लोकरंग २००९

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अपसंस्कृति के विरूद्ध लोकसंस्कृति[संपादित करें]

जोगिया जनूबी पट्टी (फाजिलनगर, कुशीनगर) को `लोकसंस्कृतियों का उत्सव और लोक उत्सवों का गांव´ में तब्दील होने की खुशी जहां देश के तमाम बुद्धिजीवियों के कौतुहल का विषय है वहीं हमें खुशी इस बात की है कि दिनों-दिन असाध्य नज़र आ रहे गंवई फूहड़पन, अपसंस्कृति और लम्पटई को मात्र दो वर्षों के लोकरंग आयोजन ने हिला कर रख दिया है। गांव क्या पूरा जवार लोकरंग को अपना उत्सव मानने लगा है। सामाजिक ठहराव, कुंठा, निराशा और लोक कला की उपेक्षा से मुक्त गंवई समाज, पुन: मुन्हरके में चौपाल सजाने को उद्धत नज़र आ रहा है। आरकेस्ट्रा जैसे फूहड़पन और नशाखोरी को नकारने का जज्बा भी लोगों में देखने को मिल रहा है।

यह गांव गौतम बुद्ध की निर्वाण स्थली कुशीनगर से लगभग 17 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग से सटा है। विगत दो वर्षों से इस गांव ने लुप्त हो रही लोक संस्कृतियों को मंच प्रदान कर, सामाजिक समरसता में लगी सेंध के विरूद्ध लोक जनमानस में नई चेतना पैदा कर दी है। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित इस कार्यक्रम ने देश के सभी प्रमुख हिन्दी साहित्यकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

विगत वर्ष 23, 24 मई 2008 को जब इस अभियान की शुरुआत की गई थी तब सहज अनुमान लगाना कठिन था कि मृतप्राय हो चुके हुड़का, पखावज, फरी, धोबियाऊ, जांघिया नृत्य एवं कहरवा, कजरी, चइता, तथा निर्गुन गायकी पूरे पूर्वांचल के जनसैलाब को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो सकते हैं। लेकिन इस वर्ष 28, 29 मई 2009 को जब यह कार्यक्रम पुन: आयोजित हुआ तो लोगों का उत्साह देखते बना। पूरा गांव कलाग्राम के रूप में सजा हुआ था। घरों के दीवारों व अनाज के बखारों पर बनी सुन्दर कलाकृतियां, जगह-जगह भोजपुरी व हिन्दी कविताओं, गीतों के पोस्टर, पेड़ों पर सजे -धजे मिट्टी के मटकों ने गांव को आर्ट गैलरी की शक्ल दे दी थी। जहां इस अद्भुत नजारे को देश के तमाम साहित्यकार, कलाप्रेमी चकित मन से देख रहे थे वहीं गंवई जनमानस भी इससे अभीभूत था। पेड़ों पर मिट्टी के बरतनों से बनाई गई कलाकृतियों के संवाद से गंवई समाज आपसी कटुता, बैमनस्य को किनारे रख, लोकरंग में अपनी सहभागिता निभा रहा था। गांव की महिलाएं सुबह से द्वार और सड़कों की सफाई में लगीं थीं तो पुरूष बच्चों को बाहर से आ रहे मेहमानों से अदब से पेश आने की नसीहत दे रहे थे। यदि कोई आगन्तुक राष्ट्रीय राज्य मार्ग से तीन किलोमीटर दूर जोगिया के बारे में जानकारी चाहे तो लोग तपाक से पूछ रहे थे- लोकरंग में आए हैं क्या ?

लोकरंग की आयोजक संस्था- `लोकरंग सांस्कृतिक समिति´ एन0जी0ओ0 नही है और न उसे किसी थैलीशाह की मदद मिली हुई है। उसने इस आयोजन के निमित्त आम जनता का सहयोग लिया है। इस वर्ष लोक संस्कृतियों के निरूपण के प्रयास में `लोकरंग-1´ नामक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन किया गया है और विज्ञापन स्वरूप प्राप्त राशि इस आयोजन में प्रयुक्त हुई है। अतिथियों के खान-पान और रहने की व्यवस्था गांव वालों ने अपने जिम्मे ले लिया है। `लोकरंग-1´ पुस्तक में हमने गुमनाम लोक कलाकार रसूल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई है। रसूल हमारे लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं। रसूल के समकालीन लोक कलाकारों में शायद ही कोई दूसरा हो जिन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध जनता को उद्वेलित किया हो और सैनिकों की छावनी में जाकर कहा हो-

छोड़ द गोरकी के अब तू खुशामी बालमा

एकर कहिया ले करब, गुलामी बालमा

देशवा हमार बनल इ आ के रानी

करे ले हमनी पर इ हुक्मरानी

एकर छोड़ द तू दिहल, सलामी बालमा

एकर कहिया ले करब, गुलामी बालमा।

रसूल को इस गीत के कारण जेल जाना पड़ा था।

लोक कलाकार रसूल के गीतों में राष्ट्रप्रेम और हिन्दू-मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल मिलती है -

सर पर चढ़ल आजाद गगरिया, संभल के चल डगरिया ना।

एक कुईंया पर दू पनिहारन, एक ही लागल डोर

कोई खींचे हिन्दुस्तान की ओर, कोई पाकिस्तान की ओर

ना डूबे ना फूटे ई, मिल्लत की गगरिया ना।.............

