राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली

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राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान चिह्न

स्थापित १५ अक्टूबर १९७०
प्रकार: लोक सेवा
अवस्थिति: दिल्ली, भारत
परिसर: नगरीय
कुलपति: श्री ए. पी. सच्चिदानन्द
सम्बन्धन: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
जालपृष्ठ: www.sanskrit.nic.in


राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान है। यह भारत सरकार द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित मानित विश्वविद्यालय है। भारत सरकार ने संस्कृत आयोग (1956-1957) की अनुशंसा के आधार पर संस्कृत के विकास तथा प्रचार-प्रसार हेतु संस्कृत सम्बद्ध केन्द्र सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के उद्देश्य से 15 अक्टूबर 1970 को एक स्वायत्त संगठन के रूप में इसकी स्थापना की। 7 मई 2002 को मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार ने इसे बहुपरिसरीय मानित विश्वविद्यालय के रूप में घोषित किया।

अनुक्रम

उद्देश्य[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के संस्था के बहिर्नियम (Memorandum of Association) में घोषित उद्देश्य इस प्रकार है-

संस्थान की स्थापना के उद्देश्य पारम्परिक संस्कृत विद्या व शोध का प्रचार, विकास व प्रोत्साहन है और उनका पालन करते हुएः-

  1. संस्कृत विद्या की सभी विधाओं में शोध का आरम्भ, अनुदान, प्रोत्साहन तथा संयोजन करना है, साथ-साथ शिक्षक-प्रशिक्षण तथा पाण्डुलिपि विज्ञान आदि को भी संरक्षण देना जिससे पाठमूलक प्रासंगिक विषयों में आधुनिक शोध के निष्कर्ष के साथ सम्बन्ध स्पष्ट किया जा सके तथा इनका प्रकाशन हो सके।
  2. देश के विविध भागों में केन्द्रीय संस्कृत परिसरों की स्थापना, अधिग्रहण तथा संचालन करना और समान उद्देश्यों वाली अन्य संस्थाओं को संस्थान से सम्बद्ध करना।
  3. केन्द्रीय प्रशासनिक संकाय के रूप में इसके द्वारा स्थापित अथवा अधिगृहीत समस्त केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठों का प्रंबन्धन तथा उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में अधिकाधिक प्रभावी सहयोग करना जिससे विशिष्ट क्षेत्रों में विद्यापीठों के बीच कर्मचारियों, छात्रों व शोध और राष्ट्रिय कार्य-विभाजन के अन्तर्बदल और स्थानान्तरण को सुसाध्य एवं तर्कसंगत बनाया जा सके।
  4. संस्कृत के संवर्धनार्थ भारत सरकार के केन्द्रीय अभिकरण (Nodal Agency) के रूप में उनकी नीतियों एवं योजनाओं को लागू करना।
  5. उन शैक्षणिक क्षेत्रों में अनुदेश एवं प्रशिक्षण का प्रबन्ध करना जो निर्धारित मानदण्डों को पूरा करते हों और संस्थान जिन्हें उचित समझता हो।
  6. शोध एवं ज्ञान के प्रसार एवं विकास के लिए समुचित मार्गदर्शन एवं व्यवस्था करना।
  7. प्राचीर-बाह्य (Extra-mural) अध्ययन, विस्तारित योजनाएँ एवं दूरस्थ क्रिया-कलाप जो समाज के विकास में योगदान देते हों, उनका उत्तरदायित्व लेना।
  8. इसके अतिरिक्त उन सभी उत्तरदायित्वों एवं कार्यो का निष्पादन करना जो संस्थान के उद्देश्यों को आगे बढाने के लिए आवश्यक या वांछित हो।

केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मन्त्री संस्थान का कुलाध्यक्ष (President) होता है। प्रबन्धनपरिषद संस्थान की सर्वश्रेष्ठ नीति-निर्धारक परिषद है। राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान का कुलपति जोप्रबन्धन परिषद का अध्यक्ष होता है, संस्थान का मुख्य शैक्षणिक एवं प्रशासनिक अधिकारी है।

