लेव तोलस्तोय

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लेव तोलस्तोय
L.N.Tolstoy Prokudin-Gorsky.jpg
जन्म: 9 सितम्बर 1828
यास्नाया पोल्याना, रूसी साम्राज्य
मृत्यु: 20 नवंबर 1910
आस्तापोवो, रूसी साम्राज्य
कार्यक्षेत्र: साहित्य
विधा: उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध
साहित्यिक
आन्दोलन
:
ईसाई अराजकतावादी
शान्तिवादी
प्रमुख कृति(याँ): युद्ध और शान्ति
आन्ना करेनिना
प्रभाव: पेत्र चेल्सिस्की, अलेक्सांदर पूश्किन, लारेंस स्टर्न, हैरियेट बीचर स्टोव, चार्ल्स डिकन्स, प्लेटो, एरिस्टोटल, ज़ाँ-ज़ाक रूसो, आर्थर शोपनहाउअर, निकोलाइ गोगोल, बाइबल, हेनरी थोरो
इनसे प्रभावित: महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, वर्जिनिया वुल्फ़, ओर्हन पामुक, लुडविग विटगेनस्टाइन, एडना ओ'ब्रायन, जेम्स जॉयस, व्लादीमिर नाबोकोव, जे. डी. सैलिंगर, आधुनिकतावाद

लेव तोलस्तोय (रूसी:Лев Никола́евич Толсто́й, 9 सितम्बर 1828 - 20 नवंबर 1910) उन्नीसवीं सदी के सर्वाधिक सम्मानित लेखकों में से एक हैं। उनका जन्म रूस के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उन्होंने रूसी सेना में भर्ती होकर क्रीमियाई युद्ध (1855) में भाग लिया, लेकिन अगले ही वर्ष सेना छोड़ दी। लेखन के प्रति उनकी रुचि सेना में भर्ती होने से पहले ही जाग चुकी थी। उनके उपन्यास युद्ध और शान्ति (1865-69) तथा आन्ना करेनिना (1875-77) साहित्यिक जगत में क्लासिक रचनाएँ मानी जाती है।

धन-दौलत व साहित्यिक प्रतिभा के बावजूद तोलस्तोय मन की शांति के लिए तरसते रहे। अंततः 1890 में उन्होंने अपनी धन-संपत्ति त्याग दी। अपने परिवार को छोड़कर वे ईश्वर व गरीबों की सेवा करने हेतु निकल पड़े। उनके स्वास्थ्य ने अधिक दिनों तक उनका साथ नहीं दिया। आखिरकार 20 नवम्बर 1910 को अस्तापवा नामक एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर इस धनिक पुत्र ने एक गरीब, निराश्रित, बीमार वृद्ध के रूप में मौत का आलिंगन कर लिया।

जीवन वृत्त[संपादित करें]

लेव निकोलायेविच तोलस्तोय का जन्म मास्को से लगभग 100 मील दक्षिण पैत्रिक रियासत यास्नाया पोल्याना में हुआ था। इनकी माता पिता का देहांत इनके बचपन में ही हो गया था, अत: लालन पालन इनकी चाची तत्याना ने किया। उच्चवर्गीय ताल्लुकेदारों की भॉति इनकी शिक्षा के दीक्षा के लिये सुदक्ष विद्वान् नियुक्त थे। घुड़सवारी, शिकार, नाच-गान, ताश के खेल आदि विद्याओं और कलाओं की शिक्षा इन्हें बचपन में ही मिल चुकी थी। चाची तात्याना इन्हें आदर्श ताल्लुकेदारों बनाना चाहती थी और इसी उद्देश्य से, तत्कालीन संभ्रात समाज की किसी महिला को प्रेमपात्री बनाने के लिये उकसाया करती थीं। युवावस्था में तॉलस्तॉय पर इसका अनुकूल प्रभाव ही पड़ा। पर तॉलस्तॉय का अंत:करण इसे उचित नहीं समझता था। अपनी डायरी में उन्होंने इसकी स्पष्ट भर्त्सना की है।

