की प्रकृति को समझने के लिए पहले हमें यह समझना आवश्यक है कि ऐसा संघर्ष एक एकीकृत वर्ग हित से उत्पन्न् होता है, जिसे वर्ग चेतना भी कहा जाता है। वर्ग चेतना माक्र्सवादी सिद्धान्त का एक पहलू है, जो सामाजिक वर्गों की आत्म-जागृति, अपनी स्वयं की तार्किक रूचियों में कार्य करने की क्षमता, या उस सीमा को मापने की ओर संकेत करता है जहाँ तक एक व्यक्ति को अपने वर्ग (या वर्ग गठबंधन) द्वारा उनके लिए निर्धारित ऐतिहासिक कार्यों की जानकारी होती है।

इसके अतिरिक्त, परिभाषा द्वारा, वर्गों के विषयपरक हित मूलभूत रूप से विरोधी होते हैं; और इसके परिणामस्वरूप, ये परस्पर विरोधी हित और चेतनाएँ अन्ततः वर्ग संघर्ष की ओर ले जाती हैं।

माक्र्स ने पहले देखा कि वर्ग संघर्ष का विकास व्यक्गित कारखानों और पूंजीवादियों तक सीमित था। परन्तु, पूंजीवाद की परिपक्वता पर, पूंजीपतियों और श्रमजीवियों के जीवन की दशाओं में अधिकाधिक अन्तर आता गया। वर्गों के अन्दर इस बढ़ते ध्रुवीकरण और एकरूपीकरण ने व्यक्तिगत संघर्षों के अधिक व्यापक होने के लिए माहौल तैयार किया। जब बढ़ता हुआ वर्ग संघर्ष सामाजिक स्तर पर दिखाई देता है तो वर्ग चेतना और समान हित भी बढ़ते हैं। इसके परिणामस्वरूप जब वर्ग चेतना में वृद्धि होती है तो शासकीय वर्ग के लिए ऐसे हित की अवधि को सुनिश्चित करने के लिए नीतियाँ बनाई जाती हैं। यहाँ राजनैतिक ताकत के लिए संघर्ष का प्रयोग शुरू होता है और वर्ग राजनैतिक ताकतें बन जाते हैं।

चूंकि राजनैतिक ताकत के वितरण का निर्धारण उत्पादन पर ताकत या पूंजी पर ताकत द्वारा किया जाता है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि पूंजीपति वर्ग अपनी संपत्ति का प्रयोग अपनी जायदाद एवं सामाजिक संबंधों की सुरक्षा तथा उन्हें वैध ठहराने के लिए करता है। इस प्रकार शासक वर्ग वह है जिसके पास आर्थिक ताकत है और जो निर्णय लेता है। (डेरेन्डोर्फ)

समाजवादी क्रान्ति की अपरिहार्यता[संपादित करें]

माक्र्स अन्तिम असंतुष्टि के कारण पूंजीवादी समाज के साम्यवादी समाज में क्रान्ति की अपरिहार्यता की कल्पना करते हैं। वृहद् स्तरीय उत्पादन, पूंजीवादी हित समूहों एवं संगठनों के साथ-साथ पूंजी के आयामों एवं ताकत में अत्यधिक वृद्धि में श्रम का सामाजीकरण समाजवाद के अपरिहार्य आगमन के लिए मुख्य आधार उपलब्ध करवाता है। इस रूपान्तरण के भौतिक, बौद्धिक एवं नैतिक प्रणेता साधारण जन हैं। पूंजीपतियों के विरूद्ध आमजनों का संघर्ष अन्ततः राजनैतिक संघर्ष का रूप ले लेता है जिसका लक्ष्य आमजनों द्वारा राजनैतिक विजय हासिल करना होता है। साधारण लोगों की प्रमुखता के साथ, उत्पादन का सामाजीकरण उत्पादन के साधनों को समाज की संपत्ति बनने की ओर ले जाता है। इस रूपान्तरण के प्रत्यक्ष परिणाम श्रम उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि, एक छोटा कार्यदिवस, और लघु स्तरीय एकीकृत उत्पादन की जगह सामूहिक एवं बेहतर श्रम होते हैं। पूंजीवाद हमेशा के लिए उत्पादक और स्वामी के संबंध को तोड़ देता है, जो कभी वर्ग संघर्ष से जुड़ा था। अब विज्ञान के सचेतन प्रयोग एवं सामूहिक श्रम की सघनता के आधार पर एक नए संघ का निर्माण किया जाएगा।

