रायसेन ज़िला

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रायसेन भारत राज्य "मध्य प्रदेश रायसेन जिले का एक शहरऔर नगर पालिका है।  यह रायसेन जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है।रायसेन जिले में घूमने के लिए प्रसिद्ध स्थान रायसेन किला दरगाह और साँची का स्तूप हैं।  रायसेन राज्य की राजधानी भोपाल से 45.5 किमी दूर है।

रायसेन ज़िला
MP Raisen district map.svg

मध्य प्रदेश में रायसेन ज़िले की अवस्थिति
राज्य मध्य प्रदेश
 भारत
प्रभाग रायसेन
मुख्यालय रायसेन
क्षेत्रफल 8,395 कि॰मी2 (3,241 वर्ग मील)
जनसंख्या 1,331,699 (2011)
जनघनत्व 157/किमी2 (410/मील2)
साक्षरता 74.26 per cent
लिंगानुपात 899
तहसीलें 09
लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र Vidisha
विधानसभा सीटें 4
राजमार्ग NH12
औसत वार्षिक वर्षण 1191.1मिलीमीटर मिमी
आधिकारिक जालस्थल

इतिहास[संपादित करें]

स्थान और सीमाएं : रायसेन जिले मध्य प्रदेश के मध्य भाग में स्थित है। जिला अक्षांश 23°19’ उत्तर और देशांतर 77°47' पूर्व के बीच स्थित है। यह नरसिंहपुर जिले के दक्षिण-पूर्व में, सागर ज़िला जिले से उत्तर-पूर्व में, विदिशा ज़िला जिले के उत्तर में, सिहोर जिले से पश्चिम में घिरा है, और होशंगाबाद ज़िला और सीहोर जिले के दक्षिण में है। जिले का कुल क्षेत्रफल 8395 वर्ग किमी है जो की राज्य के क्षेत्रफल का 1.93% शामिल हैं।.

नाम की उत्पत्ति :एक मजबूत किले के साथ रायसेन हिन्दू काल एवं नींव की अवधि से प्रशासन का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। पंद्रहवीं सदी में इस किले पर मांडू के बहादुरशाह का शासन था। 1543 में शेरशाह सूरी ने गौंड राजा पूरणमल शाह से कब्जा कर लिया। अकबर के समय में रायसेन मालवा में सरकार का एक मुख्यालय था।

इतिहास: मुगल काल के दौरान खामखेड़ा क्षेत्र मुख्यालय गैरतगंज तहसील में पड़ता था। शाहपुर, परगना का मुख्यालय था, बाद में उसे सगोनि पर स्थानांनतरित कर दिया गया जो की बेगमगंज तहसील में आता है । भोपाल के भारत के संघ के 'सी' राज्य बनने के बाद रायसेन जिलामुख्यालय के साथ, 5 मई 1950 को अस्तित्व में आया.


क्षेत्रफल - 8395 वर्ग कि.मी.

जनसंख्या - (2001 जनगणना) १३०००००

साक्षरता - ६७

एस. टी. डी (STD) कोड ०७४८२ -

जिलाधिकारी - श्री अरविंद दुबे

समुद्र तल से उचाई -

अक्षांश - 23°19'उत्तर

देशांतर - 77°47'पूर्व

औसत वर्षा - 1197.1मि.मी.

दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

भोजपुर, मध्य प्रदेश[संपादित करें]

प्राचीन काल का यह नगर "उत्तर भारत का सोमनाथ' कहा जाता है। यह स्थान भोपालसे २५ किमी की दूरी पर रायसेन जिले में वेत्रवती नदी के किनारे बसा है। गाँव से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल शिव मंदिर है। इस नगर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज (१०१० ई.- १०५३ ई.) ने किया था। अतः इसे भोजपुर, मध्य प्रदेश मंदिर या भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर पूर्ण रुपेण तैयार नहीं बन पाया। इसका चबूतरा बहुत ऊँचा है, जिसके गर्भगृह में एक बड़ा- सा पत्थर के टूकड़े का पॉलिश किया गया लिंग है, जिसकी ऊँचाई ३.८५ मी. है। इसे भारत के मंदिरों में पाये जाने वाले सबसे बड़े लिंगों में से एक माना जाता है।

साँची का स्तूप[संपादित करें]

प्राचीन काल का यह नगर * भोपाल से ४५ किमी की दूरी पर रायसेन जिले में वेत्रवती नदी के किनारे बसा है। नगर से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल बोद्ध स्तूप है। इस स्तूप में भगबान बोद्ध की अस्थिया रखी हुइ है।

भीमबेटका शैलाश्रय[संपादित करें]