1844 में तॉलस्तॉय कज़ान विश्वविद्यालय में प्रविष्ट हुए और 1847 तक उन्होनें पौर्वात्य भाषाओं (eastern languages) और विधिसंहिताओं (कानून) का अध्ययन किया। रियासत के बँटवारे का प्रश्न उपस्थित हो जाने के कारण स्नातक हुए बिना ही इन्हे विश्वविद्यालय छोड़ देना पड़ा। रियासत में आकर इन्होंने अपने कृषक असामियों की दशा में सुधार करने के प्रयत्न किए और सुविधापूर्वक उन्हें स्वतंत्र भूस्वामी हो जाने के लिये कतिपय शर्तें उपस्थित कीं, परंतु असामी वर्ग आसन्न स्वतंत्रता की अफवाहों से प्रभावित था, अत: उसने तॉलस्तॉय की शर्ते ठुकरा दीं। पर यह अफवाह अफवाह ही रही और अंतत: कृषकों को पश्चाताप करना ही हाथ लगा। उनकी कहानी "ए लैंड औनर्स मोर्निग" (1856) इसी घटना पर आधृत है।

1851 में तॉलस्तॉय कुछ समय के लिये सेना में भी प्रविष्ट हुए थे। उनकी नियुक्ति कोकेशस में पर्वतीय कबीलों से होनेवाली दीर्घकालीन लड़ाई में हुई जहाँ अवकाश का समय वे लिखने पढ़ने में लगाते रहे। यहीं पर उनकी प्रथम रचना चाइल्डहुड 1852 में निर्मित हुई जो एल0 टी0 के नाम से "टि कंटेंपोरेरी" नामक पत्र में प्रकाशित हुई। उस रोमैंटिक युग में भी इस नीरस यथार्थवादी ढंग की रचना ने लोगों को आकृष्ट किया और उसके रचनाकार के नाम के संबंध में तत्कालीन साहित्यिक तरह तरह के अटकल लगाने लगे थे।

1854 में तॉलस्तॉय डैन्यूब के मोर्चे पर भेजे गए; वहाँ से अपनी बदली उन्होने सेबास्तोपोल में करा ली जो क्रीमियन युद्ध का सबसे तगड़ा मोर्चा था। यहाँ उन्हें युद्ध और युद्ध के संचालकों को निकट से देखने परखने का पर्याप्त अवसर मिला। इस मोर्चे पर वे अंत तक रहे और अनेक करारी मुठभेड़ों में प्रत्यक्षत: संघर्षरत रहे। इसी के परिणामस्वरूप उनकी रचना "सेबास्टोपोल स्केचेज" (1855-56) निर्मित हुई। युद्ध की उपयोगिता और जीवन पर उसके प्रभावों को निकट से देखने समझने के यथेष्ट अवसर उन्हें यहाँ मिले ओर इन उपलब्धियों का यथोचित उपयोग उन्होंने अपनी अनेक परवर्ती रचनाओं में किया।

1855 में उन्होने पीटर्सवर्ग की यात्रा की जहाँ के साहित्यिकारों ने इनका बड़ा सम्मान किया। 1857 ओर 1860-61 में इन्होंने पश्चिमी यूरोप के विभिन्न देशों का पर्यटन किया। परवर्ती पर्यटन का मुख्य उद्देश्य एतद्देशीय शिक्षापद्धतियों और दातव्य संस्थाओं के संघटन और क्रियाकलापों ही जानकारी प्राप्त करना था। इसी यात्रा में उन्हे यक्ष्मा (टीबी) से पीड़ित अपने बड़े भाई की मृत्यु देखने को मिली। घोरतम यातनाओं के अनंतर होनेवाली यक्ष्माक्रांत भाई की मृत्यु का तॉलस्तॉय पर मर्मातक प्रभाव पड़ा। युद्ध और शांति, आन्ना कारेनिना और इवान इल्यीच की मृत्यु में मृत्यु के जो अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलते हैं, उनका आधार उपर्युक्त घटना ही रही है।

