लोधा राजपूत

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लोधी,लोध राजपूत

क्षत्रीय लोधी (क्षत्रिय लोधा,क्षत्रिय लोध) राजपूत[संपादित करें]

लोधा (लोधी या लोध) भारत में पायी जाने वाली एक प्राचीन चन्द्रवंशी क्षत्रिय जाति है। ये मध्य भारत और उत्तर भारत में बहुतायत में पाये जाते हैं.लोधी क्षत्रियों का मूल इस्थान पंजाब का लुधियाना प्रान्त हे पंजाब का लुधियाना प्रान्त लोधी (लोधा-लोध) क्षत्रियों ने ही बसाया था। भारत में लोधा (लोधी या लोध) क्षत्रिय कुछ राज्यों में 'अन्य पिछड़ा वर्ग' और कुछ राज्यों में ' सामान्य ' में आने वाली जाती हे. वेदो पुराणों और ऐतिहासिक किताबो से एक बात इश्पष्ट हो जाती हे की लोधा (लोधी-लोध) एक चंद्रवंशी क्षत्रिय जाती हे.

नोट: अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग 1990 के आसपास बना था जिसमे सामन्य में आने वाली जातियां को जो आर्थिक और शक्षणिक रूप से पिछड़ गयी थी उन्हें इसमें शामिल किया गया था.अन्य पिछड़े वर्ग की जातियाँ सामान्य से ही ली गयी हे.

शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र[संपादित करें]

लोध (लोधा-लोधी) शब्द का उल्लेख अनेक वैदिक ग्रंथो में मिलता हे जिनमे प्रमुख हे

(1) ऋग्वेद के तीसरे मंडल में अध्याय चार के 53 वे सूत्र के 23 वें मंत्र, जिसे 3, 53, 23

(2) भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व अध्याय 15

(3) 'भृगु' सहिंता उत्तर भाग, श्री परशुराम विजय अध्याय 34

(4) परसुराम सहिंता, प्रहस्त सम्वादे अध्याय 82 के 19 वे श्लोक

(5) 'सन्त कुमार सहिंता ' के उत्तर भाग के 18वे अध्याय

(6) गर्ग सहिंता मध्य भाग 51 श्लोक 82

(7) भविष्य पुराण अध्याय 15

(8) अत्रि सहिंता उत्तर भाग भाग श्री परशुराम विजय अध्याय - 34, पष्चिम यात्रा भृगुवाच

(9) परशुराम सहिंता प्रहस्त संवादे अध्याय 82 श्लोक 19 पृष्ठ 309

लोध (लोधी-लोधा) शब्द का पहला उल्लेख ऋृगवेद के मंडल 3 अध्याय 4 सूत्र 53 मंत्र 23 में है।

“न सायकस्य चिकिते जनोसां लोधं पशुमन्यमानाः।“ “नवाजिनं वाजिना हासयन्ति व गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति।"

इस मंत्र में 'लोध' शब्द का उपयोग गुणवाचक विशेषण के रुप में उपयोग हुआ है। 'लोध' वीर रस को प्रस्तुत करता है।