हमें अपने सीमित साधनों और गंवई सदस्यों के दम पर रसूल की मृत्यु के 56 वर्षों बाद, उनकी तमाम रचनाओं को जनमानस के सामने उजागर करन का सुखद अनुभव हुआ है।

`लोक-रंग 2009´ को देखने-सुनने हजारों की संख्या में लोग आये। उन्होंने फूहड़ पुरबिया गानों की जगह अपनी मिट्टी, जीवन के गीत-संगीत तथा अपनी लोक कलाओं का भरपूर आनन्द उठाया। जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ तथा प्रगतिशील लेखक संघ जैसे सांस्कृतिक संगठनों का इसमें सहयोग मिला। हिरावल, पटना तथा इप्टा, आजमगढ़ तो अपने पूरे दल-बल के साथ यहां मौजूद रहे ही।

दो दिनों तक चले इस समारोह में तमाम लुप्त होती लोकसंस्कृतियों के दर्शन हुए। श्रीमती शान्ती के नेतृत्व में गांव की महिलाओं के पहली बार किसी मंच पर कजरी गायन प्रस्तुत किया। रामजीत सिंह और उनके साथियों के द्वारा एकतारा और खजड़ी जैसे लुप्त होने वाद्ययन्त्रों के माध्यम से निर्गुन गायकी प्रस्तुत की गई। नागेश्वर यादव और उनके साथियों ने पैर में घुंघुरू बांधे, फार, नगाड़ा, करताल के माध्यम से बिरहा गायकी व फरी नृत्य प्रस्तुत किया गया। मीर बिहार व कटहरी बाग की टीमों ने झाल, मृदंग जैसे वाद्ययन्त्रों के द्वारा चइता गायन प्रस्तुत किया। इप्टा, आजमगढ़ ने लोकगीतों के अलावा कहरवा, जांघिया और धोबियाऊ नृत्य तथा जोगीरा प्रस्तुत किया। जांघिया नृत्य में जांघ पर सैकड़ों घुंघुरूओं को बांधे लोक कलाकारों ने, नगाड़े की थाप पर प्रस्तुत अद्भुत नृत्य से हजारों जनमानस को मुग्ध कर दिया।

हिरावल ने भारतेन्दु हरिश्चन्द के प्रसिद्ध नाटक `अंधेर नगरी चौपट राजा´ का मंचन किया। इसके मूल नाट्य लेख में परिवर्तन किए बिना देश के अन्दर बढ़ती साम्प्रदायिकता, बाजारवाद के विभिन्न दृश्यों के समायोजन के द्वारा हिरावल ने इस को सामयिक बनाने का प्रयास किया है। सूत्रधार, आजमगढ़ ने इस मौके पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के द्वारा लिखित नाटक `हवालात´ का मंचन किया।

पूर्वांचल में गायन, वादन, नृत्य आदि के जो कला रूप आम तौर पर प्रचलित व लोकप्रिय हैं, `लोक-रंग´ में उनकी एक बानगी देखने को मिलती है। वैसे ये विधाएं आज संकट में हैं और धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। लेकिन इस समारोह से इन विधाओं को फिर अपनी जमीन मिल रही है। कलाकारों में अच्छा-खासा उत्साह है। वे अपनी कला को हेय मानने की मानसिकता से उबर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि ऐसी कलाएं भी सम्मान दिला सकती हैं। वे इन्हें और मांजने तथा नयी विषय-वस्तु से सजाने-संवारने की दिशा में सोचने लगे हैं। कभी अंधविश्वास के गढ़ के रूप में कुख्यात जोगिया जनूबी पट्टी, आज प्रगतिशील संस्कृतियों का गढ़ बनता नज़र आ रहा है। लोकरंग ने सामाजिकता, समरसता और भाईचारा की संस्कृति को पुन: उगाया है। इस प्रयास से इस विचार को मजबूती मिली है कि लोक संस्कृति की जनपक्षधर धारा को आगे बढ़ाकर, गांव में फैल रही अपसंस्कृति, द्वेष, इष्र्या का आसानी से मुकाबला किया जा सकता है।

`लोक-रंग´ की विचार गोष्ठियों में हमने अनपढ़ किसानों से लेकर बुद्धिजीवियों तक को हिस्सेदार बनाया है। हमने लोक कलाओं को आधुनिक कला से तथा बुद्धिजीवी समुदाय को गंवई जनता से जोड़ने का प्रयास किया है। अभी तक जो परिणाम और प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उनसे आशा बंधती है कि यदि `लोक-रंग´ अपनी निरन्तरता कायम रख सका तो निसन्देह यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप ले सकता है और पूरब की इस पट्टी में एक नई सांस्कृतिक चेतना की बयार महसूस की जा सकती है।

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