लिंकेज

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सेल्फ-लॉकिंग प्लायर एक-डिग्री की स्वतंत्रता वाले लिंकेज का अच्छा उदाहरण है।

यांत्रिकी में उन दंडों (छड़ों) के समूह को अनुबंधन या कटी-संहतियाँ या लिंकेज (Linkages) कहते हैं जो एक दूसरे से हिंज द्वारा ज़ड़े रहते हैं और जिनसे कोई विशेष प्रकार की गति प्राप्त होती है। कटी-संहतियों के उदाहरण अनेक यंत्रों में देखे जा सकते हैं।

पैंटोग्राफ़ (Pantograph) नामक यंत्र में चार छड़ रहते हैं जो एक दूसरे से हिंज द्वारा जुड़े रहते हैं।

वाट का ऋजु-लेखक[संपादित करें]

फ्लाईबाल गवर्नर द्वारा वाष्प के प्रवाह का नियंत्रण

आजकल जब यंत्र के किसी भाग को ऋजु रेखा में चलाना रहता है तब ऐसा प्रबंध किया जाता है कि वह भाग दो स्थिर ऋजु भागों के बीच फिसले। वाष्प इंजन के आविष्कारक जेम्स वाट के समय में इस प्रकार की युक्ति ठीक नहीं बन पाती थी, क्योंकि ऐसी युक्ति में बहुत सी शक्ति घर्षण द्वारा नष्ट हो जाती थी। इसलिए वाट ने १७८४ ई. में एक युक्ति की उपज्ञा की जिसे "वाट्स पैरालेल मोशन" (वाट की समांतर गति) कहते हैं।

वाट ने इसका उपयोग इंजन का पिस्टन चलाने में किया, परंतु सुविधा के लिए उसने तीन अतिरिक्त छड़ें जोड़ ली थीं।

पोसेलिए की कटी-संहति (Peaucellier–Lipkin linkage)[संपादित करें]

१९वीं शताब्दी के आरंभ में वाट के ऋजु-लेखक में सुधार करने की चेष्टा की गई। फ्रांस की सेना के एक लेफ़्टिनेंट पोसेलिए ने छह छड़ों की कटी-संहति बनाई जिससे एक बिंदु शुद्ध ऋजु रेखा में चलता था। इसमें सात छड़ें रहती हैं। लोगों ने सोचा कि कम छड़ों से काम चलाया जाए तो अच्छा होगा। गणितज्ञ चेबिचफ़ (Chebyshev) ने "सिद्ध" कर दिया कि पाँच अथवा इससे कम छड़ों की संहतियों से ऋजु-रेखात्मक गति प्राप्त नहीं हो सकती, परंतु उसका प्रमाण अशुद्ध निकला, क्योंकि १८७७ ई. में हार्ट ने पाँच छड़ों की कटी-संहित की उपज्ञा की जिससे सरल रेखा खींची जा सकती थी

अन्य कई कटी-संहतियाँ बनी हैं जिनसे शांकव, समविभव वक्र आदि खींचे जा सकते हैं।

एक सरल लिंकेज

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]