गतिविधियाँ[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान निम्नलिखित कार्यक्रमों के क्रियान्वयन हेतु कृतसंकल्प है।

  • देश के विभिन्न राज्यों में केन्द्रीय संस्कृत परिसरों की स्थापना।
  • प्राथमिक स्तर से स्नातकोत्तर स्तर तक परम्परागत पद्धति से संस्कृत के अध्ययन, अध्यापन को संचालित करना एवं विद्यावारिधि उपाधि प्राप्ति हेतु शोधकार्य का प्रबन्ध करना।
  • स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए सेवापूर्ण शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन करना।
  • स्वैच्छिक एवं संयुक्त परियोजनाओं को लागू करने में अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं के साथ सहयोग स्थापित करना।
  • पाण्डुलिपि संग्रहालय की स्थापना के साथ-साथ अप्राप्य एवं दुर्लभ पाण्डुलिपियों एवं महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सम्पादन और प्रकाशन आदि की व्यवस्था करना।
  • संस्कृत के मौलिक ग्रन्थों के प्रकाशन हेतु अनुदान देना।
  • संस्कृत में प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं को अनुदान देकर प्रोत्साहित करना।
  • अंगीभूत परिसरों एवं देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को संस्कृत पढने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करना।
  • संस्कृत के प्रकाशित उपयोगी ग्रन्थों को खरीदकर विभिन्न संस्थाओं में निःशुल्क वितरण करना।
  • पारम्परिक पद्धति से प्राथमिक (प्रथम) स्तर से स्नातकोतर (आचार्य) स्तर पर्यन्त परीक्षाओं का आयोजन करना।
  • संस्कृत शिक्षण के संवर्धन हेतु देश के विभिन्न भागों में पारम्परिक पद्धति से संस्कृत शिक्षणरत संस्थाओं को संबद्धता प्रदान करना।
  • देश की संस्कृत सेवी संस्थाओं को लाभ पहुंचाने के लिए अवकाश प्राप्त अनुभवी संस्कृत विद्वानों की शास्त्रचूडामणि योजना के अन्तर्गत नियुक्त कर, विभिन्न संस्थाओं में पदस्थापित करना।
  • कार्यरत संस्कृत प्राध्यापकों के ज्ञानवर्धन हेतु पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का आयोजन करना।
  • समय समय पर देश एवं विदेश स्तर पर विश्व संस्कृत सम्मेलन जैसे बृहत् कार्यक्रमों की।

कार्यकृत्य[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान निम्नलिखित कार्यो के लिए सदा प्रयत्नशील है--

शिक्षण[संपादित करें]

संस्थान के अंगभूत परिसरों में संस्थान द्वारा निर्मित पाठ्यक्रम के आधार पर प्राक्-शास्त्री से लेकर आचार्य स्तर का शिक्षण प्रदान किया जाता है। संस्थान द्वारा संचालित और संस्थान से सम्बद्ध संस्कृत संस्थाएँ भी उक्त पाठ्यक्रम के अनुसार अध्यापन-कार्य सम्पन्न करती हैं।

प्रशिक्षण[संपादित करें]

परिसरों में शिक्षण अभ्यास पर बल देते हुए एक शैक्षणिक सत्र के शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का संचालन किया जाता है जिससे संस्कृत में शिक्षा आचार्य (एम.एड.) एवं शिक्षा शास्त्री (बी.एड.) उपाधि प्रदान की जाती है।

शोध[संपादित करें]

