राम प्रसाद नौटियाल

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Ram Prasad Nautiyal
राम प्रसाद नौटियाल

जन्म 01 अगस्त 1905
कांडा (खाटली) बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड, Flag of India.svg भारत
मृत्यु दिसम्बर 24, 1980(1980-12-24) (उम्र 75)
राष्ट्रीयता Indian

लैंसडौन विधान सभा' क्षेत्र से विधायक के रूप में: प्रथम कार्यकाल:- 1951 to 1957, द्वितीय कार्यकाल - 1957 to 1962 राम प्रसाद नौटियाल (1 अगस्त, 1905 - 24 दिसम्बर, 1980) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी तथा राजनेता।

आरंभिक जीवन[संपादित करें]

रामप्रसाद नौटियाल का जन्म १ अगस्त १९०५ को ग्राम - कांडा मल्ला, ब्लॉक - बीरोंखाल, जनपद - पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड) की सुरम्य वादियों में हुआ। इनके पिता का नाम गौरी दत्त नौटियाल व माता का नाम देवकी देवी था। राम प्रसाद नौटियाल उत्तराखंड की पवित्र भूमि में पैदा होने वाले प्रमुख स्वन्त्रता सेनानियों में से एक थे. इनके संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इन्होंने दिल्ली, कलकत्ता, लाहौर आदि बड़े शहरों से लौटकर उत्तरांखंड के गढ़वाल व कुमायूं क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए लडे बल्कि स्थानीय जनता के संघर्षों को भी आवाज दी.

इनके दो छोटे भाई थे बलिराम व कशीराम, कहा जाता है कि बलिराम नौटियाल को कराची (अब पाकिस्तान) में अध्यनरत रहने के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए गिरफ़्तार किया व कई तरह की यातनाएं दी, तदुपरांत इनको मरणासन्न स्थिति में रिहा कर दिया गया. बलिराम जी इन चोटों से कभी उभर नहीं पाए व कुछ समय पश्चात युवा अवस्था में ही इनका स्वर्गवास हो गया.

राम प्रसाद जी एक सामान्य पहाड़ी परिवार से थे, परिवार ने किसी तरह इनकी शिक्षा की व्यवस्था देहरादून के दयानन्द ऐंग्लो वैदिक (D.A.V) स्कूल में की। वहां एक बार सरोजनी नायडू जी के भाषण के दौरान व उसके पश्चात कई छात्रों ने स्वन्त्रता के पक्ष में नारेबाजी शुरू कर दी. राम प्रसाद उनमे से एक थे. राम प्रसाद जी को इसके लिए तीन सप्ताह के कठोर कारावास की सजा दी गयी, इतने पर भी इन्होंने अपनी नारेबाजी जारी रखी जिससे नाराज़ होकर इन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया.

ब्रिटिश सेना में नियुक्ति[संपादित करें]

स्कूल से निष्काषित होने के बाद ये मेरठ आ गए व वहां ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए; इन्हें रिकॉर्ड कीपर बना कर बलोचिस्तान भेज दिया गया. यहाँ एक दिन तोरखान नाम का बलूच सरदार कर्नल एबोट के ऑफिस में आ धमका व उस पर हमला बोल दिया, जैसे तोरखान अपनी पिस्तौल से फायर किया साहसी राम प्रसाद ने उसको दबोच लिया व इस तरह कर्नल एबोट को भागने का मौका मिल गया, इससे खुश होकर कर्नल ने उन्हें घुड़सवारी की ट्रेनिंग दिलवाई व ६३ मोबाइल कोर रावलपिंडी भेज दिया.

यहाँ, युद्धाभ्यास में शामिल ब्रिटिश सेना की टुकड़ियों पर अपदस्थ रुसी ज़ार के भगोड़े सैनिको ने अचानक हमला बोल दिया व कई सैनिक मार डाले। युद्धाभ्यास सूखी नदी के आर-पार २/८ पंजाब रेजिमेंट व रॉयल मराठा रेजिमेंट के बीच चल रहा था. कर्नल वैली ने इनको नदी के उस पर जाकर कर्नल डेविस को हमले की खबर देने की जिम्मेदारी सौंपी. रौखड़ की लंबाई करीब डेढ़ मील थी व रुस्सियन आर्मी मशीनगनों से घातक गोलीबारी कर रही थी। राम प्रसाद के दोनों साथी मरे गए परंतु वह किसी तरह कर्नल डेविस को सन्देश पहुँचाने में सफल रहे. कर्नल इनकी वीरता पर बड़े प्रसन्न हुए व इन्हें एडजुटेंट क्वार्टर मास्टर बनाकर पदोन्नति दी गयी.