यात्रा से लौटकर उन्होंने अपने गाँव यास्नाया पोल्याना में कृषकों के बच्चों के लिये एक स्कूल खोला। इस विद्यालय की शिक्षा पद्धति बड़ी प्रगतिशील थी। इसमें वर्तमान परीक्षाप्रणाली एवं इसके आधार पर उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण कारने की व्यवस्था नहीं रखी गई थी। विद्यालय बड़ा सफल रहा जिसका मुख्य कारण तॉलस्तॉय की नेतृत्व शक्ति और उसके प्रति हार्दिक लगन थी। विद्यालय की ओर से, गाँव के ही नाम पर ""यास्नाया पोल्याना"" नामक एक पत्रिका भी निकलती थी जिसमें प्रकाशित तॉलस्तॉय के लेखों में विद्यालय ओर उसके छात्रों की विभिन्न समस्याओं पर बड़े ही सारगर्भित विचार व्यक्त हुए हैं।

1862 में तॉलस्तॉय का विवाह साफिया बेर्हस नामक उच्चवर्गीय संभ्रांत महिला से हुआ। उनके वैवाहिक जीवन का पूर्वाश तो बड़ा सुखद रहा पर उत्तरांश कटुतापूर्ण बीता। तॉलस्तॉय के वैवाहिक जीवन में गृहिणी का आदर्श पूर्णत: भारतीय गृहिणी का सा था: पर तत्कालीन रूसी संभ्रांत समाज के विचार बिल्कुल भिन्न थे।

1863 से 1869 तक तॉलस्तॉय का समय "वार ऐंड पीस" की रचना में एवं 1873 से 76 तक का समय "अन्ना कैरेनिना" की रचना में बीता। इन दोनों रचनाओं ने तॉलस्तॉय की साहित्यिक ख्याति को बहुत ऊँचा उठाया। वे मनुष्यजीवन का रहस्य और उसके तत्वचिंतन के प्रति विशेष जागरूक थे। 1875 से 1879 तक का समय उनके लिये बड़ा निराशजनक था- ईश्वर पर से उनकी आस्था तक उठ चुकी थी ओर आत्महत्या तक करने पर वे उतारू हो गए थे। पर अंत में उन्होंने इसपर विजय पाई। 1878-79 में इन्होने "कनफेशन" (मेरी मुक्ति की कहानी) नामक अपनी विवादपूर्ण कृति की रचना की। इसके क्रांतिकारी विचार ऐसे हैं जिनके कारण रूस में इसके प्रकाशन की अनुमति भी नहीं मिली और पुस्तक स्विटजरलैंड में प्रकाशित हुई। इस समय की उनकी अन्य कई रचनाएँ इसी कोटि की हैं और वे सब स्विटजरलैंड में छपी हैं।

1878 से लेकर 1885 तक की अवधि में फलात्मक साहित्य सृजन की दृष्टि से तॉलस्तॉय निष्क्रिय रहे। उनकी अंतर्वृति मानव जीवन के रहस्य की खोज में उलझी रही। अंबतक की समस्त रचनाएँ उन्हें व्यर्थ प्रतीत होने लगीं। पर 1886 में वे पुन: उच्चकोटि के सिद्धहस्त उपन्यास लेखक के रूप में सामने आए और इसी वर्ष उनकी महान उपन्यासिक रचना '"इवान इल्यीच की मृत्यु"' प्रकाशित हुई।

उनके आचार संबंधी विश्वासों के प्रति अब सारा संसार आकृष्ठ हो चुका था और यास्नाया पोल्याना ग्राम की मान्यता उत्कृष्ट तीर्थस्थली के रूप में जगद्धिख्यात हो चुकी थी। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस समय युवक थे। इन्हीं दिनों उन्होंने तॉलस्तॉय की रचनाएँ रुचिपूर्वक पढ़ी थीं और उनकी ओर आकृष्ट हुए थे।

19वीं शताब्दी का अंत होते होते दरिद्रों और असहायों के प्रति तॉलस्तॉय की सेवावृति यहाँ तक बढ़ी कि उन्होने अपनी रचनाओं से रूस देश में होनेवाली अपनीं समस्त आय दान कर दी। अपनी पत्नी को मात्र उतना अंश लेने की उन्होंने अनुमति दी जितना परिवार के भर पोषण के लिये अनिवार्य था। 'पुनरुत्थान' (रिसरेक्शन) [1899] नामक अपने उपन्यास की समस्त आय उन्होंने रूस की शांतिवादी जाति दुखेबोर लोगों को रूस का परित्याग कर कैनाडा में जा बसने के लिये दे दी।

