रूस के सम्राट
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रूसी साम्राज्य का विस्तार
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इवान तृतीय, जिसे 'महान' की उपाधि से भी संबोधित किया जाता है, ने रूसी साम्राज्य का विस्तार यूरोप में किया। सबसे पहले उसने लिथुआनिया के शासक को हराया और अंततः उसका साम्राज्य तीन गुना फैल गया। इसके बाद इवान चतुर्थ आया जिसे 'इवान भयंकर' कहकर भी याद करते हैं। उसने सामंतों के खिलाफ़ सख़्ती दिखाई और जो लोग उसके खिलाफ होते उसे मार भी दिया गया। इवान चतुर्थ के बाद आराजकता का माहौल रहा। उसके बेटा संतानहीन मर गया और कई वर्षों तक सत्ता अनेक हाथो में जाती रही। इसके बाद मिखाइल रोमानोव को शासक बनाया गया। रोमानोव के वंश ने अगले ३०० सालों तक रूस पर राज्य किया।
१६१३ में रोमानोव के शासक बनने के बाद सत्ता में स्थिरता तो आई पर पश्चिमी यूरोप में हुए औद्योगिक क्रांति तथा वैज्ञानिक खोजों की वजह से रूस फिर भी पिछड़ा हुआ रहा। इसके बाद पीटर के शासनकाल में इसमें सुधार आया। पीटर ने पश्चिमी यूरोप का दौरा छद्मवेष में किया और इस तरह यूरोप की प्रगति पर निगाह डालता रहा। इस क्रम में, कहा जाता है कि, उसने एक बार हॉलैंड की किसी जहाज कंपनी में बढ़ई का काम भी किया। लौटने के बाद पीटर ने भी रूस का आधुनिकीकरण आरंभ किया। पीटर ने सैन्य सुधार, वेष-भूषा सुधार तथा कैलेंडर में सुधार करवाए। उसने स्वेड लोगों को हराकर बाल्टिक सागर के पत्तनों पर अधिपत्य जमाया और इस तरह व्यापार के नए अवसर मिले। साम्राज्य को जीर्णता से उबारने के लिए उसने १७०३ में साम्राज्य की नई राजधानी का निर्माण कराया जिसे आज सेंट पीटर्सबर्ग कहते हैं।
पीटर की मृत्यु के ४० साल बाद कैथरीन को गद्दी मिली जो जर्मन मूल की थी। उसने पीटर के पोते से शादी की थी। उसने रूसी साम्राज्य तथा इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। कैथरीन के समय के सेनाध्यक्ष अलेक्ज़ेंडर सुवोरोव ने एक भी युद्ध न हारने का कीर्तिमान बनाया और १७९९ में इटली में नेपोलियन की फ्रेंच सेना के साथ हुए मुकाबिले के बाद वापस आने में कामयाबी दिखाई।

परन्तु नेपोलियन १८१२ में रूस पर आक्रमण करने दुबारा आया। उसने मॉस्को की घेराबंदी कर रूसी साम्राज्य पर समर्पण का दबाब डाला। पर ग्रामीण गुरिल्ला युद्ध और इस समय अत्यधिक ठंड की वजह से फ्रासिसी सेना को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और अंततः नेपोलियन की हार हुई। इस युद्ध ने लियो तोलस्तोय कए विश्व-प्रसिद्ध उपन्यास को जन्म दिया जिसका नाम था - युद्ध और शांति।
औद्योगीकरण और साम्यवाद
[संपादित करें]जब निकोलस द्वितीय सत्ता में आया (1914)। मास्को के आसपास पड़ने वाले क्षेत्रों के अलावा आज का फिनलैंड , लातविया , लिथुआनिया , एस्तोनिया तथा पौलैंड , यूक्रऐन व बेलारूस के कुछ हिस्से रूसी साम्राज्य के अंग थे। तब तक रूस का औद्योगीकरण एक नए सामाजिक वर्ग को जन्म दे चुका था - मजदूर संघ। उद्योगों के मजदूरों के संघ संगठित होने लगे थे। 1903में रूसी जनतांत्रिक श्रमिक दल के दो टुकड़े हुए - बोल्शेविक (शाब्दिक अर्थ - बहुमती) और मेन्शेविक (अल्पमती)। ये क्रांति चाहते थे। 1904-5 में देश की पूर्वी सेना को जापान के हाथों करारी हार का मुँह देखना पड़ा था। 