वात रोग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
Gout
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
The gout james gillray.jpg
Gout, a 1799 caricature by James Gillray
आईसीडी-१० M10.
आईसीडी- 274.00 274.1 274.8 274.9
ओएमआईएम 138900 300323
डिज़ीज़-डीबी 29031
मेडलाइन प्लस 000422
ईमेडिसिन emerg/221  med/924 med/1112 oph/506 orthoped/124radio/313
एम.ईएसएच D006073

वात रोग (जिसे पोडाग्रा के रूप में भी जाना जाता है जब इसमें पैर का अंगूठा शामिल हो)[1] एक चिकित्सिकीय स्थिति है आमतौर पर तीव्र प्रदाहक गठिया—लाल, संवेदनशील, गर्म, सूजे हुए जोड़ के आवर्तक हमलों के द्वारा पहचाना जाता है। पैर के अंगूठे के आधार पर टखने और अंगूठे के बीच का जोड़ सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है (लगभग 50% मामलों में)। लेकिन, यह टोफी, गुर्दे की पथरी, या यूरेट अपवृक्कता में भी मौजूद हो सकता है। यह खून में यूरिक एसिड के ऊंचे स्तर के कारण होता है। यूरिक एसिड क्रिस्टलीकृत हो जाता है और क्रिस्टल जोड़ों, स्नायुओं और आस-पास के ऊतकों में जमा हो जाता है।

चिकित्सीय निदान की पुष्टि संयुक्त द्रव में विशेष क्रिस्टलों को देखकर की जाती है। स्टेरॉयड-रहित सूजन-रोधी दवाइयों (NSAIDs), स्टेरॉयड या कॉलचिसिन लक्षणों में सुधार करते हैं। तीव्र हमले के थम जाने पर, आमतौर पर यूरिक एसिड के स्तरों को जीवन शैली में परिवर्तन के माध्यम से कम किया जाता है और जिन लोगों में लगातार हमले होते हैं उनमें, एलोप्यूरिनॉल या प्रोबेनेसिड दीर्घकालिक रोकथाम प्रदान करते हैं।

हाल के दशकों में वात रोक की आवृत्ति में वृद्धि हुई है और यह लगभग 1-2% पश्चिमी आबादी को उनके जीवन के किसी न किसी बिंदु पर प्रभावित करता है। माना जाता है कि यह वृद्धि जनसंख्या बढ़ते हुए जोखिम के कारकों की वजह से है, जैसे कि चपापचयी सिंड्रोम, अधिक लंबे जीवन की प्रत्याशा और आहार में परिवर्तन। ऐतिहासिक रूप से वात रोग को "राजाओं की बीमारी" या "अमीर आदमी की बीमारी" के रूप में जाना जाता था।

संकेत और लक्षण[संपादित करें]

पैर का पार्श्वदृश्य जो अंगूठे के आधार पर जोड़ के ऊपर त्वचा का एक लाल धब्बे दिखाता है
पैर के अंगूठे के टखने और अंगूठे के बीच के जोड़ पर मौजूद वात रोग: जोड़ के ऊपर की त्वचा पर मामूली लालिमा पर ध्यान दें।

वात रोग कई तरह से मौजूद हो सकता है, हालांकि सबसे सामान्य तीव्र प्रदाहक गठिया (लाल, संवेदनशील, गर्म, सूजे हुए जोड़) का बार-बार होने वाला हमला होता है।[2] सबसे ज़्यादा बार, आधे मामलों में पैर के अंगूठे के आधार पर टखने और अंगूठे के बीच का जोड़ प्रभावित होता है।[3] अन्य जोड़ जैसे कि एड़ियां, घुटने, कलाइयां और उंगलियां, भी प्रभावित हो सकती हैं।[3] जोड़ों का दर्द आमतौर पर सोने के 2-4 घंटे बाद और रात के दौरान शुरू होती है।[3] रात में शुरू होने का कारण, शरीर का तापमान कम होना है।[1] जोड़ों के दर्द के साथ-साथ अन्य लक्षण कभी-कभार ही मौजूद हो सकते हैं, जिनमें थकान और उच्च ज्वर शामिल हैं।[1][3]

लंबे समय से चले आ रहे यूरिक एसिड के उच्च स्तर (हाइपरयूरीसेमिया) के परिणाम स्वरूप अन्य रोगलक्षण हो सकते हैं, जिनमें यूरिक एसिड के कठोर, दर्दरहित जमा हुए क्रिस्टल शामिल हैं, जिन्हें टोफी के नाम से जाना जाता है। व्यापक टोफी के परिणाम स्वरूप हड्डी कटाव के कारण गठिया हो सकता है।[4] यूरिक एसिड के बढ़े हुए स्तरों के कारण गुर्दों में क्रिस्टल नीचे बैठ सकते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप पत्थरी बन सकती है और उसके बाद यूरेट अपवृक्कता हो सकती है।[5]

कारण[संपादित करें]

हाइपरयूरीसेमिया, वात रोग का मूल कारण होता है। यह कई कारणों से हो सकता है, जिनमें आहार, आनुवंशिक गड़बड़ी, या यूरेट, यूरिक एसिड के लवणों का कम उत्सर्जन शामिल हैं।[2] लगभग 90% मामलों में हाइपरयूरीसेमिया का मुख्य कारण गुर्दों में यूरिक एसिड का कम उत्सर्जन होता है, जब कि ज़रुरत से अधिक उत्पादन 10% के कम मामलों में कारण होता है।[6] हाइपरयूरीसेमिया वाले लगभग 10% लोगों में उनके जीवन काल में किसी न किसी बिंदु पर वात रोग विकसित हो जाता है।[7] लेकिन, हाइपरयूरीसेमिया के स्तर के आधार पर, जोखिम अलग-अलग हो सकता है। जब स्तर 415 और 530 माइक्रोमोल/लीटर (7 और 8.9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) के बीच हों, तो जोखिम 0.5% प्रति वर्ष होता है, जब कि 535 माइक्रोमोल/लीटर (9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) से ऊपर के स्तरों वाले लोगों में यह जोखिम 4.5% प्रति वर्ष होता है।[1]

जीवन शैली[संपादित करें]

