जन लोकपाल विधेयक आंदोलन २०११

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जन लोकपाल विधेयक (नागरिक लोकपाल विधेयक) के निर्माण के लिए जारी यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में ५ अप्रैल २०११ को समाजसेवी अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के जंतर-मंतर पर शुरु किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ, जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण, पतंजलि योगपीठ के संस्थापक बाबा रामदेव आदि शामिल थे। संचार साधनों के प्रभाव के कारण इस अनशन का प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और इसके समर्थन में लोग सड़कों पर भी उतरने लगे। इन्होंने भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की माँग की थी और अपनी माँग के अनुरूप सरकार को लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया था। किंतु मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप शुरु हुए अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। किंतु इस अनशन के आंदोलन का रूप लेने पर भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और १६ अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पास कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया वह कमजोर और जन लोकपाल के सर्वथा विपरीत था। अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ अपने पूर्व घोषित तिथि १६ अगस्त से पुनः अनशन पर जाने की बात दुहराई। सरकार ने इसकी राह में कई रोड़े अटकाए एवं १६ अगस्त को अन्ना हजारे एवं उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। किंतु इससे आंदोलन पुरे देश में भड़क उठा। देश भर में अगले १२ दिलों तक लगातार बड़ी संख्या में धरना, प्रदर्शन और अनशन आयोजित किए गए। अंततः संसद द्वारा अन्ना की तीन शर्तों पर सहमती का प्रस्ताव पास करने के बाद २८ अगस्त को अन्ना ने अपना अनशन स्थगित करने की घोषणा की।

इतिहास[संपादित करें]

अप्रैल २०११[संपादित करें]

५ अप्रैल २०११ को एक सशक्त लोकपाल विधेयक के निर्माण की माँग पर सरकारी निष्क्रियता के प्रतिरोध में अन्ना हजारे ने आमरण अनशन शुरु कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी इस मुहिम में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव एवं अन्य अनेक प्रसिद्ध समाजसेवी शामिल थे। सरकार ने इसे उपेक्षित करना जारी रखा। इस अनशन को भारत एवं शीघ्र ही विश्व के संचार माध्यमों में विस्तृत रूप से प्रकाशित और प्रसारित किया जाने लगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी इस कोशिश को शीघ्र ही व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा। भारत के प्रायः सभी शहरों में युवा सड़कों पर उतर आए एवं इसके समर्थन में प्रदर्शन किया तथा पर्चे बाँटे।

अन्ना हजारे के अनशन के देशव्यापी जन आन्दोलन के रूप में फैल जाने से चिंतित सरकार ने जनलोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिये झटपट एक समिति की घोषणा की। उसने १६ अगस्त से पहले संसद में एक मजबूत लोकपाल विधेयक पास कराने पर भी सहमति प्रकट कर दी। इस तरह यह अनशन समाप्त हुआ और भ्रष्टाचार के विरुद्ध पनपता जन आंदोलन मजबूत लोकपाल के निर्माण की आशा के साथ समाप्त हुआ। किंतु सरकारी मंशा संदिग्ध थी इसलिए अन्ना हजारे ने साथ ही घोषणा की कि यदि आगामी १५ अगस्त तक अपेक्षित लोकपाल विधेयक निर्मित नहीं हुआ तो वे १६ अगस्त से पुनः अनशन पर जाएँगे।

लोकपाल मसौदा समिति[संपादित करें]

अप्रैल में किए गए अन्ना हजारे के अनशन की समाप्ति की शर्तों के अनुरूप सरकार ने १० सदस्यीय लोकपाल मसौदा निर्माण समिति के निर्माण की घोषणा की। इसमें सरकार के ५ एवं नागरिक समाज के ५ प्रतिनिधि रखे गए। अन्ना हजारे ने सरकार के संवैधानिक प्रावधानों की बाध्यता वाले तर्क का विरोध न करते हुए किसी मंत्री को समिति का अध्यक्ष होना स्वीकार कर लिया। किंतु कपिल सिब्बल के नेतृत्व वाली इस समिति के मंत्रियों ने अपनी मनमानी की। प्रधानमंत्री और न्यायाधीशों को लोकपाल के दायरे में लाने के मुद्दे पर नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच विरोध बना रहा। कपिल सिब्बल ने कहा कि भविष्य में क़ानून बनाने के लिए नागरिक समाज की राय नहीं ली जाएगी।[1] अंततः मंत्रियों ने अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल के सभी महत्वपूर्ण सुझावों को मानने से इनकार कर दिया। दिखावे के लिए जन लोकपाल के वे सभी बिंदु मान लिए गए जो सरकारी मंत्रियों और सांसदों, एवं न्यायधिशों को लोकपाल की पहुँच से बाहर रखते थे। अंततः सरकारी मंत्रियों के रवैये से निराश अन्ना हजारे के साथियों ने जन लोकपाल का मसौदा अलग से निर्मित किया। और इस तरह समिति ने दो मसौदे का निर्माण किया जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखा गया। वहाँ भी मंत्रियों के मसौदे को तो पूर्णतः प्रस्तुत किया गया किंतु जन लोकपाल का सारांश रखा गया। और अपेक्षा के अनुरूप मंत्रिमंडल ने मंत्रियों के मसौदे को अपनाकर संसद में पेश करने के लिए सहमति दे दी।

संसद में प्रस्तुत लोकपाल विधेयक[संपादित करें]

४ अगस्त २०११ को संसद में लोकपाल विधेयक प्रस्तुत किया गया। सरकार के लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री को उनके कार्यकाल के दौरान इसके दायरे से बाहर रखा गया था। लेकिन सभी भूतपूर्व प्रधानमंत्री इसके दायरे में रखे गए थे। इसके अनुसार लोकपाल एक समिती होगी जिसके अध्यक्ष वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायधीश होंगे। इसमें आठ सदस्य होंगे जिसमें से चार क़ानून को जानने वाले एवं अनुभवी लोग होंगे। इसमें जांच की समय सीमा सात साल रखी गई थी।[2]

अगस्त २०११ अनशन[संपादित करें]

भारत का ६५ वाँ स्वाधीनता दिवस समारोह अन्ना हजारे द्वारा अप्रैल के अनशन की समाप्ति की इस घोषणा की छाया में हुआ कि यदि १५ अगस्त तक सरकार ने लोकपाल विधेयक पास नहीं कराया तो वे पुनः अनशन करेंगें। १५ अगस्त से कई दिन पूर्व ही यह स्पष्ट हो चुका था कि १६ अगस्त से घोषित अनशन जरूर होगा। सरकार ने इसे रोकने की हर तरह की कोशिश आरंभ कर दी। दिल्ली पुलिस ने १ अगस्त तक जंतर मंतर पर अनशन की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके पश्चात अन्ना हजारे ने चार अन्य स्थान सुझाकर वहाँ अनशन करने की अनुमति माँगी किंतु वह भी नहीं दी गई। अंततः १३ अगस्त को अन्ना हजारे ने घोषणा की कि यदि उन्हें अनशन की इजाजत नहीं दी गई तो वे जेल भरो आंदोलन शुरु करेंगे। साथ ही उन्होंने पानी भी त्याग देने की घोषणा की। दिल्ली पुलिस ने जेपी पार्क में अनशन करने की अनुमति २२ प्रतिबंधों के साथ दी। अन्ना हजारे ने इनमें से ६ शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। इनमें प्रदर्शनकारियों की संख्या ५००० तक सीमित रखने, अनशन ३ दिन तक ही करने, अनशन स्थल पर लाउडस्पीकर का प्रयोग न करने, टेंट न लगाने आदि की शर्तें शामिल थीं।[3]

