वधू

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वधू[संपादित करें]

यह स्त्रीलिंग वाचक शब्द है, और महिला जातकों के लिये उस समय प्रयुक्त होता है, जब वह वैवाहिक बंधन में बंध कर किसी को नया जीवन देने की योग्यता रखते हुये अपने पुरूष साथी को नवजीवन देने के गुणों को सजीव करती है। अर्थात् पुरूष जीवन-साथी का जीवन भर तथा विपत्ती के समय विशेष रूप से साथ देना। विपत्ती के समय समर्पण भाव से नवजीवन का संचार करना (हिम्मत देना) वधु का गुण (कर्तव्य) है। "वधू" शब्द वध से बना है, 'वध' का अर्थ है, किसी का जीवन समाप्त करना। और वधू का अर्थ किसी के जीवन में नवजीवन का संचार करने वाली महिला। यह जीवन भर साथ-साथ चलने के लिये प्रयोग किया जाता है, "वर" का विलोम शब्द है। इस शब्द का प्रयोग यदि ’ऊ’ की मात्रा हटाने के बाद किया जाये तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है, केवल "वध" शब्द रह जाता है। वधू के कर्तव्य सहित इतिहास में अनेक आदर्श उदाहरण हैं- इनमें से एक "सावित्री"।

वधू के अन्य नाम जिनमें रिस्ते बदल जाते है[संपादित करें]

  • कुलवधू एक ही समाज में ब्याह कर लायी हुई स्त्री, और कुल की मर्यादा का ख्याल रखने वाली महिला.
  • पुत्रवधू पुत्र के लिये ब्याह कर लायी हुई स्त्री.
  • नगरवधू यह शब्द वैश्या के लिये प्रयोग किया जाता है।