वर्तमान साहित्‍य

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वर्तमान साहित्‍य हिन्दी की एक पत्रिका है। यह 'साहित्य, कला और सोच की पत्रिका' (मासिक) के रूप में प्रकाशित होती रही है। कुछ समय के लिए यह पत्रिका त्रैमासिक भी हुई थी। 'वर्तमान साहित्‍य' ने तीन दशक से अधिक समय तक एक सफल पत्रिका के रूप में प्रकाशित होते रहने की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

सम्पादन एवं प्रकाशन[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' का प्रकाशन एक मासिक साहित्यिक पत्रिका के रूप में सन् 1984 में इलाहाबाद से आरंभ हुआ। इसके संस्थापक संपादक विभूति नारायण राय हैं। बाद में इसका प्रकाशन '109, रिछपालपुरी, पोस्ट बॉक्स नं.13, गाजियाबाद-1' से होने लगा। लंबे समय तक इस पत्रिका के संपादक मंडल में से॰रा॰ यात्री, विभूतिनारायण राय, ओम प्रकाश गर्ग, हरीशचन्द्र अग्रवाल, सूरज पालीवाल एवं प्रियदर्शन मालवीय शामिल रहे हैं। काफी समय तक कविता संबंधी क्षेत्र में इसे लीलाधर मंडलोई एवं संस्कृति क्षेत्र हेतु अजीत राय का विशेष सहयोग मिलता रहा है। लम्बे समय तक इसके प्रबंध संपादक रघुनाथ शर्मा के साथ घनश्याम मुरारी श्रीवास्तव भी रहे। काफी समय तक इसका प्रकाशन इसके संपादकीय कार्यालय 'यतेंद्र सागर, प्रथम तल 1-2, मुकुंद नगर, हापुड़ रोड, गाजियाबाद-1' से होते रहा है।[1] बाद में कुँवरपाल सिंह भी इसके संपादक रहे।[2] नमिता सिंह ने भी इसका सम्पादन किया। अजय बिसारिया एवं राजीवलोचन नाथ शुक्ल सह-संपादक के रूप में जुड़े। डॉ॰ राजीव श्रीवास्तव प्रबंध-संपादक रहे। इसका प्रकाशन '28, एमआईजी, अवन्तिका-I, रामघाट रोड, अलीगढ़-202001' के पते से होने लगा।[3] इस समूह के बाद पुनः विभूतिनारायण राय ही मुख्य संपादक एवं प्रकाशक रहे तथा इसका संपादन नोएडा से और प्रकाशन पूर्ववत् अलीगढ़ से होते रहा।[4] भारत भारद्वाज भी कार्यकारी संपादक के रूप में इससे जुड़े।

बीच में कुछ समय के लिए इस पत्रिका की निरंतरता बाधित भी हुई थी तथा इसकी आवर्तिता में भी परिवर्तन हुआ था। सामान्यतः यह मासिक पत्रिका रही है, परंतु सन् 1993 से '94 तक में कहानी, कविता, आलोचना एवं महिला लेखन पर केंद्रित महाविशेषांकों की शृंखला के कारण इसको काफी आर्थिक क्षति भी पहुँची तथा निरंतरता बाधित हो गयी। अप्रैल '93 के बाद 8 महीने तक इस मासिक पत्रिका का कोई अंक नहीं आ पाया था।[5] फिर मई-दिसंबर 1993 अंक के रूप में इसका 'आलोचना विशेषांक' प्रकाशित हुआ। सन् 1994 के भी अंत में जनवरी-दिसंबर '94 अंक के रूप में इसका 'महिला लेखन विशेषांक' प्रकाशित हुआ। सन् 1995 में इसका प्रकाशन बाधित रहा। 1996 से कुछ वर्षों तक यह त्रैमासिक रूप में पुनः अपने मूल उद्गम स्थल इलाहाबाद से प्रकाशित हुई थी। भारत भारद्वाज के शब्दों में "पिछले वर्षों प्रकाशित महाविशेषांक, विशेषांको की शृंखला ने भले ही वर्तमान साहित्य की आर्थिक कमर तोड़ दी है, पत्रिका की आवृत्ति (फिलहाल त्रैमासिक) भी बदल गई है, पत्रिका फिर अपने मूल उद्गम-स्थल इलाहाबाद पहुँच गई है, लेकिन न पत्रिका का तेवर बदला है और न संपादकीय चयन दृष्टि। स्तर भी बरकरार है।...'वर्तमान साहित्य' अभी भी हिंदी की दो-तीन श्रेष्ठ लघुपत्रिकाओं में से एक है। रचनाओं की स्तरीयता के कारण ही नहीं, विविधता के कारण भी।"[6] इसके बाद पत्रिका पुनः मासिक रूप में नियमित हो गयी तथा इसका प्रकाशन पूर्वोक्त संपादक एवं प्रबंधक समूह द्वारा यतेंद्र सागर, गाजियाबाद से होने लगा।