उसने इस पुनर्वितरण का विस्तार परिवारों में ताकत संरचना के लिए भी किया। माक्र्स ने कल्पना की कि समाजवाद के साथ स्त्रियों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी, जिससे पितृ-प्रधान परिवार टूटेगा...

“आधुनिक उद्योग, उत्पादन की सामाजिक रूप से संगठित प्रक्रिया में घरेलू क्षेत्र के बाहर स्त्रियों, युवाओं, और दोनों लिंगों के बच्चों को एक महत्वपूर्ण भाग सौंपने के द्वारा परिवार एवं स्त्री-पुरूष के बीच संबंधों के एक उच्चतर रूप के लिए एक नए आर्थिक आधार को तैयार करता है... इसके अतिरिक्त, यह स्पष्ट है कि सामूहिक कार्य समूह में दोनों लिंगों एवं हर आयु के व्यक्ति शामिल हैं, और इस तथ्य को उपयुक्त दशाओं में मानवीय विकास का एक स्रोत बनना चाहिए; हालांकि इसके स्व-विकसित, क्रूर, पूंजीवादी स्वरूप में श्रमिक का अस्तित्व उत्पादन की प्रक्रिया के लिए है, न कि उत्पादन की प्रक्रिया श्रमिक के लिए, यह तथ्य भ्रष्टाचार एवं गुलामी का घातक स्रोत है। (कैपिटल, संस्करण 1, अध्याय 13)

बचत मूल्य राजनैतिक अर्थव्यवस्था की समीक्षा में कार्ल माक्र्स का एक केन्द्रिय विचार है। माक्र्स ने स्वयं इस शब्द को नहीं खोजा था, उसने इस विचार को विकसित किया था। “बचत मूल्य” जर्मन शब्द “मेरवेर्ट” का अनुवाद है, जिसका अर्थ है कुल मूल्य (विक्रय में से सामग्री की लागत को घटाने के बाद।) पारम्परिक रूप से, कुल मूल्य सकल श्रम आय और सकल लाभ आय का योग होता है। परन्तु, माक्र्स का इस विचार का प्रयोग भिन्न है क्योंकि माक्र्स के लिए मेरवेर्ट निवेश की गई उत्पादक पूंजी पर लाभ या आय को बताता है, यानि, पूंजी के मूल्य में वृद्धि की राशि। अतः, माक्र्स द्वारा मेरवेर्ट के प्रयोग का अनुवाद हमेशा “कुल मूल्य” से भिन्न, “बचत मूल्य” के रूप में किया जाता रहा है। माक्र्स के सिद्धान्त के अनुसार, बचत मूल्य कर्मचारियों द्वारा स्वयं की श्रम लागत की वृद्धि से निर्मित नए मूल्य के बराबर है, जिसे उत्पादों का विक्रय करने पर पूंजीवादी द्वारा लाभ के रूप में लिया जाता है।

माक्र्स ने सोचा कि 19वीं सदी के बाद से संपत्ति एवं जनसंख्या में भीमकाय वृद्धि का मुख्य कारण श्रम के उपयोग द्वारा अधिकतम बचत मूल्य को पाने का प्रतिस्पद्र्धी प्रयास था, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता एवं पूंजीवादी संसाधनों में भी उतनी ही भीमकाय वृद्धि हुई। आर्थिक बचत को जिस सीमा तक धन में परिवर्तित किया और अभिव्यक्त किया जा सकता है, उतने ही वृहत्तर स्तर पर धन का एकत्रीकरण संभव है। (देखें पूंजी एकत्रीकरण और बचत उत्पाद)