भीमबेटका (भीमबैठका) भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त के रायसेन जिले में स्थित एक पुरापाषाणिक आवासीय पुरास्थल है। यह आदि-मानव द्वारा बनाये गए शैल चित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। ये शैलचित्र लगभग नौ हजार वर्ष पुराने हैं। अन्य पुरावशेषों में प्राचीन किले की दीवार, लघुस्तूप, पाषाण निर्मित भवन, शुंग-गुप्त कालीन अभिलेख, शंख अभिलेख और परमार कालीन मंदिर के अवशेष भी यहां मिले हैं। भीम बेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त १९९० में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित किया। इसके बाद जुलाई २००३ में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। ये भारत में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं। ऐसा माना जाता है कि यह स्थान महाभारत के चरित्र भीम से संबन्धित है एवं इसी से इसका नाम भीमबैठका पड़ा। ये गुफाएँ मध्य भारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विन्ध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर हैं।[1]; इसके दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियाँ आरम्भ हो जाती हैं।[2] इनकी खोज वर्ष १९५७-१९५८ में डाक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा की गई थी।

हिंगलाज मंदिर बाड़ी

हिंगलाज मंदिर बाड़ीहिंगलाज]] शक्तिपीठ बाड़ी इसके पीछे यह अंतर्कथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में 'बृहस्पति सर्व' नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाई भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और राजदक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। तदनंतर सम्पूर्ण विश्व को प्रलय से बचाने के लिए जगत के पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने चक्र से सती के शरीर को काट दिया। तदनंतर वे टुकड़े 51 जगहों पर गिरे। वे 51 स्थान शक्तिपीठ कहलाए इन्ही 51 शक्तिपीठ में से पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जहाँ माँ सती की मृत देह का ब्रह्मरंध्र गिरा बह प्रमुखतम शक्तिपीठ आग्नेय माँ हिंगलाज शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुआ इसी की उपपीठ मध्यप्रदेश बाड़ी, रायसेन के उत्तरतट स्थित रामजानकी मन्दिर खाकी अखाडा के समीप स्थित है। माँ हिंगलाज शक्ति पीठ के बारे में कहा जाता है कि ।खाकी अखाडा के महन्तगण सोरों कासगंज की तीर्थयात्रा पर जाते रहे है। सोरोजी के पण्डा श्री प्रेमनारायण के द्वारा लिखित रचना "पण्डावही" में इन महन्तों के नाम उल्लेखित है। "पण्डावही" के अनुसार ब्रह्मलीन "श्री 108 महन्त तुलसीदास" महन्त परम्परा की 12वीं पीढी के महन्त हुये। ये बाडी-मण्डल के महामंडलेश्वर रहे। महंत कविता लिखते थे।"तुलसीमानस शतक" एवं "नर्मदा चालीसा" आपकी प्रसिद्ध रचनाएॅ है। मंहत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,समाजसेवी,संगीतकार,एवं इतिहासविद् थे।खाकी अखाडा के पूर्व संत-महन्त चमत्कारी एवं तपस्वी थे।खाकी अखाडा की मंहत परम्परा में चौथी पीढी के मंहत श्री भगवान दास महाराज "माँ हिंगलाज" को अग्नि स्वरूप में लेकर आये। वर्तमान में श्री रामजानकी मंदिर के पास में धूनी स्थान है वह स्थापना से 150 वर्ष तक अखण्ड धूनी चैतन्य रहने का स्थान हेेै। यह अग्नि ज्योति स्वरूप में मंहत जी पाकिस्तान के बलूचिस्तान (पाकिस्तान) प्रान्त से (जो हिंगलाज माता मन्दिर मूल शक्तिपीठ हैं) लेकर आये थे। श्री मंहत भगवानदास जी, श्री राम के उपासक एवं माॅ जगदम्बा के अनन्य भक्त थे, उनके मन में "माॅ हिंगलाज शक्तिपीठ" के दर्शन की लालसा उठी। महंत अपने दो शिष्यों को साथ लेकर पदयात्रा पर निकल पडे। मंहत लगभग 2 वर्षो तक पदयात्रा करते रहे। अचानक मंहतश्री संग्रहणी-रोग से ग्रषित हो गए, अपितु अपनी आराध्य माँ के दर्शनो की लालसा में पदयात्रा अनवरत जारी रही। एक दिन मंहतश्री अशक्त होकर बैठ गए और माॅ से प्रार्थना करने लगे कि- हे माॅ आपके दर्शनो के बिना में वापिस नहीं जाउगा,चाहे मुझे प्राण ही क्यो त्यागना ना पडे। एक माह तक शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति में जंगली कंदमूल-फल का आहार लेकर अपने संकल्प पर अटल रहे। कहते है कि भगवान भक्तों की कठिन से कठिन परीक्षा लेते है। वर्षा के कारण एक दिन धूनी भी शांत हो गई, जिस दिन धूनी शांत हुई उसके दूसरे दिन प्रातःकाल एक भील कन्या उस रास्ते से अग्नि लेकर निकली और महंत से पूछने लगी कि, बाबा आपकी धूनी में तो अग्नि ही नही है,आप क्यों बैठे हो। बाबा ने अपनी व्यथा उस कन्या को सुनाई। कन्या उन्हे अग्नि देकर अपने मार्ग से आगे बढकर अंतर्ध्यान हो गई। मंहतश्री ने उस अग्नि से धूनी चैतन्य की ओर मन ही मन "माॅ हिंगलाज" से प्रार्थना करने लगे। रात्रि में उनको स्वप्न आया कि भक्त अपने स्थान वापिस लौट जाओ। मैने तुम्हे दर्शन दे दिये हैं। मेरे द्वारा दी गई अग्नि को अखण्ड धूनी के रूप में स्थापित कर "हिंगलाज मंदिर" के रूप में स्थापना कर दी इस प्रकार बाडी नगर में "माॅ हिंगलाज देवी मंदिर" जगदम्बे की "51वी उपशक्ति पीठ" के रूप में स्थापित हुआ।