लाला लाजपत राय की मृत्यु व उसका इनपर प्रभाव[संपादित करें]

इन्ही दिनों इन्होंने लाहौर से प्रकाशित होने वाले एक समाचार पत्र में लाला जी की मृत्यु का समाचार पढ़ा, इसमें लिखी गयी निम्नलिखित पंक्तियों का इन पर गहरा असर पड़ा,

 " मैं एक गुलाम देश में पैदा हुआ हूँ, जहाँ मुझे कोई भी मामूली पुलिस अफसर लाठियों से पीट पीट कर मौत के घाट उतार सकता है " 

उन समय आर्य गैजेट के संपादक 'भीमसेन सच्चर' जी थे, जिनके ओजपूर्ण लेखों ने इनके युवा मन मस्तिष्क को झकझोर दिया व इन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर स्वन्त्रता संग्राम में कूदने का निश्चय कर लिया।

फ़ौज से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के बाद ये लाहौर में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं डॉ॰ किचलू व डॉ॰ गोपीनाथ जी से मिले जिन्होंने इन्हें कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में शामिल होने के लिए कलकत्ता जाने का सुझाव दिया, इसके बाद ये सीधे कलकत्ता पहुंचे जहाँ इन्हें डॉ॰ हार्डिकर ने कांग्रेस सेवा दल में शामिल कर लिया। अधिवेशन की समाप्ति के पश्चात इन्हें कांग्रेस सेवा दल का प्रशिक्षण लेने के लिए हुगली भेज दिया गया. ट्रेनिंग पूरी करने के पश्चात इन्हें लाहौर में अन्य सेवा दलों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी दी गयी, जिसके लिए इन्हें लाहौर आना पड़ा.

इन्ही दिनों भगत सिंह, राजगुरुसुखदेव भी लाहौर में अनवरत रूप से आया जाया करते थे, जिन्होने बाद में 'लाला जी' की मृत्यु के प्रतिशोध में ब्रिटिश पुलिस अफसर सौंडर्स की गोली मार कर हत्या दी.

इसी दौरान सौंडर्स की मौत के पश्चात क्रांतिकारियों की धर-पकड़ तेज हो गई, युवा राम प्रसाद की सरकार विरोधी गतिविधियां भी चरम पर थी. इन्हें गिरफ्तार करने के लिए वारंट जारी कर दिया गया। इनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी होने की खबर 'पुष्पा' नामक एक छात्रा ने इन्हें गुप्त रूप से भिजवा दी, यह छात्रा D.A.V स्कूल लाहौर में कांग्रेस दल की नेता थी व वहां के प्रधानाचार्य 'छबीलदास' की भतीजी और एक ब्रिटिश C.I.D. अफसर की बेटी थी. इन्हें लाहौर छोड़ने की सलाह दी गयी और ये वहां से भागकर हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में पहुचे जहाँ से इन्हें पुनः भागकर शाहपुर के एक आर्य समाज मंदिर में शरण लेनी पड़ी, यहाँ से इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व लाहौर जेल दिया गया.

लाहौर जेल में तरह-तरह की यातनाएं देकर इनसे सौंडर्स मर्डर काण्ड में शामिल होने की बात कबूलने के लिए बाध्य करने की कोशिश की गई, बाद में इन्हें सरकारी मुखबिर बनाने का लालच भी दिया गया किन्तु सारी कोशिशें असफल रहने के बाद ब्रिटिश सरकार को इन्हें रिहा करना पड़ा.

गढ़वाल व कुमाऊं में 'सविनय अवज्ञा' आंदोलन[संपादित करें]

२१ दिसम्बर १९२९ को जेल से रिहा होने के बाद राम प्रसाद जी सीधे रावी नदी के किनारे चल रहे कांग्रेस के वार्षिक सम्मलेन में भाग लेने के लिए पहुँच गए. यहाँ इनको उत्तर प्रदेश (तब उत्तराखंड भी यू.पी. का हिस्सा था) से आने वाले समूह के कैंप की देख रेख में लगाया गया. यहाँ इनकी मुलाकात हरगोविन्द पन्त, 'कुमाऊं केशरी' बद्री दत्त पांडेय, विक्टर मोहन जोशी, देवी सिंह कोरिया, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, कृपाराम मिश्र 'मनहर' आदि से हुई.

बाद में इन्हें कुमांऊ के लिए सत्याग्रह दल का पर्यवेक्षक बना कर 'रानीखेत' भेज दिया गया, यहाँ पहुंचकर इन्होंने गढ़वाल व कुमाऊं मंडलों में कई सत्याग्रह कैंप चलाये व सैकड़ों कार्यकर्तों को देश सेवा के लिए प्रेरित किया व तैयार किया. गढ़वाल व कुमाऊं में कई प्रशिक्षण शिविर चलाने के बाद इन्होंने अपना कार्यालय कोटद्वार के निकट दुगड्डा नामक स्थान पर स्थापित किया. इस समय तक राम प्रसाद जी अपने साथियों के बीच 'कप्तान साहब' के नाम से प्रसिद्द हो चुके थे.