  • सभी परिसरों में छात्रों का शोध हेतु पंजीयन संस्थान द्वारा आयोजित अखिल भारतीय प्रवेश-परीक्षा में सफलता के आधार पर या नेट् उत्तीर्णीता के आधार पर होता है और शोध-कार्य के सफल समापन पर उन्हें विद्यावारिधि (पी0 एच0 डी0) की उपाधि प्रदान की जाती है।
  • संस्थान संस्कृत वाङ्मय के विभिन्न अंगों पर शोध कार्यक्रमों का उत्तरदायित्व निर्वहण करता है।
  • दुर्लभ संस्कृत पाण्डुलिपियों के सम्पादन प्रकाशन का कार्य करता है।
  • गङ्गानाथ झा परिसर, इलाहाबाद का एकमात्र उद्देश्य चयनित शाखाओं में शोध एवं सम्पादन है।

प्रकाशन[संपादित करें]

  • अपने अंगभूत परिंसरों द्वारा सम्पादित शोध-ग्रन्थों और दुर्लभ संस्कृत पाण्डुलिपियों का प्रकाशन करता है।
  • संस्थान मुख्यालय द्वारा ‘संस्कृत-विमर्श’ नामक अर्धवार्षिक तथा गङ्गानाथ झा परिसर द्वारा त्रैमासिक शोध-पत्रिका और उशती नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन।
  • मौलिक संस्कृत ग्रन्थों के प्रकाशन हेतु विद्वानों एवं संस्थाओं को 80 प्रतिशत आर्थिक सहायता प्रदान करता है।
  • प्रकाशकों के माध्यम से अप्राप्य तथा दुर्लभ संस्कृत ग्रन्थों के प्रकाशनार्थ आर्थिक सहायता दी जाती है।
  • संस्थान समय-समय पर विभिन्न ग्रन्थमालाओं का प्रकाशन करता है। अब तक संस्थान का निम्नलिखित ग्रन्थमालाएँ आरम्भ की जा चुकी हैः-

· रजत जयन्ती ग्रन्थमाला · स्वतन्त्र भारत स्वर्ण जयन्ती ग्रन्थमाला · संस्कृत वर्ष स्मृति ग्रन्थमाला

संस्कृत पाण्डुलिपियों का संग्रहण एवं संरक्षण[संपादित करें]

  • संस्थान संस्कृत पाण्डुलिपियो का संग्रह तथा संरक्षण करता है। शुल्क के आधार पर संस्थाओं को पाण्डुलिपियों की प्रतियाँ भी उपलब्ध कराता है।
  • गङ्गानाथ झा परिसर के पाण्डुलिपि-संग्रहालय में विभिन्न शास्त्रों से सम्बन्धित पचास हजार से भी अधिक पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं।

पत्राचार एवं अनौपचारिक रीति से संस्कृत शिक्षण, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा स्वाध्याय सामग्री का निर्माण[संपादित करें]

वर्तमान में निम्नलिखित कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं :-

पत्राचार के माध्यम से संस्कृत -

देश-विदेश के प्रारम्भिक संस्कृत शिक्षणार्थियों को हिन्दी एवं अंग्रेजी माध्यम भाषा सिखाने हेतु द्विवर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम का संचालन करता है।

अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण -

संस्थान अखिल भारतीय स्तर पर अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण केन्द्रों के माध्यम से क्रमिक संस्कृत स्वाध्याय सामग्री जिसे दीक्षा पाठ्यक्रम कहते है, का संचालन करता है।

संस्कृत भाषा शिक्षक प्रशिक्षण -

संस्कृत संस्कृत भाषा शिक्षण हेतु अखिल भारत स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है।

शास्त्रीय ग्रन्थों का उन्नत शिक्षण -

संस्थान शास्त्रीय ग्रन्थों के विशिष्ट अध्ययन एवं शिक्षण हेतु विशिष्टाध्ययन कार्यक्रम का आयोजन करता है।

स्वाध्याय सामग्री का निर्माण -

संस्थान भाषा संस्कृत शिक्षण की मुद्रित एवं इलेक्ट्रानिक सामग्री का निर्माण एवं उसका प्रचार-प्रसार भी करता है।

