रुद्रपट्टण शामाशास्त्री
रुद्रपट्टण शामाशास्त्री (1868–1944) संस्कृत के विद्वान थे। वे मैसूर के पौर्वात्य अनुसंधान संस्थान (Oriental Research Institute) में पुस्तकालयाध्यक्ष थे। उन्होने अर्थशास्त्र (ग्रन्थ) की खोज की और उसे प्रकाशित किया।
जीवनी
[संपादित करें]शामाशास्त्री का जन्म 1868 में राज्य में कावेरी नदी के किनारे स्थित रुद्रपट्टण नामक गाँव में हुआ था जो वर्तमान में कर्नाटक में है। उनकी आरम्भिक शिक्षा रुद्रपट्टण में हुई। बाद में, वे मैसूर संस्कृत स्कूल गए और संस्कृत में स्नातक हुए। 1889 में मद्रास विश्वविद्यालय से उन्हें बी०ए० की उपाधि मिली। संस्कृत में उनकी योग्यता से प्रभावित होकर मैसूर प्रांत के उस समय के दीवान, सर शेषाद्रि अय्यर ने शामशास्त्री की सहायता की और उनकी प्रतिभा को निखारा। वे पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में मैसूर के गवर्नमेंट ओरिएंटल पुस्तकालय में नियुक्त हो गए।
यह पुस्तकालय 1891 में स्थापित हुआ था और यहां हज़ारों संस्कृत ताड़ के पत्तों की पाण्डुलिपियाँ रखी गई थीं। पुस्तकालयाध्यक्ष के तौर पर, शामाशास्त्री जी प्रतिदिन इन पाण्डुलिपियों की विषयसामग्री को देखने, कैटलॉग करने और विश्लेषित करने का मौका मिला।
1905 में उन्होंने ने ताड़पत्रों के एक समूह से अर्थशास्त्र (ग्रन्थ) की खोज की। 1909 में उन्होंने इसके संस्कृत संस्करण को सम्पादित और प्रकाशित किया। बाद में उन्होंने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और 1915 में इसे भी प्रकाशित किया।
यह पाण्डुलिपि इस पुस्तकालय को तंजोर जिले के एक पंडित से प्राप्त हुई थी। इसके बाद अर्थशास्त्र की अन्य पाण्डुलिपियाँ भी भारत के दूसरे भागों से भी प्राप्त हुईं। अर्थशास्त्र ग्रन्थ के बारे में तब तक केवल दण्डी, बाणभट्ट, विष्णुशर्मा, मल्लिनाथसूरि, मेगस्थनीज आदि द्वारा लिखी बातों से ही पता चला था। यह प्राचीन भारतीय राजनीति के इतिहास को प्रकाशित करने वाली एक अहम घटना थी। इसने प्राचीन भारत की समझ को बदल दिया और इतिहास की शिक्षा का रास्ता भी बदल दिया। इसने विशेषकर यूरोपीय विद्वानों की इस गलतफहमी को सही किया कि भारतीयों ने सरकार चलाने की कला यूनानियों से सीखी थी।
अर्थशास्त्र ग्रन्थ का फ्रेंच, जर्मन और कई दूसरी भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
उन्होंने मैसूर ओरिएंटल लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। 1912 से 1918 तक उन्होंने बेंगलुरु में संस्कृत महापाठशाला के प्रिंसिपल के तौर पर काम किया। वे 1918 में क्यूरेटर के तौर पर और बाद में मैसूर में आर्कियोलॉजिकल रिसर्च के डायरेक्टर के तौर पर गवर्नमेंट मैसूर ओरिएंटल लाइब्रेरी में लौट आए। 1929 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे वहीं कार्य करते रहे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र की खोज के अलावा उन्होंने वैदिक काल और वैदिक खगोल विज्ञान पर भी शोध किया और वैदिक अध्ययन में बहुमूल्य योगदान दिया।
कृतियाँ
[संपादित करें]शामाशास्त्री की कृतियों में मुख्य निम्नलिखित हैं-
- वेदाङ्गज्यौतिष्य
- द्रप्सा -- वैदिक काल में ग्रहण का विश्लेषण
- Eclipse-Cult in the Vedas, Bible, and Koran -- द्रप्सा का परिशिष्ट
- गवम अयन
- Evolution of Indian Polity : यह पुस्तक उन दस व्याख्यानों पर आधारित है जो उन्होंने सर आशुतोष मुखर्जी के निमन्त्रण पर कलकत्ता विश्वविद्यालय में दिये थे।
- The Origin of Devanagari Alphabets (देवनागरी वर्णों की उत्पत्ति)
उन्होंने कन्नड भाषा में उपलब्ध अनेक ग्रन्थों का भी सम्पादन किया।
- रुद्रभास का जगन्नाथविजय (1923)
- नयसेन का धर्मामृत (1924 में भाग-१ तथा 1926 में भाग-२)
- लिंगन्नाकवि का केलादिनृपविजय (1921)
- गोविंदवैद्य का कण्ठीरावणरसराजविजय (1926)
- कुमारव्यास कृत कर्नाटक महाभारत का विराटपर्व (1920)
- कुमारव्यास कृत कर्नाटक महाभारत का उद्योगपर्व (1922)
सम्मान एवं पुरस्कार
[संपादित करें]आशुतोष मुखर्जी, रवींद्रनाथ टैगोर आदि ने शामाशास्त्री के योगदान की प्रशंशा की। महात्मा गांधी जब मैसूर आये थे तब नंदी हिल्स में शामाशास्त्री जी से मिले थे।
- १९१९ में वाशिंगटन डीसी के ओरिएन्टल विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी
- १९२१ में कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी
- रॉयल एशियाटिक सोसायटी के सदस्य नियुक्त हुए।
- कैम्पबेल स्मारक स्वर्ण पदक जीता।
- मैसूर के महाराजा ने उन्हें अर्थशास्त्र विशारद की उपाधि से विभूषित किया।
- अंग्रेज सरकार ने उन्हें महामहोपाध्याय की उपाधि से अलंकृत किया।
- वाराणसी संस्कृत मण्डली द्वारा विद्यालंकार तथा पण्डितराज की उपाधि से सम्मानित।