इन दिनों 'सविनय अवज्ञा' आंदोलन अपने चरम पर था. गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्रों में भी स्वाधीनता के दीवानों की गतिविधियां बढ़ गई, जगह-जगह सभाएं की गई. जनता को स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरितकरने हेतु राम प्रसाद जी व उनके साथियों ने जनजागरण अभियान चलाया जिसके फलस्वरूप ७६ मालगुजारो व थोकदारों ने अपने पदों से त्याग पत्र दे दिया व अंग्रेज सरकार के विरुद्ध लड़ाई में अपना योगदान देने लगे. इसी दौरान वन विभाग ने सेंधीखाल व अन्य नदी के किनारे वाले गांवों के नजदीक नदियों में तार की बाड करना शुरू कर दिया जिससे गांव के पशु जंगल के चरागाहों में नहीं जा सके व स्थानीय जनता का जीवन जो जल-जंगल पर ही निर्भर था भयंकर कठिनाइयों में पड़ गया, राम प्रसाद जी को इसकी खबर मिली, वे व उनके साथी रातों को चुपचाप नदी के किनारों से बाड़ उखाड़ कर नदी में फेंक देते व जनता को इसके विरुद्ध आवाज उठाने के किये प्रेरित करते, अंत में विभाग को हार माननी पड़ी व जनता को अपना हक़ वापस मिला.

इनकी इन हरकतों से तंग आकर सरकार को इनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करना पड़ा. किन्तु ये चोरी-छुपे अपने काम को अंजाम देते रहे. इसी बीच इन्हें भीलाड़ी गांव (रिखणीखाल ब्लॉक पौड़ी गढ़वाल) से गिरफ्तार कर लिया गया. इन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा २०८ के अंतर्गत दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई व बताया गया की तीन और मुक़दमे बाद में लगाए जायेंगें. जिनमें से एक कर्नल इबट्सन पर जानलेवा हमला करने का था.


मैं ब्रिटिश नागरिक नहीं हूँ[संपादित करें]

एक बार दुगड्डा में प्रभात फेरी से लौटते समय चुनाधार इलाके में अचानक कर्नल इबाटसन व स्थानीय तहसीलदार ५०-६० जवानों के साथ आ धमके, गंगा सिंह त्यागी नामक एक बालक जो कक्षा ९ का छात्र था अपने हाथ में तिरंगा लिए हुए जोर-जोर से आजादी के नारे लगा रहा था उस पर कर्नल साहब बिगड़ गए व अपने घोड़े पर बैठकर ही कोड़ों की बरसात कर दी, बालक गंगा बेहोश होकर गिर पड़ा, इब्ट्सन को इस पर भी चैन नहीं आया; वह धोड़े से उतरा व बेहोश बालक को जोर से लात मारने लगा, इस पर नौटियाल जी को बहुत क्रोध आया उन्होंने कर्नल को उसके कॉलर से पकड़ा व उठा कर सड़क के नीचे पहाड़ी में फ़ेंक दिया , खुशनसीबी से इब्ट्सन ने एक उखड़े हुए पेड़ की जड़ पकड़ ली व मौत से बच गया.राम प्रसाद जी के पीछे अंग्रेज अफसर भागे किन्तु वे चूनाधार के जंगलो में गायब हो गए.

इस मुक़दमे की सुनवाई के लिए इन्हें कोटद्वार लाया गया, जहाँ इन्हें जज गिल साहब के सामने पेश होना पड़ा, इन्हें उनके पास शरीर पर बेड़ियाँ डाल कर ले जाया गया, जज ने तुरंत आदेश दिया की इनकी बेड़ियाँ खोल दी जाय. इब्ट्सन के वकील ने तहरीर पढ़ना आरम्भ किया, तहरीर पूरी हुई तो जज ने राम प्रसाद जी से कहा, "तुम्हे कुछ कहना है"

राम प्रसाद बोले, "जब इब्ट्सन खुद कोर्ट में मौजूद है तो वे क्यों नहीं कटघरे में आकर घटना का विवरण देतें है."

इस पर जज ने इब्ट्सन की ओर देखा, आखिर इब्ट्सन को कटघरे में आना पड़ा, उसने सब कुछ सच बताया.

जज ने पुनः राम प्रसाद जी को कहा, "आपको कुछ कहना है?"