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत के ६५ वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए एक तरफ तो भ्रष्टाचार को समाप्त करने की इच्छा जताई मगर साथ ही उसके लिए किसी भी तरह के प्रदर्शन को असंवैधानिक करार दिया। अन्ना हजारे सारा दिन राजघाट पर चिंतन करते रहे और शाम को अनशन के जारी रखने की घोषणा की। 'उन्होंने कहा, "हम सुबह अनशन के लिए जेपी पार्क जाएँगे. हमें पता चला है कि वहाँ धारा १४४ लगी है पर अगर हमें वहाँ जाने से मना किया तो हम उसी जगह बैठ जाएँगे कि ले चलो जहाँ चलना है। प्रशासन उन्हें जहाँ भी ले जाए उनका अनशन वहीं होगा, "हम जेल में अनशन पर बैठेंगे, वहाँ ले गए और अगर फिर छोड़ दिया तो वापस जेपी पार्क पर आकर बैठ जाएँगे।"[4]

१६ अगस्त भारतीय सत्ता और जनता की शक्ति की परीक्षा का दिन था। पुलिस ने अनशन से निबटने की पूरी तैयारी कर रखी थी। अनशन शुरु करने के लिए तैयार होते हुए अन्ना एवं उनके साथियों को पुलिस ने दिल्ली के मयूर विहार स्थित सुप्रीम इन्क्लेव से करीब साढ़े सात बजे अनशन शुरु करने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया।[5] पुलिस ने वहां मौजूद लोगों को बताया कि वो अन्‍ना को अनशन स्‍थल ले जा रहे हैं। उन्होंने जीवन अनमोल अस्पताल के पास मीडिया और अन्‍ना समर्थकों को आगे बढ़ने से रोक दिया। गिरफतार कर दिल्ली के सिविल लाइन्स पुलिस मेस ले जाये जाने के फौरन बाद उन्होंने वहीं अपना उपवास आरंभ कर दिया और पानी लेने से भी इनकार कर दिया।[6] दिल्ली की एक विशेष अदालत में आगे आंदोलन न करने और अपने समर्थकों को आंदोलन करने के लिए न कहने जैसी शर्तों वाले निजी मुचलका न देने के बाद अदालत ने अन्ना हज़ारे और उनके सहयोगियों को सात दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस ने उन्हें तथा अन्य कार्यकर्ताओं को तिहाड़ जेल भेज दिया।

देशव्यापी प्रदर्शन[संपादित करें]

अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में जम्मू से कर्नाटक तक और कोलकाता से जयपुर तक सैकड़ों लोगों ने सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन और जेल भरो आंदोलन शुरू हो गया। केवल दिल्ली में ही 3 हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया। दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के 12 स्टेडियमों को जेल में तब्दील कर दिया।[7] महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले में स्थित अन्ना हज़ारे के गाँव रालेगण सिद्धि में उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर पहुँचते ही गाँव निवासी अपने जानवरों सहित सड़क पर आ गए और रास्ता रोक दिया। दुकानें और स्कूल बंद रहे तथा सैंकड़ों लोगों ने उपवास आरंभ गर दिया। देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई के आज़ाद मैदान में बडी़ संख्या में लोगों ने एकत्रित होकर जनलोकपाल बिल का समर्थन और अन्ना हज़ारे की गिरफ़्तारी का विरोध किया। पुणे और नासिक में 'मी अन्ना हज़ारे' यानी मैं अन्ना हज़ारे लिखी हुई गाँधी टोपियाँ पहने लोगों ने मोर्चा निकाला। पटना में गाँधी मैदान के पास कारगिल चौक से लेकर डाकबंगला चौराहा और बेली रोड तक अलग-अलग जत्थों में लोग सड़कों पर निकले। जिनमें रोष था किंतु वे हिंसा या तोड़फोड़ जैसी कार्रवाई नहीं कर रहे थे। उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं ने हड़ताल कर दिया। जयपुर में अन्ना के समर्थन में उद्योग मैदान में तीन दिनों का क्रमिक अनशन करने का निर्णय लिया। चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा में विभिन्न स्थानों पर वकीलों, शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं ने रैलियाँ निकाली। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए।

हैदराबाद में दो जगहों पर बड़े प्रदर्शन हुए। इंदिरा पार्क में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और सौ लोग अनशन पर बैठे। दूसरी तरफ तेलुगु देशम पार्टी ने एक रैली निकाली और अपने नेता चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व ने दिन भर का अनशन किया। विजयवाड़ा, वारंगल, तिरुपति और विशाखापट्टनम आदि में भी अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन हुए। तमिलनाडु के चेन्नई, कोयबंटूर और मदुराई सहित कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। केरल और कर्नाटक में भी बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरे।[8] शाम को दिल्ली के इंडिया गेट और छत्रसाल स्टेडियम में सैकड़ों लोगों ने इकट्ठा होकर मोमबत्तियाँ जलाकर विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन १७ अगस्त को भी तिहाड़ जेल में बंद अन्ना हजारे के समर्थन में जारी रहा। मुंबई में ५ बड़ी रैलियाँ निकाली गई। पटना में जुनियर डॉक्टरों ने हड़ताल किया। भोपाल में स्कूली बच्चों, छात्रों और प्राध्यापकों, वकीलों एवं कई सरकारी कर्मचारियों ने प्रदर्शन में भाग लिया। दिल्ली में छत्रसाल स्टेडियम प्रदर्शन कारियों का कारागार बना रहा। अंदर और बाहर हजारों लोग जमा थे जिन्होंने अन्ना की ही तरह रिहा होने से इनकार कर दिया। शाम चार बजे हजारों लोगों ने स्वतः ही इंडिया गेट पहुँचकर जंतर-मंतर की ओर मार्च शुरू कर दिया।[9]

तिहाड़ जेल में[संपादित करें]

