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वज्रोली मुद्रा

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वज्रोली, हठयोग की एक मुद्रा है। वज्रोली क्रिया में मूत्रमार्ग से जल ऊपर खींचकर फिर बाहर निकाला जाता है। इस प्रकार उस मार्ग की शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार किसी टब में बैठकर मलमार्ग द्वारा भी पानी खींचा जाता है। थोड़ी देर पेट में रखकर उसे घुमाया जाता है और फिर मलत्याग कर दिया जाता है। इस प्रकार आधुनिक एनिमा की पुरातन ढंग से पूर्ति हो जाती है। यह क्रिया ब्रह्मचर्य में सहायक होती है। वीर्य का ऊर्ध्वगमन संभव करती है। वह ओजस्-तेजस् में बदलता है और शीघ्रपतन,स्वप्नदोष, प्रमेह जैसे रोगों में आशाजनक लाभ होता है।

ब्रह्मचर्य के लिए वज्रोली क्रिया का हठयोग में विधान है। आरंभ में शुद्धि के लिए मूत्रमार्ग में जलचढ़ा कर स्वच्छ किया जाता है। पीछे जब नीचे से ऊपर खींचने की क्रिया का अभ्यास हो जाता है, तो वीर्य की अधोगामी प्रवृत्ति को प्रतिबंधित करके ऊपर चढ़ाने एवं मस्तिष्क तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाता है। इससे वीर्यपात की हानियाँ रुकती हैं और उस बहुमूल्य तत्त्व को मस्तिष्क में ले जाकर प्राणशक्ति बढ़ाने से लेकर मानसिक पराक्रमों को अधिक सरल एवं सफल बनाया जाता है। यह सफल हो सके तो शरीर में से निकलने वाले प्राण तक को रोककर ब्रह्मरंध्र में छिपाया जा सकता है और निर्धारित आयु से कहीं अधिक जिया जा सकता है।[1]

चित्र:Vajroli Mudra Bernard 1943.jpg
थिओस बर्नार्ड (Theos Bernard) वज्रोली मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए

वज्रोली क्रिया में आसन इस प्रकार लगाया जाता है कि एड़ी या एड़ी से ऊपर की हड्डी, गुदा और जननेंद्रिय मूल को हलका-सा दबाती रहे। यह दबाव इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि उस क्षेत्र में अवस्थित पौरुष ग्रंथियों या जननेंद्रिय की ओर जाने वाली नसों पर अधिक दबाव डालें और उनकी स्वाभाविक क्रिया में अवरोध उत्पन्न करें। इस योजना के लिए उस केंद्र का हलका-सा स्पर्श ही पर्याप्त है, जिससे यह अनुभव होता रहे कि यहाँ कुछ हलकी रोक-थाम जैसी चेष्टा की गई है।

अब गुदामूल को ऊपर खींचना चाहिए। इसके लिए साँस भी खींचनी पड़ती है। गुदा को ऊपर खींचने के साथ-साथ जननेंद्रिय की मूत्रवाहिनी नसें भी ऊपर खींचती हैं। इस खिचाव को इसी स्तर का समझना चाहिए जैसे कि कभी-कभी मल-मूत्र त्यागने की इच्छा होती है, पर वैसा अवसर नहीं होता। अतएव उन वेगों को रोकना पड़ता है। रोकने का तरीका एक ही है कि उस क्षेत्र को ऊपर खींचा जाए। माँस-पेशियों को ऊपर सिकोड़ा जाए।

वज्रोली मुद्रा में यही करना पड़ता है। साँस ऊपर चढ़ाते हुए गुदा-क्षेत्र की समस्त माँस-पेशियों को ऊपर की तरफ इस प्रकार चढ़ाया जाता है कि मानो किसी पिचकारी द्वारा पानी ऊपर खींचा जा रहा है।

खींचने की शक्ति जब न रहे तो फिर जैसे धीरे-धीरे खींचने की क्रिया की गई थी, उसी प्रकार उसे नीचे उतारने-छोड़ने की क्रिया करनी चाहिए। दोनों ही बार जल्दबाजी न की जाए। उसे धीमी गति से ऊपर चढ़ाया और नीचे उतारा जाए। स्मरण रहे इस माँस-पेशीय संकोचन के साथ प्राणायाम की तरह वायु को भी ऊपर चढ़ाने-छोड़ने का तारतम्य मिलाए रहना पड़ता है।

आरंभ में यह क्रिया दस बार की जाए। फिर प्रति सप्ताह एक की संख्या और बढ़ाते चला जाए। इसका अंत 24 आकुंचन-प्रकुंचनों पर समाप्त हो जाना चाहिए।

वज्रोली मुद्रा को करते समय सावधानियां

वज्रोली मुद्रा को करते समय निम्न बाताें पर जरूर ध्यान देना चाहिए -

  • इस मुद्रा को हमेशा खाली पेट ही किया जाता है।
  • इसे हमेशा मल व मूत्र त्याग करने के बाद ही करना चाहिए।
  • अगर किसी काे पेट में दर्द या पेट संबंधी कोई रोग है, तो इसे नहीं करना चाहिए।
  • अगर किसी को मलद्वार से संबंधित कोई रोग है, तो उसे वज्रोल मुद्रा करने से बचना चाहिए।
  • नाभि में दर्द होने पर भी इसे नहीं करना चाहिए।
  • शुरुआत में इसे प्रशिक्षित योग प्रशिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए।

सन्दर्भ

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इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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