                       । ।माॅ का चमत्कार।।

 माँ हिंगलाज के चमत्कारों की घटनाएॅ तो अनेक है पर एक घटना का संबंध "खाकी अखाडा" से जुडा है, भोपाल रियासत की बेगम कुदसिया बेगम (1819) के कार्यकाल से है। खाकी अखाडे में 50-60 साधू संत स्थायी रूप से रहते थे। उनके भोजन की व्यवस्था मंहत जी की "रम्मत धर्मसभा" की आय से होती थी। माॅ हिंगलाज के दर्शनार्थिंयो एवं दानदाताओं का इसमें सहयोग रहता था। यह घटना सन् [[1]] के आसपास की है, उस समय नबाब की बेगम कुदसिया का बाडी में केम्प था। "श्री रामजानकी मंदिर" खाकी अखाडे में प्रातः सुप्रभात आरती "जागिये कृपानिधान" एवं सांयकालीन आरती भी "गौरीगायन कौन दिशा से आये, पवनसुत तीव्र ध्वनि" शंख,घंटा,घडियाल एवं नौबत वाद्ययन्त्रों के साथ होती थी। बेगम कुदसिया ने जब यह शोर सुबह-शाम सुना तो बहुत ही क्रोधित हुई ओर मंहत जी को हुक्म भेजा कि जब तक बाड़ी में हमारा केम्प है,यहाॅ पर शोर-शराबा नही होना चाहिये।  हमारी नमाज में खलल पडता है।  मंहत जी ने हुक्म मानने से इन्कार कर दिया और कहा की भगवान की आरती इसी प्रकार होती रहेगी उसका परिणाम कुछ भी हो। मंहत जी का इन्कार सुनकर बेगम बहुत ही क्रोधित हुई।

बेगम पहले ही मंहतजी के चमत्कारों एवं साधना के बारे मे सुन चुकी थी इसलिए उसने परीक्षा लेने के लिए एक थाल में मांस को कपडे से ढककर चार प्यादों सेवक के साथ भोग लगाने मन्दिर भेज दिया जैसे ही प्यादे सेवक मंदिर परिसर के अन्दर आये।  महंत समझ गए। मंहत जी ने एक सेवक भेज कर उसे मुख्यद्वार पर ही रूकवा दिया और एक शिष्य को आज्ञा दी कि अखण्डधूनी के पास जो कमण्डल रखा है उसे लेकर थाल पर जल छिडक दो और  बेगम के सेवको से कह दो कि भोग लग गया हैं। बेगम साहिबा को भोग प्रसाद प्रस्तुत कर दो।  कपडा बेगम के सामने ही हटाना। प्यादे(सेवक) वह थाल लेकर वापस बेगम के पास केम्प में पहूचे और बेगम के सामने थाल रखकर सब किस्सा बयान किया जब बेगम ने थाल का कपडा हटाया तो, उसमें मांस के स्थान पर प्रसाद स्वरूप विभिन्न प्रकार की मिठाईयाॅ मिली। बेगम को आश्चर्य हुआ और महन्त जी से मिलने मंदिर पहुची और कहा कि महाराज मैं आपकी खिदमत करना चाहती हूॅ आप मुझे हुक्म दीजिये आपकी क्या खिदमत करूॅ। इसके बाद  बेगम "माँ हिंगलाज" के चमत्कार से प्रभावित हुई। इसके उपरांत बेगम ने मंदिर के नाम जागीर दान दी। इसके अतिरिक्त 1844 एवं 1868 में भी मन्दिर को जागीर प्राप्त हुई, जो आज मंदिर की संपत्ति है। आज लगभग 65 एकड़ का विस्तृत बगीचा,जिसमें अमरूद,कटहल,नींबू, आम सीताफल इत्यादि लगें हुए है।

एक दुर्घटना के पश्चात उक्त प्राचीन माँ हिंगलाज मन्दिर शक्तिपीठ एक शासकीय ट्रस्ट के रूप में संचालित हो रहा है