इलेक्ट्रानिक माध्यमों से संस्कृत कार्यक्रमों का प्रसारण[संपादित करें]

संस्थान इन्दिरा गाँधी राष्ट्रिय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के ज्ञानदर्शन के भाषा-मन्दाकिनी चैनल के माध्यम से एवं प्रसार भारती के डी0 डी0 भारती, डी0 डी0 इण्डिया चैनल से संस्कृत कार्यक्रम प्रसारित करता है।

पारम्परिक पद्धति से संस्कृत शिक्षण हेतु पाठ्यक्रम-निर्धारण[संपादित करें]

अपने परिसरों तथा सम्बद्ध संस्थाओं में पारम्परिक पद्धति से संस्कृत शिक्षण हेतु प्रथमा से आचार्य (शास्त्री, शिक्षा-शास्त्री, आचार्य) तक सभी कक्षाओं के पाठ्यक्रम का निर्धारण करता है।

परीक्षा[संपादित करें]

  • संस्थान सम्बद्ध संस्थाओं द्वारा संचालित संस्थान के समस्त पाठ्यक्रमों के लिए परीक्षाओं का आयोजन करता है। उत्तरमध्यमा/प्राक्शास्त्री (12वीं), शास्त्री (बी.ए.) और आचार्य (एम0 ए0) के प्रमाण-पत्र/उपाधियाँ प्रदान करता है। कक्षा में सर्वप्रथम एवं अपने-अपने शास्त्र में सर्वप्रथम आने वाले छात्रों को स्वर्णपदक प्रदान किया जाता है।
  • शिक्षा-शास्त्री पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु अखिल भारतीय पूर्वशिक्षाशास्त्री प्रवेश परीक्षा (पी.एस.एस.टी.) का आयोजन करता है।
  • परिसरों एवं सम्बद्ध संस्थाओं के शोध-कर्ताओं को उनके शोध-प्रबन्ध के मूल्याकंन तथा मौखिक परीक्षण के पश्चात् विद्यावारिधि (पी.एच.डी.) की उपाधि प्रदान करता है।

परिसरों की स्थापना[संपादित करें]

संस्थान पारम्परिक पद्धति से संस्कृत शिक्षण हेतु देश के विविध प्रान्तों में अपने परिसरों की स्थापना, अधिग्रहण व संचालन करता है। वर्तमान में संस्थान के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय के अतिरिक्त ग्यारह (11) अंगभूत परिसर है। संस्थान के अन्तर्गत अभी तक निम्नलिखित परिसर देश के विभिन्न राज्यों में संस्कृत विद्या के केन्द्र के रूप मे काम कर रहे है।

  • 1. गंगानाथ झा परिसर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
  • 2. श्री रणवीर परिसर, जम्मू और कश्मीर
  • 3. श्री सदाशिव परिसर, पुरी, उडीसा
  • 4. गुरूवायूर परिसर, पुरानाटुकरा, त्रिचूर, केरला
  • 5. जयपुर परिसर, जयपुर, राजस्थान
  • 6. लखनऊ परिसर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
  • 7. राजीव गांधी परिसर, श्रृंगेरी, कर्णाटक
  • 8. वेदव्यास परिसर, गरली, हिमाचल प्रदेश
  • 9. भोपाल परिसर, भोपाल, मध्य प्रदेश
  • 10. के. जे. सौमैया संस्कृत विद्यापीठ, मुम्बई परिसर, मुम्बई, महाराष्ट्र
  • 11. एकलव्य परिसर, अगरतला, त्रिपुरा

छात्रवृत्तियाँ[संपादित करें]

संस्थान देश भर में अपने अंगभूत परिसरों तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में अध्ययनरत संस्कृत के सुयोग्य छात्रों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान करता है। ये छात्रवृत्तियाँ दो प्रकार की हैः

  • उच्चमाध्यमिकोत्तर छात्रवृत्तियाँ (स्नातकोत्तर स्तर तक)
  • शोध छात्रवृत्तियाँ

केन्द्र सरकार की योजनाएँ[संपादित करें]