1904 में सेंट पीटर्सबर्ग़ में आयोजित एक शातिपूर्ण प्रदर्शन रैली पर सेना ने गोली बरसाई जिसमें सैकड़ों मारे गए और कई घायल हो गए। ऐसी घटनाओं से जनता में प्रशासन के ख़िलाफ़ रोष और भी बढ़ा। इन्ही कारणों से प्रेरित होकर 1904 में एक क्रांति हुई जिसको उस समय दबा दिया गया। आंदोलन तो दब गया लेकिन ज़ार निकोलस द्वितीय को कई सुधार करने पड़े, इनमें सबसे महत्वपूर्ण था - रूसी संसद ड्यूमा का गठन। रूसी भाषा में डोमा का अर्थ घर या सदन होता है।
प्रथम विश्वयुद्ध
[संपादित करें]प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत यूरोप में 1914 में हुई। सेंट पीटर्सबर्ग़ का नाम बदलकर पेत्रोग्राद कर दिया गया था। कारण ये था कि पुराना नाम जर्मन लगता था जबकि पेत्रोग्राद पूर्णरूपेण रूसी था - इससे देशभक्ति लाने का अंदेशा था। लेकिन सैन्य विफलताओं तथा खाद्य साधनों की कमी की वजह से मजदूरों तथा सैनिकों में असंतोष फैल गया। फरवरी 1917 में पेत्रोग्राद में विद्रोह हुए जिसके फलस्वरूप ज़ार निकोलस द्वितीय का अपहरण कर लिया गया। इस घटना के साथ ही रूस में पिछले ३०० सालों से चले आ रहे साम्राज्य का अन्त हुआ और साम्यवाद की नींव रख दी गई। हाँलांकि साम्यवादियों को सत्ताधिकार तुरंत नहीं मिला। रूस युद्ध से अलग हो चुका था। इधर निकोलस के परिवार को कैद कर रखा गया और 16-17 जुलाई 1918 की रात को उनकी हत्या कर दी गई।
लगातार निराश हो चुकी रूसी जनता द्वारा बोल्शेविकों को समर्थन मिलने लगा था और इस समर्थन में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी। अपने नेता व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों में २५ अक्टूबर को सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस घटना का विश्व इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह विश्व में पहली बार किसी साम्यवादी शासन की स्थापना का क्षण था। इस घटना को अक्टूबर क्रांति के नाम से जाना जाता था। रूस में इस समय तक जूलियन कैलेंडर का इस्तेमाल होता था जो पुराना था और उसमें सूर्य की परिक्रमा करने में पृथ्वी के द्वारा लगाए गए दिनों का अंशात्मक हिसाब नहीं था। यूरोप के कई देश (जैसे इंग्लैंड) पहले से ही ग्रेगोरियन कैलेंडर - जो आजकल प्रयुक्त होता है - का प्रयोग शुरु कर चुके थे। इस कैलेंडर में इस दोष का निवारण था: अब तक की गई इन ग़लतियो के एवज में वर्तमान तिथि में १३ दिन और जोड़ देना। इसको अपनाने के बाद २५ अक्टूबर (क्रांति का दिन) ७ नवम्बर को आने लगा। हाँलांकि इस घटना को अक्टूबर क्रांति कहते हैं पर इसे ७ नवम्बर को मनाया जाता है।
रूस के युद्ध से अलग होने के कुछ ही दिनों बाद भयंकर अशांति का माहौल फैल गया। बोल्शेविकों को पेत्रोग्राद तथा मॉस्को में तो बहुत समर्थन मिला पर संपूर्ण देश के परिदृश्य में वे राजनैतिक रूप से बहुत अछूते थे। एक विद्वेषपूर्ण आतरिक युद्ध सी स्थिति पैदा हो गई। बोल्शेविकों द्वारा स्थापित लाल सेना तथा रूस की राजनैतिक तथा सैनिक संस्थाओं द्वारा गठित श्वेत सेना में संघर्ष छिड़ गया। इसके अलावे हरी सेना तथा काली सेना नाम के भी संगठन बने जो इन दोनों के ख़िलाफ़ थे। १९२२ में अंततः लाल सेना की विजय हुई।
दिसंबर १९१७ में बोल्शेविकों ने अपनी राजनैतिक शक्ति बनाने के लिए एक नई पुलिस का गठन किया जिसका संक्षेप चेका () था।