लगभग 12% वात रोग का कारण आहार से संबंधित होता है,[2] और इसमें अल्कोहल, फ्रक्टोज-से मीठे किये गये पेय, मीट और समुद्री भोजन के उपभोग के साथ मज़बूत संबंध होता है।[4][8] अन्य ट्रिगरों में शारीरिक बड़ी चोट और सर्जरी शामिल हैं।[6] हाल के अध्ययनों से पता चला है कि आहार से संबंधित कारक जिन्हें कभी संबंधित समझा जाता था, वास्तव में संबंधित नहीं हैं, जिनमें प्यूरीन-से भरपूर सब्जियों (जैसे, सेम, मटर, मसूर और पालक) और कुल प्रोटीन का सेवन शामिल है।[9][10] कॉफी, विटामिन Cऔर डेयरी उत्पादों का सेवन और साथ ही शारीरिक तंदरुस्ती, जोखिम को कम करते प्रतीत होते हैं।[11][12][13] माना जाता है कि यह आंशिक रूप से इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने में उनके प्रभाव के कारण है।[13]

आनुवांशिकता[संपादित करें]

वात रोग का होना आंशिक रूप से आनुवांशिक है, जो यूरिक एसिड के स्तर में लगभग 60% परिवर्तनशीलता मेम योगदान डाकता है।[6] तीन जीन को आमतौर पर वात रोग से जुड़ा हुआ पाया गया है जिन्हें SLC2A9, SLC22A12 और ABCG2 के नाम से जाना जाता है और उनमें हुए बदलाव, जोखिम को लगभग दोगुना कर सकते हैं।[14][15]SLC2A9 और SLC22A12 में कार्य उत्परिवर्तनों का खत्म हो जाना यूरेट अवशोषण और निर्विरोध यूरेट स्राव को कम करके वंशानुगत हाइपरयूरीसेमिया का कारण बनता है।[15] कुछ दुर्लभ आनुवंशिक विकार वात रोग के कारण जटिल बन जाते हैं, जिनमें पारिवारिक किशोर हाइपरयूरीसेमिक अपवृक्कता, मज्जा पुटीय गुर्दा रोग, फॉसफोरीबोसिलपाइरोफॉसफेट सिन्थेटेस अतिक्रियाशीलता और लेश-नाइहैन सिंड्रोम में देखी जाने वाली हाइपोज़ेनथाइन-गुयानाइन फॉसफोरीबोसिलट्रांसफिरेस कमी शामिल हैं।[6]

चिकित्सकीय परिस्थितियां[संपादित करें]

वात रोग अक्सर अन्य चिकित्सकीय समस्याओं के संयोजन में होता है। पेट का मोटापे, उच्च रक्तचाप, इंसुलिन प्रतिरोध और असामान्य लिपिड स्तर के संयोजन से होने वाला मेटाबोलिक सिंड्रोम लगभग 75% मामलों में होता है।[3] वात रोग द्वारा जटिल बनने वाली अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में पॉलीसिंथेमीया, सीसा विषाक्तता, गुर्दे की विफलता, हीमोलाइटिक एनीमिया, सोरायसिस और ठोस अंग प्रत्यारोपण शामिल हैं।[6][16] 35 के बराबर या इससे अधिक शरीर द्रव्यमान सूचकांक किसी पुरुष के वात रोग के जोखिम को बढ़ा देता है।[10] लेड के साथ जीर्ण संपर्क और लेड संदूषित शराब, गुर्दे के प्रकार्य पर लेड के हानिकारक प्रभाव के कारण, वात रोग के लिए जोखिम के कारक हैं।[17] लेश-नेहन सिंड्रोम को अक्सर वातरोगी गठिया के साथ जोड़ा जाता है।

दवाएं[संपादित करें]

मूत्रवर्धक दवाएं को वात रोग के दौरों के साथ जोड़ा गया है। लेकिन, हाइड्रोक्लोरोथियाजिड की निम्न खुराक जोखिम को बढ़ाती हुई प्रतीत नहीं होती है।[18] अन्य अन्य संबंधित दवाओं में नियासिन और एस्पिरिन(एसिटाइलसैलिसिलिक एसिड) शामिल हैं।[4] प्रतिरक्षा दमनकारी दवाएं सिसलोस्पोरिन और टैक्रोलिमस भी वात रोग के साथ जुड़ी हुई हैं,[6] विशेष रूप से सिसलोस्पोरिन, जब इन्हें हाइड्रोक्लोरोथियाजिड के साथ संयोजन में उपयोग किया जाता है।[19]

पैथोफिज़ियोलॉजी (रोग के कारण पैदा हुए क्रियात्मक परिवर्तन)[संपादित करें]

वात रोग प्यूरीन चयापचय का एक विकार है,[6] और उस समय होता है जब इसका अंतिम मेटाबोलाइट, यूरिक एसिड, मोनोसोडियम यूरेट के रूप में क्रिस्टलीकृत हो कर जोड़ों में, स्नायुओं पर और आसपास के ऊतकों में नीचे बैठ जाता है।[4] उसके बाद यह क्रिस्टल एक स्थानीय प्रतिरक्षा-की मध्यस्थता वाली सूजन वाली प्रतिक्रिया शुरू करता है,[4] जिसमें सूजन प्रवाह के मुख्य प्रोटीनों में से एक इंटरल्यूकिन 1β होता है।[6] मनुष्यों में विकास के साथ-साथ यूरीकेस, जो कि यूरिक एसिड को तोड़ता है और प्राइमेट्स की कमी ने इस समस्या को आम बना दिया है।[6]