संस्थान संस्कृत भाषा और साहित्य के संवर्धन तथा प्रचार हेतु मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रवर्तित निम्नलिखित विविध योजनाओं का कार्यान्वयन करता हैः –

शास्त्र चूडामणि योजना -

इस योजना के अन्तर्गत संस्कृत के विख्यात सेवा-निवृत्त विद्वानों को संस्थान के परिसरों तथा अन्य संस्कृत संस्थाओं में दो वर्ष की अवधि (एक वर्ष के लिए वर्धनीय) के लिए नियुक्त किया जाता है। वे शिक्षकों और छात्रों को संस्कृत वाङ्मय के विभिन्न शास्त्रों/विद्या विशेषों में गहन शिक्षण प्रदान करते हैं।

ग्रन्थ-क्रय योजना -

इस योजना के अधीन संस्थान लेखकों और प्रकाशकों से संस्कृत ग्रन्थों का क्रय करके संस्कृत संस्थाओं को निःशुल्क वितरित करता है।

संस्कृत शब्दकोश परियोजना -

ऐतिहासिक सिद्धान्तों के आधार पर 1500 ई.पू. से 1900 ई. तक की अवधि का एक अति व्यापक संस्कृत शब्दकोश डेकन कालेज, पूना के द्वारा तैयार किया जा रहा है जिसे वित्तीय सहायता दी जाती है।

व्यावसायिक प्रशिक्षण योजना -

इस योजना के अन्तर्गत चुने हुए संगठनों को ज्योतिष, कर्म-काण्ड, पुरालिपि-शास्त्र, सूची-निर्माण, पाण्डुलिपि विज्ञान, संस्कृत आशुलिपि और टङ्कण आदि विषयों में कार्यशालाओं के आयोजन हेतु तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

आदर्श संस्कृत महाविद्यालयों/शोध संस्थानों के रूप में मान्यता प्राप्त संस्थाओं को वित्तीय सहायता -

इस योजना के अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में 23 संस्थाएँ संस्थान के अधीन चल रही है। इन संस्थाओं को व्यय की आवर्ती मदों पर 95% तथा अनावर्ती मदों पर 75% अनुदान दिया जाता है।

भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित विद्वानों को मानदेय राशि -

संस्थान भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रतिवर्ष सम्मानित संस्कृत के 15, प्राकृत का 1, अरबी के 3 और फारसी के 3 प्रख्यात विद्वानों में से प्रत्येक को 50,000/- रूपए की वार्षिक मानदेय राशि प्रदान करती है। युवा संस्कृत विद्वान के सम्मानार्थ प्रतिवर्ष एक लाख रूपए का महर्षि बादरायण पुरस्कार आरम्भ किया गया।

अखिल भारतीय वाक्स्पर्धा प्रतियोगिता -

संस्थान प्रत्येक वर्ष देश के विभिन्न भागों में आठ शास्त्रीय विषयों पर अखिल भारतीय वाक्स्पर्धा आयोजित करता है जिससे पारम्परिक संस्कृत छात्रों को शास्त्रीय संस्कृत भाषा में आशु भाषण में प्रोत्साहित किया जा सके। श्लोकान्त्याक्षरी, समस्या-पूर्ति तथा शलाका प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है।

स्वैच्छिक संस्कृत संगठनों को वित्तीय सहायता -

इस योजना के अन्तर्गत चयनित संगठनों को संस्कृत शिक्षकों के वेतन, छात्रों की छात्रवृत्ति, पुस्तकालय अनुदान और संस्था के भवन-निर्माण के रूप में वित्तीय सहायता दी जाती है।

अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग[संपादित करें]