                  बाडी नगर के वृद्धजनों में यह घटना "माॅ हिंगलाज" के चमत्कारों  के संदर्भ में कही जाती है। माॅ हिंगलाज का यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण हैं। वहाॅ पहुचकर जैसे ही माॅ की परिक्रमा कर आप दण्डवत करेगे ,वैसे ही मन में अभूतपूर्व शांति का अनुभव प्राप्त होगा।

                । ।मंदिर परिसर में दर्शनीय स्थल।।

1.प्राचीन माॅ हिंगलाज मंदिर के प्रमुख प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही पहले "माॅ हिंगलाज का प्राचीन मंदिर" के दर्शन होंगे। यह मंदिर लगभग 1500 ईस्वी के समय का निर्मित है। मंदिर का शिखर गौड़वाना शैली का बना हुआ है। माॅ की प्रतिमा जगदम्बे की 51वी उपशक्ति-पीठ के रूप में स्थापित हैं। शासकीय हिंगलाज ट्रस्ट के द्वारा "श्री रामजानकी मंदिर" एवं "माॅ हिंगलाज मंदिर" के आसपास काफी विकास कार्य कराये जा रहे है।

2. "माँ हिगलाज मंदिर" से कुछ ही दूरी पर "श्री राम जानकी मंदिर" है,जिसमें हिन्दू धर्म के सम्पूर्ण देवी-देवताओ की अष्टधातु से निर्मित प्रतिमाएं है।

3.मंदिर से नीचे की और आते ही भगवान "श्री गणेश मंदिर" है।

4. "श्री गणेश मंदिर" से कुछ ही दुरी पर "शिवालय" स्थित है।

5. शिवालय के सामने की और पवन पुत्र "श्री हनुमान मंदिर" स्तिथ है। उक्त मंदिर के अतिरिक्त कुछ ही दूरी पर अखण्ड धुनि निरन्तर जल रही है।

7. रामजानकी मन्दिर परिसर में सिद्ध संतो की समाधि स्थित है जिनके दर्शन मात्र से ही असीम शांति का अनुभव मिलता है।

उक्त माँ हिंगलाज शक्तिपीठ विश्व में दो स्थानों बलूचिस्तान(पाकिस्तान) एवं बाड़ी(भारत) में प्रख्यात मंदिर के रूप में स्थित है। "माँ हिंगलाज कि कृपा"

सभी पर बनी रहे।

गोविंद चौहान बाड़ी [[2]]

मृगनाथ गुफा पाटनी बाड़ी

राज्य के पुरातात्विक संग्रहालय, भोपाल स्थलों की सूची में वर्ष 2008 में एक नाम और जुड़ गया जब उज्जैन के विक्रम विश्विद्यालय की पुरातत्व विभाग की टीम ने रायसेन जिले की भीमबेटका गुफ़ा से 80 कि. मी की दूरी पर बाड़ी तहसील के अन्तर्गत पाटनी गांव के समीप मृगनाथ गुफा को खोजा गया।

रहस्यमयी मृगनाथ गुफा यही है रहस्यमयी मृगन्नाथ धाम गुफा जो जाती हैं पाताल लोक,

जिला मुख्यालय रायसेन से 70 किलोमीटर दूर एवं तहसील बाड़ी से 06 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित निम्मार्क आश्रम कासिया पाटनी में मृगनाथ गुफा स्थित है।

विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में स्थित यह सिद्ध साधु संतों की तपोभूमि पर अनेक रहस्य रोमांचक पर्यटन स्थानों से भरा पड़ा है जिसमे प्रमुख रूप से नारद मुनि तपोस्थली, कामधेनु दर्शन, नर्मदा नदी दर्शन, धुनिबाले बाबा जी (खंडवा) साधना स्थली, चाँदीखेड़ी बाले बाबा जी साधना स्थली, कुंडा बाले बाबा समाधि दर्शन, स्नान कुण्ड, रमणीक आश्रम, वनाच्छादित क्षेत्र सहित आदिमानव कालीन शैल चित्र से भरा यह सिद्ध तपोभूमि अपने अंदर अनेक रहस्य को छुपाये हुए है। इसी के नजदीक है रहस्मयी मृगनाथ गुफा जिसके अंदर मिलते है रास्ते और चौराहे जो जाता है पाताल लोक, कोई कहता है आदिमानव कालीन गुफा, रहस्य और रोमांच से भरी कई किलोमीटर तक जमीन के अंदर तक इस गुफा के अंतिम छोर आज तक किसी को नही मिला है, गुफा के अंदर सामान्य भूलभुलैया बाले रास्ते, चौराहे औऱ खुले मैदान सुनकर आश्चर्य होता है लेकिन यह सत्य है इसे ही रहस्यमयी मृगनाथ गुफा के नाम से जाना जाता हैं इस स्थान का महाभारत पुराण में वर्णन मिलता हैं, किवदंती है कि यहाँ नारद मुनि की तपस्थली रही है इस स्थल को जुलाई 2009 में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय की पुरातत्व विभाग की टीम ने इस गुफा को खोजा था।