1910 में सहसा उन्होंने अपने पैत्रिक ग्राम "यास्नाया पोल्याना" को सर्वदा के लिये परित्यक्त करने का निश्चय किया। 10 नवम्बर 1910 को अपनी पुत्री ऐलेक्लेंड्रा के साथ उन्होनें प्रस्थान किया, पर 22 नवबंर 1910 को मार्ग के स्टेशन ऐस्टापोवो में अकस्मात् फेफड़े में दाह होने से वहीं उनका शरीरांत हो गया।

विचार एवं दर्शन[संपादित करें]

उनकी धर्मभवना बड़ी उदार और व्यापक थी। तत्कालीन ईसाई धर्म के प्रति उनकी स्पष्टत: विरोधी भावना थी। अपने विचारों से वे एक प्रकार के सर्वदेववादी प्रतीत होते हैं। मृत्यु को वे शरीर की अंतिम ओर अवश्यंभावी परिणति मानते थे। मनुष्य को वे शरीर की अंतिम और अवश्यंभावी परिणति मानते थे। मनुष्य के संपर्क में आनेवाली प्रत्येक वस्तु को उपयोगिता के मानदंड से आँकना वे उचित समझते थे और इसी कारण जीवन की सोद्देश्यता के प्रति वे सर्वदा जिज्ञासु बने रहे। निरुद्देश्य, विचारहीन ओर आत्मकेंद्रित जीवन को वे एक प्रकार का पाप मानते थे; यहाँ तक कि संभोग को वे केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से ही विहित मानते थे।

मनोवैज्ञानिक रचनाओं में फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की ही तॉलस्ताय के समकक्ष ठहरते हैं। गाल्स्वर्दी, टामस मान, जूल्स रोम्याँ आदि महान लेखकों पर तॉलस्तॉय का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है। परवर्ती रूसी लेखकों को भी तॉलस्तॉय ने यथेष्ट प्रभावित किया है।

विचारों की उपयोगिता : लेनिन की दृष्टि में[संपादित करें]

लेनिन सहित विश्व के अनेकानेक विद्वानों ने तोलस्तोय के साहित्य, विशेषतः 'युद्ध और शान्ति' की सर्वश्रेष्ठता मुक्तकंठ से स्वीकार की है; परंतु तोलस्तोय एक विचारक भी थे और साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ निबंधों तथा अन्य विधाओं में भी उन्होंने अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है। उनके युगीन सन्दर्भ विचारों की उपयोगिता के सम्बन्ध में लेनिन का मानना है कि "तोलस्तोय ने ऐसा ललित साहित्य रचा है, जो तब जनता के लिए सदा मूल्यवान और पठनीय होगा, जब वह जमींदारों और पूंजीपतियों का तख्ता उलट कर अपने लिए मनुष्योचित सामाजिक जीवन की व्यवस्था कर लेगी। साथ ही तोलस्तोय उल्लेखनीय ओज के साथ वर्तमान व्यवस्था में पददलित आम जनता की मनोदशा को व्यक्त करने तथा उसकी दशा का वर्णन करने तथा उसके विरोध एवं रोष के स्वतःस्फूर्त भावों को मुखरित करने में समर्थ हुए हैं।तोलस्तोय मुख्यतः 1861 से 1904 तक के युग के थे और उन्होंने -- एक कलाकार, विचारक एवं उपदेशक के नाते -- अपनी कृतियों में समूची प्रथम रूसी क्रांति की ऐतिहासिक विशिष्टताओं को, उसकी क्षमताओं और त्रुटियों को आश्चर्यजनक स्पष्टता के साथ उभारा है।"[1]

इसके बावजूद प्राचीन व्यवस्था की विविध खामियों, अमीर वर्ग की आंतरिक निस्सारता तथा उसके विरुद्ध प्रकट तोलस्तोय के विचारों के संदर्भ में लेनिन का कहना है कि "तोलस्तोय की आलोचना में कोई नयी बात नहीं थी। उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं कही जो उनसे बहुत अरसे पहले यूरोपीय तथा रूसी साहित्य में मेहनतकशों के हिमायतियों द्वारा न कही गयी हो। तोलस्तोय की आलोचना की विशेषता एवं ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि हमारे विचाराधीन काल के रूस -- देहाती, किसानों के रूस -- के व्यापक जन समुदाय के दृष्टिकोण में जो आमूल परिवर्तन आ रहा था, उसकी अभिव्यक्ति उसमें ऐसे ओजसे की गयी है, जो किसी प्रतिभावान कलाकार के ही बस का काम था।"[2]