संस्थान अन्तर्राष्ट्रीय समितियों के सहयोग से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत सम्मेलनों का आयोजन करता है। इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि संस्थान ने प्रथम विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली में वर्ष 1972 में, पञ्चम विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन वाराणसी में वर्ष 1981 में और दशम विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन बेंगलूर में 3-9 जनवरी 1997 को किया।

संगठन[संपादित करें]

प्रशासन विभाग[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के मुख्यालय में प्रशासन अनुभाग नियमों, विनियमों और प्रक्रियानुसार आन्तरिक व्यवस्था कार्य करता है। यह संस्थान के विभिन्न अंगीभूत परिसरों को अधिक प्रभावी और कार्यकुशल बनाने हेतु आवश्यक स्थापन सहायता प्रदान करता है। यह अनुभाग प्रमुख रूप से सामान्य प्रशासन, स्थापना सम्बन्धी कार्य, सेवा और भूमि आपूर्ति और भवन अधिग्रहण, नए परिसरों की स्थापना और प्रबन्धन परिषद् तथा वित्त, समिति की बैठकों के संचालन आदि कार्य करता है।

वित्त विभाग[संपादित करें]

वित्त विभाग का समस्त कार्य उपनिदेशक (वित्त) की देखरेख में किया जाता है। संस्थान-मुख्यालय स्थित वित्त विभाग का कार्य आय-व्यय का विवरण तैयार करना, अनुदान की प्राप्ति, मुख्यालय एवं उसके अन्तर्गत परिसरों के पक्ष में उनका वितरण, वित्तीय व्यवस्था और वार्षिक लेखा-विवरण तैयार करना वित्त-विभाग से ही संस्थान एवं परिसरों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भविष्य-निधि को सुरक्षित रखने तथा यथा समय वितरण की व्यवस्था की जाती है। मन्त्रालय एवं संस्थान की योजना के अस्वीकृत पाठ्यक्रमों के छात्र-छात्राओं की छात्रवृत्ति-राशि का वितरण-कार्य, मन्त्रालय की शास्त्रचूडामणि इत्यादि कतिपय योजनाएँ, सम्मानित संस्कृत पण्डितों के लिए मानदेय राशि का भुगतान तथा विभिन्न शोध संस्थानों एवं सम्मान से सम्मानित विद्वज्जनों के लिए देय वार्षिक राशि का वितरण भी संस्थान के वित्त विभाग से ही जाता है।

शैक्षणिक विभाग[संपादित करें]

इस विभाग के महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व हैः -

  • संस्थान के शैक्षिक क्रियाकलापों को सुव्यवस्थित करना और विभिन्न कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रमों का निर्माण करना।
  • विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम बनाने के लिए विभिन्न विषयों की समितियों का गठन करना।
  • विद्वत् परिषद् की बैठक व अध्ययन परिषद् की बैठक के आयोजन का समन्वय करना और अनुवर्ती कार्रवाई करना।
  • यह अनुभाग शैक्षणिक कार्य-निष्पादन और शैक्षणिक कार्यक्रम के कैलेण्डर निर्माण हेतु मानकों के निर्धारण के लिए भी उत्तरदायी है।

परीक्षा विभाग[संपादित करें]

इस अनुभाग का मुख्य दायित्व, विभिन्न परीक्षाओं का आयोजन तथा संस्थान के परीक्षा पत्रों का मूल्यांकन संस्थान के द्वारा प्रथमा से आचार्य, शिक्षाशास्त्री तथा विद्यावारिधि जैसी विभिन्न परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। इन परीक्षाओं में अंगीभूत परिसरों तथा सम्बद्ध संस्थाओं के छात्र प्रवेश पाते है। ये परीक्षा शैक्षिक परिषद् द्वारा निर्धारित मार्गदर्शी सिद्धान्तों और इस उद्देश्य से निर्धारित पाठ्यक्रमों के अनुसार संचालित की जाती है।

योजना विभाग[संपादित करें]

इस विभाग द्वारा संस्कृत के प्रचार के लिए मंत्रालय के विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है-