इसके बाद इसे मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा मध्यप्रदेश की प्रमुख गुफाओं में शामिल किया गया है।

यह एक ऐसी रहस्मयी गुफा है जिसका अंतिम छोर कई किलोमीटर अंदर जाने के बाद भी किसी को नही मिला है मृगनाथ गुफा अनेक रहस्यों को छुपाये हुए है रहस्य और रोमांच से भरभूर अलौकिक मृगनाथ गुफा में एक संकरी सी जगह से सहजता से नहीं बल्कि चट्टानों से चिपक कर ऐसे चलना पड़ता है जैसे छिपकली रास्ता तय कर रही हो, गुफा में प्रवेश पाने के बाद यह यह अलग स्वरूपों में नजर आती है, गुफा के अंदर इतनी भूल भूलैया है कि इसमे किसी स्थानीय जानकार व्यक्ति के साथ टार्चों की रोशनी में प्रवेश स्थल के बाहर रस्सी के एक सिरे को बाँध कर दूसरे सिरे के सहारे जाना पड़ता है ताकि सकुशल वापिसी हो सके कोई भटके नही। गुफा के अंदर है भीमबेटका के समकालीन रोक पेंटिंग्स (शैल चित्र)

शैलाश्रयों की अंदरूनी सतहों में उत्कीर्ण प्यालेनुमा निशान एक लाख वर्ष पुराने हैं। इन कृतियों में दैनिक जीवन की घटनाओं से लिए गए विषय चित्रित हैं। ये हज़ारों वर्ष पहले का जीवन दर्शाते हैं, कई साधु संतों की साधना स्थली रहस्यमयी गुफा के अंदर प्रवेश पाते ही अंदर रास्ते तिराहे चौराहे सब दिखाई देते है यह गुफा देखने मे बहुत सामान्य प्रतीत होती है लेकिन टार्चों आधुनिक संसाधनों की रोशनी में यह सब दिखाई देते है जैसे किसी नागर सभ्यता का यही से उदय हुआ हो, ऋषि मुनियों की साधना स्थली भी अंदर दिखाई पड़ती है।

निम्मार्क आश्रम कासिया पाटनी के संत ग्वाल बाबा ने बताया कि यह गुफा पुरातन काल से योगियों, ऋषि मुनियों की साधना स्थली रही है हम तो वर्षो से ऐसे ही देख रहे है कहा जाता है कि नारद मुनि ने विंध्याचल पर्वत माला की इस गुफा में तपस्या की थी, गुफा के अंदर गणेश जी, हनुमान जी की मूर्तियां और शिवजी के पद चिन्ह विद्धमान है, नागफनी शिला, कामधेनु, नर्मदा की जल धार, गुप्त गंगा, चाँदीखेड़ी बाले बाबा जी की साधना स्थली सातधुनि जैसे रहस्मयी स्थल भी है।

एडवेंचर ट्रेकिंग के शौकीन एवं शोधार्थी पर्यटक, अनेक विश्वविद्यालय से विद्यार्थी यहां शोध करने आते है उत्साही पर्यटक गोविन्द चौहान ने बताया कि यह हमारे नगर से 6 किलोमीटर दूर है इसलिए हम अनेकों बार इस मृगनाथ गुफा में कई आधुनिक संसाधनों के साथ भी जा चुके हैं।

छींद मंदिर

रायसेन जिले की बरेली तहसील से 7 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित है प्रसिद्ध छींद धाम मंदिर

बगलवाडा[संपादित करें]

रायसेन जिले की बरेली तहसील के १० कि.मी. दक्षिण में बगलवाडा स्थित है। यहां नर्मदा नदी के तट पर कई प्राचीन मंदिर है। जिनमें हनुमान मंदिर , रामजानकी मंदिर , मां नर्मदा मंदिर प्रमुख है। यहां पर पांडवों ने यज्ञ किया था उस स्थान को कुंडा महाराज नाम से जाना जाता है।

जामगढ[संपादित करें]

रायसेन जिले की बरेली तहसील में जामगढ आदि मानव की आश्रय स्थली के रूप में जाना जाता है। यहां जामवंत की प्रस्तर गुफा के साथ ही गुफाओं की श्रंखला है। पास में ही भगदेई में खजुराहो शैली का शिव मंदिर है। इस मंदिर को गुर्जर -प्रतिहार वंश कालीन माना जाता है। कई विद्वानों का मानना है कि है यह ऐतिहासिक शिव मंदिर 5 वीं, 6वीं सदी का भी हाे सकता है।

शैलकला एवं शैलचित्र[संपादित करें]