इस बात को अच्छी तरह से समझा नहीं गया है कि क्या चीज़ यूरिक एसिड का अवक्षेपण शुरू करती है। जब कि यह सामान्य स्तरों पर क्रिस्टलों में परिवर्तित हो सकता है, स्तरों के बढ़ने पर ऐसा होने की अधिक संभावना होती है।[4][20] गठिया का एक तीव्र प्रकरण शुरू करने में महत्वपूर्ण माने जाते अन्य कारकों में ठंडे तापमान, यूरिक एसिड के स्तरों में तेजी से बदलाव, एसिडोसिस,[21][22] जोड़ जलयोजन और बाह्य मैट्रिक्स प्रोटीन, जैसे कि प्रोटियोग्लाईकैन्स, कोलेजन औरचोन्ड्रोयटिन सल्फेट शामिल है।[6] कम तापमानों पर क्रिस्टलों के अवक्षेपण की बढ़ी हुई क्रिया आंशिक रूप से इस बात की व्याख्या करती है कि पैरों के जोड़ सबसे अधिक क्यों प्रभावित होते हैं।[2] यूरिक एसिड में तेजी से बदलाव, कई कारणों से हो सकते हैं जिनमे आघात, शल्य चिकित्सा, कीमोथेरेपी, मूत्रवर्धक दवाइयां और एलोप्यूरिनॉल को रोकना या शुरू करना शामिल हैं।[1] उच्च रक्तचाप के लिए अन्य दवाओं की तुलना में कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और लोसार्टन को वात रोग के कम जोखिम के साथ जोड़ा जाता है।[23]

रोग निदान[संपादित करें]

बाएं पैर के एक्स-रे पर वात रोग: सामान्य स्थान पैर का अंगूठा होता है। पैर की पार्श्व सीमा पर नरम ऊतकों की सूजन पर ध्यान दें।
ध्रुवीकृत प्रकाश के साथ माइक्रोस्कोप के नीचे फोटो खींचे गए श्लेष तरल के नमूने से बैंगनी पृष्ठभूमि में कई बहुरंगी सुई के आकार के क्रिस्टल
यूरिक एसिड क्रिस्टलों की नुकीली छड़ें। जोड़ों में यूरिक एसिड के क्रिस्टलों के बनने को वात रोग के साथ जोड़ा जाता है।

हाइपरयूरीसेमिया और क्लासिक पोडाग्रा वाले किसी व्यक्ति में किसी भी अतिरिक्त जांच के बिना वात रोग का निदान और इलाज किया जा सकता है। यदि निदान के बारे में संदेह हो तो श्लेषम द्रव विश्लेषण किया जाना चाहिए।[1] एक्स-रे, जबकि पुराने वात रोग को पहचानने में उपयोगी होता हैं, तीव्र दौरों में उनकी उपयोगिता बहुत कम होती है।[6]

श्लेषम द्रव[संपादित करें]

श्लेषम द्रव या टोफस में मोनोसोडियम यूरेट क्रिस्टलों की पहचान के आधार पर वात रोग का निश्चित निदान किया जाता है।[3] निदान न किए गए सूजन वाले जोड़ों से प्राप्त सभी श्लेष तरल के नमूने की इन क्रिस्टलों के लिए जांच की जानी चाहिए।[6] ध्रुवीकृत प्रकाश माइक्रोस्कोपी के नीचे, उनका सुई की तरह आकार और मजबूत नकारात्मक दोहरा अपवर्तन होता है। इस परीक्षण को करना मुश्किल होता है और अक्सर किसी प्रशिक्षित पर्यवेक्षक की ज़रूरत होती है।[24] तरल की निकाले जाने के बाद अपेक्षाकृत जल्दी से जांच की जानी चाहिए क्योंकि तापमान और pH उनकी घुलनशीलता को प्रभावित करता है।[6]=== रक्त के परीक्षण === हाइपरयूरीसेमिया वात रोग की एक विशिष्ट विशेषता है लेकिन यह लगभग आधी बार हाइपरयूरीसेमिया के बिना होता है और यूरिक एसिड के बढ़े हुए स्तरों वाले अधिकांश लोगों में कभी भी वात रोग विकसित नहीं होता है।[3][25] इसलिए यूरिक एसिड का स्तर मापने की नैदानिक उपयोगिता सीमित है।[3] हाइपरयूरीसेमिया को पुरुषों में 420 माइक्रोमोल/लीटर (7.0 मिलीग्राम/डेसीलीटर) और महिलाओं में 360 माइक्रोमोल/लीटर (6.0 मिलीग्राम/डेसीलीटर) अधिक के प्लाज्मा यूरेट स्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है।[26] आम तौर पर किए जाने वाले अन्य रक्त परीक्षण श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या, इलेक्ट्रोलाइट्स, गुर्दे का कार्य और एरिथ्रोसाइट अवसादन दर (ESR) हैं। लेकिन संक्रमण के अभाव में वात रोग के कारण सफेद रक्त कोशिकाएं और ESR दोनों बढ़ सकते हैं।[27][28] सफेद रक्त कोशिकाओं की 40.0×109/l (40,000/mm3) जैसी गिनती दर्ज की गई है।[1]

विभेदक निदान[संपादित करें]

वात रोग में सबसे महत्वपूर्ण विभेदक निदान, सेप्टिक गठिया है।[3][6] इस पर उन लोगों में विचार किया जाना चाहिए जिनमें संक्रमण के चिह्न हों या जिनमें इलाज के साथ सुधार न हो।[3] निदान में मदद के लिए, एक श्लेषम द्रव ग्राम स्टेन कल्चर किए जा सकते हैं।[3] समान लगने वाली अन्य समस्याओं में छद्म वात रोग और संधिवात गठिया शामिल हैं।[3] वातरोगी टोफी (विशेष रूप से जब जोड़ में स्थित न हो) को गलती से बेसल सेल कार्सिनोमा,[29] या अन्य अर्बुद समझा जा सकता है।[30]

रोकथाम[संपादित करें]

जीवन शैली में परिवर्तन और दवाएं, दोनों यूरिक एसिड का स्तर कम कर सकते हैं। आहार और जीवन शैली के प्रभावी विकल्पों में मांस और समुद्री खाद्य जैसे आहारों को कम करना पर्याप्त विटामिन C लेना, अल्कोहल और फ्रकटोज के उपभोग को सीमित करना और मोटापे से बचना, शामिल हैं।[2] मोटे पुरुषों में कम कैलोरी आहार यूरिक एसिड के स्तरों को 100 µmol/l (1.7 मिलीग्राम/डेसीलीटर) कर कर देता है।[18] प्रति दिन 1500 मिलीग्राम विटामिन  C का सेवन वात रोग के जोखिम को 45% कम कर देता है।[31] कॉफी के सेवन को वात रोग के हल्के जोखिम के साथ जोड़ा गया है लेकिन चाय को नहीं।[32] ऑक्सीजन की कमी वाली कोशिकाओं से प्यूरीन छोड़े जाने के माध्यम से वात रोग स्लीप एपनिया का अनुपूर्वक हो सकता है। एपनिया के उपचार से दौरों को कम किया जा सकता है।[33]