  • स्वैच्छिक संस्कृत संगठनों को वित्तीय सहायता:-

इस योजना के अन्तर्गत संगठन/संस्थाओं को संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए किए जा रहे क्रियाकलापों और उनका विस्तार करने या नई योजनाएं बनाने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।

  • अखिल भारतीय वाक्स्पर्धा:-

इस योजना के अन्रगत अखिल भारतीय स्तर पप आठ सास्त्कीय विषयों मे वाक्स्पर्धाओं का औयोजन किया जाता है। साथ ही अन्त्याक्षरी एवं सम्स्यापूर्ति स्पर्धाएं थभी आयोजित की जाती है, जिनमें देश क सभी प्रान्तों से छात्र भाग लेते है।

  • शास्त्रचूडामणि योजना:-

संस्कृत भाषा मे उपलब्ध विभिन्न शास्त्रों में शिक्षकों तथा शोध छात्रों के विशेष मार्गदर्शन के लिए विद्यापीठों एवं अन्य संस्कृत संस्थाओं में सुप्रसिद्ध सेवा निवृत्त संस्कृत विद्वानों को इस योजना के अन्तर्गत दो वर्ष के लिए (एक वर्ष की सम्भावित वृद्धि) नियुक्त किया जाता है।

  • व्यावसायिक प्रशिक्षण योजना:-

इस योजना के अन्तर्गत संस्कृत छात्रों के लिए ज्योतिष, कर्मकाण्ड, पुरालिपिशास्त्र, पाण्डुलिपि विज्ञान, संस्कृत आशुलिपि-टंकण आदि का अल्पकालिक व्यावसायिक प्रशिक्षण संचालित करने के लिए संस्कृत संस्थाओं को आर्थिक अनुदान दिया जाता है।

  • संस्कृतशब्दकोश परियोजना:-

इस योजना के अन्तर्गत ऐतिहासिक सिद्धान्त के आधार पर विश्वकोष के समान संस्कृतशब्दकोष के निर्माण एवं प्रकाशन के लिए डेकन कालेज पुना को वार्षिक अनुदान दिया जाना एक अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व का कार्य है। सम्प्रति इसके चार खण्ड (2446) पृष्ठ प्रकाशित हो चुके है।

  • सुप्रसिद्ध संस्कृत, अरबी और फारसी के विद्वानों को राष्ट्रीय सम्मान:-

प्रतिवर्ष देश के सुप्रसिद्ध संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा के विद्वानों का उनकी विशिष्ट सेवा के आधार पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रपति सम्मान के लिए चयन किया जाता है तथा इन्हें आजीवन प्रतिवर्ष 50.000 रू0 सम्मान राशि दी जाती है।

  • आदर्श संस्कृत महाविद्यालय/ शोध संस्थान योजना:-

इस योजना के अन्तर्गत देश में संस्कृत शिक्षण के प्रोत्साहनार्थ उसके प्रचार-प्रसार में संलग्न संस्कृत पाठशालाओं/महाविद्यालयों को संस्थान द्वारा स्वीकृत किया जाता है। इन्हें 15 प्रतिशत का आवर्ती अनुदान और 75 प्रतिशत अनावर्ती अनुदान दिया जाता है। इनका प्रसासन प्रबन्ध समिति के द्वारा किया जाता है।