"1983 में जब यह पत्रिका निकली थी, 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'सारिका' और 'दिनमान' जैसी पत्रिकाएँ बंद होने की कगार पर थी। 'कल्पना' पहले ही बंद हो चुकी थी। 'हंस' (संपादक राजेन्द्र यादव) का पुनः प्रकाशन शुरू नहीं हुआ था। 'नया ज्ञानोदय', 'कथादेश', 'वागर्थ', 'परिकथा', 'पाखी' आदि पत्रिकाएँ तो बाद में निकलीं। ऐसी स्थिति में 'वर्तमान साहित्य' का प्रकाशन साहित्यिक परिदृश्य पर एक सार्थक हस्तक्षेप था।"[7]

महत्त्वपूर्ण विशेषांक[संपादित करें]

अपनी लम्बी सर्जनात्मक यात्रा में समय-समय पर 'वर्तमान साहित्य' के अनेक विशेषांक प्रकाशित हुए। इनमें से अनेक विशेषांक अपने वृहद् आकार-प्रकार के कारण 'महाविशेषांक' की श्रेणी में आते हैं। अनेक महाविशेषांक प्रकाशित कर 'वर्तमान साहित्य' ने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है।

कहानी महाविशेषांक[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' के अप्रैल एवं मई 1991 के दो अंकों के रूप में दो खंडों में नियोजित वृहदाकार 'कहानी महाविशेषांक' का प्रकाशन हुआ था, जिसके अतिथि संपादक थे रवीन्द्र कालिया। इसे 'कहानी पर केंद्रित बीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा आयोजन' कहा गया था।[8] इसमें नयी-पुरानी पीढ़ी के अड़सठ कहानीकारों की कहानियाँ समायोजित की गयी थी। इसके दोनों खंडों में कहानियों पर केंद्रित कुल चार समीक्षात्मक आलेख थे। सुरेन्द्र चौधरी के 'उत्तर शती की कथा यात्रा' तथा उपेन्द्रनाथ अश्क के 'महिला कथा लेखन की अर्धशती' जैसे आलेखों के साथ परमानन्द श्रीवास्तव एवं शुकदेव सिंह के कहानी के 50 साल की यात्रा पर सर्वेक्षणपरक आलेख थे। इसमें पर्याप्त ऐसी कहानियाँ थीं जो लंबे समय तक चर्चित रहीं।[9]

कविता विशेषांक[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' के अप्रैल-मई 1992 (संयुक्तांक) के रूप में 'कविता विशेषांक' का प्रकाशन हुआ था। इसके अतिथि संपादक राजेश जोशी थे। समकालीन कविता की चार पीढ़ियों के कवियों के साथ कुछ अन्य वैचारिक सामग्रियों को समेटे 364 पृष्ठों का यह विशेषांक 'समकालीन कविता की प्रवृत्तियों की सही पहचान की दिशा में एक सार्थक प्रयास था'।[10]

आलोचना विशेषांक[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' के मई-दिसंबर 1993 (संयुक्तांक) के रूप में 'आलोचना विशेषांक' का प्रकाशन हुआ था। कुल 125 पृष्ठों के सामान्य आकार के इस विशेषांक के अतिथि संपादक थे डॉ॰ सत्यप्रकाश मिश्र। यथासाध्य परिश्रमपूर्वक निकाले गये इस अंक में विजयदेव नारायण साही एवं रामस्वरूप चतुर्वेदी से लेकर शिवकुमार मिश्र, परमानन्द श्रीवास्तव, प्रो॰ राजनाथ, धनंजय वर्मा, मैनेजर पांडेय, डॉ॰ रघुवंश, गिरिराज किशोर, मधुरेश एवं रचनाकार शिवमूर्ति तक के विभिन्न विषयों-मुद्दों पर केन्द्रित आलेख समायोजित किये गये थे। अन्य कई महत्त्वपूर्ण सामग्रियों के साथ इसी अंक में विजेन्द्र नारायण सिंह का विवादास्पद आलेख[11] 'आलोचना और आलोचक-चरित्र' भी प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डॉ॰ रामविलास शर्मा की समीक्षा-दृष्टि की सक्षम एवं सकारात्मक पड़ताल करते हुए भी 'सट्टेबाज' जैसे फूहड़ शब्द का भी प्रयोग कर डाला था। हालाँकि डॉ॰ शर्मा के लिए यह भी लिखा था कि "उनकी सट्टेबाजी (पॉलिमिक्स) भी बहुतों की आलोचना से श्रेष्ठतर है।"[12] इसमें उन्होंने नामवर सिंह पर काफी नकारात्मक टिप्पणियाँ की थीं।