अब राम प्रसाद जानबूझकर जोर-जोर से बोले,

  मैं अपने आप को ब्रिटिश नागरिक नहीं मानता अतः इस कोर्ट में कुछ भी कहना मेरे लिए अपमानजनक होगा.

यह सुनकर जज चौंक गए व बोले,

"आप कोर्ट का अपमान कर रहें है, इसके लिए आप पर अवमानना का अभियोग चलाया जा सकता है."

बाद में कोर्ट ने अपनी सजा सुनाई व इन्हें बरेली जेल भेज दिया गया.

गवर्नर मैलकम हैली को काला झंडा दिखाने की घटना[संपादित करें]

उसी समय की बात है, तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर मैलकॉम हेली का पौड़ी दौर था, यह खबर सुनते ही राम प्रसाद जी व उनके दल ने यह योजना बनाई की गवर्नर को काले झंडे दिखाए जाएँ व उसका बायकॉट किया जाय. इस काम को अंजाम देने के लिए 'जयानंद भारतीय' को चुना गया, युवा जयानंद में खूब जोश था व उन्होंने अपनी सहमति दे दी। उनको लेकर राम प्रसाद जी पौड़ी गए वहां जयानंद जी ने गवर्नर के सामने जाकर काला ध्वज लहराया व 'बन्देमातरम' का घोष किया. ‘गवर्नर गो बैक' के नारे लगाते हुए उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया व इसके लिए उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई.


लैंसडौन पर कब्ज़ा करके प्रशासन को जनता के अधीन करने की योजना[संपादित करें]

१९४२ का समय था, गाँधी जी “भारत छोडो ” आंदोलन का श्रीगणेश कर चुके थे . “करो या मरो ” की ललकारों से भारत वर्ष का कण-कण गूंज रहा था . देश भर में कई क्रन्तिकारी वीरों ने जगह-जगह सरकारी व्यस्था को उखाड़ फेंक जनता का नियंत्रण स्थापित कर दिया था. इसी बीच ‘ढोरीं डबरालसयुं ’ में राम प्रसाद जी व उनके साथियों की एक मीटिंग हुई जिसमे ५०० से ज्यादा सदस्य इक्कट्ठा हो गए थे।

योजना बनाई गई की लैंसडौन कोर्ट पर कब्ज़ा किया जाय व प्रशासन को जनता के अधीन कर दिया जाय। इसके लिए चार समूह बनाये गए जो कि गढ़वाल के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनित्व करते थे। हर समूह को अपने-अपने क्षेत्रों में और अधिक लोगों को जोड़ने व सक्रिय हो जाने का निर्देश दिया गया. दूसरी बैठक चौबट्टाखाल के पास जंगलों में हुई जिसमे करीब १००० साथियों ने शिरकत की, इसमें २१ सदसयों की एक मुख्य कार्यकारणी बनाने का निर्णय लिया गया, इस समिति में राम प्रसाद जी स्वयं भी थे, इसके अन्य प्रमुख सदस्य बैरिस्टर चंद्र सिंह रावत, सदानन्द शास्त्री, थोकदार नारायण सिंह, छवाण सिंह नेगी व गोकुल सिंह नेगी आदि थे.

राम प्रसाद जी ने स्वयं आगे बढ़कर कर्णप्रयाग में थोकदार देवानंद जी व जीवानंद खंडूरी की सहायता से P.W.D के स्टोर का ताला तोड़कर 7 पेटी डायनामाइट निकाली व पैदल ही अत्यधिक भारी पेटियां कंधे पर रखकर कई किलोमीटर दूर डुमेला तल्ला में पहुंचाईं. इसके बाद यहाँ से इन्हें पूर्व में गठित चारों कमानो में भिजवाने की व्यवस्था की.

दुर्भाग्यवश उनकी महत्वपूर्ण बैठकों में मंगतराम खंतवाल भी मौजूद थे जिन्होंने सारी योजना अंग्रेज प्रशासन के समर्थक मालगुजार गोविन्द सिंह को बता दी. गोविन्द सिंह ने लैंसडौन डाक बंगले में जाकर ब्रिटिश अफसर डी. सी. फनींड को सारी सूचना दे दी. योजना इस प्रकार थी कि, २७ अगस्त १९४२ को हजारों की संख्या में जनता व क्रांतिकारियों की भीड़ लैंसडौन पर धावा बोलेगी, सबसे पहले एक टीम लैंसडौन को जोड़ने वाली टेलीफोन लाइन्स काट देगी. लैंसडौन अदालत पर कब्ज़ा किया जायेगा, S.D.M अम्बादत्त जी को D.M. घोषित कर दिया जायेगा व ट्रेज़री को कब्जे में लेकर प्रशासन को जनता के अधीन कर दिया जायेगा। व्यवस्था के लिए एक कार्यपालक समिति बनाई जाएगी जिसके संयोजक प्रताप सिंह नेगी होंगे.