वेदों के प्रमुख भाष्यकार स्वामी दयानन्द जी ने 'लोधं' शब्द की व्याख्या साहसी, बुद्धिमान, वीरश्रेष्ठ तथा युद्धद्यिा में निपुण और व्यूह रचना करना तथा रक्षा करने में सामथ्र्यवान हों। 'लोधं' मनुष्य का एक गुण विशेष है। जो कभी योद्धाओं को उनकी वीरता और कुशलता के कारण ही सेनापति व सेनानायकों को प्रदान किया जाता था। जैसे वेदमंत्रों को पढ़ने वाले को पंडित कहा जाता है, उसी प्रकार जो मनुष्य युद्ध विद्या में निपुण थे वही लोध (लोधी) कहलाये। ऋग्वेद का उर्पयुक्त मंत्र विशेषकर उस सीन पर प्रयुक्त हुआ है जहां राजा को सेना के गठन संबधी ज्ञान कराया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि 'लोध' गुण विशेष वाले क्षत्रियों का नाम था। जो बाद में एक जाति के रुप में परिवर्तित हो गया। आचार्य सायणा ने अपने भाष्य में 'लोध' शब्द ऋषि विश्वामित्र के लिये विशेषण में प्रयुक्त किया है। जब वे अपनी तपस्या में पूर्णतया लगे हुए थे और तपस्या में लीन अपने प्राणों तक की चिन्ता नहीं थी। यदि यही मान लिया जाये कि 'लोध’ ऋषि विश्वामित्र का नाम था, यह भी संभव हो सकता है कि उनकी प्रेरणा से उन्हीं के समान गुण वाले क्षत्रियों ने अपना नाम लोध रख लिया हो और आगे चल कर उसी गुण धर्म वाले समुदाय विशेष का नाम लोध /लोधी पड़ गया।

अब तक उर्पयुक्त मंत्र तथा लोध शब्द की व्याख्या पर प्रकाश डालने वाले कई विद्वान इस प्रकार है

1. वेदों के प्रमुख भाष्यकार ऋषिवर स्वामी दयानन्दजी। 2. दक्षिण के द्रविड़ ब्राहा्रण सायणाचार्यजी। 3. सुप्रसिद्ध भाष्यकार एवं वशिष्ठ गोत्र के दुर्गाचार्यजी। 4. पारस्कर देश के रहने वाले निसम्तकार यास्काचार्यजी। 5. डा॰ रामस्वरुप ऋषिकेष। 6. श्रोत्रिय छोटेलाल शर्मा एम॰ आर॰ एन॰ (लन्दन) 7. श्री विष्णुदयाल शर्मा विधायक 8. श्री श्रवण कुमार त्रिपाठी 9. श्री महेशचन्द्र जैन 'शील' 10. आचार्य रामकुमार रामकृष्ण तिवारी 11. गुप्तकाल के प्रारंभ के अमर सिंह

इतने विद्वानों के मतों का अध्ययन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि लोध शब्द पर एक दो विद्वानों के मतों को छोड़कर सभी मतानुसार 'लोध' शब्द एक गुण विशेष था जो कालान्तर में जाति के रुप में प्रचलित हुआ।

क्रमांक विषय
1 शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र
2 भृगुवंशी परशुराम चन्द्रवंशी (लोधी) क्षत्रियों के प्रतिद्वन्दी क्यों बने?
3 लोधी सम्वत
4 लोधा (लोधी) राजवंश के प्रशिद्ध राजे ओर रजवाड़े ओर उनके संस्थापक / प्रशिद्ध शासक
5 प्रशिद्ध राजनेता
6 लोधी क्षत्रियों ने राजपूत लिखना कब से प्रारम्भ किया…?

इतिहास[संपादित करें]

सृष्टि की रचना के बाद संभवतः मानव सभ्यता तथा वंश पंरपरा स्थापित हुई होगी। तदोपरान्त वर्ण व्यवस्थास्थापित हुई हो, राज वंशावलियों के अनुसार मनु के दो पुत्र थे-मरीचि और अत्रि, मरीचि के कश्यप और कश्यप से सूर्य नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यहीं से सूर्य वंश की उत्पत्ति हुई। इधर अत्रि से समुद्र और समुद्र से चन्द्र नामक पुत्र का जन्म हुआ। यहीं से चन्द्र वंश की उत्पत्ति हुई। चन्द्र से परम तेजस्वी बुध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। चन्द्रवंशी राजा बुध बड़े धार्मिक, तेजस्वी और पराक्रमी राजा थे। वे अत्यन्त सुन्दर थे। अपनी विद्वता एवं बुद्धिमानी के कारण ही वे 'बुध' कहलाये। राजा बुध ने ऋग्वेद के उर्पयुक्त मंत्र का अध्ययन कर लोध गुण युक्त चन्द्रवंशी क्षत्रियों की एक विशाल सेना का गठन किया। इसी सेना के बल पर उन्होंने अनेक युद्ध जीते।