महिला लेखन विशेषांक[संपादित करें]

महाविशेषांकों के क्रम में 'वर्तमान साहित्य' की आर्थिक स्थिति डावाँडोल होते जाने के बावजूद जनवरी-दिसंबर '94 अंक के रूप में 'महिला लेखन विशेषांक' का प्रकाशन हुआ। इसकी अतिथि संपादिका थीं नासिरा शर्माउषा प्रियंवदा, सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा आदि लेखिकाओं की कहानियों के साथ इसमें जयदेव तनेजा एवं सुधीश पचौरी जैसे लेखकों के आलेख भी संकलित किये गये थे।

कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र की 150वीं जयंती पर केंद्रित अंक[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' ने फरवरी 1999 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र की 150 वर्ष पूरे होने पर विशेषांक प्रकाशित किया। इस विशेषांक के सन्दर्भ में अजय तिवारी ने लिखा है कि "दूरदर्शन के माध्यम से कुबेर दत्त ने और 'वर्तमान साहित्य' के माध्यम से विभूति नारायण राय ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र की 150वीं जयंती को हिंदी के लिए अविस्मरणीय बना दिया। उनके इस कार्य का महत्त्व और बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि वामपंथी लेखक संगठनों ने इस अवसर पर कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया।"[13]

'शताब्दी साहित्य' शृंखला के विशेषांक[संपादित करें]

इस यात्रा-क्रम में इस पत्रिका द्वारा सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य हुआ शताब्दी-विशेषांकों की शृंखला के रूप में। "हिंदी साहित्यिक पत्रिका के पिछले सौ वर्षों के इतिहास में यह पहली बार संभव हुआ कि किसी पत्रिका ने एक वर्ष के भीतर लगातार पांच विशेषांक..."[14] प्रकाशित किये। बीसवीं शताब्दी के साहित्य एवं कला-माध्यमों पर केन्द्रित इस शृंखला के अंतर्गत 'शताब्दी कथा विशेषांक' (जनवरी-फरवरी 2000), 'शताब्दी पंजाबी साहित्य विशेषांक' (मार्च-अप्रैल 2000), 'शताब्दी कविता विशेषांक' (मई-जून 2000), 'शताब्दी नाटक विशेषांक' (जुलाई-अगस्त 2000), 'बांग्ला साहित्य : शताब्दी विशेषांक' (सितंबर-अक्टूबर 2000), 'शताब्दी सिनेमा विशेषांक' (फरवरी-मार्च 2002), 'शताब्दी आलोचना पर एकाग्र'-1,2,3 (मई, जून, जुलाई 2002), आदि के रूप में उपलब्धियों का एक मानदण्ड कायम कर दिया गया। इन विशेषांकों के स्थायी महत्त्व के कारण पुस्तक-रूप में भी इनका प्रकाशन 'कथा-साहित्य के सौ बरस', 'पंजाबी साहित्य के सौ बरस', 'कविता के सौ बरस', 'नाटक के सौ बरस', 'सिनेमा के सौ बरस', 'आलोचना के सौ बरस' आदि नामों से प्रायः यथावत्[15] होते गया।

शताब्दी कथा विशेषांक[संपादित करें]