योजना के लीक हो जाने की खबर चिंतामणि बलोधी लेकर आये व बताया कि फिर्नीड्स ने लैंसडौन जाने वाले सारे मार्गों को सील करने का आदेश दे दिया है. चौमासू पुल व बांधर पुल पर फौज का कड़ा पहरा लगा दिया गया और क्षेत्र के सारे लायसेंसी हथियार धारकों को तत्काल हाजिर होने का निर्देश जारी किया गया.

इसपर भी राम प्रसाद जी व साथियों ने योजना पर काम जारी रखा, 27 अगस्त 1942 को सारे विद्यालयों को बंद करवा दिया गया ८० लोगों के एक दल के साथ राम प्रसाद जी आगे बढ़े , करीब 50 सदस्यों के साथ छवाण सिंह नेगी धूरा चुंगी के निकट टेलीफ़ोन तार काटने के लिये चल पड़े, टेलीफोन तार काटते समय बिजली की तार के संपर्क में आने से उनके एक साथी केशर सिंह को भयंकर झटका लगा व वह पहाड़ी से नीचे गिर गए.

ब्रिटिश अधिकारियों ने छापामारी शुरू कर दी . हज़ारों कार्यकर्ता पकडे गए। रात के गुप्प अँधेरे में सबके-सब पागलों की तरह अपने मृत साथी का शव ढूंढने में लग गए , राम प्रसाद जी के पास शव लाया गया उन्होंने रात में ही दाह संस्कार करना जरुरी समझा व स्वयं बलिदानी केशर सिंह का शव कंधे पर उठा कर शिरुबाड़ी पहुंचे; ‘बन्दे मातरम ’ के पवित्र उद्घोष के साथ उनको अंतिम विदाई दी गयी.

जगह-जगह से हजारों लोगों की भीड़ लैंसडौन की तरफ बढ़ रही थी , प्रशासन व जनता के बीच भिड़ंत शुरू हो चुकी थी; किन्तुं अंग्रेज फ़ौज की घातक हथियारों के साथ अग्रिम मौजूदगी का अहसास राम प्रसाद जी को था, उन्होंने रक्तपात का कोई लाभ न जानकार विभिन्न स्थानों में आगे बढ़ चुके जन समूहों को रुकने को कहा, तत्काल तौर से ठहरने व फिर वापस लौटने की व्यवथा करवाई। इस पूरी कवायद में वे कई दिन तक जान पर खेलकर भूखे-प्यासे जंगलों से होते हुए इधर-उधर व्यवस्था करते रहे।

योजना असफल रही , किन्तु इससे स्थानीय अंग्रेज प्रशासन बुरी तरह घबरा गया व भड़क गया. इसके बाद जनता पर जो अत्याचार हुए वे अकथनीय हैं. खबरे मिली की जिन घरों के मर्द घर नहीं पहुँच पाए उन घरों की महिलाओं के साथ घरों में घुस-घुस कर पटवारी, कानूनगोय तथा अन्य सरकारी अफसर बदसुलूकी तक करने लग गए. जनता बड़ी डरी हुई थी व कोई भी सामने आने को तैयार न था. इस सब के प्रतिशोध में कुमरथा गांव के पास एक अंग्रेज अधिकारी को मारकर नदी में फेंक दिया गया. इसके लिए पुलिस ने कांतिचंद उनियाल को दोषी ठहराया, पुलिस से बचने के लिए वह बदरीनाथ की तरफ भयानक व बर्फीले जगलों में भाग गए जहाँ भूख-प्यास व ठण्ड से उनकी मृत्यु हो गयी.

मरणासन्न पिता व पुत्र को छोड़कर जेल जाने की व्यथा[संपादित करें]

अपने संघर्ष को जारी रखते हुए राम प्रसाद जी जंगलों में छिप-छिप कर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध जनता को जागरूक करते व बीच बीच में बैठकें कर के स्वतंत्रता की अलक जगाने का प्रयास करते, उस समय वह 'क्वालागाड़' के जंगलों में सक्रिय थे. इसी बीच उन्हें खबर दी गई की उनके पिताजी का स्वस्थ्य बहुत बिगड़ गया है व संभवतया वह अब ज्यादा दिन न बच पाएं. राम प्रसाद जी ने खबर की सत्यता जानने के लिए अपने एक साथी को गांव भेजा तो पता चला कि बात सच है, वह किसी तरह बचते बचाते अपने गांव पहुच गए. कई दिन से भूखे प्यासे थे, घर में बचा-खुचा 'फाणु-भात' खाया, माता जी व पत्नी से मिले. पिता जी उस समय मरणासन्न अवस्था में लेटे हुए थे उनका मुख चादर से ढका हुआ था, राम प्रसाद जी ने उनके चरण छुए व माता जी से जाने की आज्ञा मांगी. माता जी ने कहा,