अन्ना को मिल रहे देशव्यापी समर्थन के दबाब में सरकार ने उन्हें मुक्त करने का फैसला किया। १६ अगस्त की ही शाम साढ़े सात बजे तक दिल्ली पुलिस ने विशेष अदालत से अन्ना की रिहाई के लिए आवेदन किया जिसे मान लिया गया। लेकिन ने अन्ना ने रिहाइ के बाद अपने गाँव लौट जाने या दिल्ली में तीन दिन अनशन कर लेने की शर्त के साथ रिहा होने से इनकार कर दिया और तिहाड़ में ही रात बिताई। जेल के कई कैदियों ने उनके समर्थन में भोजन लेने से इनकार कर दिया। जेल के बाहर हजारों लोगों का हुजूम उनका समर्थन करने के लिए डटा रहा। अन्ना ने बिना शर्त प्रदर्शन करने की अनुमति मिलने तक तिहाड़ जेल में ही अनशन जारी रखने का फैसला किया। १७ अगस्त को दिन भर दिल्ली पुलिस अन्ना को तिहाड़ से बाहर करने के लिए माथा-पच्ची करती रही। उसने अन्ना तथा उनके रिहा साथियों किरण वेदी तथा उनके समर्थन में पहुँचे लोगों मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, आदि से भी बात की। शाम तक दिल्ली पुलिस ने उन्हें अनशन के लिए रामलीला मैदान का प्रस्ताव दिया जिसे अन्ना ने स्वीकार कर लिया। मगर उन्होंने दिल्ली पुलिस के ३ दिन का प्रदर्शन करने की शर्त को मानने से इनकार कर दिया। उन्हें बीमार बताकर तिहाड़ से बाहर करने के लिए बुलाए गए एंबुलेंस को अन्ना समर्थकों ने जेल तक पहुँचने ही नहीं दिया। दिल्ली पुलिस ने लोगों पर बल-प्रयोग का साहस नहीं किया। १७ अगस्त की रात भी तिहाड़ ही आंदोलन की धूरी बना रहा। अन्ना कम-से-कम ३० दिनों तक अनशन से कम पर राजी नहीं थे। देर रात को दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने किरन बेदी, प्रशांत भूषण, मनीष सिसौदिया और अरविंद केज़रीवाल वाली अन्ना टीम के साथ बैठक की।[9] तीन दिन तिहाड़ जेल में गुजारने के बाद जब अन्ना हजारे पौने 12 बजे बाहर निकले तो जोश से भरे हुए दिखे। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय के नारे के साथ अपने समर्थकों का जोश बढ़ाया। अन्ना ने समर्थकों को सम्बोधित करते हुए कहा

"1947 में अधूरी आजादी मिली। 1947 में मिली आजादी के लिए 1942 में आंदोलन शुरू हुआ था और अब 16 अगस्त से दूसरी आजादी की लड़ाई शुरू हो गई हैं जिसे आपको अंजाम तक पहुंचाना है। अन्ना रहे या न रहे लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ यह मशाल जलती रहनी चाहिए। जेल के बाहर 4 दिनों से बैठे आप लोगों को मैं धन्यवाद देता हूं और बच्चे, बूढ़े और युवाओं से अपील करता हूं कि वे अधिक से अधिक संख्या में रामलीला मैदान पहुंचे। कोई तोड़फोड़ और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाएं और ट्रैफिक का पूरा ध्यान रखें। वह अब उनसे रामलीला मैदान पर ही बात करेंगे। "

समर्थकों को संदेश देने के बाद अन्ना हजारे जुलूस के साथ मायापुरी की ओर रवाना हो गए। खुले ट्रक में अन्ना के जुलूस के साथ- साथ हजारों लोगों की भीड़ हाथ में तिरंगा लिए उनके साथ पैदल मार्च कर रही थी। दिल्ली की सड़कों पर ऐसा नज़ारा शायद ही पहले देखा गया हो, जब तेज बारिश में हाथ में झंडा लिए नारे लगाते हुआ जनसैलाब आगे बढ़ा। मायापुरी चौक पर पहुंचने के बाद अन्ना कार से राजघाट पहुंचे।

रामलीला मैदान पर[संपादित करें]

तिहाड़ जेल में ३ दिन बिताने के बाद रामलीला मैदान को अनशन के लिए तैयार कर दिए जाने पर अन्ना हजारे जुलूस के साथ मायापुरी और राजघाट होते हुए 18 अगस्त को दोपहर बाद सवा दो बजे वहाँ पहुंच गए। वहाँ उनके आने का सुबह से इंतजार कर रहे समर्थकों ने नारों के साथ उनका स्वागत किया।

रामलीला मैदान में मंच पर आते ही अन्ना ने भी भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद के नारों के साथ अपने समर्थकों का अभिवादन किया और उन्हें अपना संदेश दिया- "1942 में हमारे देश में एक क्रांति हुई थी, जिससे अंग्रेज चले गए थे। अंग्रेज चले गए, लेकिन भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। इसलिए अब आजादी की दूसरी लड़ाई की शुरुआत हो गई है। देश के सभी लोगों ने मेरे भाई, मेरी बहन, युवा - युवतियों ने यह जो मशाल जलाई है, इस मशाल को कभी बुझने नहीं देना। चाहे अन्ना हजारे रहे न रहे मशाल जलती रहेगी। अभी एक लोकपाल नहीं इस देश में पूरा परिवर्तन लाना है। देश के गरीब महकमे को हम कैसे महल दे सकेंगे यह सोचना है। क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। मैं आज ज्यादा कुछ नहीं बोलूंगा क्योंकि पिछले तीन दिनों में मेरा वजन 3 किलो कम हो गया है, लेकिन आप लोग जो आंदोलन देश में चला रहे हैं उसकी ऊर्जा मुझे मिल रही है। '

कई देशों को युवकों ने बनाया है, मुझे पूरा विश्वास है इस देश का युवा जग चुका है और अब इस देश का भविष्य उज्ज्वल है। इन गद्दारों ने देश को लूटा है अब हम भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे। अपनी आजादी को हम हरगिज भुला सकते नहीं। सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं। मैं खुश हूं कि कोई तोड़फोड़ नहीं हुई और न ही राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा। अब मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन मैं आपसे फिर बात करूंगा। "

२१ अगस्त को इस आंदोलन को नई दिशा मिली। रामलीला मैदान में समर्थकों को संबोधित करते हुए अन्ना हजारे ने कहा

"वैसे तो इस रामलीला मैदान में वर्षो से रावण जलता आ रहा है, मगर इस बार भ्रष्टाचार का रावण जलेगा। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के समाधान के बाद ही उनकी लड़ाई रुकेगी। मुझे किसी का डर नहीं है। क्योंकि मेरे पास न तो कोई बैंक बैलेंस और न ही कोई संपत्ति है। मंदिर के छह गुणा आठ मीटर के कमरे में रहता हूं।" उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वे अपने क्षेत्र के सांसदों के घरों पर जाएं और उनकी सद्बुद्धि के लिए धरना दें। लोग बापू का प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम गाएं और सांसदों से पूछें कि लोकपाल पर उनकी राय क्या है। वे सरकारी लोकपाल के साथ हैं या जन लोकपाल के। क्योंकि आप लोगों ने उन्हें वोट दिया है। यह आपका अधिकार है।[10]

अरविंद केजरीवाल ने जानना चाहा कि प्रधानमंत्री बताएं कि सरकार से किस जगह और कहां बात करनी है। उन्होंने अन्ना की बात में आगे और जोड़ा कि लोग सांसदों के अलावा दिल्ली में मंत्रियों और विधायकों के घरों के बाहर भी जाएं और धरना दें तथा उन लोगों से भी पूछें कि उनकी राय क्या है।