भीमबैठका शैलचित्र

यहाँ ७५० शैलाश्रय हैं जिनमें ५०० शैलाश्रय चित्रों द्वारा सज्जित हैं। पूर्व पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।[1] यह बहुमूल्य धरोहर अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। भीम बैठका क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिलाओं पर लिखी कई जानकारियां मिलती हैं। यहां के शैल चित्रों के विषय मुख्यतया सामूहिक नृत्य, रेखांकित मानवाकृति, शिकार, पशु-पक्षी, युद्ध और प्राचीन मानव जीवन के दैनिक क्रियाकलापों से जुड़े हैं। चित्रों में प्रयोग किए गए खनिज रंगों में मुख्य रूप से गेरुआ, लाल और सफेद हैं और कहीं-कहीं पीला और हरा रंग भी प्रयोग हुआ है।[2]

शैलाश्रयों की अंदरूनी सतहों में उत्कीर्ण प्यालेनुमा निशान एक लाख वर्ष पुराने हैं। इन कृतियों में दैनिक जीवन की घटनाओं से लिए गए विषय चित्रित हैं। ये हज़ारों वर्ष पहले का जीवन दर्शाते हैं। यहाँ बनाए गए चित्र मुख्यतः नृत्य, संगीत, आखेट, घोड़ों और हाथियों की सवारी, आभूषणों को सजाने तथा शहद जमा करने के बारे में हैं। इनके अलावा बाघ, सिंह, जंगली सुअर, हाथियों, कुत्तों और घडियालों जैसे जानवरों को भी इन तस्वीरों में चित्रित किया गया है। यहाँ की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे।[2] इस प्रकार भीम बैठका के प्राचीन मानव के संज्ञानात्मक विकास का कालक्रम विश्व के अन्य प्राचीन समानांतर स्थलों से हजारों वर्ष पूर्व हुआ था। इस प्रकार से यह स्थल मानव विकास का आरंभिक स्थान भी माना जा सकता है।

निकटवर्ती पुरातात्विक स्थल[संपादित करें]

भीमबेटका के शैलचित्र

इस प्रकार के प्रागैतिहासिक शैलचित्र रायगढ़ जिले के सिंघनपुर के निकट कबरा पहाड़ की गुफाओं में[3], होशंगाबाद के निकट आदमगढ़ में, छतरपुर जिले के बिजावर के निकटस्थ पहाडियों पर तथा रायसेन जिले में बरेली तहसील के पाटनी गाँव में मृगेंद्रनाथ की गुफा के शैलचित्र एवं भोपाल-रायसेन मार्ग पर भोपाल के निकट पहाडियों पर (चिडिया टोल) में भी मिले हैं। हाल में ही होशंगाबाद के पास बुधनी की एक पत्थर खदान में भी शैल चित्र पाए गए हैं। भीमबेटका से ५ किलोमीटर की दूरी पर पेंगावन में ३५ शैलाश्रय पाए गए है ये शैल चित्र अति दुर्लभ माने गए हैं। इन सभी शैलचित्रों की प्राचीनता १०,००० से ३५,००० वर्ष की आंकी गयी है।

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार[संपादित करें]

गोरखपुर-देवरी से चैनपुर-बाड़ी तक करीब 80 किमी लंबी और 14 से 15 फीट चौड़ी प्राचीन दीवार निकली है। विंध्याचल पर्वत के ऊपर से निकली यह दीवार आज भी लोगों के लिए रहस्य बनी हुई है। [4][5]

दीवार के बारे में बताया जाता है कि इसका निर्माण परमार कालीन राजाओं ने करवाया होगा। दीवार के बनाने का उददेश्य परमार राजाओं द्वारा अपने राज्य की सीमा को सुरक्षित रखना माना जा रहा है।

रायसेन जिला मुख्यालय से 140 किमी दूर स्थित ग्राम गोरखपुर-देवरी से इस प्राचीन दीवार की शुरुआत हुई है, जो सैकड़ों गावों के बीच से होकर बाड़ी के चौकीगढ़ किले तक पहुंची है। जयपुर-जबलपुर नेशनल हाईवे क्रमांक-12 से लगे ग्राम गोरखपुर से बाड़ी की दूरी 80 किमी है, लेकिन प्राचीन दीवार विंध्याचल पर्वत के ऊपर से तो कहीं पर गांवों के आसपास से निकली है। इस लिहाज से इस दीवार की लंबाई कुछ ज्यादा भी हो सकती है, लेकिन कई स्थानों पर दीवार को तोड़ भी दिया गया है। टूटी दीवार के अवशेष गांवों के आसपास दिखाई देते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "भीमबेटका की गुफाएँ". इन्क्रेडिबल इण्डिया. पपृ॰ ०१. मूल (एचटीएम) से 13 जून 2010 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि १८ जुलाई २००९.
  2. "भीमबेटका की पहाड़ी गुफाएं" (पीएचपी). राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल. भारत सरकार. पपृ॰ ०१. मूल से 13 मई 2009 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि १८ जुलाई २००९.
  3. "हुसैनाबाद में ढाई हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष" (एचटीएमएल). याहू जागरण. पृ॰ ०१. अभिगमन तिथि १८ जुलाई २००९.[मृत कड़ियाँ]
  4. रायसेन में मिली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार
  5. "भारत में भी है चीन जैसी 'महान दीवार', 1000 साल पुरानी पर अब तक गुमनाम". मूल से 31 दिसंबर 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 जनवरी 2017.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

चौकीगढ़ किला

  1. हमारी_धरोहर_चौकीगढ़_किला

चौकीगढ़ किले का वैभवशाली इतिहास

एडवेंचर ट्रेकिंग के शौकीनो को आकर्षित करता है गौंडवाना साम्राज्य का वैभवशाली किला चौकीगढ़.....