सिद्धान्त[संपादित करें]

Pyramid of Capitalist System

बचत मूल्य के स्रोत को समझाने की समस्या को फ्रेडरिक ऐंगल्स द्वारा निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया गया हैः “यह बचत-मूल्य कहाँ से आता है? यह न तो क्रेता द्वारा वस्तुओं को उनके मूल्य से कम पर खरीदने से आ सकता है और न ही विक्रेता द्वारा उन्हें अधिक मूल्य पर बेचने से। क्योंकि दोनों मामलों में प्रत्येक व्यक्ति के लाभ और हानियाँ एक-दूसरे को निरस्त कर देते हैं और इसका कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति क्रेता एवं विक्रेता होता है। न ही यह धोखे से आ सकता है, क्योंकि हालांकि धोखा किसी अन्य की कीमत पर एक व्यक्ति को धनी बना सकता है लेकिन यह दोनों के स्वामित्व वाले धन के योग को नहीं बढ़ा सकता है और इसलिए वितरण में मूल्यों के योग को नहीं बढ़ा सकता है। इस समस्या का समाधान आवश्यक है और इसका समाधान सारे धोखे और किसी बल के हस्तक्षेप के बिना पूर्णतः आर्थिक तरीके से किया जाना चाहिए-समस्या यह हैः व्यक्ति द्वारा लगातार क्रय मूल्य से महंगा बेचना कैसे संभव है, इस परिकल्पना पर भी कि समान मूल्यों को हमेशा समान मूल्यों से बदला जाता है?”

माक्र्स का समाधान कार्यरत श्रम समय और श्रम शक्ति के बीच अन्तर करना था। एक पर्याप्त रूप से उत्पादक व्यक्ति अपनी मजदूरी की लागत से बढ़कर उत्पादन कर सकता है। हालांकि उसकी मजदूरी कार्य के घण्टों पर आधारित प्रतीत होती है लेकिन एक आर्थिक अर्थ में यह मजदूरी श्रमिक के उत्पादन के पूर्ण मूल्य को प्रतिबिम्बित नहीं करती है। वास्तव में श्रमिक अपने श्रम को नहीं बल्कि अपनी कार्य करने की क्षमता को बेचता है।

एक श्रमिक की कल्पना करें जिसे 10 डाॅलर प्रति घण्टे की दर से काम पर रखा गया है। पूंजीवादी की नौकरी में आने पर, पूंजीवादी उसे जूता बनाने की मशीन का संचालन सौंपता है जिसके द्वारा श्रमिक प्रत्येक पन्द्रह मिनट में 10 डाॅलर का उत्पादन करता है। हर घण्टे, पूंजीवादी को 40 डाॅलर मूल्य का उत्पादन मिलता है और श्रमिक को केवल 10 डाॅलर का भुगतान किया जाता है, शेष 30 डाॅलर को वह सकल आय के रूप में रख लेता है। पूंजीवादी द्वारा स्थिर एवं चल लागतों (मान लें) 20 डाॅलर (चमड़ा, मशीन का क्षय, आदि) को घटाने के बाद, उसके पास 10 डाॅलर शेष रहते हैं। इस प्रकार, 30 डाॅलर के व्यय पर पूंजीवादी को 10 डाॅलर बचत मूल्य प्राप्त होता है; उसकी पूंजी का स्थान न केवल संचालन ने ले लिया है बल्कि उसमें 10 डाॅलर की वृद्धि भी हुई है।

श्रमिक सीधे इस लाभ को नहीं ले सकता है क्योंकि उसका उत्पादन के साधनों (जैसे, जूता बनाने वाली मशीन) या उसके उत्पादों पर कोई दावा नहीं है और मजदूरी के बारे में सौदेबाजी करने की उसकी क्षमता कानूनों एवं श्रम की पूर्ति/माँग से बँधी है।

परिभाषा[संपादित करें]