बीसवीं शताब्दी के हिन्दी कथा साहित्य पर केन्द्रित 'शताब्दी कथा विशेषांक' का प्रकाशन इस पत्रिका के वर्ष-17, अंक-1-2 (संयुक्तांक), जनवरी-फरवरी 2000 अंक के रूप में हुआ। इसके संयोजक-संपादक के रूप में असग़र वजाहत का नाम था परन्तु संपादकीय पत्रिका के संस्थापक संपादक विभूतिनारायण राय ने लिखा था। सह संपादक थे गोबिन्द प्रसाद। इस विशेषांक में हिन्दी कहानी एवं हिन्दी उपन्यास दोनों के विभिन्न आयामों को समेटते हुए अनेक आलेख प्रकाशित किये गये हैं। हिन्दी कहानी के विभिन्न दौरों तथा स्थितियों को दर्शाने वाले कई आलेख संकलित किये गये हैं। इसमें हिन्दी की पहली कहानी के रूप में अजय तिवारी ने रेवरेंड जे॰ न्यूटन की कहानी 'जमींदार का दृष्टांत' को विभिन्न तर्कों[16] के साथ प्रस्तुत किया है। सदी के श्रेष्ठ उपन्यासों एवं कहानियों के रूप में 'मील के पत्थर : उपन्यास' शीर्षक के अंतर्गत दस उपन्यासों[17] तथा 'मील के पत्थर : कहानियाँ' शीर्षक के अंतर्गत दस कहानियों पर केंद्रित विवेचनात्मक आलेख संयोजित किये गये हैं। 'सदी का कथाकार' के रूप में प्रेमचन्द को चुनकर उन पर मैनेजर पांडेय का आलेख दिया गया है। प्रेमचंद की मृत्यु के बाद 'ज़माना' से चुनी हुई सामग्री भी लिप्यंतरण सहित प्रस्तुत की गयी है। 'दस्तावेज़' के अंतर्गत आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं रामचंद्र शुक्ल तथा निराला के आलेखों के अतिरिक्त 'कफ़न' का लिप्यंतरण सहित मूल पाठ तथा 'जमींदार का दृष्टान्त' (रेवरेण्ड जे॰ न्यूटन की कहानी) भी, उसकी प्राप्ति की टिप्पणी सहित,[18] प्रस्तुत किये गये हैं। इसके अतिरिक्त डॉ॰ नामवर सिंह, प्रोफेसर शमीम हनफी, अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, राजेंद्र यादव एवं उदय प्रकाश के साक्षात्कार भी समायोजित हैं।

शताब्दी पंजाबी साहित्य विशेषांक[संपादित करें]

वर्तमान साहित्य की 'शताब्दी साहित्य माला' के अंतर्गत अपेक्षाकृत सबसे लघु आकार के इस विशेषांक (पाठ्य-सामग्री 256 पृष्ठों में) का प्रकाशन 'वर्तमान साहित्य' के मार्च-अप्रैल 2000 अंक के रूप में हुआ। इसके संपादक थे रामसिंह चाहल। इस विशेषांक में पंजाबी साहित्य पर केन्द्रित चार आलेखों के अतिरिक्त चुनी हुई 17 कहानियाँ एवं 38 कवियों की कविताएँ दी गयी हैं। इसके अतिरिक्त एक लघु नाटक के साथ निबंध, डायरी एवं आत्मकथा विधा की एक-एक रचनाएँ तथा चार साक्षात्कारों के साथ पंजाबी कविता पर एक लघु परिचर्चा भी समायोजित की गयी है।

शताब्दी कविता विशेषांक[संपादित करें]

बीसवीं शताब्दी की कविता पर केंद्रित 'शताब्दी कविता विशेषांक' इस पत्रिका के 'मई-जून 2000' अंक के रूप में प्रकाशित हुआ। इसके संपादक थे सुप्रसिद्ध कवि-समीक्षक लीलाधर मंडलोई तथा सहसंपादक थे गोबिन्द प्रसाद। इस वृहदाकार अंक में शताब्दी के कवि रूप में निराला को चुनकर उन पर केंद्रित बहुमुखी सामग्रियाँ दी गयी हैं। उसके बाद भारतेंदु पर केंद्रित आलेख के साथ-साथ प्रथम दलित कवि हीरा डोम की एकमात्र उपलब्ध सुप्रसिद्ध कविता 'अछूत की शिकायत'[19] पर केंद्रित आलेख के बाद श्रीधर पाठक से लेकर कुंवर नारायण तक विभिन्न महत्वपूर्ण कवियों की चुनिंदा कविताओं पर केंद्रित आलेख संयोजित किये गये हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक काल की हिंदी कविता के विभिन्न आयामों एवं विभिन्न दौरों को विवेचित करने वाले अनेक आलेख समायोजित किये गये हैं। साथ ही सुभद्रा कुमारी चौहान एवं महादेवी वर्मा पर केंद्रित आलेखों के अतिरिक्त काव्यभाषा और भावबोध, लम्बी कविताओं की परंपरा, लोकप्रिय हिंदी कविता आदि के साथ 50 बरस की स्त्री कविता तथा दलित कविता आदि विषयों पर केंद्रित आलेख भी संयोजित हैं। इस महाविशेषांक के अंतिम अंश में 13 विद्वानों से की गयी बातचीत भी प्रस्तुत हैं।

शताब्दी नाटक विशेषांक[संपादित करें]

बीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य पर केन्द्रित महाविशेषांकों की शृंखला में चौथी कड़ी के रूप में 'शताब्दी नाटक विशेषांक' का प्रकाशन 'वर्तमान साहित्य' के वर्ष 17, संयुक्तांक 7-8 (जुलाई-अगस्त 2000) के रूप में हुआ। नाटक के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित इस विशेषांक के संपादक थे अजीत पुष्कल एवं हरीशचन्द्र अग्रवाल। इस महत्त्वपूर्ण विशेषांक में नाटक तथा रंगमंच के विकास पर केन्द्रित विभिन्न विशेषज्ञों के आलेखों के साथ-साथ इप्टा आंदोलन और पृथ्वी थिएटर, जनम, नुक्कड़ नाटक आदि से सम्बद्ध आलेख भी संयोजित किये गये हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं भारतेन्दु नाट्य अकादमी पर केंद्रित आलेखों के अतिरिक्त लोकनाट्य, रासलीला, रामलीला, नाचा, नौटंकी, विदेशिया शैली, इंद्रासनी, पुतुल कला आदि पर केंद्रित आलेख इसके वैशिष्ट्य में बहुआयामी गुणात्मक वृद्धि करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों की रंगयात्रा पर केंद्रित आलेखों के अतिरिक्त 'परदे के पीछे' शीर्षक अनुभाग में रंगकर्म के विभिन्न आयामों को भी विवेचित किया गया है। बकौल संपादक "हमने कोशिश की है कि हमारा यह अंक रंगकर्मियों को उत्प्रेरित करे। रंगकर्म से जुड़े मुद्दों पर सामग्री देने की पहल की गई है।"[20] अंतिम अंश में 'बतकही' शीर्षक के अंतर्गत नाटक एवं रंगमंच के अनेक विशेषज्ञों के साक्षात्कार भी प्रकाशित किये गये हैं।

बाङ्ला साहित्य : शताब्दी विशेषांक[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' के शताब्दी साहित्य विशेषांकों की शृंखला में पाँचवी कड़ी[21] के रूप में 'बाङ्ला साहित्य : शताब्दी विशेषांक' (बाङ्ला साहित्य के सौ बरस) का प्रकाशन वर्ष-17, अंक 9-10 (संयुक्तांक), सितंबर-अक्टूबर 2000 के रूप में हुआ। इसके संपादक थे डॉ॰ रामशंकर द्विवेदी। कुल 400 पृष्ठों के इस विशेषांक में 9 पृष्ठों के संपादकीय के बाद सर्वप्रथम बाङ्ला कहानी, उपन्यास, कविता एवं मंच-नाटक के सौ वर्षों के सर्वेक्षणपरक चार आलेख संपादक डॉ॰ रामशंकर द्विवेदी द्वारा लिखित हैं। इसके बाद उज्ज्वल कुमार मजूमदार लिखित 'बाङ्ला निबन्धों की साम्प्रतिक दशा' शीर्षक आलेख भी दिया गया है। इसके बाद अन्नदाशंकर राय, आशापूर्णा देवी एवं विमल कर से साक्षात्कार, समरेश वसु के आत्मकथ्य एवं विमल कर लिखित 'तरुण बंगाली कथाकारों की मानसिकता' शीर्षक समीक्षा आदि का समायोजन हुआ है। पुनः अनेक विशिष्ट कविताओं एवं कहानियों से संवलित इस विशेषांक में सुनील गंगोपाध्याय का आत्मकथांश, शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय के उपन्यास 'चक्र' का आरंभिक अंश एवं 'जीवनानन्द समग्र' पर प्रभात कुमार दास द्वारा लिखित 16 पृष्ठों की समीक्षा भी सम्मिलित की गयी है।

शताब्दी सिनेमा विशेषांक[संपादित करें]