चौकीगढ़ किला गौंडवाना साम्राज्य का प्रमुख सत्ता शक्ति का केंद्र इतिहास की अनूठी दास्तान है। मध्यप्रदेश की जनजातीय समूह के लिए गौरव का विषय है, एडवेंचर ट्रेकिंग, पर्यटन शौकीनों, यायावरी जिंदगी जीने वालो के लिए रहस्य और रोमांच से भरपूर चौकीगढ़ का किला अवश्य घूमना और देखना चाहिये। 13वी शताब्दी में गौड़ राजा उदय वर्धन ने इस वैभवशाली दो मंजिला किले का निर्माण कराया था, जिसका समकालीन साक्ष्य गिन्नौरगढ़ में मिलता है, मलिक काफूर खां 1307 ईस्वी, सुल्तान बहादुर शाह 1535 ईस्वी, रूमी खान, दोस्त मोहम्मद खां 1708 ईस्वी सहित कई आक्रमणकारी आक्रांता राजाओ ने हमले किये तोपों, गोलो की मार झेलने के बाद आज भी मध्यकालीन स्थापत्य शैली को दर्शाता यह भव्य दो मंजिला किला शानोशौकत के साथ सीना तान कर खड़ा है। काश गोविन्द हम अपनी धरोहर को संभाल पाते- ढह रहा है चौकीगढ़ का किला पिछली कई शताब्दियों से खड़ा अपने गौरवशाली अतीत की ढहती हुई कहानी कहता है बाड़ी से 14 किलोमीटर दूर उत्तर में एवं परमार कालीन दीवार (भारत की सबसे लंबी दीवार) के पश्चिम में विंध्याचल पर्वत के सिंघोरी अभ्यारण में स्थित दो मंजिला वैभवशाली चौकीगढ़ किले की स्थापना गौंडवाना साम्राज्य के महान प्रतापी राजा संग्राम सिंह शाह (वीरांगना रानी दुर्गावती के ससुर) ने की थी, उन्होंने सम्वत 1479 (डॉ हीरालाल) में गौंडवाना साम्राज्य के गढ़ा राज्य की बागडोर सम्हालने के बाद मदन महल जबलपुर को अपनी राजधानी बनाने के पश्चात 26 वर्षो तक राज्य से बाहर रहकर 52 गढ़ो की स्थापना की गौंडवाना साम्राज्य उस समय विश्व में अजेय, सुद्धढ़ और समृद्धशाली था। जिसका वर्णन महान इतिहासकार अकबर के नवरत्न अबु फ़जल ने आईने ए अकबरी (अकबरनामा), गणेशनृपवर्णन संग्रहश्लोका एवं ब्रिटिश कर्नल सर डब्ल्यू एस स्लीमन द्वारा लिखित जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल 1837ई० की ऐतिहासिक पुस्तको में चौकीगढ़ के अद्धभुत किले का विस्तृत वर्णन मिलता है, दो मंजिला किला कभी वैभवपूर्ण शानोशौकत का केंद्र हुआ करता था, मध्यप्रदेश जनजातीय समूह के लिये यह गौरव का विषय है यह पर्यटन एवं इतिहास प्रेमियों के लिए रोचक एवं अद्भुत है जो मध्यकालीन गौड़ राजाओ की विलासता, भव्यता में अनमोल रत्न जैसा है, मुगलो से पूर्व बाड़ी (बारीगढ़) एक बड़ी केंद्रीयकृत रियासत थी जिसका नियंत्रण मंगलगढ़ वर्तमान भोपाल तक रहा है, शताब्दियों तक यहाँ गौड़ राजाओ का शासन रहा, गौड़ राजाओं की अनेक रियासत भी टुकड़ों टुकड़ों में थी कुछ रियासत आज भी चर्चाओं में बनी हुई हैं और उनके वंशज आज भी मौजूद हैं। चौकीगढ़ को निकट से देखने पर गौड़ राजाओ की भव्यता, मध्यकालीन स्थापत्य शैली, संस्कृति, रहन सहन और उनके वैभवशाली अतीत को समझा जाना जा सकता है घने प्राकृतिक वनाच्छादित जंगल के बीच पशु पक्षियों के कलरब, प्राकृतिक सुंदरता को निकट से देखने चौकीगढ़ किला दर्शन जरूरी है।