एक अर्थव्यवस्था में कुल बचत-मूल्य (माक्र्स सम्पूर्ण बचत-मूल्य की ओर संकेत करते हैं) मूलतः शुद्ध वितरित एवं अवितरित लाभ, शुद्ध ब्याज, शुद्ध किराए, उत्पादन पर शुद्ध कर एवं राजस्व, लाइसेन्स, पट्टों, निश्चित मानदेयों आदि से जुड़ी शुद्ध रसीदों के योग के बराबर होता है। निःसन्देह, सामान्य लेखांकन में सकल एवं शुद्ध लाभ आय की गणना का तरीका निजी व्यवसाय से कुछ अलग हो सकता है (संचालन बचत भी देखें।) स्व३यं माक्र्स की चर्चा मुख्यतः लाभ, ब्याज और किराए पर ध्यान देती है, कर निर्धारण एवं राजस्व जैसी वसूली को अनदेखा करती है जो उसके जीवनकाल में आनुपातिक रूप से राष्ट्रीय आय के बहुत छोटे अवयव थे। परन्तु पिछले 150 वषों में, संसार के लगभग प्रत्येक देश में अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका बढ़ गई है। 1850 के आस-पास, विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में सकल घरेलू उत्पादन में सरकार का औसत भाग 5 प्रतिशत के लगभग था; 1870 में 8 प्रतिशत से थोड़ा अधिक; प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व 10 प्रतिशत से कुछ कम; द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ने से ठीक पूर्व लगभग 20 प्रतिशत; 1950 तक लगभग 30 प्रतिशत; और आज औसत लगभग 35-40 प्रतिशत है।

कार्ल माक्र्स का विरक्ति का सिद्धान्त सामाजिक वर्गों में विभाजित एक समाज में जीने के फलस्वरूप अपने मानवीय स्वभाव के आयामों से लोगों की सामाजिक विरक्ति का वर्णन करता है।

विरक्ति एक सामाजिक रूप से विभाजित समाज में जीने का प्रणालीबद्ध परिणाम है क्योंकि एक सामाजिक वर्ग का यांत्रिक भाग होने से व्यक्ति अपनी मानवता से दूर हो जाता है। उत्पादन के पूंजीवादी रूप में विरक्ति का सैद्धान्तिक आधार यह है कि श्रमिक अपने जीवन और नियति का निर्धारण करने की क्षमता को खो देता है जब उसे अपने कार्यों के निदेशक के रूप में स्वयं के बारे में सोचने के अधिकार से; बताए गए कार्यों के चरित्र का निर्धारण करने से; दूसरे लोगों से उनके संबंध को परिभाषित करने से; और उनके श्रम द्वारा उत्पादित वस्तुओं का स्वामित्व रखने एवं वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य का उपयोग करने से वंचित किया जाता है। हालांकि श्रमिक एक स्वायत्त, स्व-सिद्ध मानव है, एक आर्थिक अस्तित्व के रूप में उसे लक्ष्यों की ओर निर्देशित किया जाता है और पूंजीवादी द्वारा बताई गई गतिविधियों की ओर मोड़ा जाता है, जिसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व है जिससे वह उद्यमियों के बीच व्यवसायिक प्रतिस्पद्र्धा के दौरान श्रमिक से बचत मूल्य की अधिकतम राशि को निकालता है।

पुस्तक सूची[संपादित करें]

  1. Dahrendorf, Ralf. Class and Class Conflict in Industrial Society. Stanford, Calif.: Stanford University Press, 1959.
  2. David McLellan, ed., "Capital." The Marx-Engels Reader, 1977. Oxford University Press: Great Britain.
  3. Kingston, Paul W. The Classless Society. Stanford, Calif.: Stanford University Press, 2000.
  4. Marx & Engels. The Communist Manifesto. New York: Penguin group, 1998.
  5. Parkin, F. Marx’s Theory of History: A Bourgeois Critique. New York: Columbia University Press, 1979.
  6. Youth for International Socialism- NewYouth.com