उपचार[संपादित करें]

उपचार का प्रारंभिक उद्देश्य किसी तीव्र हमले के लक्षणों को व्यवस्थित करना होता है।[34] बाद वाले हमलों को सीरम यूरिक एसिड का स्तर कम करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विभिन्न दवाओं से कम किया जा सकता है।[34] दिन में कई बार 20 से 30 मिनट के लिए बर्फ लगाने से दर्द कम हो जाता है।[2][35] तीव्र उपचार के लिए विकल्पों में स्टेरॉयड-रहित सूजन-रोधी दवाएं (NSAIDs), कॉल्चिसीन और स्टेरॉयड शामिल हैं,[2] जबकि रोकथाम के लिए विकल्पों में एलोप्यूरिनॉल, फेबुक्सोस्टेट और प्रोबेनेसिड शामिल हैं। यूरिक एसिड के स्तरों को कम करने से बीमारी का इलाज किया जा सकता है।[6] कोमोब्रिडिटी का इलाज भी महत्वपूर्ण है।[6]

NSAIDs[संपादित करें]

NSAIDs अक्सर वात रोग के लिए प्रथम श्रेणी उपचार होते हैं और कोई भी विशिष्ट एजेंट किसी भी अन्य की तुलना में आम तौर पर कम या अधिक प्रभावी नहीं होता है।[2] चार घंटे के भीतर सुधार देखा जा सकता है और एक से दो सप्ताह के लिए उपचार की अनुशंसा की जाती है।[2][6] लेकिन उन लोगों में इनकी सिफारिश नहीं की जाती है जिनमें स्वास्थ्य से संबंधित अन्य समस्याएं हो, जैसे कि जठरांत्रिय रक्तस्राव, गुर्दे की विफलता या दिल की विफलता[36] जबकि इंडोमेथासिन ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता NSAID रहा है, बेहतर प्रभाव के अभाव में एक विकल्प जैसे कि आईब्यूप्रोफ़न को इसके बेहतर दुष्प्रभाव प्रोफाइल के कारण पसंद किया जा सकता है।[18] NSAIDs से गैस्ट्रिक दुष्प्रभावों के जोखिम वाले लोगों के लिए, एक अतिरिक्त प्रोटॉन पंप अवरोध दिया जा सकता है।[37]

कॉल्चिसीन[संपादित करें]

कॉल्चिसीन उन लोगों के लिए एक विकल्प है जो NSAIDs को सहन नहीं कर सकते हैं।[2] इसके दुष्प्रभाव (मुख्य रूप से जठरांत्रिय गड़बड़ी) इसके उपयोग को सीमित कर देते हैं।[38] लेकिन जठरांत्रिय गड़बड़ी, खुराक पर निर्भर करती है और जोखिम को छोटी लेकिन प्रभावी खुराक का उपयोग करके कम किया जा सकता है।[18] कॉल्चिसीन अन्य आम तौर पर दी जाने वाली दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है, जैसे कि एटोर्वास्टेटिन और इरिथ्रोमाइसिन तथा अन्य।[38]

स्टेरॉयड[संपादित करें]

ग्लूकोकॉर्टीकॉयड दवाओं को भी NSAIDs के बराबर प्रभावी पाया गया है[39] और यदि NSAIDs के अपवाद मौजूद हों तो इसको दिया जा सकता है।[2] इनके कारण उस समय भी सुधार होता है जब जोड़ में इसका टीका लगाया जाता है; लेकिन जोड़ के संक्रमण को बाहर ज़रूर किया जाना चाहिए क्योंकि स्टेरॉयड इस स्थिति को बिगाड़ देते हैं।[2]

पेग्लोटिकेस[संपादित करें]

2010 में पेग्लोटिकेस (Krystexxa) से अमेरिका में वात रोग का इलाज करने के लिए मंजूरी दी गई थी।[40] यह उन 3% लोगों के लिए एक विकल्प है जो अन्य दवाओं के प्रति असहनशील हैं।[40] पेग्लोटिकेस हर दो सप्ताह बाद अंतःशिरीय विधि से दी जाती है,[40] और यह पाया गया है कि इससे लोगों में यूरिक एसिड का स्तर कम हो जाता है।[41]

प्रोफाइलैक्सिस[संपादित करें]

बहुत सी दवाएं वात रोग की आगे की घटनाओं को रोकने के लिए उपयोगी हैं ज़ैन्थाइन ऑक्सीडेस इन्हीबीटर (एलोप्यूरिनॉल और फेबुक्सोस्टेट सहित) और युरिकोसुरिक (प्रोबेनेसिड और सलफिनपाइराज़ोन सहित) इनमें शामिल हैं। दौरों का स्थिति और खराब करने की सैद्धांतिक चिंताओं के कारण आम तौर पर इन्हें तीव्र दौरों को ठीक कर लेने के बाद, एक से दो सप्ताह तक शुरू नहीं किया जाता है[2] और अक्सर पहले तीन से छह महीनों के लिए किसी NSAID या कॉल्चिसीन के साथ संयोजन में उपयोग किया जाता है।[6] तब तक इनकी सिफारिश नहीं की जाती है जब तक व्यक्ति को वात रोग के दो या तीन दौरे न हो गए हों,[2] जब तक कि जोड़ों में विनाशकारी बदलाव, टोफी, या यूरेट अपवृक्कता मौजूद न हो,[5] क्योंकि इस बिंदु तक दवाओं को लागत प्रभावी नहीं पाया गया है।[2] जब तक सीरम यूरिक एसिड का स्तर 300–360 µmol/l (5.0-6.0 मिलीग्राम/डेसीलीटर) तक नीचे नहीं आ जाता यूरेट को कम करने के उपायों को बढ़ा दिया जाना चाहिए और अनिश्चित काल के लिए जारी रखना चाहिए।[2][6] यदि हमले के समय इन दवाओं को लंबे समय से इस्तेमाल किया जा रहा हो, तो इनको रोक देने की सिफारिश की जाती है।[3] यदि स्तरों को 6.0 मिलीग्राम/डेसीलीटर से कम नहीं किया जा सकता है और बाद में फिर हमले होते हैं, तो इसे उपचार विफलता या ज़िद्दी वात रोग माना जाता है।[42] कुल मिलाकर प्रोबेनेसिड, एलोप्यूरिनॉल से कम प्रभावी दिखाई देती है।[2]

