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वर्ग पहेली

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कोई बंगाली वर्ग पहेली

वर्ग पहेली (crossword) किसी भाषा के शब्द और अर्थ के ज्ञान की पहेली होती है जो प्रायः सफेद और काले रंग वाले वर्गाकार या आयताकार खानों के रूप में होती है। इस पहेली में सफेद खानों में अक्षरों को इस प्रकार भरना होता है ताकि इस प्रकार बने शब्द दिये गये दिशानिर्देशों का पालन करें। ये दिशानिर्देश पहेली के लिये दी हुई आकृति के साथ ही दिये गये होते हैं।

जिन वर्गों से उत्तर आरम्भ होता है उनमें कोई संख्या लिखी होती है। इन संख्याओं के संगत ही उत्तर के संकेत दिये गये होते हैं। प्रायः उत्तर के अन्त में कोष्टक में उस उत्तर में उपस्थित वर्णों की संख्या दी गयी होती है।

भारतीय गणित में वर्ग पहेली

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माना जाता है कि जादुई वर्गों के चमत्कारिक गुण होते हैं। प्राचीन भारतीय गणितज्ञों (हिन्दू , बौद्ध एवं जैन सभी) ने विभिन्न प्रकार से जादुई वर्गों का उपयोग किया है। [1]

भारतीय परम्परा में माना जाता है कि सबसे पहले भगवान शिव ने मणिभद्र को जादुई वर्ग की शिक्षा दी थी। नारायण पण्डित की गणितकौमुदी में उल्लेख है कि-

अथ भुवनत्रयगुरुणा उपदीष्टमीशेन मणिभद्राय ।
कौतुकिने भूताय श्रेढीसम्बन्धि सद्गणितम् ॥
सद्गणितचमत्कृतये यंत्रविदां प्रीतये कुगणकानाम् ।
गर्वक्षिप्तयै वक्ष्ये तत्सारं भद्रगणिताख्यम्॥
अर्थ - अब तीनों लोकों के गुरु और भगवान ने मणिभद्र को श्रेढी-सम्बन्धी सद्गणित का उपदेश दिया। जो सद्गणित यंत्रविदों की प्रसन्न करने वाला है और कुगणकों के गर्व को दूर करने वाला है, उस सद्गणित का सार रख रहा हूँ जो भद्रगणित के नाम से प्रसिद्ध है।[2]

जादुई वर्ग का सबसे प्राचीन भारतीय साहित्यिक साक्ष्य प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन (अनुमानतः १०० ई०) के एक ग्रन्थ में मिलता है। अपने 'कच्छपुट-तन्त्र' नामक ग्रन्थ में उन्होंने 4 × 4 आक्र के वर्ग बनाने की विधि दी हुई है जिनके योग कोई सम संख्या या कोई विषम संख्या होती है। इसके बनाने के लिए जो नियम बताया है वह कटपयादि संख्या-लेखन-पद्धति के अनुसार दिया गया है-[3]

नीलं चापि दयाचलो नवभुवं खारीवरं रागिनं
भूपो नारिवगो जरा चरनिभं तानं शतं योजयेत् ॥
भूतप्रेतपिशाचराक्षसमुखान् सर्पान् खलान् संहरत्
अग्निचौरभयादिनाशनमिदं नागार्जुनं निर्मितम् ॥

इसके बाद वराहमिहिर के बृहत्संहिता (लगभग 550 ई.) में जादुई वर्ग मिलता है जिसे उन्होंने इत्र के अवयवों के संयोजन और मात्रा निर्धारित करने के लिए एक जादू वर्ग का उपयोग किया है। बृहत्संहिता का अध्याय ७६ गन्धयुक्ति के नाम से है। इसमें उन्होंने विभिन्न प्रकार के इत्र बनाने की युक्ति (मिलाये जाने वाले अवयव एवं विधि) बतायी है। नीचे दिये गये श्लोकों में उन्होंने "सर्वतोभद्र" (सबके लिये उपयोगी) नामक इत्र के निर्माण की विधि बतायी है-[4]

द्वित्रीन्द्रियाष्टभागैर् अगुरुः पत्रम् तुरुस्कशैलेयौ।
विसयास्तपक्सदहनह् प्रियन्गुमुस्तारसाः केशः॥
स्पृक्कात्वक्तगराणाम् माम्स्याश् च कृतैकसप्तषद्भागाः।
सप्तर्तुवेदचन्द्रैर् मलयनखश्रीककुन्द्रुकाः॥
सोदशके कच्छपुते यथा तथा मिश्रिते चतुर्द्रव्ये।
येऽत्राष्टादशभागास् तेऽस्मिन् गन्धादयो योगाः॥
नखतगरतुरुष्कयुता जातीकर्पूरमृगकृतोद्बोधाः।
गुदनखधूप्या गन्धाः कर्तव्यः सर्वतोभद्राः॥

यह ४x४ आकर का है। इसमें प्राकृतिक संख्याओं 1-8 के दो सेट शामिल हैं, और इसका स्थिर योग 18 है। यह वर्ग, आज की शब्दावली में, 'पैन-विकर्ण' है। इसका अर्थ यह है कि इसके न केवल दो मुख्य विकर्णों पर स्थित संख्याओं का योग समन है बल्कि इसके सभी "टूटे हुए" विकर्ण पर स्थित संख्याओं के योग भी समन हैं।

भट्टोत्पल (967 ई.) ने कई अन्य श्लोकों का भी उल्लेख किया है जिनमें वर्णित जादुई वर्ग के योग समान है।[5]

वराहमिहिर के चार मूल वर्गों में से एक वह है जिसे 90° घुमाने पर बनने वाला वर्ग वही है जिसे अल-बरुनी और अल-ज़िंजानी अक्सर तावीज़ों ( talisman) के लिए एक बुनियादी पैटर्न के रूप में उपयोग करते थे।

वराहमिहिर ने अपने वर्ग को 'कच्छपुट' (कछुए का आवरण?) कहा है।[6]

लेकिन जदुई वर्गों की रचना के लिये आवश्यक गणित का विधिवत एवं विशद वर्णन सबसे पहले नारायण पण्डित (१३५६ ई०) की गणितकौमुदी में मिलता है।

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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सन्दर्भ

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  1. Magic Squares in India[मृत कड़ियाँ] (बिभूतिभूषण दत्त एवं अवधेश नारायण सिंह ; १९९२)
  2. Nārāyaṇa Paṇḍita’s Turagagati Method for the Construction of4x4 Pandiagonal Magic Squares (K. Ramasubramanian ; Indian Institute of Technology Bombay, India)
  3. Nārāyaṇa Paṇḍita’s Turagagati Method for the Construction of4x4 Pandiagonal Magic Squares (K. Ramasubramanian ; Indian Institute of Technology Bombay, India)
  4. Varāhamihira's pandiagonal magic square of the order four
  5. Magic Squares in Indian Mathematics
  6. Varahamihira’s Pandiagonal Magic Square of the Order Four (TAKAO HAYASHI ; 1987)