२२ अगस्त को सुबह से शाम तक लोगों का सांसदों और मंत्रियों के घरों के सामने जाकर प्रदर्शन करने का सिलसिला जारी रहा। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के घर के सामने प्रदर्शन करने पर पुलिस ने 50 लोगों को हिरासत में भी लिया।[11] इस आंदोलन को आगे बढ़ाने और खर्चों के लिए पैसा जुटाने के लिए रामलीला मैदान में बनाए गए दान शिविर पर भी लोगों की लंबी कतार लगी रही। बच्चे हों या बुजुर्ग, अमीर हो या गरीब सभी अपने क्षमता के अनुरूप इस आंदोलन के लिए दान दे रहे थे। लोग अपने घरों से खाना बनाकर यहां अन्ना के समर्थकों को बांट रहे थे। धनी व्यापारी, जो ट्रक में भरकर खाने-पीने की चीजें बांट रहा हो या फिर एक मजदूर जो रामलीला मैदान की साफ-सफाई में जुटा हो यहां सभी अपनी मर्जी से देश के लिए अन्ना की एक पुकार पर आ रहे थे।[12]

अनशन के सातवें दिन अन्ना का वजन 5 किलो कम हो गया। उनके रक्त और मूत्र में कीटोन आने शुरू हो गए।[13] लेकिन उनका उत्साह पूर्ववत ही बना रहा। उनके स्वास्थ्य की गिरावट एवं उसके राजनैतिक प्रभाव से चिंतित सरकार ने वार्ता करने के लिए प्रणव मुखर्जी को नियुक्त किया। पहले दौर की वार्ता काफी सकारात्मक रही। अन्ना समर्थकों के तीन मुद्दों पर मतभेद था और तीन शर्तें मानी जानी थी। सरकारी वार्ताकारों ने इसके लिए अगले दिन सुबह तक का समय लिया। डॉ नरेश त्रेहान ने मंगलवार २३ अगस्त की शाम को अन्ना हज़ारे के स्वास्थ्य की जाँच करने के बाद उन्हें ड्रिप लगाने की सलाह दी थी लेकिन इसके लिए भी उन्होंने इनकार कर दिया। रात को लोगों को संबोधित करते हुए अन्ना ने कहा कि दोपहर के बाद डॉक्टरों ने कहा था कि किडनी में कुछ समस्या आ गई है और उन्हें ड्रिप के ज़रिए दवा देनी होगी। मैने डॉक्टरों से कहा था कि मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन कर बताउँगा कि मैं क्या करुँगा। मेरी अंतरात्मा कह रही है कि तू ये क्या कह रहा है कि दिल दिया है, जान भी देंगे और जान देने से डरता है।.. तो मैंने डॉक्टरों से कह दिया है कि मेरी अंतरात्मा कह रही है कि कोई दवा नहीं लेनी है। मै मर गया तो परवाह नहीं, मेरे बाद कितने अन्ना खड़े हो गए हैं। अगर उनकी किडनी को कुछ हो जाता है तो हज़ारों लोगों में से कोई न कोई उन्हें किडनी दे देगा। डॉक्टर की रिपोर्ट के बाद सरकार भी कुछ सोचने लगेगी और अगर सरकार की ओर से उन्हें ज़बरदस्ती उठाकर ले जाने के प्रयास हों तो सारे दरवाज़ों पर लोग खड़े हो जाएँ और मुझे ले जाने न देना।"[14] रात भर में ही सरकार का रुख पूरी तरह बदल गया और २४ अगस्त को वह कल हुई सहमति से पीछे हट गई। उसने जन लोकपाल विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने से इनकार कर दिया और अन्ना के अनशन को उनकी समस्या बताया। अन्ना को जबर्दस्ती अनशन स्थल से उठाने की संभावना भी बढ़ गई। २४ अगस्त बुधवार की शाम को समर्थकों को संबोधित करते हुए अन्ना हज़ारे ने कहा-

"हिंसा मत करो..मुझसे हिंसा सहन नहीं होगी। अगर मैं जेल जाऊं तो आप लोग सांसदों के घर पर विरोध जताओ। राष्ट्रीय संपत्ति का कोई नुकसान मत करना। अगर पुलिस आती है तो मैं ख़ुशी से जेल जाऊंगा. और कल से सबको जेल भरो आंदोलन करना है। देश को अहिंसा के मार्ग से बचाना है। ये आज़ादी की दूसरी लड़ाई है। सरकार का रवैया लोकशाही वाला ना होकर हुक्मशाही का है। ये लोकशाही के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है लेकिन मेरी विनती है कि अगर सरकार मुझे यहां से उठाए तो उसे कोई रोके नहीं। अब मुझे सरकार की चाल समझ आ गई है। सरकार चाहती है कि आंदोलन को तोड़ने के लिए आप लोग हिंसा करें। इसलिए हम सभी को संयम रखना है।"[15] २५ अगस्त को अनशन के 10वें दिन रामलीला मैदान में अन्ना हजारे ने कहा कि "मेरा वजन सिर्फ 6.5 किलोग्राम कम हुआ है। बाकी मेरी तबीयत ठीक है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं जन लोकपाल विधेयक पारित होने तक नहीं मरूंगा। मुझे आपसे काफी ऊर्जा मिल रही है।"[16]

अन्ना हजारे के समर्थन में लगातार दसवें दिन देश भर में प्रदर्शन जारी रहा। लगातार दूसरे दिन लोगों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया। उनमें से 50 को हिरासत में ले लिया गया। अहिंसात्मक प्रदर्शनों से घबराई सरकार की सुरक्षा के नाम पर पर दिल्ली पुलिस ने प्रधानमंत्री आवास के नजदीक के चार मेट्रो स्टेशनों- हुडा सिटी सेंटर और जहांगीरपुरी के बीच स्थित उद्योग भवन, रेस कोर्स और जोर बाग तथा केंद्रीय सचिवालय से बदरपुर मार्ग पर खान मार्केट मेट्रो स्टेशन को दोपहर तीन बजे से बंद करवा दिया।[16]

अन्ना हजारे के प्रतिनिधियों और सरकार के साथ बातचीत में २४ अगस्त को पैदा हुए गतिरोध को शांत करने की कोशिश करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, सरकार जन लोकपाल सहित अरुणा राय के विधेयक और सरकारी विधेयक पर सदन में चर्चा कराने के लिए तैयार है। भ्रष्टाचार के मसले पर लोकसभा में चर्चा की गई। प्रधानमंत्री नेता विपक्ष और लोकसभा अध्यक्ष सहित लोकसभा ने एक स्वर से अन्ना हजारे से अनशन खत्म करने की अपील की। इसके बाद केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीमंत्री विलासराव देशमुख ने रामलीला मैदान जाकर अन्ना हजारे को सभी पार्टियों तथा संसद की ओर से भेजा गया पत्र दिया और उनसे अनशन समाप्त करने का आग्रह किया।