" बेटा तुम्हारा पुत्र भी बहुत बीमार है, तुम कुछ दिन रुक जाओ"

माता जी को सुबकते हुए देख राम प्रसाद जी मन में तो जरूर रोये होंगे, किन्तु जब बीड़ा राष्ट्रधर्म निभाने का उठाया हो तो फिर अपनों की चिंता व दुःख किसे, उन्होंने माता जी ढाढस बंधाने का प्रयास किया. माता जी पुत्र के मन को जानती थीं अतः कुछ न बोलीं, किन्तु आये हुए रिश्तेदारों ने कहा की अब शायद पिता जी सुबह तक भी क्या बच पाएं, ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते ये उनका धर्म है की वह अंतिम रश्मों को पूरा करें. राम प्रसाद जी को रुकना पड़ा, उन्होंने स्पष्ट कर किया की वे सुबह होते ही निकल पड़ेंगे.

रात को दो बजे जब वे जागे और जैसे ही उन्होंने अंगीठी जलाई तो देखा कि अंग्रेज फौज के लगभग दो सौ जवान मकान पर घेरा डाले हुए हैं। कमांडिंग अफसर बोला कि रात को नौटियाल जी व उनके परिवार को न छेड़ा जाय किन्तु सुबह होते ही उन्हें समर्पण करना होगा. पूरा परिवार घबरा गया, माता जी ने उन्हें ऊपर वाले कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया व कहा की वह रात को ही जा चुकें है. इस पर भी तहसीलदार चन्दन सिंह सीढ़ियों पर चढ़ गया व ललकारने लग गया,

"हमने अब तुम्हे गिरफ्तार कर दिया है, तुम समर्पण कर दो"

तहसीलदर की इस धृष्टता पर राम प्रसाद जी को बड़ा क्रोध आया, उन्होंने दरवाजे पर जोर से लात मारी व दरवाजा तोड़कर बाहर निकले, तहसीलदार को गले से पकड़ा और छज्जे से नीचे फ़ेंक दिया, तहसीलदार ने नीचे से फायर कर दिया, राम प्रसाद जी ने भी बचाव करते हुए अपनी पिस्तौल से तहसीलदार पर फायर झोंक दी, अँधेरे की वजह से वह बच निकला, फायरिंग की आवाज से बीमार बच्चा बुरी तरह घबरा गया व मंडुए के खेतों में जाकर छुप गया. घर में विलाप प्रलाप का माहौल हो गया. अंग्रेज अफसर भी नौटियाल जी के तेवर देखकर घबरा गए. रक्तपात न हो अतः निश्चय किया गया कि अब सुबह ही उन्हें गिरफ्तार किया जायेगा.

सुबह गिरफ्तारी देने के बाद उनकी विदाई के लिए जनता ढोल-दमाऊ लेकर आयी, रणसिंघा की विजयी हुंकार के साथ उन्हें विदा किया गया. गांव की सीमा पार होते ही बोले अब मैं बिना सवारी के नहीं जाऊँगा मैं कोई मामूली कैदी नहीं हूँ, ऑफिसर्स जानते थे इनके साथ बहस करना बेकार है, घोडा व पालकी मंगाई गई राम प्रसाद जी ने एक योद्धा की तरह घोड़े पर ही जाना स्वीकार किया. राम प्रसाद जी मरणासन्न पिता व पुत्र को छोड़कर जाते समय भी जनता को मार्तृभूमि के लिए हंस-हंस कर पीड़ा सहने का सन्देश देकर गए. बाद में खबर मिली की बीमार पिता व पुत्र दोनों का देहावसान हो गया।

इसके बाद इन पर कई धाराओं के अंतर्गत केस चलाये गए व सजा काटने के लिए बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया गया. यहाँ इनको रफ़ी अहमद किदवई, महावीर त्यागी व कृष्णा दत्त पालीवाल आदि कई प्रमुख सेनानियों के साथ रखा गया. बाद में इनके तेवर देखकर इन्हें तन्हाई (seclusion) में रखा गया. यहाँ से इन्हें 14th July 1945 को रिहा कर दिया गया.


गरीबी व छुवाछूत के विरुद्ध संघर्ष[संपादित करें]

1945 में रिहा होने के बाद इन्होंने स्वंतंत्र आंदोलनों के साथ-साथ दलित उद्धार , छुआ-छूत उन्मूलन व डोला-पालकी जैसी पुरानी परम्पराओं को समाप्त करने के लिए भी व्यापक जन-जागरण के कार्यक्रम चलाये. छुआ-छूत को कप्तान नौटियाल पहले से ही नहीं मानते थे , इसका स्पष्ट उदाहरण उनके साथियों में सभी वर्गों के प्रतिनिधत्व की मौजूदगी से मिलता है.