लेनिन
[संपादित करें]लेनिन का जन्म २२ अप्रैल १८७० को सिम्बर्स्क में हुआ था। अपनी राजनैतिक गतिविधियों के कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। हाँलांकि उन्होंने एक बाहरी विद्यार्थी के रूप विधि की डिग्री हासिल की। उसके बाद वे सेंट पीटर्सबर्ग़ चले गए और वहाँ पर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होते रहे। उन्होंने कई उपनामों का इस्तेमाल किया जिसमें अंततः १९०१ में वे लेनिन का प्रयोग करने पर स्थिर हो गए। उन्हें साइबेरिया में निर्वासन भुगतना पड़ा। १९०७ के बाद इनको रूस में रहना असुरक्षित लगने लगा और इस कारण वे पश्चिमी यूरोप चले गए। स्विट्ज़रलैंड में बसे लेनिन को जर्मन मदद इस आशा के साथ मिली कि वो रूसी सैन्य प्रयासों को कमज़ोर करने में मदद करेंगे। इस घटना की वजह से उन्हें अक्सर एक जर्मन जासूस की नज़र से भी देखा गया। १९१८ में उनपर दो आत्मघाती हमले हुए। १९२४ में उनकी मृत्यु हो गई। इसके तीन दिन बाद ही पेत्रोग्राद का नाम बदल कर लेनिन ग्राद कर दिया गया। प्रेत्रोग्राद को पहले (और अब) सेंट पीटर्सबर्ग़ कहते थे।
स्तालिन
[संपादित करें]लेनिन की मृत्यु के बाद जोसेफ स्तालिन को सत्ता संघर्ष में विजय मिली। उसने दुनिया भर में साम्यवाद और तानाशाही का नया आयाम पेश किया। स्तालिन ने अपने सभी प्रतिद्वंदियों को या तो मरवा दिया या निर्वासित कर दिया। स्तालिन का जन्म आज के जॉर्जिया में १८७९ में हुआ था जो उसके जन्म के समय रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। वो अपनी किशोरावस्था से कविताएँ लिखता था पर इस रूप में उसे अधिक सफलता नहीं मिली।
सत्ता में आने तुरंत बाद उसने रूस को एक बिल्कुल नए प्रशासनिक स्वरूप में ले गया। उसने पंचवर्षीय योजनाओं की नींव डाली जो पहले से मौजूद आर्थिक योजना की जगह पर लाई गई थी। किसानों से उनकी जमीन लेकर उन्हें एक सम्मिलित खेत बनाया तथा उनमें काम करने वाले श्रमिकों को श्रम के अनुसार वेतन मिलता। इसी प्रकार उद्योगों में भी उत्पादन बढ़ाने की व्यवस्था की गई। जल्द ही रूस एक उपभोक्ता सामग्री बनाने वाले देश से एक भारी मशीनों को बनाने वाले देश के रूप में उभरा। कला और साहित्य को सरकार द्वारा नियंत्रित किया गया। धर्म पर भी लगाम लगाई गई और इसके तहत चर्चों को या तो बन्द किया गया या तोड़ा गया या उनका इस्तेमाल अन्य कार्यों में किया जाने लगा। १९३० के दशक में रूसी लोगों के जीवन में अनुशासन अभूतपूर्व रूप से लागू किया गया। निस्संदेह यह सभी लोगों द्वारा पसन्द नहीं किया गया। उद्योगों में अधिक मिहनत करने वाले मजदूरों को पुरस्कार और प्रोत्साहन मिले जिससे कि उत्पादन क्षमता में बढोतरी हुई। उसी समय स्ताखानोवित नामक पद बहुत लोकप्रिय हुआ। यह अलेक्सेई स्ताखनोव नामक एक मजदूर द्वारा छः घंटे से कम समय में १०२ टन कोयले के खनन का रिकार्ड बनाने के लिए प्रसिद्ध हुआ। इस व्यक्ति को उस साल के टाइम पत्रिका पर भी जगह मिली। इन प्रोत्साहनों के द्वारा मजदूरों में अधिक उत्पादन की होड़ लगी। जल्द ही रूस एक औद्योगिक देश के रूप में जाना जाने लगा। १९३४ के आसपास का रूसी जीवन वहाँ की संस्कृति पर एक अमिट छाप छोड़कर गया। सरकार द्वारा आशावाद, आधिक्य, साम्यवादी भावना, देशभक्ति जैसी भावनाओं को बढ़ावा दिया गया।