आदर्श पाठशाला योजना के तहत सम्प्रति देश भर में 23 आदर्श महाविद्यालय है:-

  1. स्वामी परांकुशाचार्य आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हुलासगंज, जिला-गया (बिहार)
  2. लक्ष्मीदेवी शराफ आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, कालीरेखा, जिला-देवधर-814112(बिहार)
  3. जगदीश नारायण ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत महाविद्यालय, लगमा रो़ड, जिला-दरभंगा (बिहार)
  4. राजकुमारी गणेश शर्मा आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, कोलहन्टा पटोरी, जिला-दरभंगा-846003(बिहार)
  5. श्री रंगलक्ष्मी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, वृन्दावन (मथुरा)
  6. भगवान दास संस्कृत महाविद्यालय, पोस्ट-गुरुकुल कांगडी, जिला-हरिद्वार (उत्तर प्रदेश)
  7. श्री एकरसानन्द संस्कृत महाविद्यालय, जिला-मैनपुरी-205001 (उत्तर प्रदेश)
  8. हिमाचल आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, जांगला रोहरूद्ध, जिला-शिमला, (हिमाचल प्रदेश)
  9. सनातन धर्म आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, डोगी, जिला-उना-174307 (हिमाचल प्रदेश)
  10. हरियाणा संस्कृत विद्यापीठ, पोस्ट-बघोला (पलवल) जिला-फरीदाबाद-121102 (हरियाणा)
  11. श्री दीवान कृष्ण किशोर सनातन धर्म आदर्श संस्कृत महाविद्यालय (लाहौर), अम्बाला केन्ट-133001(हरियाणा)
  12. मुम्बादेवी संस्कृत महाविद्यालय, द्वारा-भारतीय विद्या भवन, के.एम. मुंशी मार्ग, मुम्बई-400007(महाराष्ट्र)
  13. वैदिक संशोधन मण्डल, तिलक विद्यापीठ नगर, पुणे-37 (महाराष्ट्र)
  14. पूर्णप्रज्ञा संशोधन काथीगुप्पा मेन रोड, बैंगलूर – 560 029 (कर्नाटक)
  15. कालीकट आदर्श संस्कृत महाविद्यालय बालुसेरी, पोस्ट-बालुसेरी, जिला- कालीकट 673 612 (केरल)
  16. मद्रास संस्कृत कालेज एवं एस. एस. वी पाठशाला, 84 रायपेठा हाई रोड, मैलापुर, मद्रास – 600 004 (तमिलनाडु)
  17. श्री सीता राम वैदिक आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, 7/2 पी. डब्लू. डी. रोड, कलकता-700 035 (पश्चिम बंगाल)
  18. राम जी मेहता आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, मालीघाट, मुजफ्फर पुर, (बिहार)
  19. कालिया चौक विकराम किशोर आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, गांव कालिया चौक, पी. ओ. हरिया, डिस्ट्रिक्ट मिदना पुर, पश्चिम बंगाल – 721 430
  20. रानी पद्मावती तारा योगतंत्र आदर्श महाविद्यालय, इन्द्रापुर (शिवपुर) वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  21. श्री अहोबिल मठ संस्कृत महाविद्यालय, मुद्रन्तकम्, तमिलनाडु
  22. संस्कृत अकादमी, ओसमानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
  23. चिन्मय फाऊन्डेशन, (शोध संस्थान) आदि शंकरा निलयम्, पोस्ट्-वेलीयानन्द, डिस्टी-एरनाकुलम्, केरल - 682 319

पाठ्यक्रम[संपादित करें]

यहां उपलब्ध पाठ्यक्रमों में निम्न हैं:-

  • प्राक-शास्त्रि
  • शास्त्रि
  • विद्या-वारिधि
  • शिक्षा-शास्त्रि
  • आचार्य

प्रवेश[संपादित करें]

इस अनुभाग का मुख्य दायित्व, विभिन्न परीक्षाओं का आयोजन तथा संस्थान के परीक्षा पत्रों का मूल्यांकन संस्थान के द्वारा प्रथमा से आचार्य, शिक्षाशास्त्रि तथा विद्यावारिधि जैसी विभिन्न परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। इन परिक्षाओं में अंगीभूत परिसरों तथा सम्बद्ध संस्थाओं के छात्र प्रवेश पाते है। ये परीक्षा शैक्षिक परिषद् द्वारा निर्धारित मार्गदर्शी सिद्धान्तों और इस उद्देश्य से निर्धारित पाठ्यक्रमों के अनुसार संचालित की जाती है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]