उन्होंने व उनके साथियों ने कई बार स्थानीय हरिजनों के घरों शरण ली , भोजन किया व रास्ते में ही रात पड़ जाने पर इनकी छतों के नीचे ही रात बिताई . यधपि इनको जानने वाले इन्हें आदर से पंडित जी कह कर भी बुलाते थे , किन्तु ये कप्तान नौटियाल कहलाना अधिक पसंद करते थे .

1946 में राम प्रसाद जी व उनके साथियों द्वारा दुगड्डा में एक विशाल सम्मलेन आयोजित किया गया , जिसमे गोविन्द बल्लभ पन्त , नरदेव सिंह शास्त्री , बद्री दत्त पांडेय , काशीपुर नरेश कुंवर आनंद सिंह आदि प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की। इस मीटिंग में क्षेत्र में अकाल की स्थिति पर चिंता प्रकट की गयी, जमाखोरी पर लगाम लगाम के लिए प्रशासन के ईमानदार ऑफिसर्स के साथ मिलकर करीब 52 समूह खोले गए, इसके बाद राम प्रसाद नौटियाल व साथियों ने अंग्रेज समर्थक बनियों को खूब आड़े हाथों लिया उनके दिमाग को ठिकाने लगा कर स्थानीय छोटे व मंझोले व्यापारियों के लिए बाज़ार में प्रतिभागिता का रास्ता खोल दिया , जिससे तत्कालीन अकाल से त्रस्त जनता को कुछ राहत मिली.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद[संपादित करें]

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इन्होंने अपना संघर्ष जारी रक्खा व शीर्ष नेतृत्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उत्तराखंड के दुर्गम किन्तु सामरिक तौर से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम किया. गोविन्द बल्लभ पन्त इन्हें "लोहा" कहा करते थे जिससे समय आने पर हथौड़ा बनाया जा सकता है तो बन्दूक भी बनाई जा सकती है। Dr. हरदयाल पन्त जी ने इन्हें प्रान्तीस सेवा दाल का आर्गेनाइजर नियुक्त किया, जहाँ इनकी देख रेख में ३६ चौकियां, ४६० राइफल्स, ८ मशीनगन्स व ५०,००० कारतूस रहते थे. इसके बाद इन्हें मैकमोहन रेखा का निरीक्षण करने आये हुए दल का गाइड बनाकर चीन बॉर्डर पर भेज दिया गया, वहां से इनका दल १९ नवम्बर १९४९ को लौटा.तत्पश्चात इन्होंने कई महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों में अपना योगदान दिया, १९५० आते-आते राम प्रसाद जी ने मन बना लिया था कि अब वे अपने क्षेत्र की जनता के बीच रह कर ही कार्य करेंगे. १९५१ के असेंबली चुनाव में लैंसडौन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का विचार मन में आया व बात शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाई गयी.

गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने बात यह कह कर टाल दी कि वे सरकार के लिए कितने उपयोगी हैं ये वे नहीं जानते। राम प्रसाद जी अब निश्चय कर चुके थे, उन्होंने कांग्रेस मुखयालय में जाकर शीर्ष नेतृत्व के साथ अपॉइंटमेंट का फॉर्म भरा, एक महीने बाद वे नेहरू जी के पास पहुँच गए. कमरे में नेहरू जी , पटेल जीपन्त जी बैठे थे . नेहरू जी कप्तान साहब को जानते थे, बोले, "बताइये कप्तान नौटियाल, बोलिये!", राम प्रसाद जी ने स्पष्ट कहा, “मुझे टिकेट चाहिए”

नेहरू जी बोले , “पन्त जी नहीं मानते...... ”

मुलाकात समाप्त हुई , राम प्रसाद जी लौट गए ; बाद में पता चला कि टिकट दे दी गयी है. यह जिम्मेदारी भी नौटियाल जी ने बखूबी निभाई व लगातार दो बार भारतीय राष्टीय कांग्रेस के टिकट से लैंसडौन सीट से विधायक चुने गए.