मुख्यतः बीसवीं शताब्दी के हिन्दी सिनेमा पर केंद्रित तथा अंशतः विश्व सिनेमा एवं कुछ अन्य भाषाओं के सिनेमा पर भी दृष्टिपात करने वाला 'वर्तमान साहित्य' का यह 'शताब्दी सिनेमा विशेषांक' (फरवरी-मार्च, 2002) सिनेमा पर केन्द्रित लेखन के क्षेत्र में बहुआयामी एवं बहुमूल्य सामग्री प्रस्तुत करता है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं मृत्युंजय। इसमें सर्वप्रथम 'दस्तावेज' खंड के अंतर्गत जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, रामवृक्ष बेनीपुरी, मुल्कराज आनंद एवं बलराज साहनी के आलेख दिये गये हैं। इसके बाद विश्व सिनेमा के अंतर्गत आद्यंत प्रासंगिकता के आधार पर विश्व सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ 12 फिल्मों का चयन कर उन पर टिप्पणी की गयी है।[22] 'मूल्यांकन' खंड के अंतर्गत ए के हंगल, डॉ॰ चमनलाल एवं शरद रंजन शरद के आलेख दिये गये हैं जिनमें मुख्यतः हिन्दी सिनेमा की प्रवृत्तियों पर टिप्पणी की गयी है। इस विशेषांक के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खंडों में एक है 'प्रक्रिया' खंड, जिसमें फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से संबंधित पूरे दर्जनभर आलेख दिये गये हैं। सत्यजित राय से लेकर चेतन आनंद तक के द्वारा लिखे गये इन आलेखों में फिल्म निर्माण के संदर्भ में ऑफ स्क्रीन की बहुआयामी सामग्री प्रस्तुत हुई है। 'कालखंड' शीर्षक खंड के अंतर्गत दो आलेख हैं 'मूक युग गूंगा नहीं था' तथा 'अंतिम दशक की फिल्में... दर्शक का विद्रोह'। यह अंक सिनेमा के संदर्भ में अभिनेता-पक्ष की अपेक्षा निर्देशकीय पक्ष पर केंद्रित है। इसके 'व्यक्तित्व' शीर्षक समृद्ध खंड के अंतर्गत कुल 29 लेखों में आरंभिक समय से लेकर आधुनिक समय तक के कुल 20 निर्देशकों के कार्य एवं उपलब्धियों पर विभिन्न दृष्टियों से विचार किये गये हैं। 'पहलू' खंड के अंतर्गत सिनेमा के संदर्भ में स्त्री, दलित एवं अपराध विषय पर केंद्रित आलेख दिये गये हैं। 'गीत-संगीत' खंड के अंतर्गत सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु खरे, नन्दकिशोर नंदन, सुमनिका सेठी एवं आचार्य सारथी के आलेख प्रस्तुत किये गये हैं। 'कहानी' खंड के अंतर्गत दो आलेख हैं। इसके अतिरिक्त कमलेश्वर, मस्तराम कपूर, सागर सरहदी एवं वेद राही लिखित संस्मरण भी संकलित किये गये हैं। शताब्दी के विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में बलराज साहनी एवं नूरजहाँ पर केंद्रित आलेख दिये गये हैं। इस अंक में हिन्दी के अतिरिक्त भोजपुरी, मैथिली, हरियाणवी एवं विशेष खंड के रूप में असमिया सिनेमा पर केंद्रित आलेख भी समायोजित किये गये हैं। 'परिशिष्ट' के अंतर्गत दो सूचनात्मक आलेख हैं। प्रथम आलेख 'सदी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ' के अंतर्गत 7 जुलाई 1896 को लुमिये ब्रदर्स द्वारा मुंबई के वाटसन होटल में प्रदर्शित 'एराइवल ऑफ ए ट्रेन, दि सी बाथ' तथा 'लेडीज़ एंड सोल्जर्स ऑन व्हील्स' फिल्मों की सूचना से लेकर सन् 2000 तक की विशिष्ट सिनेमाई घटनाओं की सूचना प्रस्तुत की गयी है। इसी के अंत में 'स्टारडस्ट हीरो होंडा सहस्राब्दी पुरस्कार' के माध्यम से हिन्दी सिनेमा के क्षेत्र में आद्यंत मान्य सर्वोत्तम अभिनेता से लेकर सर्वोत्तम गायिका तक की सूची प्रस्तुत की गयी है।[23] इस खंड के दूसरे आलेख 'साहित्यिक कृतियों पर बनी हिन्दी फिल्में' के अंतर्गत मूल साहित्यिक कृति का नाम, उस पर बनी फिल्म का नाम तथा उसके निर्देशक के नामों की सूची प्रस्तुत की गयी है।

शताब्दी आलोचना पर एकाग्र[संपादित करें]

'वर्तमान साहित्य' के विशेषांकों की शृंखला में मील का पत्थर है 'शताब्दी आलोचना पर एकाग्र' महाविशेषांक। इसमें इसके अतिथि सम्पादक अरविन्द त्रिपाठी की आलोचनात्मक अन्तर्दृष्टि एवं व्यवस्थापन क्षमता का उत्तम परिचय मिलता है। तीन खण्डों में प्रकाशित यह महाविशेषांक वस्तुतः इस पत्रिका के तीन अंकों की शृंखला है। 'वर्तमान साहित्य' के इस शताब्दी आलोचना विशेषांक के तीनों अंक इस पत्रिका के वर्ष-19, अंक-5,6 एवं 7 के रूप में क्रमशः मई, जून एवं जुलाई 2002 ई॰ में प्रकाशित हुए थे।[24][25]