बस इसी समय से महाराज बुध ने लोध गुण युक्त चन्द्रवंशीय क्षत्रियों को ऋग्वेदानुकूल लोधी क्षत्रिय नाम दिया। हो सकता है कि राजा बुध के समय वर्ण व्यवस्था हो और जाति प्रथा न हो। जाति प्रथा के कौटुम्बिक व कर्म के सिद्धान्त को ध्यान में रखकर राजा बुध ने लोधगुण युक्त चन्द्रवंशी क्षत्रियों को ही 'लोधी' क्षत्रिय की संज्ञा दी हो। बाद में कौटुम्बिक सिद्धान्त को मानकर उनके परिवार जनों ने अपने को लोधी कहा हो और आगे चलकर भिन्न-भिन्न परिवारों का एक समूह जाति के रुप में परिणित हो गया। अतः लोधी समाज का संबध राजा बुध से स्वाभाविक है। क्यांेकि राजा बुध स्वंय चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे। अतः उन्होंने अपनी सेना में पारिवारिक व चन्द्रवंशीय क्षत्रियों को ही प्रधानता दी होगी। तभी से उनके वंशजों ने अपने नाम पर लोधगुण युक्त 'बुध', 'बुधौरिया', 'बुघरैया' खापे आज भी विद्यमान हैं, जो लोधी जाति के ही खापे है।

लोधी जाति की उत्पत्ति के बारे में कई बार विद्वानों के मत अलग-अलग है। किन्तु एक बात सर्वमत सत्य हे कि 'लोधी' जाति एक अत्यंन्त प्राचीन विशुद्ध चन्द्रवंशी क्षत्रिय जाति है। जिसका नामकरण वैदिक शब्द 'लोध' (अर्थात योद्धा वीर) गुण तथा युद्धकर्म के आधार पर हुआ है। इस जाति की प्राचीनता पौराणिक ग्रन्थों में इसका वर्णन प्रमाणित करता है।

हैहय वंशीय क्षत्रियों की भांति चन्द्रवंशीय लोधी क्षत्रियों का भी परशुराम से युद्ध हुआ जिसका उल्लेख हमें वेदो के निम्न श्लोको में मिलता हे " 'भृगु' सहिंता उत्तर भाग, श्री परशुराम विजय अध्याय ३४ " ,, " परसुराम सहिंता, प्रहस्त सम्वादे अध्याय ८२ के १९ वे श्लोक " , " अत्रि सहिंता उत्तर भाग भाग श्री परशुराम विजय अध्याय - ३४, पष्चिम यात्रा भृगुवाच " ,, " परशुराम सहिंता प्रहस्त संवादे अध्याय ८२ श्लोक १९ पृष्ठ ३०९ " यदि सत्य की खोज की जाए तो पौराणिक आख्यानों के अनुसार परशुराम लोधी क्षत्रिय (लोध गुण वाले चन्द्रवंशियों)संघर्ष तो हुआ है। संभवतः परशुराम के संघर्ष के दौरान ही लोध गुण युक्त चन्द्रवंशी क्षत्रियों ने परशुराम से बचने के लिये अपने पूर्वजों के नाम पर अपनी जाति का नाम रख लिया हो। जैसे यदु संतान ने अपने को यादव कहना प्रारंभ किया और महाराजा बुध की संतानों ने बुध, बुधेरिया आदि कहना प्रांरभ किया हो। और इससे पहले सभी लोध गुण युक्त चन्द्रवंशी लोध (लोधी) ही कहलाते हों। जैसे कि इस संघर्ष के समय अनेक लोधी क्षत्रियों ने शास्त्र धारण करना छोड़कर कृषि कार्य अपना लिया और क्षात्र (युद्ध के हतियार) से खेती करने लगे और वो अन्नदाता (किसान) के रूप में अपना क्षत्रिय धर्म निभाने लगे थे क्यूंकि एक क्षत्रिय जनता हे उसे कैसे अपनी प्रजा का पालन पोषण करना हे बस यही करना था की लोधी क्षत्रियों ने और रक्त न बहाने से युद्ध के शस्त्रों से खेती करना बेहतर समझा और वो अन्नदाता बन गए थे क्यूंकि क्षत्रियो का एक रूप अन्नदाता भी होता हे.