जन लोकपाल सहित अरुणा राय के विधेयक और सरकारी विधेयक पर सदन में चर्चा कराने के प्रस्ताव पर अन्ना ने कहा कि- "संसद में जन लोकपाल विधेयक पर चर्चा शुरू हो तो हम अपना अनशन तोड़ने पर विचार करेंगे। लेकिन हमारी तीन मुख्य मांगे हैं। राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, निचले स्तर के अधिकारियों को भी लोकपाल के दायरे में लाना और नागरिक चार्टर बनाना। यह तीनों गरीबों के लिए हैं। इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जब तक सहमति नहीं बनती है तब तक उनका अनशन जारी रहेगा।

प्रधानमंत्री और पूरी संसद द्वारा अपने स्वास्थ्य पर चिंता जताए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना हजारे ने कहा कि "इसके लिए हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। लेकिन मेरे स्वास्थ्य की चिंता आज उन्हें हुई। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता है उन्हें तो वह 10 दिनों से कहां थे। दरअसल, चिंता उन लोगों को है जो यहां आए हुए हैं। एयर कंडीशन में बैठने वालों को अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता नहीं है।"[17] अन्ना ने विलासराव को दिए गए पत्र में प्रधानमंत्री को लिखा कि- "हमारे मन में हमारी संसद के प्रति अपार सम्मान है, हमारी संसद हमारे जनतंत्र का पवित्र मंदिर है। मैं अनशन पर अपने किसी स्वार्थ के लिए नहीं बैठा, जिस तरह से आप लोग देश की भलाई के लिए काम कर रहे हैं उसी तरह से मैं भी देश के लोगों के बारे में ही सोचता रहता हूँ। मेरे पास किसी प्रकार की कोई सत्ता नहीं है। मैं एक बहुत सामान्य आदमी हूँ और समाज व ग़रीब जनता के लिए कुछ करने की भावना रखता हूँ। हमारा आंदोलन किसी व्यक्ति या पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं है। हम भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हैं। हम भ्रष्ट व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं। यदि हमारे आंदोलन के दौरान मेरे अथवा मेरे किसी साथी के द्वारा कुछ ऐसे शब्द कहे गए किए गए हों जिससे आपको या किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँची हो तो मैं हम सबकी तरफ़ से दिलगीर व्यक्त करता हूँ। किसी को आहत करना हमारा मक़सद नहीं है।

हर राज्य में इसी क़ानून के ज़रिए लोकायुक्त भी बनाए जाएँ, हर विभाग में जन समस्याओं के लिए सिटिज़न्स चार्टर बनाए जाए जिसे न मानने पर संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई हो और तीसरा ये कि केंद्र सरकार के ऊपर से नीचे तक सभी कर्मचारियों और राज्य के सभी कर्मचारियों को इसके दायरे में लाया जाए। क्या इन तीन बातों पर संसद में प्रस्ताव लाया जा सकता है? मुझे उम्मीद ही नहीं यक़ीन है कि हमारे सभी सांसद देश की जनता को भ्रष्टाचार के रोज़-रोज़ के ज़िल्लत से निजात दिलाने के लिए शुरु में राज़ी हो जाएंगे. मेरी अंतरात्मा कहती है कि इन बातों पर अगर संसद में सहमति होती है तो मैं अपना अनशन तोड़ दूँ।"

जनलोकपाल बिल की बाक़ी बातें, जैसे चयन प्रक्रिया आदि भी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मैं मेरी जनता के साथ तब तक रामलीला मैदान में बैठा रहूँगा जब तक बाक़ी सारे मुद्दों पर संसद में निर्णय नहीं हो जाता क्योंकि यही जनता की आवाज़ है। मेरे साथ देश भर में इतने लोग इस उम्मीद से जुड़े हैं कि उन्हें भ्रष्टाचार से निजात मिलेगी। इसके लिए जरूरी है कि राज्यों में भी लोकायुक्त के गठन के लिए कानून पास हो। आम लोगों को रोजाना जिन अधिकारियों के भ्रष्टाचार से दो-चार होना पड़ता है, उनके भ्रष्टाचार से लड़ने की व्यवस्था हो। इसी तरह सभी सरकारी सेवाओं के लिए समयसीमा तय हो और उन्हें समय पर पूरा नहीं करने वाले अधिकारी पर जुर्माना लगे।

अन्ना हज़ारे[18] प्रधानमंत्री आवास में अन्ना की इस चिट्ठी पर विचार-विमर्श भी किया गया किंतु अगले दिन सरकार का रवैया पहले जैसा ही बना रहा।। इसके साथ ही सरकार ने विज्ञापनों एवं अन्य साधनों से संचार माध्यमों का एक वर्ग तैयार कर लिया था जो अब उनके पक्ष को ठीक ठहराने की कोशीश कर रही थी। कई संचार माध्यम अन्ना टीम के बीच फूट, प्रदर्शकों के बीच लोकपाल की कम समझदारी आदी विषय उठाने लगे थे। इसके बावजूद यह आंदोलन निरंतर जारी था और सरकार पर दबाव बढ़ रहा था। संसद की कार्यवाई का सीधा प्रसारण देखकर एवं नेताओं के बयान और चेहरे देखकर जनता अन्ना के साथ रहने के निर्णय पर अटल थी।

26 अगस्त को ११ दिनों तक चुप रहने के बाद लोकसभा में कांग्रेस के भावी कर्णधार माने जाने वाले राहुल गांधी ने कहा कि- "लोकतंत्र की गरिमा को कम करना एक ख़तरनाक चलन है। व्यक्तिगत रूप से कई लोगों ने देश को महत्वपूर्ण योगदान दिया है लेकिन ये समझना ज़रूरी है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अपना महत्व है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया लंबी ज़रूर होती है पर इससे सभी को अपना विचार रखने का मौका मिलता है।..पिछले दिनों में ये समझ बनाई जा रही है कि एक लोकपाल क़ानून आने से भ्रष्टाचार से निजात मिल जाएगी लेकिन ये ग़लत है, सिर्फ़ एक लोकपाल क़ानून लाने से भ्रष्टाचार नहीं ख़त्म होगा, बल्कि इसके लिए कई और चुनौतियों के हल ढूंढ़ने होंगे"[19] इसकी प्रतिक्रिया में किरण बेदी ने ट्विटर पर लिखा कि, "ऐसा हो सकता है कि एक लोकपाल काफ़ी ना हो, पर शुरुआत तो करिए।"[19] राहुल गांधी के बयान से आक्रोशित अन्ना हजारे के समर्थकों ने शुक्रवार को  उनके तुगलक रोड स्थित आवास के बाहर प्रदर्शन किया और जमकर नारेबाजी की। पुलिस ने अन्ना के 50 समर्थकों को हिरासत में ले लिया। राहुल गांधी ने अपने घर के बाहर प्रदर्शन कर रहे अन्‍ना समर्थकों के लिए कोल्‍ड ड्रिंक्स और समोसे भिजवाए।

27 अगस्त को सरकार ने संसद में अन्ना की प्रमुख तीन मांगों पर बहस कराई।। रात ८ बजे तक संसद के दोनों सदनों ने ध्वनिमत से इन शर्तों के पक्ष में विचार करने के लिए उसे स्थाई समिति के पास भेजने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

