लोलेइ

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लोलेइ
Lolei1.JPG
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिंदू धर्म
देवताशिवा
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिरोलुओस, शयम रीप
देशकंबोडिया
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भौगोलिक निर्देशांक13°21′10″N 103°58′26″E / 13.35278°N 103.97389°E / 13.35278; 103.97389निर्देशांक: 13°21′10″N 103°58′26″E / 13.35278°N 103.97389°E / 13.35278; 103.97389
वास्तु विवरण
प्रकारखमेर (प्रीह को to बाकोंग style)
निर्मातायशोवर्मन् प्रथम
निर्माण पूर्ण८९३ सदी

लोलेइ (ख्मेर: ប្រាសាទលលៃ) अंगकोर, कंबोडिया में 9वीं शताब्दी के हिंदू मंदिर रोलुओस समूह के तीन मंदिरों में उत्तरीतम मंदिर है, जिनमें से अन्य दो प्रीह को और बाकोंग हैं। लोलेइ हरिहरलय शहर के हिस्से के रूप में बनने वाले तीन मंदिरों में से अन्तिम मंदिर था जो रोलोस में समृधि लाया, और जिसे ८९३ में खमेर राजा यशोवर्मन् प्रथम ने इसे शिव और शाही परिवार के सदस्यों को समर्पित किया। "लोलेइ" नाम प्राचीन नाम "हरिहरलय" का आधुनिक भ्रष्ट नाम माना जाता है। [1] 98,112 जिसका अर्थ है "हरिहर का शहर।" जो कि एक द्वीप पर बना मंदिर था जो कि अब सूखे चुके इंद्रतटका बरय के केंद्र से थोड़े उत्तर में एक द्वीप पर स्थित था।[2]:60 इसका निर्माण जो कि यसोवर्मन के पिता और पूर्वसुरी इन्द्रवर्मन प्रथम के तहत लगभग पूरा हो चुका था। विद्वानों का मानना है कि मंदिर को एक द्वीप पर रखना इसे देवताओं के घर माउंट मेरु के साथ प्रतीकात्मक रूप से पहचानने के लिए किया गया जो कि हिंदू पौराणिक कथाओं में विश्व महासागरों से घिरा हुआ है।[3]


साइट[संपादित करें]

लोलेइ के इस बलुआ पत्थर पर नक्काशी से पता चलता है एक दंतधारी द्वारपाल एक धनुषाकार द्वार के नीचे त्रिशूल के साथ खड़े है। उसकी कोहनी के स्तर पर दो मकर सिर चेहरा बाहर कि और मुख है।

लोलेइ में ईटो से बने चार मंदिर मिनारों का समुह जिन्हें एक साथ छत पर समूहित किया गया है। राजा ने अपने पूर्वजों के लिए निर्माण करया था। एक अपने दादा के लिए, एक दादी के लिए, एक अपने पिता के लिए, और एक अपनी मां के लिए। सामने के दो मिनार पुरुषों के लिए हैं जबकि पीछे के दो मिनार महिलाओं के लिए थे। दो लम्बे मिनार अपने दादा दादी के लिए हैं जबकि दो छोटे मिनार अपने माता-पिता के लिए हैं। मूल रूप से, मिनारों को एक बाहरी दीवार ने घेरा हुआ था जिसमें आने के लिए एक गोपुरा के मध्य से आना पड़ता था, लेकिन न तो दीवार और न ही गोपुरा वर्तमान में बचे हैं। आज, मंदिर एक मठ के बगल में है, जैसे कि 9वीं शताब्दी में यह आश्रम के बगल में था।[4]

मंदिर टावर अपने सजावटी तत्वों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें उनके भ्रान्तिक दरवाजे, उनके नक्काशीदार लिंटेल और उनके नक्काशीदार देवता और द्वारपाल शामिल हैं, जो कि वास्तविक और भ्रान्तिक दोनों दरवाजे के बाहर हैं। लिंटेल और अन्य बलुआ पत्थर के उपर की गई नक्काशी में दर्शाए गए कुछ प्रारूप आकाश-देवता इन्द्र अपने हाथी ऐरावत पर सवार, सांप जैसे राक्षसों जैसे मकरस और बहु-सिर वाले नागोंको दर्शाए गये है।

फ़ुटनोट[संपादित करें]

  1. Coedès, George (1968). Walter F. Vella, संपा॰. The Indianized States of Southeast Asia. trans.Susan Brown Cowing. University of Hawaii Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8248-0368-1.
  2. Higham, C., 2001, The Civilization of Angkor, London: Weidenfeld & Nicolson, ISBN 9781842125847
  3. Jessup, p.77; Freeman and Jacques, pp.202 ff.
  4. Freeman and Jacques, p.202.

संदर्भ[संपादित करें]

  • माइकल फ्रीमैन और क्लाउड जैक्स, एक प्राचीन अंगकोर (बैंकाक: नदी किताबें, 1999.)
  • हेलेन Ibbetson जेसप, कला और वास्तुकला के कंबोडिया (लंदन: थेम्स और हडसन, 2004.)

यह भी देखें[संपादित करें]