भृगुवंशी परशुराम चन्द्रवंशी (लोधी) क्षत्रियों के प्रतिद्वन्दी क्यों बने? [संपादित करें]

अब से लगभग ढाई तीन हजार वर्ष पूर्व लोधी जाति के बारे में फिर उल्लेख मिलता है। तब से लेकर अब तक लोधी जाति का इतिहास किसी न किसी रुप में अवश्य मिलता है। गौतम बुद्ध के समय लोधी क्षत्रियों की स्थिति संतोषजनक थी। इनके कई मुख्य शासन केन्द्र थे। जिसमे उज्जैन प्राचीन नगरी है। कहा जाता है कि परशुराम के समय से ही यहां लोधी क्षत्रिय निवास और शासन करते थे। इस संबध में एक घटना निम्न प्रकार बताई जाती है। चन्द्रवंश में आगे चलकर कीर्तिवीर्य अर्जुन नाम का प्रतापी राजा हुआ था। जो अपने बाहुबल, साहस और पराक्रम के कारण सहस्रबाहु अर्जुन के नाम से विख्यात हुआ। एक दिन अचानक राजा सहस्रबाहु अर्जुन आखेट करते हुए, जमदग्नि ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। जो आपस में संबधी भी बताये जाते थे। ऋषि जमदग्नि ने अपनी कामधेनु गाय के प्रताप से तत्काल राजा व उसकी सेना की खाने, पीने व ठहरने की व्यवस्था कर दी। जब राजा को कामधेनु गाय के प्रभाव का ज्ञान हुआ तो उसने भेंट स्वरुप कामधेनु को ही देने की ऋषि से याचना की। ऋषि ने इसे इन्द्र की धरोहर बताकर, राजा को इसे सौंपने में अपनी असमर्थता प्रकट की। इस पर राजा ने कुपित होकर कामधेनु को ले जाने का असफल प्रयास किया। जैसे ही राजा के सैनिक कामधेनु को लेने के लिए आगे बढ़े कामधेनु के प्रत्येक रोम से एक सैनिक बन गया। और राजा को युद्ध में पराजय मिली। कामधेनु वापस इन्द्रलोक चही गई। और राजा ने लज्जित होकर कुपित भाव से, ऋषि को अपनी राजधानी से निष्कासित कर दिया।