संसद के दोनों सदनों में शनिवार को लोकपाल मुद्दे पर अन्ना हजारे की मांगों के अनुरूप लाए गए प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बनने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पत्र लेकर केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री विलासराव देशमुख, सांसद संदीप दीक्षित और पूर्व केंद्रीय मंत्री विलास मुत्तेमवार ने अन्ना को रामलीला मैदान पहुँचकर दिया। इसके बाद अन्ना हजारे ने समर्थकों को सम्बोधित करते हुए कहा, "जन लोकपाल की यह आधी जीत हुई है। पूरी जीत अभी बाकी है। यह पूरे युवा शक्ति की जीत है। यह जनता की जीत है। यह सामाजिक संगठन की जीत है। यह मीडिया की जीत है।"  कल सबेरे 10 बजे आप सभी की उपस्थिति में मैं अपना अनशन खत्म करना चाहता हूं, वह भी आपकी अनुमति से। आप जश्न जरूर मनाएं लेकिन ध्यान रखें कि इससे शांति भंग न हो और किसी को परेशानी न हो।

अन्ना ने 28 अगस्त को सुंदरनगरी की दलित समुदाय की पांच वर्षीय बच्ची सिमरन और तुर्कमान गेट की रहने वाली मुस्लिम समुदाय की इकरा के हाथों शहद मिश्रित नारियल पानी पीकर अनशन समाप्त किया। अन्ना के अनशन स्थगित करने से पहले उनके प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने अपने लंबे वक्तव्य में मंच से लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि वो सभी राजनीतिक दलों का धन्यवाद करते हैं और साथ ही लोगों का भी जिनके सड़कों पर आने के कारण सरकार पर दबाव बना। पार्टियों के सहयोग के बिना ये प्रस्ताव पारित नहीं होता. हम उनका धन्यवाद करते हैं।...संविधान लोगों ने बनाया है और सबसे ऊपर लोग हैं जिसके बाद संविधान, संसद और सांसद आते हैं। संसद में क़ानून जनता की इच्छा के अनुसार बने। अन्ना या अन्ना का आंदोलन संविधान के ख़िलाफ़ नहीं है जैसा कि टीम के बारे में प्रचारित किया जा रहा है।[20] अनशन तोड़ने के बाद अन्ना ने आंदोलन को सफल बनाने में देश की जनता, खासतौर से युवाओं, मीडिया, पुलिस और उनकी देख-रेख में लगे चिकित्सकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि- "उन्होंने अपना अनशन सिर्फ स्थगित किया है लेकिन उनकी लड़ाई जारी रहेगी। असली अनशन पूरी लड़ाई जीतने के बाद टूटेगा। लड़ाई पूरी होने तक पूरे देश में घूमूंगा। उन्हें विश्वास है कि उनके माध्यम से सामने लाए गए जनता के मुद्दों से संसद इंकार नहीं करेगी। लेकिन यदि संसद ने इंकार कर दिया, तो जन संसद को तैयार रहना होगा। आज यह बात साबित हो गई है कि जन संसद, दिल्ली की संसद से बड़ी है। जन संसद जो चाहेगी, दिल्ली की संसद को उसे मानना होगा। हमें बाबा साहेब अम्बेडकर के बनाए संविधान के तहत इस देश में परिवर्तन लाना है। आज यह साबित हो गया है कि परिवर्तन लाया जा सकता है। हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं। अभी यह शुरुआत है। लम्बी लड़ाई आगे है। किसानों का सवाल है, मजदूरों का सवाल है। पर्यावरण, पानी, तेल जैसे तमाम मुद्दे हैं। गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल है। हमें चुनाव सुधार भी करने हैं। पूरी व्यवस्था बदलनी है। हमारा असली अनशन इस पूरे बदलाव के बाद ही टूटेगा। आज देश में इतना बड़ा आंदोलन हुआ, लेकिन पूरी तरह अहिंसक। दुनिया के सामने आप सभी ने मिसाल रखी है कि आंदोलन कैसे करना चाहिए। इस आंदोलन की यह सबसे महत्वपूर्ण बात रही है।[21]

सरकार से वार्ता[संपादित करें]

२२ अगस्त को प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी व गृह मंत्री पी. चिदंबरम से चर्चा के बाद सरकार ने प्रणव मुखर्जी को वार्ताकार नियुक्त किया और अन्ना को पत्र लिखकर इस सरकारी पहल की जानकारी दी। इसके बाद केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल और अखिल गोगोई की कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित के आवास पर मुलाकात हुई। इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार वार्ता के लिए तैयार हो गई है। इसके लिए प्रणव मुखर्जी को नियुक्त किया गया है।

२३ अगस्त की रात को पहले दौर की वार्ता में सरकार की ओर से मुखर्जी व सलमान खुर्शीद ने भाग लिया। नागरिक समाज की ओर से किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल व प्रशांत भूषण शामिल हुए। सरकार ने वार्ता को संतोषजनक बताया। सरकार ने अन्ना की सेहत पर चिंता जताई औऱ कहा कि बुधवार सुबह फिर वार्ता की जाएगी। अन्ना दल के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार और हमारे बीच तीन मुद्दों पर असहमति है। सरकार ने इन पर विचार के लिए बुधवार सुबह तक का समय मांगा है। प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार ने अन्ना से अनशन तोड़ने की भी अपील की है। लेकिन आज जो बातचीत हुई उसमें ऎसा कुछ नहीं निकला कि हम अन्नाजी से अनशन तोड़ने को कहें।[22]

वार्ता में सरकार कुछ मुद्दों पर सहमत हो गई थी।

  • प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में।
  • न्यायपालिका के लिए अलग कानून।
  • सीबीआई का एंटी करप्शन सेल लोकपाल के अधीन काम करेगा।

किंतु अभी कई विषयों पर सहमती नहीं बन पाई थी।

  • जूनियर कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर।
  • राज्यों में एक साथ लोकायुक्त की नियुक्ति।
  • हर काम की अवधि तय करना, न होने पर अफसर का वेतन काटे।

इसके साथ ही अन्ना के सहयोगी कुछ शर्तों पर सरकार की मंजूरी भी चाहते थे।

  • स्थाई समिति के पास नहीं, सीधा संसद में पेश हो जन लोकपाल बिल।
  • सरकारी बिल स्थायी समिति से वापस लिया जाए या रद्द हो।
  • यूपीए व कांग्रेस लिखित में दे, सदन में समर्थन का आश्वासन।
  • जन लोकपाल बिल इसी सत्र में पारित हो, जरूरत हो तो सत्र आगे बढ़े।