युरीकोसुरिक दवाएं आमतौर पर तब पसंद की जाती हैं यदि यूरिक एसिड के कम उत्सर्जन का पता चलता है, जो कि 24 घंटे में एकत्र किए गए मूत्र में 800 मिलीग्राम से कम यूरिक एसिड होने से होता है।[43] लेकिन उस समय इनकी सिफारिश नहीं की जाती है यदि व्यक्ति का गुर्दे की पथरी का इतिहास रहा हो।[43] यदि 24 घंटे के मूत्र में यूरिक एसिड का उत्सर्जन 800 मिलीग्राम से अधिक हो, जो कि अधिक उत्पादन को इंगित करता है, तो ज़ैन्थाइन ऑक्सीडेस इन्हीबीटर को प्राथमिकता दी जाती है।[43]

ज़ैन्थाइन ऑक्सीडेस इन्हीबीटर (एलोप्यूरिनॉल और फेबुक्सोस्टेट सहित) यूरिक एसिड के उत्पादन को अवरोधित करते हैं तथा लंबी अवधि की चिकित्सा सुरक्षित होती है और इसे अच्छी तरह से सहन किया जाता है और इसे गुर्दे की कमज़ोरी या गुर्दे में पत्थरी वाले लोगों में इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि व्यक्तियों की एक छोटी संख्या में एलोप्यूरिनॉल के कारण अतिसंवेदनशीलता हुई है।[2] ऐसे मामलों में, एक वैकल्पिक दवा, फेबुक्सोस्टेट, की सिफारिश की गई है।[44]

रोग का निदान[संपादित करें]

उपचार के बिना, वात रोग का एक तीव्र दौरा आम तौर पर पांच से सात दिनों में ठीक हो जाता है। हालांकि, 60% लोगों को एक वर्ष के भीतर एक दूसरा दौरा पड़ता है।[1] जो लोग वात रोग से पीड़ित होते हैं, उनमें उच्च रक्तचाप, डायबिटीज मेलिटस, चयापचय सिंड्रोम, तथा गुर्दे सम्बन्धी बीमारियों के साथ कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का उच्च जोखिम होने के कारण मृत्यु जोखिम भी अधिक होता है।[6][45] आंशिक रूप से इसका कारण इंसुलिन प्रतिरोध तथा मोटापा से सम्बंधित हो सकता है परन्तु कुछ बढ़े हुए जोखिम स्वतन्त्र रूप से भी होते हैं।[45]

उपचार के बिना तीव्र वात रोग के प्रकरण जीर्ण वात रोग के रूप में विकसित हो सकते हैं जिसमें जोड़ों की सतह की क्षति, जोड़ों में विकृति तथा पीड़ारहित टोफी शामिल हैं।[6] ये टोफी पांच साल तक बिना इलाज के रह रहे लोगों में से 30% तक में होते हैं और बहुधा कान की हेलिक्स, ओलेक्रेनॉन प्रक्रियाओं पर अथवा अकिलीज़ टेंडॉन्स पर होती हैं।[6] समुचित उपचार के द्वारा ये समाप्त हो जाती हैं। किडनी की पथरी भी अक्सर गाउट को जटिल बना देती है, ये 10 से 40% लोगों को प्रभावित करती है, तथा मूत्र का pH कम होने के कारण यूरिक अम्ल के अवक्षेपण बढ़ जाने के कारण होती हैं।[6] क्रोनिक रीनल डिसफंक्शन के कई अन्य स्वरुप भी हो सकते हैं।[6]

महामारी-विज्ञान[संपादित करें]

वात-रोग पश्चिमी आबादी के लगभग 1-2% को उनके जीवन काल में किसी ना किसी समय पर प्रभावित करता है तथा यह और अधिक आम होता जा रहा है।[2][6] वात-रोग की दर वर्ष 1990 और 2010 के बीच लगभग दोगुनी हो गई है।[4] इस वृद्धि का कारण बढ़ती जीवन प्रत्याशा, आहार में परिवर्तन और गठिया के साथ जुड़े रोगों में वृद्धि जैसे चपापचयी सिंड्रोम तथा उच्च रक्तचाप को माना जाता है।[10] वात-रोग की दर को प्रभावित करने वाले कई कारक पाए गए हैं, जिनमें आयु, जाति और वर्ष के मौसम सम्मिलित हैं। 30 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों तथा 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में इसका प्रसार 2% है।[36]

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में अफ़्रीकी अमरीकी पुरुषों में वात-रोग होने की सम्भावना यूरोपीय अमरीकी पुरुषों की तुलना में दो गुनी तक होती है।[46] प्रशांत द्वीप समूह के लोगों तथा न्यूज़ीलैण्ड के माओरी लोगों के बीच इसकी दर अधिक है, ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बीच यह दुर्लभ है, बावजूद इसके कि इनमें सीरम यूरिक एसिड की उच्च औसत मात्रा पायी जाती है।[47] यह चीन, पोलीनेशिया और शहरी उप-सहारा अफ्रीका में आम हो गया है।[6] कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि वात-रोग के आक्रमण वसंत ऋतु में अधिक बार होते हैं। इसका कारण आहार में मौसम के अनुसार परिवर्तन, शराब की खपत, शारीरिक गतिविधि और तापमान को समझा गया है।[48]

इतिहास[संपादित करें]