इस अवसर पर ऋषि जमदग्नि के चारों पुत्र आश्रम से बाहर गये हुए थे। जब वे लौटे तो सर्वाधिक क्रोध परशुराम को आया। और उन्होंने तत्काल सहस्रबाहु अर्जुन के विनाश का बीड़ा उठाया। उसने न केवल सहस्रबाहु का वध किया, बल्कि समस्त चन्द्रवंशी क्षत्रिय वंशो को तहस-नहस कर दिया। अवश्य ऐसा ही कोई कारण रहा होगा जिससे परशुराम क्षत्रिय कुल द्रोही बने। और उन्होंने उनके विनाश में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। चूँकि लोधी खुद चंद्रवंशी क्षत्रिय थे तो उनका भी परसुराम के साथ युद्ध हुआ और कुछ लोधी क्षत्रिय राजा परशुराम से भयभीत होकर शंकर भगवान की शरण में चले गये और वहां वे भगवान् शिव की उपासना करने लगे जिस कारन उस स्थान का नाम ही लोधीपुरी हो गया। भगवान परसुराम क्षत्रिय विनाश की कामना कर लोधीपुरी पहुंचे। तभी शंकर भगवान ने परशुराम को ललकार कर कहा 'मैरे होते हुए आप किसी भी लोधी क्षत्रिय को हानि नहीं पहुंचा सकते। इसके लिये आपको युद्ध करना होगा'। यहां पर परशुराम और लोधी क्षत्रियों में युद्ध हुआ। शंकर भगवान के आर्शीवाद से लोधी क्षत्रिय विजय हुए और परशुराम को वहां से लज्जित होकर अपने आश्रम वापस लौटना पड़ा। तभी से शंकर भगवान का नाम लोधेश्वर भगवान पड़ गया और उसी दिन से भगवान लोधेश्वर लोधी क्षत्रियों के कुल दैवता कहलाये. । उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले में धमेड़ी नामक स्थान पर लोधेश्वर महादेव का एक प्राचीन विशाल मंदिर है। जो भारत के सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थानों में गिना जाता है। यहां वर्ष में चार मेले लगते है।

इसी अध्याय में, श्री महेश चन्द्र जैन शील द्वारा दिये गये तथ्यों का उल्लेख करना भी परम आवश्यक है, जो उन्होंने अपने “भारतीय इतिहास में लोधी क्षत्रियों का स्थान नामक लेख में दिये हैं 1. हमने सर्वप्रथम आदि पुरुष वृषभ वेद के पुराण में देखा कि जिस व्यक्ति में तेजस्वी, तामषी और तपस्या के गुण हों वही लोधी है। 2. रामायण में महर्षि बाल्मीकि लिखते है कि जब भगवान राम सीता की खोज में विभन्न स्थानों पर तब वृषभ नामक राजा ने जो लोधी था राम की अगवानी की और पूर्ण मदद करने की इच्छा व्यक्त की। 3. तेलगू रामायण में भी इस प्रसंग का वर्णन किया गया है। 4. महाभारत में कौरव सेनापति कहते हैं कि मेरे पक्ष के लोधी वीरों की सेना मध्य भाग में रहेगी। जो आग आरै पीछे से होने वाले आक्रमण को विफल करने में सक्षम है। क्योंकि वे आदि देव महादेव की शरण लेकर युद्ध में आये है। चन्द्रवंशी क्षत्रियों के विध्वंस का मुख्य कारण महाभारत ही रहा। क्योंकि महाभारत में चन्द्रवंशी क्षत्रियों के मध्य यह सीधा आपसी संघर्ष था। महाभारत में भी लोधी क्षत्रिय जाति का वर्णन मिलता है। इस युद्ध के बाद समस्त चन्द्रवंशी राज्य परिवार व प्रजा भी छिन्न-भिन्न हो गई। द्वापर युग में गोकुल व बृजभुमि में अहीर (यादव), गुर्जर, गडरिया, जाट आदि जातियों का उल्लेख मिलता है। इनका मुख्य व्यवसाय गौपालन था। द्वापर के पश्चात व कलियुग के प्रारंभ के समय में लोधी क्षत्रिय जाति का इतिहास प्रयुक्त नहीं है। अब से लगभग ढाई तीन हजार वर्ष पूर्व लोधी क्षत्रिय जाति के बारे में फिर उल्लेख मिलता है। तब से लेकर अब तक लोधी क्षत्रिय जाति का इतिहास किसी न किसी रुप में अवश्य मिलता है। गौतम बुद्ध के समय लोधी क्षत्रियों की स्थिति संतोषजनक थी। इनके कई मुख्य शासन केन्द्र थे। जिसमे उज्जैन प्राचीन नगरी है। कहा जाता है कि परशुराम के समय से ही यहां लोधी क्षत्रिय निवास और शासन करते थे। इतिहासकारों के अनुसार यहां महाराज लोहित चन्द्रवंशी लोधी क्षत्रिय नरेश हुआ थे। जिन्होंने असुरों को परास्त कर बड़ा यश प्राप्त किया था । मौर्य काल में भी एक विशेष प्रकार की विशेष सेना " कुमुक लोधी क्षत्रियों " की रखी जाती थी। जो शांति एवं सुरक्षा का दायित्व निर्वाहन करती थी। जिसकी संख्या दस हजार थी। इस आशय का ताम्र पत्र विदिशा में रखा हुआ हे.