लैंसडौन विधानसभा से विधायक के रूप में जनता की सेवा[संपादित करें]

लैंसडौन विधान सभा क्षेत्र से अपने दो कार्यकालों में कप्तान नौटियाल ने ‘सड़क मार्गों ’, ‘पेयजल योजनाओं ’ व ‘सहकारी वित्तीय संस्थाओं ’ को प्राथमिकता दी।गढ़वाल व कुमायूं को देश की मुख्यधारा से पूर्ण रूप से जोड़ने का महत्व व चीन बॉर्डर से जुड़ा हुआ क्षेत्र होने के कारण इसके रणनीतिक तौर से महत्वपूर्ण स्थान होने का आभास उन्हें पहले से ही था, अतः उनकी पहली प्राथमिकता एक व्यापक सड़क जाल बिछाने की थी. इनमे से प्रमुख हैं-

राम नगर - मरचूला - बीरोंखाल - थलीसैण मोटर मार्ग और डेरियाखाल - रिखणीखाल – बीरोंखाल मोटर मार्ग :-

राम नगर-बीरोंखाल मोटर मार्ग को उन्होंने जनता के सहयोग से व श्रम दान द्वारा पूरा करवाया। सड़क मार्ग तैयार होने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह थी की उनके पास कोई गाड़ियां यही थी , इसके लिए उन्होंने जगह-जगह जाकर बैठकें की, कोआपरेटिव सोसाइटीज़ का गठन करके जनता से शेयर्स के रूप में धन इकटठा करवाया व तब जाकर दो सेकंड हैण्ड बस ख़रीदी . आज उनके द्वारा स्वीकृत कराये गए सड़क मार्गों का बड़ा हिस्सा “राष्ट्रीय राज मार्गों ” से जुड़ा हुआ है.

1956 में इन्होंने ‘यूजर्स ट्रांसपोर्ट सोसाइटी लिमिटेड’ की नींव रखी व अपने दूसरे कार्यकाल के आरम्भ में ही इसकी स्थापना कर दी। कप्तान नौटियाल जब तक ‘यूजर्स ट्रांसपोर्ट’ के अध्यक्ष रहे तब तक कंपनी के पास 24 बसें हो गयी थी जिन्हें गढ़वाल व कुमाऊं के विभिन्न रुट्स पर चलाया जाता था.

पेयजल योजनाएं
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हिमालय के निचले क्षेत्रों में बसे गांवों में पीने के पानी की बड़ी भयंकर समस्या होती है, जल सम्पन्न प्रदेश होने के बाबजूद भी आज भी कई गांवों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है. राम प्रसाद जी ने इस समस्या को समझा व कई पेयजल योजनाएं मंजूर करवाईं. इनमे से एक महत्वपूर्ण व प्रसिद्द योजना ‘डालागांव पेयजल परियोजना’ के नाम से जानी जाती है. इस परियोजना के तहत एक ही बार में करीब एक दर्जन से भी ज्यादा गांवों को पीने का स्वच्छ पानी पाइप लाइन्स के जरिये पहुँचाया गया.

कोआपरेटिव बैंक्स की स्थापना
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राम प्रसाद जी न केवल एक निर्भीक क्रांतिकारी थे बल्कि एक दूरदर्शी नायक भी थे उन्होंने 1950 के दौर में ही ‘वित्तीय समावेश’ के महत्व को समझ लिया था, इसके लिए उन्होंने गढ़वाल व कुमाऊं में कई कोआपरेटिव बैंक्स खुलवाए. इनमे गढ़वाल क्षेत्र के लैंसडौन, बीरोंखाल व नौगांवखाल में स्थापित कोआपरेटिव बैंक्स प्रमुख है. कई कोआपरेटिव सोसाइटीज की स्थापना व इनके सुचारू संचालन के लिए इन्होंने जनता के बीच जाकर वित्तीय जागरूकता उत्पन्न की व छोटी-छोटी कीमत के शेयर्स चलाये, सबसे पहले खुद शेयर खरीदे व जनता को हिस्सेदार बनाकर क्षेत्र के वित्तीय सशक्तिकरण का दूरदर्शी कार्य करने का प्रयास किया.

देहत्याग[संपादित करें]

राम प्रसाद नौटियाल जनता के बीच में रहकर जनता के लिए कार्य करने वाले नायकों में से थे, जनता के लिए कार्य करने हेतु ही वह सरकार द्वारा दिए गए सुनहरे अवसरों को छोड़कर चुनावों में सम्मलित हुए व अपने दूरदर्शी नायक होने का परिचय सड़क मार्गों, पेयजल योजनाओं व वित्तीय संस्थाओं की स्थापना करवा कर दिया. इनके अंतिम दिन कोटद्वार में एकांत में बीते; कुछ समय के लिए बीमार रहने के पश्चात् लखनऊ में इन्होंने 24 Dec1980 को संसार का त्याग किया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

1.^ http://www.elections.in/uttar-pradesh/assembly-constituencies/#info_id12 http://www.elections.in/uttar-pradesh/assembly-constituencies/#info_id12 http://www.empoweringindia.org/new/constituency.aspx?eid=610&cid=31

इन्हें भी देखें[संपादित करें]