इस वृहदाकार आयोजन के प्रथम खण्ड में 'हिन्दी आलोचना के नवरत्न' के रूप में "आलोचकों के बीच से आलोचना-मूर्धन्यों की खोज करके उनके सम्यक् मूल्यांकन की कोशिश अपने समय में सक्रिय प्रतिष्ठित आलोचकों द्वारा की गई है।"[26] इसी खण्ड में 'प्रमुख आलोचनात्मक और वैचारिक कृतियाँ' शीर्षक अनुभाग के अन्तर्गत ऐसी शीर्ष स्थानीय कृतियों की समीक्षाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, "जिनके बिना आलोचना और विचार की दुनिया आज असंभव है। इन्हीं कृतियों से बीसवीं सदी की हिन्दी आलोचना का परिसर समृद्ध हुआ है।"[26]

इसके द्वितीय खण्ड में 'विवाद और वाद' तथा 'संवाद' शीर्षक अनुभागों में 'ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली का विवाद', 'कथा में गाँव बनाम शहर की बहस' तथा आधुनिकता, मार्क्सवाद आदि से सम्बद्ध विषयों-मुद्दों से लेकर रचना, आलोचना के विभिन्न आयामों के साथ 'साहित्य में दलित विमर्श' तथा उत्तर आधुनिकता तक पर श्रेष्ठ आलोचकों-विचारकों के 48 आलेख संकलित किये गये हैं। सुप्रसिद्ध कवि-समीक्षक मदन कश्यप के शब्दों में "त्रिपाठी ने यहाँ गहरे संपादकीय विवेक का परिचय दिया है और महज इन कुछ आलेखों को इस तरह प्रस्तुत किया है कि सदी की आलोचना का पूरा चेहरा उभर कर आ जाए।"[27] इसी खण्ड के 'मूल्यांकन' अनुभाग में 'छायावाद के पुरस्कर्ता : मुकुटधर पांडेय', रामचन्द्र शुक्ल, नलिन विलोचन शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, डॉ॰ नगेन्द्र, नेमिचन्द्र जैन, नामवर सिंह, देवीशंकर अवस्थी, मलयज तथा निर्मल वर्मा के मूल्यांकन के साथ-साथ 'सदी की नाट्यालोचना' एवं स्त्री आलोचना पर भी आलेख संयोजित किये गये हैं।

इस महाविशेषांक के तृतीय खण्ड में 'साक्षात्कार और वार्तालाप' शीर्षक के अन्तर्गत 18 प्रमुख आलोचकों-विचारकों से प्रखर वैचारिक मुद्दों पर बातचीत समायोजित हैं। इसके अतिरिक्त इसमें शिवदान सिंह चौहान द्वारा प्रदीप सक्सेना को लिखे गये छह पत्र[28] एवं जगदीश गुप्त का एक पत्र भी संकलित हैं।

अन्य विशेषांक[संपादित करें]