लोधी सम्वत[संपादित करें]

भारत में अभी तक नौ संवत प्रकाश में आये हैः-

1. वीर निर्वाण संवत 2. विक्रम संवत 3. लोधी संवत 4. शंक संवत 5. शालिवाहन संवत 6. ईस्वी संवत 7. गुप्त संवत 8. हिजरी संवत 9. मधा संवत

जिस तरह न्यायप्रिय शासक महाराज विक्रमादित्य के समय विक्रम संवत का उल्लेख मिलता है। उसी तरह महाराज विक्रमादित्य के बाद, लोधी संवत महाराज ब्रहा्स्वरुप लोधी के राज्याभिषेक के समय प्रारंभ हुआ था। लोधी संवत का उल्लेख अब से 1832 वर्ष पूर्व (अर्थात 160 ई॰ पु॰) राज सिंहासन पर विराजमान राजा शालिवाहन ने, मैसूर के मुम्मड़े नामक नगर में शिलालेख में उत्कीर्ण कराया था। यह शिलालेख प्राकृत, संस्कृत, पाली तथा तेलगू भाषा में उत्कीर्ण है। इस में विक्रमादित्य के पश्चात, ब्रहा्रस्रुप लोधी के राज्यारोहरण पर लोधी संवत के उसके राज्य में प्रचलन का वर्णन खुदा हुआ है।लोधी संवत की प्रारंभ तिथि के बारे में विद्वानों के मत अलग-अलग है। पं. काशीलाल जायसवाल, जुगल किशोर मुख्तार, डा॰ हेमन्त जेकोवी इन सभी के मतों का समाधान करते हुए, जार्ज जामान्टियर ने ब्रहा्रस्वरुप लोधी के राज्याभिषेक को ही प्रमाण मानकर लोधी संवत का प्रारंभ काल माना है। लोधी क्षत्रिय बृहत् इतिहास के लेखक लोधी खेमसिंह वर्मा के मतानुसार, लोधी संवत प्रचलन काल ईस्वी सन की पहली या दूसरी शताब्दी रहा होगा। यहां पर सभी के मतों व समीपवर्तीय संवतों को ध्यान मे रखकर लेखक के मतानुसार अनुमानित तारीख इस प्रकार है। वीर संवत का प्रचलन 76 ई॰ पू॰ हुआ, तथा विक्रम संवत का प्रचलन 57/58 ई॰ पू॰ हुआ तथा लोधी संवत का प्रचलन इसके बाद हुआ और लोधी संवत के पश्चात शक संवत प्रचलन में आया। जिसका प्रचलन काल सन् 78 ई॰ बताया जाता है। और इन दोनों संवतों के मध्य के समय में विक्रमादित्य के पुत्र चन्द्रसेन व पौत्र शालिवाहन ने शासन किया, क्योंकि शालिवाहन ने ही शकों पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में शक संवत चलाया तथा सन् 160 ई॰ में उपयुक्त संवतों का उल्लेख शिलालेखों पर अंकित कराया, जो प्रमाणस्वरुप आज भी देखे जा सकते है। दोनों पीढि़यों का शासन काल 50-60 वर्ष मान लिया जाये और कुछ समय ब्रहा्रस्वरुप लोधी का शासनकाल जोड़कर देखा जाए, तो लोधी संवत का प्रचलनकाल अनुमानित ईस्वी सदी का दूसरा दशक का मध्यान्तरण् रहा होगा। इस हिसाब से आज सन् 2004 लोधी संवत 1990 हो सकता है.