एक लंबा घुंघराला विग और पूरा चोगा पहने एक आदमी बैठा है और बाहर की ओर देख रहा है। उसका बायां हाथ, एक छोटी सी मेज पर टिका हुआ है जिसमें उसने एक डब्बा पकड़ा हुआ है। उसके पीछे एक ग्लोब है।
एंटोनी वॉन ल्यूवेनहोक ने 1679 में यूरिक एसिड क्रिस्टल की सूक्ष्म बनावट का वर्णन किया है।[49]

शब्द "गाउट (gout)" का प्रयोग सर्वप्रथम रैंडॉल्फस ऑफ बौकिंग के द्वारा लगभग 1200 ईसवीं में किया गया था। इसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द gutta से हुई जिसका अर्थ है “एक बूँद” (किसी तरल की).[49] ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार इस शब्द की उत्पत्ति ह्यूमरिज्म से हुई है तथा इसके पीछे "जोड़ों में चारों ओर खून से रुग्ण सामग्री को 'छोड़ने' की धारणा है"।[50]

वात-रोग, तथापि, प्राचीन काल से ज्ञात है। ऐतिहासिक रूप से इसे "व्याधियों का राजा तथा राजाओं की व्याधि” के रूप में[6][51] अथवा “अमीरों की व्याधि” के रूप में जाना जाता था।[52] रोग के प्राथमिक दस्तावेज़ 2600 ईसा पूर्व में मिस्र से हैं, जिसमें पैर की गठिया का विवरण दिया गया है। ग्रीक चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स ने लगभग 400 ईसा पूर्व में अपनी एफोरिज्म्स में इस पर टिप्पणी करते हुए इसे किन्नरों तथा रजोनिवृत्तिपूर्व महिलाओं में प्रकट न होने वाली बीमारी बताया है।[49][53] ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस (30 ईसवीं) ने इसके सम्बन्ध की व्याख्या अल्कोहल, महिलाओं में अधिक आयु में शुरुआत, तथा इससे सम्बंधित किडनी सम्बन्धी समस्याओं से की है:

Again thick urine, the sediment from which is white, indicates that pain and disease are to be apprehended in the region of joints or viscera... Joint troubles in the hands and feet are very frequent and persistent, such as occur in cases of podagra and cheiragra. These seldom attack eunuchs or boys before coition with a woman, or women except those in whom the menses have become suppressed... some have obtained lifelong security by refraining from wine, mead and venery.[54]

1683 में थॉमस सिडेन्हम, एक अंग्रेजी चिकित्सक, ने सुबह के शुरूआती घंटों में इसके लक्षणों का दिखना तथा बड़ी आयु के पुरुषों में इसके पूर्वानुमानों का वर्णन किया था:

Gouty patients are, generally, either old men, or men who have so worn themselves out in youth as to have brought on a premature old age—of such dissolute habits none being more common than the premature and excessive indulgence in venery, and the like exhausting passions. The victim goes to bed and sleeps in good health. About two o'clock in the morning he is awakened by a severe pain in the great toe; more rarely in the heel, ankle or instep. The pain is like that of a dislocation, and yet parts feel as if cold water were poured over them. Then follows chills and shivers, and a little fever... The night is passed in torture, sleeplessness, turning the part affected, and perpetual change of posture; the tossing about of body being as incessant as the pain of the tortured joint, and being worse as the fit comes on.[55]

डच वैज्ञानिक एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक पहली बार 1679 में यूरेट क्रिस्टल की सूक्ष्म संरचना को वर्णित किया।[49] 1848 में अंग्रेजी चिकित्सक अल्फ्रेड बेरिंग गैरौड ने महसूस किया कि वात-रोग का कारण रक्त में यूरिक एसिड की अधिकता थी।[56]

अन्य जानवरों में[संपादित करें]

गठिया यूरिकेस बना सकने की उनकी क्षमता के कारण, जो कि यूरिक एसिड को विखंडित कर देता है, अधिकांश अन्य जानवरों में दुर्लभ है।[57] मनुष्यों तथा अन्य बड़े वानरों में इस क्षमता का अभाव होता है अतः इनमें वात-रोग सामान्य होता है।[1][57] तथापि टायरानोसोरस रेक्स का वह प्रतिरूप, जिसे "सू" के रूप में जाना जाता है, के विषय में माना जाता है कि वह वात-रोग के पीड़ित थी।[58]

शोध[संपादित करें]

वात-रोग के उपचार के लिये अनेक नयी दवाओं पर शोध चल रही हैं, जिनमें ऐनाकिंरा, कैनाकिन्युमैब तथा राइलोनासेप्ट आदि शामिल हैं।[59] एक रेकॉम्बीनैंट यूरिकेस एंजाइम (रैसब्यूरीकेस) उपलब्ध है; हालांकि इसका प्रयोग सीमित है क्योंकि यह एक ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया को ट्रिगर कर देता है। इसके कम एंटीजेनिक संस्करण अभी विकास की अवस्था में हैं।[1]

References[संपादित करें]