तोलस्तोय के साहित्यिक महत्व को लेनिन बखूबी समझते थे और इसलिए उन्होंने उसकी भारी प्रशंसा भी की है; परंतु साथ-साथ युगीन संदर्भ में उनके विचारों के कई हानिकारक पहलुओं से सचेत रहने की अनिवार्यता भी वे अच्छी तरह समझते थे। इसलिए दिसंबर 1910 में उन्होंने स्पष्टतया यह विचार व्यक्त किया था कि तोलस्तोय की साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन करके रूसी मजदूर वर्ग अपने दुश्मनों को ज्यादा अच्छी तरह पहचान सकेगा। उनके सिद्धांतों का अध्ययन करके समस्त रूसी जनता यह जरूर जानेगी कि उसकी निजी कमजोरी, जिसने उसे अपनी आजादी का लक्ष्य पूरा करने से रोका, किस बात में निहित थी। आगे बढ़ने के लिए यह जानना जरूरी है। इस प्रगति में वह सब लोग बाधा डाल रहे हैं, जो तोलस्तोय को 'हम सबका अंतःकरण', 'जीवन-शिक्षक' घोषित करते हैं। यह वह झूठ है जिसे उदारतावादी जो तोलस्तोय के सिद्धांतों के क्रांति-विरोधी पहलू का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जानबूझकर फैला रहे हैं। तोलस्तोय के 'जीवन-शिक्षक' होने का झूठ उदारतावादियों की देखा-देखी कुछ भूतपूर्व सामाजिक-जनवादी भी दुहरा रहे हैं। रूसी जनता आजादी तभी प्राप्त करेगी, जब वह समझ लेगी कि उसे बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करने की शिक्षा तोलस्तोय से नहीं, बल्कि उस वर्ग से लेनी है, जिसका महत्व तोलस्तोय नहीं समझ पाये और जो उस पुरानी दुनिया को, जिससे तोलस्तोय घृणा करते थे, उखाड़ फेंकने में समर्थ एकमात्र वर्ग है -- अर्थात सर्वहारा वर्ग से।[3]

22 जनवरी 1911 को लेनिन ने पुनः विस्तार से तोलस्तोय की कुछ कथात्मक रचनाओं के साथ-साथ अनेक कथेतर रचनाओं का उदाहरण देते हुए यह विचार व्यक्त किया था कि तोलस्तोयवाद में प्रतिक्रियावादी तथा यूटोपियाई तत्व होने के बावजूद आज से 25 वर्ष पहले जनता के कुछ हलकों के लिए शायद कभी-कभी तोलस्तोय के सिद्धांतों के आलोचनात्मक तत्वों की व्यवहारिक उपयोगिता हो सकती थी। पर अब, उदाहरणतः पिछले दशक में, ऐसी बात नहीं हो सकती थी, क्योंकि पिछली शताब्दी के नौवें दशक से लेकर शताब्दी के अंत तक ऐतिहासिक विकास बहुत आगे बढ़ गया है। अतः आज जब उपरोक्त घटनाओं ने 'पूर्वी' गतिहीनता का अंत कर दिया है, आज, जब 'वेख़ी'-पंथियों के सचेतन रूप से प्रतिक्रियावादी, संकीर्ण-वर्गीय तथा स्वार्थी-वर्गीय अर्थों में प्रतिक्रियावादी विचार उदारवादी बुर्जुआ लोगों में इतने व्यापक रूप से फैल गये हैं, आज, जब इन विचारों की छूत कुछ दिखाऊ मार्क्सवादियों को भी लग गयी है, जिसका परिणाम 'विसर्जनवादी' प्रवृति है, तो तोलस्तोय के सिद्धांतों को आदर्श बताने, उनके 'अप्रतिरोध' उनकी 'आत्मा' की दुहाइयों, 'आत्मोद्धार' के लिए उनके आह्वान, 'अंतःकरण' और विश्व 'प्रेम' के सिद्धांत, तपस्यावाद और क्वाइटिज़्म के उनके उपदेश, आदि-आदि को उचित ठहराने या उन पर लीपापोती करने की हर कोशिश प्रत्यक्षतम और गहनतम हानि ही करती है।[4]