  1. गौंडवाना_साम्राज्य के चौकीगढ़ किला की चाहर दीवारी में वो हर साधन और नक्कासी पूर्ण महल हैं, जो अमूमन भारत के अन्य किलों में भी हैं लेकिन यहां कुछ खास ही है, जो अन्य किलों पर नजर नहीं आता। किला पहाड़ी पर तत्कालीन समय का वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, महल का ईकोसिस्टम, इत्रदान और पारस पत्थर कुण्ड (मदागन) ! इसे अन्य किलों से तकनीकी मामलों में अलग करता है।

एक जगह एकत्र होता है पानी लगभग 2 वर्ग किमी में फैले चौकीगढ़ किला मध्यकालीन स्थापत्य शैली में बना हुआ है चाहरदीवारी पहाड़ी पर गिरने वाला बारिश का पानी भूमिगत नालियों के जरिए किला परिसर में बने एक तालाब में एकत्र होता है। नालियां कहां से बनी हैं, उनमें पानी कहां से समा रहा है, कितनी नालियां हैं। ये सब आज तक कोई नहीं जान पाया। सदियों पुराने इस वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से तत्कालीन शासकों की दूर दृष्टि और ज्ञान का अंदाजा लगाया जा सकता है। काश हम अपनी विरासत को संभाल पाते, अपने गौरवशाली अतीत की ढहती हुई कहानी कहता चौकीगढ़ किला अपने आक्रमणकारियों से उतना आहत नहीं हुआ होगा जितना आजकल के तथाकथित सभ्य समाज से हुआ है। किले के संबंध में अनेक किवदंतिया प्रचलित हैं कि चौकीगढ़ किले में अकूत सोने चांदी के आभूषणों का भंडार है, बाबड़ी में #पारस_पत्थर मौजूद है जो 6 मई 1532 वी ईस्वी में सुल्तान बहादुरशाह और मुगल बादशाह हुमायु की सेना ने मिलकर रायसेन किले पर आक्रमण किया जिससे रायसेन की राजपूतानी राजमाता दुर्गावती सिल्हादी सिंह तोमर (#मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा की बेटी थीं) ने सात सौ महिलाओं के साथ जोहर कर लिया और अपने वंशज प्रताप सिंह तोमर को सुरक्षित गुप्त मार्ग (सुरंग) से बाड़ीगढ़ के पास चौकीगढ़ के राजा महासिंह राजगोंड के पुत्र राजा पूरनमल शाह के पास भेज दिया जहाँ पूरनमल शाह ने उनको संरक्षण दिया साथ ही एक बजनदार पोटरी बाबड़ी में फेकने का पैगाम भेजा पोटरी को रानी रत्नावली ने चौकीगढ़ किले की बाबड़ी में फेंक दी

संभवतः पोटली में पारस पत्थर था शायद इसी कारण लोग लालच में बाबड़ी एवं जगह जगह पर खुदाई करते है देखरेख के अभाव में हमारी ऐतिहासिक विरासत खंडर में तब्दील हो रही। वैभवशाली दो मंजिला किला में राजारानी निवास, बारना नदी का मनोरम किनारा, स्नानागार, बाबड़ी, नक्काशीदार महल, रोशनदान, बारादरी, दुर्ग पर स्थित तोपखाना, बुर्ज, 2 किलोमीटर लंबी चाहर दीवारी, गुप्त सुरंग.चौकीगढ़ किले से रायसेन और बाड़ीगढ़ (बाड़ी) किले तक एक गुप्त सुरंग निकलती है। इस सुरंग को गुप्त तरीके से किले से बाहर निकलने के लिए बनाया गया था।

- इसका कुछ हिस्सा जमीन के अंदर बना है तो कुछ जमीन के ऊपर) इंटरलॉक तकनीक से बनी परमार कालीन दीवार के अवशेष, वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से बना तालाब पर्यटकों को बार बार अपनी ओर आकर्षित करता है, पुरातत्व एवं पर्यटन की दृष्टि से एडवेंचर ट्रेकिंग के शौकीन लोगो को यह ऐतिहासिक गौंडवाना साम्राज्य को दर्शाता किला आकर्षण का केंद्र बना हुआ है लेकिन पक्का रास्ता न होने से पर्यटकों को उबड़ खाबड़ रास्तो से होकर गुजरना पड़ता है, पक्का रास्ता बना दिया जावे तो निश्चित ही बड़ी संख्या में पर्यटक यहाँ आ सकते हैं। दुर्भाग्य है उस मानस का जो अपने अतीत से अपरिचित है, अपने पुरातन गौरव के स्वाभिमान से जो विचलित है।

चूंकि मैं एक यायावर हूँ इसलिए मैं किसी और की कहानी का किरदार बनने से हमेशा बचता आया हूँ यात्राएँ खत्म नही होती फिर मिलते है किसी नए टर्मिनल पर

सारी चमक हमारे पसीने की है जनाब विरासत में हम को कोई भी ज़ेवर नहीं मिला आपका अपना गोविन्द चौहान बाड़ी