  1. Eggebeen AT (2007). "Gout: an update". Am Fam Physician. 76 (6): 801–8. PMID 17910294. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  2. Chen LX, Schumacher HR (2008). "Gout: an evidence-based review". J Clin Rheumatol. 14 (5 Suppl): S55–62. PMID 18830092. डीओआइ:10.1097/RHU.0b013e3181896921. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  3. Schlesinger N (2010). "Diagnosing and treating gout: a review to aid primary care physicians". Postgrad Med. 122 (2): 157–61. PMID 20203467. डीओआइ:10.3810/pgm.2010.03.2133. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  4. Terkeltaub R (2010). "Update on gout: new therapeutic strategies and options". Nat Rev Rheumatol. 6 (1): 30–8. PMID 20046204. डीओआइ:10.1038/nrrheum.2009.236. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  5. Tausche AK, Jansen TL, Schröder HE, Bornstein SR, Aringer M, Müller-Ladner U (2009). "Gout--current diagnosis and treatment". Dtsch Arztebl Int. 106 (34–35): 549–55. PMC 2754667. PMID 19795010. डीओआइ:10.3238/arztebl.2009.0549. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  6. Richette P, Bardin T (2010). "Gout". Lancet. 375 (9711): 318–28. PMID 19692116. डीओआइ:10.1016/S0140-6736(09)60883-7. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  7. Vitart V, Rudan I, Hayward C; एवं अन्य (2008). "SLC2A9 is a newly identified urate transporter influencing serum urate concentration, urate excretion and gout". Nat. Genet. 40 (4): 437–42. PMID 18327257. डीओआइ:10.1038/ng.106. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  8. Weaver, AL (2008 Jul). "Epidemiology of gout". Cleveland Clinic journal of medicine. 75 Suppl 5: S9–12. PMID 18819329. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  9. Choi HK, Atkinson K, Karlson EW, Willett W, Curhan G (2004). "Purine-rich foods, dairy and protein intake, and the risk of gout in men". N. Engl. J. Med. 350 (11): 1093–103. PMID 15014182. डीओआइ:10.1056/NEJMoa035700. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  10. Weaver AL (2008). "Epidemiology of gout". Cleve Clin J Med. 75 Suppl 5: S9–12. PMID 18819329. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  11. Hak AE, Choi HK (2008). "Lifestyle and gout". Curr Opin Rheumatol. 20 (2): 179–86. PMID 18349748. डीओआइ:10.1097/BOR.0b013e3282f524a2. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  12. Williams PT (2008). "Effects of diet, physical activity and performance, and body weight on incident gout in ostensibly healthy, vigorously active men". Am. J. Clin. Nutr. 87 (5): 1480–7. PMID 18469274. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  13. Choi HK (2010). "A prescription for lifestyle change in patients with hyperuricemia and gout". Curr Opin Rheumatol. 22 (2): 165–72. PMID 20035225. डीओआइ:10.1097/BOR.0b013e328335ef38. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  14. Merriman, TR (2011 Jan). "The genetic basis of hyperuricaemia and gout". Joint, bone, spine : revue du rhumatisme. 78 (1): 35–40. PMID 20472486. डीओआइ:10.1016/j.jbspin.2010.02.027. नामालूम प्राचल |coauthors= की उपेक्षा की गयी (|author= सुझावित है) (मदद); |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  15. Reginato AM, Mount DB, Yang I, Choi HK (2012). "The genetics of hyperuricaemia and gout". Nat Rev Rheumatol. PMID 22945592. डीओआइ:10.1038/nrrheum.2012.144. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  16. Stamp L, Searle M, O'Donnell J, Chapman P (2005). "Gout in solid organ transplantation: a challenging clinical problem". Drugs. 65 (18): 2593–611. PMID 16392875.
  17. Loghman-Adham M (1997). "Renal effects of environmental and occupational lead exposure". Environ. Health Perspect. Brogan & Partners. 105 (9): 928–38. JSTOR 3433873. PMC 1470371. PMID 9300927. डीओआइ:10.2307/3433873. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  18. Laubscher T, Dumont Z, Regier L, Jensen B (2009). "Taking the stress out of managing gout". Can Fam Physician. 55 (12): 1209–12. PMC 2793228. PMID 20008601. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  19. Firestein, MD, Shaun; Budd, MD, Ralph C.; Harris Jr., MD, Edward D.; McInnes PhD, FRCP, Iain B.; Ruddy, MD; Sergent, MD, संपा॰ (2008). "Chapter 87: Gout and Hyperuricemia". KELLEY'S Textbook of Rheumatology (8th संस्करण). Elsevier. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-4160-4842-8. |editor1-first= और |editor-first= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद); |editor3-given= और |editor3-first= के एक से अधिक मान दिए गए हैं (मदद)
  20. Virsaladze DK, Tetradze LO, Dzhavashvili LV, Esaliia NG, Tananashvili DE (2007). "[Levels of uric acid in serum in patients with metabolic syndrome]" [Levels of uric acid in serum in patients with metabolic syndrome]. Georgian Med News (रूसी में) (146): 35–7. PMID 17595458. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  21. Moyer RA, John DS (2003). "Acute gout precipitated by total parenteral nutrition". The Journal of rheumatology. 30 (4): 849–50. PMID 12672211. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  22. Halabe A, Sperling O (1994). "Uric acid nephrolithiasis". Mineral and electrolyte metabolism. 20 (6): 424–31. PMID 7783706.
  23. Choi HK, Soriano LC, Zhang Y, Rodríguez LA (2012). "Antihypertensive drugs and risk of incident gout among patients with hypertension: population based case-control study". BMJ. 344: d8190. PMC 3257215. PMID 22240117. डीओआइ:10.1136/bmj.d8190.
  24. Schlesinger N (2007). "Diagnosis of gout". Minerva Med. 98 (6): 759–67. PMID 18299687. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  25. Sturrock R (2000). "Gout. Easy to misdiagnose". BMJ. 320 (7228): 132–33. PMC 1128728. PMID 10634714. डीओआइ:10.1136/bmj.320.7228.132.
  26. Sachs L, Batra KL, Zimmermann B (2009). "Medical implications of hyperuricemia". Med Health R I. 92 (11): 353–55. PMID 19999892. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  27. "Gout: Differential Diagnoses & Workup - eMedicine Rheumatology".
  28. "Gout and Pseudogout: Differential Diagnoses & Workup - eMedicine Emergency Medicine".
  29. Jordan DR, Belliveau MJ, Brownstein S, McEachren T, Kyrollos M (2008). "Medial canthal tophus". Ophthal Plast Reconstr Surg. 24 (5): 403–4. PMID 18806664. डीओआइ:10.1097/IOP.0b013e3181837a31.