प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें[संपादित करें]

आरम्भिक कृतियाँ[संपादित करें]

  1. बचपन 1852
  2. किशोरावस्था 1855
  3. युवावस्था 1857

लघु उपन्यास[संपादित करें]

  1. कज़्ज़ाक (The Coszacks) [हिन्दी अनुवाद- योगेन्द्र नागपाल, रादुगा प्रकाशन माॅस्को से प्रकाशित; पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा०लि०, रानी झाँसी रोड, नयी दिल्ली से वितरित]

वृहद् उपन्यास[संपादित करें]

  1. युद्ध और शांति -1863-69 (अनुवादक- डॉ० मदनलाल 'मधु', रादुगा प्रकाशन, मास्को से प्रकाशित; पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा०लि०, रानी झाँसी रोड, नयी दिल्ली एवं राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, जयपुर से वितरित)
  2. आन्ना कारेनिना -1873-77 (अनुवादक डॉ० मदनलाल 'मधु', राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित)
  3. पुनरुत्थान -1899 (अनुवादक- भीष्म साहनी, रादुगा प्रकाशन, मास्को से प्रकाशित; पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा०लि०, रानी झाँसी रोड, नयी दिल्ली से वितरित)

उपन्यासिका एवं लम्बी कहानियाँ[संपादित करें]

  1. दो हुस्सार -1856 (क्रूज़र सोनाटा : लघु उपन्यास एवं कहानियाँ, अनुवादक- भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित संकलन में संकलित)
  2. सुखी दम्पती -1859 (" ")
  3. इंसान और हैवान (खोल्सतोमर : एक घोड़े की कहानी) -1863 में लिखित; 1886 में प्रकाशित (" ")
  4. इवान इल्यीच की मृत्यु -1886 (" ")
  5. क्रूज़र सोनाटा -1888 (" ")
  6. नाच के बाद -1903 (" ")

नाटक[संपादित करें]

  1. अँधेरे में उजाला (अंधकार की शक्ति) -1887 (सस्ता साहित्य मंडल, नयी दिल्ली से प्रकाशित)
  2. प्रबोधन के फल -1891
  3. कलवार की करतूत (first distiller) [सस्ता साहित्य मंडल, नयी दिल्ली से प्रकाशित]

निबन्ध एवं विचार-दर्शन[संपादित करें]

  1. बुराई कैसे मिटे (सस्ता साहित्य मंडल, नयी दिल्ली से प्रकाशित)
  2. हम करें क्या -1882-86 (" ")
  3. धर्म और सदाचार (Religion and morality) -1893 (" ")
  4. हमारे जमाने की गुलामी -1899-1900 (" ")
  5. प्रेम और हिंसा (हिंदी अनुवादक-शंभू जोशी, वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर से प्रकाशित)

अन्य[संपादित करें]

  1. मेरी मुक्ति की कहानी (ए कन्फेशन तथा रिफ्लेक्शन का अनुवाद) [सस्ता साहित्य मंडल, नयी दिल्ली से प्रकाशित]
  2. टॉलस्टॉय की डायरी (अनुवादक- ठाकुर राजबहादुर सिंह, साहित्य मंडल, दिल्ली से 1932 में प्रकाशित)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. साहित्य और सौंदर्यशास्त्र (बीसवीं शताब्दी का साहित्य, भाग-1), साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली, संस्करण-1987, पृष्ठ-34.
  2. लेनिन : तोलस्तोय के बारे में, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ, संस्करण-2002, पृष्ठ-23.
  3. लेनिन : तोलस्तोय के बारे में, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ, संस्करण-2002, पृष्ठ-26.
  4. लेनिन : तोलस्तोय के बारे में, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ, संस्करण-2002, पृष्ठ-23.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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