सुबह अन्ना के सहयोगियों के साथ पुनः वार्ता को ध्यान में रखकर देर रात प्रधानमंत्री ने अन्ना मसले को लेकर आपात बैठक बुलाई और वरिष्ठ मंत्रियों के साथ चर्चा की। इसके तुरंत बाद कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक भी हुई। मगर इन सारी कवायदों का परिणाम २४ अगस्त को अपेक्षा के उल्टे रूप में सामने आया। सरकार का रुख बिल्कुल बदल गया था। प्रणब मुखर्जी के साथ बातचीत के बाद प्रशांत भूषण ने कहा कि मंगलवार को हुई वार्ताओं में सरकार का रुख़ काफ़ी सकारात्मक था लेकिन बुधवार को सब कुछ बदला-बदला सा नज़र आया। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वो जन लोकपाल बिल को पेश नहीं करेगी। [15] किरन बेदी ने कहा कि प्रणब मुखर्जी बुधवार को बैठक शुरू होते ही ग़ुस्से में दिखे और वो कह रहे थे कि जो आपको करना करते रहो। अन्ना के अनशन के बारे में सरकार ने कहा कि वो उनकी यानि नागरिक समाज और अन्ना हज़ारे की समस्या है। ये एक दिन और रात में सरकारी रवैये में फ़र्क क्यों आया, मुझे नहीं मालूम। मंगलवार को वो हमारी बातें सुन रहे थे, आज वो अपनी बातें सुना रहे थे। कल वो हमारी बातों की इज़्ज़त कर रहे थे। कल और आज में दिन-रात का फ़र्क आया है।"[23]

इस गतिरोध के पश्चात २५ अगस्त को प्रधानमंत्री ने विलासराव देशमुख को पत्र देकर अन्ना के पास भेजा। अन्ना ने तीन बातों के स्वीकृत होने पर अनशन छोड़ने का आश्वासन दिया। २७ अगस्त को संसद की कार्यवा के साथ ही अन्ना के सहयोगियों से भी लगातार बार्ता चल रही थी। मगर सरकार अपना रुख स्पष्ट नहीं कर रही थी। अंततः शाम तक इन वार्ताओं का परिणाम अन्ना की तीन मांगों पर संसद के समर्थन के प्रस्ताव के रूप में आया। जिसकी सूचना देने के लिए फिर से विलास राव देशमुख प्रधानमंत्री का पत्र लेकर रामलीला मैदान आए। जिसके पश्चात अन्ना ने २८ अगस्त को अनशन स्थगित करने की घोषणा की।

अनशन के पश्चात[संपादित करें]

13 दिनों तक चले अनशन के कारण अन्ना के वजन में साढ़े सात किलो की कमी आ गई थी। उनका रक्त चाप काफी कम हो गया था। 13 दिनों से अन्ना के स्वास्थ्य की लगातार जाँच करने वाले डॉक्टर त्रेहान ने बताया कि अन्ना के शरीर में पानी की कमी हो गई है और वे काफ़ी कमज़ोर हो गए हैं। उनके स्वास्थ्य पर नज़र रखने के लिए उन्हें कुछ दिनों के लिए गुड़गांव के एक अस्पताल में भर्ती कर लिया गया।

२७ अगस्त को संसद में अन्ना की मांगों पर सहमति बनने और २८ अगस्त को अन्ना द्वारा अनशन समाप्त करने की घोषणा के साथ ही पूरा देश जश्न में डूब गया। राजधानी दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, पटना, रांची, लखनऊ, बेंगलुरू, शिमला, जयपुर, रायपुर, गांधीनगर सहित पूरे देश में दीवाली जैसा माहौल बन गया। दिल्ली में अन्ना हजारे समर्थक अपनी खुशी का इजहार करने के लिए तिरंगा लहराते और नारे लगाते हुए इंडिया गेट पहुंचे। लोग देशभक्ति के गीतों पर झूमते नजर आए। कई व्यक्ति कारों से निकलकर जुलूस में शामिल हो गए। राजधानी रायपुर सहित छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़ में भी अन्ना हजारे समर्थकों ने पटाखे जलाए और विजय के उपलक्ष्य में नारे लगाए। पटना के विभिन्न मोहल्लों में लोगों ने पटाखे छोड़े तो कई लोगों ने मिठाइयां बांटी। कारगिल चौक पर पिछले 12 दिनों से अन्ना के समर्थन में धरना और अनशन पर बैठे लोग शनिवार देर शाम जश्न मनाने में मशगूल हो गए। कई लोगों ने मंदिर में जाकर भगवान का शुक्रिया अदा किया और अन्ना हजारे के स्वास्थ्य का ध्यान रखने की प्रार्थना की। पटना के साथ ही राज्य के दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर सहित कई जिलों में इस जनता की जीत का जस्न मनाया गया।[24]

यह वास्तव में केवल नैतिक जीत थी। इतिहास जरूर बना था किंतु कागजों पर किसी ठोस चीज का निकलकर आना अभी बाकी था। हाँ इसने उसके लिए रास्ता जरूर बना दिया था। अन्ना के तीन शर्तों के समर्थन का प्रस्ताव संसद ने स्थाई समिति को भेज दिया था जिसे मानना उसके लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं था। आगे स्थायी समिति को इ सभी सुझावों का विश्लेषण करने और यह भी तय करने का अधिकार था कि वे कितने व्यावहारिक हैं। संसद ने सरकार के उस मूल तर्क को सैद्धांतिक रूप से कायम रखा था कि क़ानून बनाने में संसद की भूमिका सर्वोपरि है और उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

संसद में दिन भर चली बहस के बाद डीएमके, बहुजन समाज पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और बीजू जनता दल ने यह साफ़ कर दिया था कि लोकायुक्त की नियुक्ति में संसद की भूमिका नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। इनमें से कुछ दलों ने ऐसे किसी क़दम के विरोध करने की मंशा भी साफ़ कर दी थी। निचली नौकरशाही को भी लोकपाल के अंतर्गत लाने को कांग्रेस ने स्वीकार तो कर लिया लेकिन यह भी कहा कि इसके लिए क़ानूनी और संस्थागत ढाँचे में मूलभूत परिवर्तन अभी किया जाना है।

सांसदों ने जन लोकपाल बिल की संसद के अंदर सांसद के व्यवहार को लोकपाल के कार्य क्षेत्र में लाने की धारा का दलगत भावना से ऊपर उठकर एक स्वर में विरोध किया था। कई दलों ने न्यायपालिका को भी इसके दायरे में लाने का विरोध किया था। कुछ दलों ने इसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाए जाने की वकालत की और कुछ ने मज़बूत जवाबदेही विधेयक लाने पर ज़ोर दिया था। प्रधानमंत्री को भी इसमें शामिल किए जाने के मुद्दे पर भी सरकार ने कोई वचन नहीं दिया। भाजपा समेत कई दलों ने कुछ ऐहतियात के साथ प्रधानमंत्री को भी इसमें शामिल किए जाने का जरूर समर्थन किया।

दो और महत्वपूर्ण माँगों, सीबीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाई को लोकपाल के अंतर्गत लाने और भ्रष्ट नौकरशाहों को बर्ख़ास्त किए जाने के तरीक़े पर अंतिम निर्णय भी स्थायी समिति पर छोड़ दिया गया।[25]

राजनीतिक दलों की भूमिका[संपादित करें]

इस जनांदोलन ने राजनीतिक दलों के चेहरों पर पड़े लोकहितैषी नकाब को हटाकर स्वार्थी सत्ताकांक्षी और जनविरोधी चरित्र को स्पष्ट कर दिया। विपक्षी दलों के साथ ही इसमें सबसे विकृत चेहरा केंद्र के सत्ताधारी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नजर आया। उसके वकील मंत्रियों कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम आदि ने स्वयं को शासक एवं अन्ना हजारे की टीम को गुलाम मानकर तुगलकी आदेश और बयान जारी किए।