शताब्दी साहित्य माला के महाविशेषांकों के बाद भी समयानुकूल आवश्यक मुद्दों एवं व्यक्तियों पर विभिन्न अंकों को केंद्रित कर उपयुक्त सामग्री प्रस्तुत करने का कार्य 'वर्तमान साहित्य' के द्वारा जारी रहा है। यशपाल पर केन्द्रित अंक (अक्टूबर-दिसंबर 2003, अतिथि संपादक- कुँवरपाल सिंह) तथा रांगेय राघव पर केंद्रित अंक (फरवरी-मार्च 2005, संपादक- कुँवरपाल सिंह, नमिता सिंह) आकार-प्रकार से महाविशेषांक ही थे। इसके अतिरिक्त भी सुभद्रा कुमारी चौहान पर केंद्रित अंक (अक्टूबर 2005, संपादक- कुँवरपाल सिंह, नमिता सिंह), जैनेन्द्र कुमार पर केंद्रित अंक (दिसंबर 2005, संपादक- कुँवरपाल सिंह, नमिता सिंह) से लेकर 'दुर्लभ साहित्य विशेषांक'-1,2 (वर्ष 31, अंक 8-9, अगस्त-सितंबर 2014 एवं अंक 10-11, अक्टूबर-नवंबर 2014, संपादक- विभूति नारायण राय, भारत भारद्वाज) तक के रूप में विभिन्न आयामों का समावेश इस पत्रिका के कलेवर में होते रहा है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. वर्तमान साहित्य, अप्रैल 2001 (वर्ष-18, अंक-4), पृष्ठ-1.
  2. वर्तमान साहित्य, अक्टूबर 2012 (वर्ष-28), पृष्ठ-1.
  3. वर्तमान साहित्य, अगस्त 2012 (वर्ष-28), पृष्ठ-1.
  4. वर्तमान साहित्य, अप्रैल 2015 (वर्ष-32, अंक-4), पृष्ठ-2.
  5. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-2, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-16.
  6. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-2, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-217.
  7. भारत भारद्वाज, 'वर्तमान साहित्य' (वर्ष 31, अंक 8-9, अगस्त-सितंबर 2014), पृष्ठ-3.
  8. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-1, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-18.
  9. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-2, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-138.
  10. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-1, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-78.
  11. समकालीन सृजन संदर्भ, खंड-2, भारत भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ-29-30.
  12. वर्तमान साहित्य, संयुक्तांक, मई-दिसंबर 1993, अतिथि संपादक- डॉ॰ सत्यप्रकाश मिश्र, पृष्ठ-31.
  13. आलोचना और संस्कृति, अजय तिवारी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्करण-2007, पृष्ठ-7 (भूमिका)।
  14. भारत भारद्वाज, हंस, संपादक- राजेन्द्र यादव, जनवरी 2001, पृष्ठ-95.
  15. इन सभी विशेषांकों में संपादकीय एवं विषय-सूची के बाद पृष्ठ-संख्या आरंभ होने से तथा इनके पुस्तकीय रूप समान आकार-प्रकार में प्रकाशित करने से संपादकीय के भूमिकारूप में संशोधित अथवा परिवर्तित करने के बावजूद मुख्य पाठ्य सामग्री की पृष्ठ-संख्या में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं हुआ है। केवल 'आलोचना के सौ बरस' के द्वितीय भाग में पृष्ठ-संख्या 392 से 399 तक में विशेषांक में छपे 'छोटे सुकुल जी' द्वारा लिखित व्यंग्यात्मक आलेख 'आलोचक का भीतर-बाहर' को बदलकर उसी स्थान पर समान पृष्ठ-संख्या में रुस्तम राय लिखित 'स्वाधीनता आंदोलन और प्रतिबन्धित पत्रिकाएँ' शीर्षक आलेख दे दिया गया है। अन्यत्र मुख्य पाठ्य सामग्री तथा पृष्ठ-संख्या में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
  16. कथा-साहित्य के सौ बरस, संपादक- विभूतिनारायण राय, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), तृतीय संस्करण-2012, पृष्ठ-40,46.
  17. वस्तुतः इसमें 'मित्रो मरजानी' को लगा कर 11 उपन्यासों की समीक्षा दी गयी है। परंतु, 'मित्रो मरजानी' वास्तव में एक लंबी कहानी है, न कि उपन्यास। अतः सही रूप में उपन्यासों की संख्या दस ठहरती है।
  18. कथा-साहित्य के सौ बरस, संपादक- विभूतिनारायण राय, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), तृतीय संस्करण-2012, पृष्ठ-603.
  19. कविता के सौ बरस, संपादक- लीलाधर मंडलोई, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), संस्करण-2013, पृष्ठ-44.
  20. नाटक के सौ बरस, संपादक- अजीत पुष्कल एवं हरीशचंद्र अग्रवाल, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), चतुर्थ संस्करण-2013, पृष्ठ-7(सम्पादकीय)।
  21. बाङ्ला साहित्य : शताब्दी विशेषांक (बाङ्ला साहित्य के सौ बरस), वर्ष-17, अंक 9-10 (संयुक्तांक), सितंबर-अक्टूबर 2000, अतिथि संपादक- डॉ॰ रामशंकर द्विवेदी, पृष्ठ-v (विषय-सूची के बाद 'संकेत' शीर्षक के अंतर्गत से.रा. यात्री द्वारा उल्लिखित)।
  22. सिनेमा के सौ बरस, संपादक- मृत्युंजय, शिल्पायन, शाहदरा, दिल्ली, दसवां संस्करण-2017, पृष्ठ-17-20.
  23. सिनेमा के सौ बरस, संपादक- मृत्युंजय, शिल्पायन, शाहदरा, दिल्ली, दसवां संस्करण-2017, पृष्ठ-423.
  24. वर्तमान साहित्य, शताब्दी आलोचना पर एकाग्र-1,2,3, वर्ष-19, अंक-5,6,7, मई,जून एवं जुलाई 2002, आवरण एवं पृष्ठ-2 (संपादकीय तथा विषय-सूची से पूर्व)।
  25. अनभै साँचा, संयुक्तांक-43-44, जुलाई-दिसंबर-2016, (डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी पर एकाग्र), संपादक- द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र, पृष्ठ-154.
  26. आलोचना के सौ बरस, खण्ड-1, संपादक- अरविन्द त्रिपाठी, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), संस्करण-2012, पृष्ठ-5 (पुरोवाक्)।
  27. मदन कश्यप, 'इंडिया टूडे' 11 सितम्बर 2002, पृष्ठ-75.
  28. आलोचना के सौ बरस, खण्ड-3, संपादक- अरविन्द त्रिपाठी, शिल्पायन, शाहदरा (दिल्ली), संस्करण-2012, पृष्ठ-14-20.

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