लोधा (लोधी-लोध) राजवंश के प्रशिद्ध राजे ओर रजवाड़े ओर उनके संस्थापक / प्रशिद्ध शासक[संपादित करें]

1) लोद्रवा, नौंवी सताब्दी - महाराज लोद्रभानु सिंह लोध 2) हिंडोल, नौंवी से दसवीं से सताब्दी के मध्य - महाराज ईश्वर दास लोधी (प्रशिद्ध शासक) 3) रामगढ़, सोहलवीं सताब्दी - महाराज मोहन सिंह लोधी 4) गहोरा 5) बांधवगढ़, तेरहवीं सदी - महाराज विजय सिंह लोधी 6) हिरागढ़, सोलहवीं सदी - महाराजा हिरदेशाह लोधी 7) कालपी, दसवीं सताब्दी - महाराज श्रीचंद्र लोधी उर्फ लहराया 8) करौली, दसवीं सताब्दी - 300 सालो तक लोधी क्षत्रियोँ का राज रहा था इसपे (संदर्भ - श्री जगदीश सिंह गहलोत जी “राजपूताने का इतिहास - प्रथम भाग” 9) गढ़ खण्डहर, ग्यारहवीं सदी 10) ग्वारी राजवंश, पंद्रहवी सदी - महाराज रतन सिंह लोधी 11) चरखारी रियासत (मंडो नगरी), चौदहवीं सदी - महाराज मंडन सिंह लोधी 12) हटरी, चौदहवीं सदी - महाराज चिंतामन सूर लोधी 12) कामठा जागीरदारी - रायबहादुर राजा इन्द्रराज सिंह लोधी 13) झमझिर नरसिंहपुर, ग्यारवी सदी - राव सूरत सिंह बहादुर लोधी 14) फतेहगढ़ (हुसैनगढ़), अठारवीं सदी - महाराज छबिलराय सिंह लोधी 15) वलराज, 10वी सदी - राजा नलखि सिंह लोधा 16) कान्था, 11वी सदी - राजा कान्था सिंह लोधा 17) उज्जैन - महाराज ब्रह्मस्वरूप लोधी (लोधी संवत) ये कुछ लोधी क्षत्रियोँ के प्रशिद्ध राजे ओर रजवाड़े थे । इनके अलावा लोधी क्षत्रियोँ की कई जागीरें ओर जमींदारियाँ भी रही है। भारत मे सबसे ज्यादा जमींदारियाँ अगर किसी की रही है तो वो लोधी क्षत्रिय थे । आजादी से पूर्व तक भारत में लोधी क्षत्रिय जाती के 230 छोटे बड़े राजघराने देश में थे जिनमे से अन्तः आजादी के बाद 23 राजघराने ही अस्तित्व में बचे रह पाए.

प्रसिद्ध राजनेता[संपादित करें]

लोधी क्षत्रिय वंश के कुछ प्रसिद्ध राजनेता जिनके बिना भारतीय राजनीति की कल्पना भी नहीं की जा सकती हे.

  • हिन्दू हर्दय सम्राट महामहिम कल्याण सिंह लोधी जी (भूत पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश और वर्तमान राज्यपाल राजस्थान)
  • भगवा ध्वजा वाहक साध्वी उमा भारती जी (भूत पूर्व मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश)
  • हिन्दू हर्दय सम्राट प्रधान गौ सेवक ठाकुर राजा सिंह लोधी जी (बीजेपी विधायक गोश-महल तेलंगाना)
  • ठाकुर श्री प्रहलाद सिंह पटेल लोधी जी (कैबिनेट मिनिस्टर और संसद दमोह)
  • सुश्री कुसुम सिंह महदेले जी (एक्स कैबिनेट मिनिस्टर मध्य प्रदेश)
  • हिन्दू हर्दय सम्राट स्वामी श्री साक्षी जी महाराज (सांसद उन्नाव)

