लक्षण

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लक्षण का अर्थ है - 'पहचान का चिह्न' या गुणधर्म या प्रकृति। किसी पदार्थ की वह विशेषता जिसके द्वारा वह पहचाना जाय। वे गुण आदि जो किसी पदार्थ में विशिष्ट रूप से हों और जिनके द्वारा सहज में उसका ज्ञान हो सके। जैसे,—आकाश के लक्षण से जान पड़ता है कि आज पानी बरसेगा।

शरीर में दिखाई पड़नेवाले वे चिह्न आदि जो किसी रोग के सूचक हों, भी 'लक्षण' कहलाते हैं। जैसे,—इस रोगी में क्षय के सभी लक्षण दिखाई देते हैं।

सामुद्रिक के अनुसार शरीर के अँगों में मिलने वाले कुछ विशेष चिह्न भी लक्षण कहे जाते हैं जो शुभ या अशुभ माने जाते हैं। जैसे,—चक्रवर्ती और बुद्ध के लक्षण एक से होते हैं। लक्षणों को जाननेवाला या शुभ अशुभ चिह्नों का ज्ञाता लक्षणज्ञ कहलाता है।

काव्य या साहित्य के लक्षणों का विवेचन करनेवाला ग्रंथ लक्षण ग्रंथ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, लक्षण ग्रन्थ का अर्थ साहित्यिक समीक्षा की पुस्तक या 'समालोचना शास्त्र' है।लक्षण वयवहार के विशिष्ट गुण हैं- जैसे कुंठा के प्रति प्रतिक्रियाएं, समस्याओं का समाधान करने की प्रणालियाँ, आक्रामक तथा प्रतिरक्षक व्यवहार और दूसरों की उपस्थिति में व्यक्ति का बहिर्मुखी या अंतर्मुखी वयवहार आदि।

विभिन्न वस्तुओं के लक्षण[संपादित करें]

विद्यार्थी
काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥
पुराण के लक्षण
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् ॥
(१) सर्ग – पंचमहाभूत, इंद्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन,; (२) प्रतिसर्ग – ब्रह्मादिस्थावरांत संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन,; (३) वंश – सूर्यचंद्रादि वंशों का वर्णन, देवता व ऋषियों की सूचियाँ ; (४) मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और (५) वंशानुचरित (सूर्य चंद्रादि वंशीय चरित) ।
महाकाव्य लक्षण

आचार्य विश्वनाथ के अनुसार महाकाव्य के लक्षण इस प्रकार हैं :

जिसमें सर्गों का निबंधन हो वह महाकाव्य कहलाता है। इसमें देवता या सदृश क्षत्रिय, जिसमें धीरोदात्तत्वादि गुण हों, नायक होता है। कहीं एक वंश के अनेक सत्कुलीन भूप भी नायक होते हैं। शृंगार, वीर और शांत में से कोई एक रस अंगी होता है तथा अन्य सभी रस अंग रूप होते हैं। उसमें सब नाटकसंधियाँ रहती हैं। कथा ऐतिहासिक अथवा सज्जनाश्रित होती है। चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक उसका फल होता है। आरंभ में नमस्कार, आशीर्वाद या वर्ण्यवस्तुनिर्देश होता है। कहीं खलों की निंदा तथा सज्जनों का गुणकथन होता है। न अत्यल्प और न अतिदीर्घ अष्टाधिक सर्ग होते हैं जिनमें से प्रत्येक की रचना एक ही छंद में की जाती है और सर्ग के अंत में छंदपरिवर्तन होता है। कहीं-कहीं एक ही सर्ग में अनेक छंद भी होते हैं। सर्ग के अंत में आगामी कथा की सूचना होनी चाहिए। उसमें संध्या, सूर्य, चंद्रमा, रात्रि, प्रदोष, अंधकार, दिन, प्रात:काल, मध्याह्न, मृगया, पर्वत, ऋतु, वन, सागर, संयोग, विप्रलंभ, मुनि, स्वर्ग, नगर, यज्ञ, संग्राम, यात्रा और विवाह आदि का यथासंभव सांगोपांग वर्णन होना चाहिए (साहित्यदर्पण, परिच्छेद 6,315-324)।
महापुरुष के लक्षण
विद्वान के लक्षण
सत्यं तपो ज्ञानमहिंसता च विद्वत्प्रणामंच सुशीलता च।
एतानि योधारयते स विद्वान् न के वलंयः पठते स विद्वान्॥
सत्य, तप (अपने धर्म से न डिगना) ज्ञान, अहिंसा (किसी का दिल न दुखाना) विद्वानों का सत्कार, शीलता, इनको जो धारण करता है वह विद्वान् है केवल पुस्तक पढ़ने वाला नहीं।
शास्त्रारायधीत्यपि भवन्तिमूर्खायस्तु क्रियावान् पुरुषः सविद्वान्।
सुचिन्तितंचौषध मातुराणाँ न नाममात्रेण हरोत्यरोगम्॥
शास्त्र पढ़ कर भी मूर्ख रहते हैं परन्तु जो शास्त्रोक्त क्रिया को करने वाला है वह विद्वान् है। रोगी को नाम मात्र से ध्यान की हुई औषधि निरोग नहीं कर सकती।
बुद्धि के लक्षण
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा ।
ऊहापोहोऽर्थ विज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥
शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, चिंतन, उहापोह, अर्थविज्ञान, और तत्त्वज्ञान – ये बुद्धि के गुण हैं ।
ज्ञान के लक्षण
अक्रोधो वैराग्यो जितेन्द्रियश्च क्षमा दया सर्वजनप्रियश्च।
निर्लोभो मदभयशोकरहितो ज्ञानस्य एतत् दश लक्षणानि॥
अक्रोध, वैराग्य, जितेन्द्रिय, क्षमा, दया, सर्वजनप्रिय, निर्लोभ, मदभयशोकरहित - ये दस ज्ञान के लक्षण हैं।
धर्म के लक्षण
धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दशकं धर्म लक्षणम्॥
धर्म के दस लक्षण हैं - धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , स्वच्छता , इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना ( अक्रोध )
धूर्त के लक्षण
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा ।
ऊहापोहोऽर्थ विज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥
शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, चिंतन, उहापोह, अर्थविज्ञान, और तत्त्वज्ञान – ये बुद्धि के गुण हैं ।
मित्र के लक्षण

गुसाई तुलसीदास जी सन्मित्र के लक्षण इस प्रकार कथन करते हैं :—

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।

तिनहिं विलोकत पातक भारी॥

जिन दुख गिरिसम रज करजाना।

मित्र के दुख रज मेरु समाना॥

जिनके असमति सहज न आई।

ते शठ कत हठि करत मिताई॥

देत लेत मन संक न धरईं।

बल अनुमान सदा हित करईं॥

कुपथ निवारि सुपथ चलावा।

गुण प्रगटइ अवगुणहिं दुरावा॥

विपत्ति काल कर सतगुन नेहा।

श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥


इन्हें भी देखें[संपादित करें]