  30. Sano K, Kohakura Y, Kimura K, Ozeki S (2009). "Atypical Triggering at the Wrist due to Intratendinous Infiltration of Tophaceous Gout". Hand (N Y). 4 (1): 78–80. PMC 2654956. PMID 18780009. डीओआइ:10.1007/s11552-008-9120-4. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  31. Choi HK, Gao X, Curhan G (2009). "Vitamin C intake and the risk of gout in men: a prospective study". Arch. Intern. Med. 169 (5): 502–7. PMC 2767211. PMID 19273781. डीओआइ:10.1001/archinternmed.2008.606. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  32. Choi HK, Curhan G (2007). "Coffee, tea, and caffeine consumption and serum uric acid level: the third national health and nutrition examination survey". Arthritis Rheum. 57 (5): 816–21. PMID 17530681. डीओआइ:10.1002/art.22762. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  33. Abrams B (2005). "Gout is an indicator of sleep apnea". Sleep. 28 (2): 275. PMID 16171252. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  34. Zhang W, Doherty M, Bardin T; एवं अन्य (2006). "EULAR evidence based recommendations for gout. Part II: Management. Report of a task force of the EULAR Standing Committee for International Clinical Studies Including Therapeutics (ESCISIT)". Ann. Rheum. Dis. 65 (10): 1312–24. PMC 1798308. PMID 16707532. डीओआइ:10.1136/ard.2006.055269. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  35. Schlesinger N; एवं अन्य (2002). "Local ice therapy during bouts of acute gouty arthritis". J. Rheumatol. 29 (2): 331–4. PMID 11838852. डीओआइ:10.1093/rheumatology/29.5.331.
  36. Winzenberg T, Buchbinder R (2009). "Cochrane Musculoskeletal Group review: acute gout. Steroids or NSAIDs? Let this overview from the Cochrane Group help you decide what's best for your patient". J Fam Pract. 58 (7): E1–4. PMID 19607767. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  37. Clinical Knowledge Summaries. "Gout - Management -- What treatment is recommended in acute gout?". National Library for Health. अभिगमन तिथि 26 अक्टूबर 2008.
  38. "Information for Healthcare Professionals: New Safety Information for Colchicine (marketed as Colcrys)". U.S. Food and Drug Administration.
  39. Man CY, Cheung IT, Cameron PA, Rainer TH (2007). "Comparison of oral prednisolone/paracetamol and oral indomethacin/paracetamol combination therapy in the treatment of acute goutlike arthritis: a double-blind, randomized, controlled trial". Annals of Emergency Medicine. 49 (5): 670–7. PMID 17276548. डीओआइ:10.1016/j.annemergmed.2006.11.014.
  40. "FDA approves new drug for gout". FDA.
  41. Sundy, JS (2011 Aug 17). "Efficacy and tolerability of pegloticase for the treatment of chronic gout in patients refractory to conventional treatment: two randomized controlled trials". JAMA: the Journal of the American Medical Association. 306 (7): 711–20. PMID 21846852. डीओआइ:10.1001/jama.2011.1169. नामालूम प्राचल |coauthors= की उपेक्षा की गयी (|author= सुझावित है) (मदद); |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  42. Ali, S (2009 Nov). "Treatment failure gout". Medicine and health, Rhode Island. 92 (11): 369–71. PMID 19999896. नामालूम प्राचल |coauthors= की उपेक्षा की गयी (|author= सुझावित है) (मदद); |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  43. Elizabeth D Agabegi; Agabegi, Steven S. (2008). Step-Up to Medicine (Step-Up Series). Hagerstwon, MD: Lippincott Williams & Wilkins. पृ॰ 251. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-7817-7153-6.
  44. "Febuxostat for the management of hyperuricaemia in people with gout (TA164) Chapter 4. Consideration of the evidence". Guidance.nice.org.uk. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2011.
  45. Kim SY, De Vera MA, Choi HK (2008). "Gout and mortality". Clin. Exp. Rheumatol. 26 (5 Suppl 51): S115–9. PMID 19026153.
  46. Rheumatology Therapeutics Medical Center. "What Are the Risk Factors for Gout?". अभिगमन तिथि 26 जनवरी 2007.
  47. Roberts-Thomson RA, Roberts-Thomson PJ (1999). "Rheumatic disease and the Australian aborigine". Ann. Rheum. Dis. 58 (5): 266–70. PMC 1752880. PMID 10225809. डीओआइ:10.1136/ard.58.5.266. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  48. Fam AG (2000). "What is new about crystals other than monosodium urate?". Curr Opin Rheumatol. 12 (3): 228–34. PMID 10803754. डीओआइ:10.1097/00002281-200005000-00013. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  49. Pillinger, MH (2007). "Hyperuricemia and gout: new insights into pathogenesis and treatment". Bulletin of the NYU Hospital for Joint Diseases. 65 (3): 215–221. PMID 17922673. नामालूम प्राचल |coauthors= की उपेक्षा की गयी (|author= सुझावित है) (मदद)
  50. "gout, n.1". Oxford English Dictionary, Second edition, 1989. अभिगमन तिथि 18 सितंबर 2011.
  51. Kubitz possibly has gout."The Disease Of Kings - Forbes.com". Forbes.
  52. "Rich Man's Disease - definition of Rich Man's Disease in the Medical dictionary - by the Free Online Medical Dictionary, Thesaurus and Encyclopedia".
  53. "The Internet Classics Archive Aphorisms by Hippocrates". अभिगमन तिथि जुलाई 27, 2010.
  54. "LacusCurtius • Celsus — On Medicine — Book IV".
  55. "BBC - h2g2 - Gout - The Affliction of Kings". BBC. अभिगमन तिथि जुलाई 27, 2010.
  56. Storey GD (2001). "Alfred Baring Garrod (1819-1907)". Rheumatology (Oxford, England). 40 (10): 1189–90. PMID 11600751. डीओआइ:10.1093/rheumatology/40.10.1189. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  57. Agudelo CA, Wise CM (2001). "Gout: diagnosis, pathogenesis, and clinical manifestations". Curr Opin Rheumatol. 13 (3): 234–9. PMID 11333355. डीओआइ:10.1097/00002281-200105000-00015. नामालूम प्राचल |month= की उपेक्षा की गयी (मदद)
  58. Rothschild, BM (1997). "Tyrannosaurs suffered from gout". Nature. 387 (6631): 357. PMID 9163417. डीओआइ:10.1038/387357a0. नामालूम प्राचल |coauthors= की उपेक्षा की गयी (|author= सुझावित है) (मदद)
  59. "New therapeutic options for gout here and on the horizon - The Journal of Musculoskeletal Medicine".

External links[संपादित करें]

साँचा:Antigout preparations साँचा:Diseases of the musculoskeletal system and connective tissue साँचा:Purine, pyrimidine, porphyrin, bilirubin metabolic pathology

साँचा:Good article hi:वातरोग