लोधा (लोधी) क्षत्रियों ने राजपूत लिखना कब से प्रारम्भ किया…?[संपादित करें]

बोद्धकाल में बौद्ध धर्म की प्रगति व प्रसार और वैदिक धर्म के पतन के कारणों से चिन्तित आर्य ऋषियों ने बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये समस्त क्षत्रिय राजाओं को आमंत्रित कर आबू पर्वत पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। जिसमें अनेक राजाओं को यज्ञाग्नि के समक्ष दीक्षित कर उन्हें राजपूत नाम दिया। तभी से अग्निवंशी क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई। तभी से यज्ञ में सम्मिलित चन्द्रवंशी लोधी क्षत्रियों नें बड़ी संख्या में अपने उपनाम के रुप में राजपूत शब्द अपनाया। और वे अपने को लोधी राजपूत कहने लगे। आजकल क्षत्रिय और राजपूत दोनो ही एक दूसरे के पर्यायवाची है।

संदर्भ सूत्र[संपादित करें]

1) ऋग्वेद के तीसरे मंडल में अध्याय चार के 53 वे सूत्र के 23 वें मंत्र, जिसे 3, 53, 23

2) भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व अध्याय 15

3) 'भृगु' सहिंता उत्तर भाग, श्री परशुराम विजय अध्याय 34

4) परसुराम सहिंता, प्रहस्त सम्वादे अध्याय 82 के 19 वे श्लोक

5) ' सन्त कुमार सहिंता ' के उत्तर भाग के 18वे अध्याय

6) गर्ग सहिंता मध्य भाग 51 श्लोक 82

7) भविष्य पुराण अध्याय 15

8) अत्रि सहिंता उत्तर भाग भाग श्री परशुराम विजय अध्याय - 34, पष्चिम यात्रा भृगुवाच

9) परशुराम सहिंता प्रहस्त संवादे अध्याय 82 श्लोक 19 पृष्ठ 309

10) लोधी क्षत्रिय बृहत इतिहास -> श्री खेम सिंह वर्मा जी

11) बुद्धदेव -> श्री जगमोहन

12) भारतीय इतिहास में लोधी क्षत्रियोँ का इस्थान -> श्री महेश चंद्र जैन शील

13) राजस्थान जातिओं की खोज -> श्री रमेश चंद्र गुणार्थी

14) राजस्थान का इतिहास -> कर्नल जेम्स टॉड

15) भारतवर्ष का मध्यकाल का इतिहास -> श्री सी. पी. वैध

16) राजपूताने का इतिहास (प्रथम भाग) -> श्री जगदीश सिंह गहलोत

17) जाती अन्वेषण प्रथम भाग -> श्री छोटेलाल शर्मा जी

18) भारत यात्रा -> श्री गंगा प्रशाद

19) लोधी क्षत्रिय पुराण , तृतीय खण्ड -> श्री केशव दास जी

20) भारतीय इतिहास की भयंकर भूले -> श्री पुरुषोत्तम नागेश

21) क्रांति पथ -> श्री श्रवण कुमार त्रिपाठी

22) चंदेल वंश राजत्व काल -> श्री केशव चंद्र

23) ट्राइब्स एंड कास्ट सेंट्रल प्रोविजन ऑफ इंडिया -> मध्य प्रदेश की जातियाँ - रसेल

24) लोधी क्षत्रियोँ की विकास यात्रा -> श्री डॉ. भारत सिंह, श्री छांगम सिंह राजपूत

25) करोली इतिहास के झरोखे से - > श्री दामोदर लाल गर्ग

26) भारतीय उपमहाद्वीपीय इतिहास में लोधी वीरों का स्वर्णिम योगदान -> श्री योगेन्द्र सिंह लोधी