14 अगस्त को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हज़ारे पर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप लगाते हुए कहा कि अन्ना भ्रष्ट हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस सरकार द्वारा गठित न्यायमूर्ति सावंत की रपट का संदर्भ दिया था, जिसमें अन्ना को दोषी ठहराया गया था। उन्होंने यह नहीं बताया था कि न्यायमूर्ति सावंत की रपट के बाद इस मुद्दे पर सुखतांकर आयोग ने जांच की थी और अन्ना को आरोपमुक्त कर दिया था।[26] इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, अंबिका सोनी आदि के साथ ही विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी, सीताराम येचुरी आदि का कद भी छोटा कर दिया। मनमोहन सिंह ने संसद में इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होने की चेतावनी दी। अंबिका सोनी ने इसे साफ करते हुए अमेरिका का नाम उजागर किया।

सभी नेताओं ने बार-बार संसद की सर्वोच्चता की दुहाई दी और लोगों के प्रयासों को अराजक कार्यवाई ठहराने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरु होती है जो भारत को संप्रभु, लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष बनाएंगें।

सरकारी तिकड़म[संपादित करें]

सरकार और सरकार में बैठे लोगों के हितैषियों एवं चाटुकारों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इस आन्दोलन को दबाने और तोड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।

  • दिग्विजय सिंह ने प्रश्न उठाया कि अन्ना के आन्दोलन को पैसा कहाँ से आ रहा है?
  • इस आन्दोलन के लिये दिल्ली पुलिस ने कठोर शर्तें रखीं जिन्हे स्वीकार न करने पर अन्ना को आन्दोलन की अनुमति नहीं दी

गयी।

  • दिल्ली पुलिस ने आन्दोलन करने पर १६ अगस्त को अन्ना को गिरफ्तार कर लिया।
  • मनीष तिवारी ने अन्ना को अन्ना पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप मढ़ दिये (जिसके लिये बाद में माफी मांगनी पड़ी)।
  • सरकार ने कहा कि इसके पीछे अमेरिका का हाथ है।
  • कहा गया कि कानून बनाना संसद का 'विशेषाधिकार' है और अन्ना 'ब्लैकमेलिंग' कर रहे हैं और लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं।
  • सरकार ने फूट डालने और आन्दोलन की धार कम करने के लिये इसको धर्म और जाति के आधार पर बांटने की कोशिश की। इमाम बुखारी को आगे करके कहा गया कि मुसलमान इस आंदोलन से दूर रहें। इसी तरह अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष ने भी इसे कह डाला कि इसका 'नीची जातियों' का कोई सरोकार नहीं है।
  • सिविल सोसायटी के साथ अनेकों दौरों की चर्चा में सरकारी पक्ष (कपिल सिब्बल, पी चिदम्बरम आदि) ने जनलोकपाल विधेयक के मुख्य मुद्दों को प्रस्तावित विधेयक में मिलाने से अन्त तक इनकार करते रहे।
  • सरकार ने स्थायी समिति को 'सरकारी लोकपाल बिल' सौंपकर समय कटाने का रास्ता निकाला। राहुल गांधी ने लोकायुक्त को 'संवैधानिक संस्था' बनाने का सिफूगा छोड़कर इसकी महत्ता कम करने की कोशिश की।
  • शनिवार, २६ अगस्त को बुलाये गये संसद के विशेष अधिवेशन में चर्चा के दौरान भी कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों ने कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा। सब कुछ गोल-मटोल भाषा में बोलते रहे। आम जनता को कभी नहीं जानने दिया कि अब आगे क्या करने जा रहे हैं। हर समय प्रक्रिया को अस्पष्ट रखा गया।
  • अब यह लगभग साफ हो गया है कि स्वामी अग्निवेश सरकार के गुप्त एजेन्ट की तरह से काम कर रहे थे और अन्ना के दल का आन्तरिक भेद सरकार को दे रहे थे।

रणनीतिक कौशल[संपादित करें]

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम के राष्ट्रीय जनांदोलन का रूप लेने के पीछे आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अन्ना हजारे का व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ ही एक कुशल टीम के सही और समयोचित लिए गए निर्णय भी शामिल थे। अरविंद केजरीवाल, किरण वेदी, प्रशांत भूषण आदि समर्थ लोगों की टीम ने इस आंदोलन को निरंतर सही रास्ते पर रखा और उसके पथभ्रष्ट होने की गुंजाइश समाप्त कर दी।

  • अरविंद केजरीवाल ने रामलीला मैदान में घोषणा की कि इस आंदोलन के दौरान किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता को अन्ना के मंच पर जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

हां, यदि कोई हमारे समर्थन में आता है तो उसका स्वागत है। भाजपा कार्यकर्ताओं के इसमें बढ़ - चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, तो उन्होंने कहा, ' हम किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता और नेता को मना नहीं कर रहे हैं, उनका स्वागत है। वे यहां आकर अन्य समर्थकों के बीच बैठ सकते हैं। '

  • २१ अगस्त को प्रदर्शन का रुख मंत्रियों सांसदों औऱ विधायकों के घरों की ओर कर दिया गया। इसने सांसदों पर उचित विधेयक के निर्माण के लिए अतिरिक्त दबाब बनाना शुरु किया।
  • संसद में चल रही और टीवी, पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से उठाए जाने वाले सवालों का टीम के सदस्य ट्विटर, साक्षात्कार, रामलीला के मंच आदि माध्यम से तथा लेख लिखकर निरंतर सही जबाब देते रहे। इसने सरकार के गलत तर्कों को समाप्त किया और आंदोलन के विरोध में जनमत को मोड़ने की सरकार एवं राजनितिक दलों की सारी कोशिशें बेकार गई।
  • अंततः बिना किसी ठोस लगने वाले आश्वासन के लिए सरकार को बाध्य किए अन्ना के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए 12 दिन तक अनशन को समाप्ति की ओर ले गए। कानूनी रूप से टीम को एक प्रस्ताव मात्र मिला था जिसकी माने जाने की कोइ बाध्यता नहीं थी। परंतु इसके पीछे जनता की इतनी ताकत मिल चुकी थी कि सरकार के लिए यह कानून से भी अधिक अनुपालनीय हो गया था।
  • अनशन की समाप्ति रात को नौ बजे न कर अगले दिन सुबह आंदोलन जारी रखने की घोषणा के साथ एक समारोह के रूप में किया जिसमें टीवी के माध्यम से सारा देश शामिल था।
  • मुसलमान और दलित राजनिति करने वालों का जबाब उन्होंने अपने तर्कों से तो दिया ही व्यावहारिक जवाब अन्ना के अनशन को एक दलित और एक मुस्लिम समुदाय की बच्ची से तुड़वाकर दिया।
  • अभी काम अधूरा है इसका आभास दिलाने के लिए लोगों को शाम को पुनः एकत्रित होने का आह्वान किया और फिर से जीत की शाम मनाई।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

समाचार पत्र[संपादित करें]

विडियो/संगीत[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]