रामेश्वर दयाल दुबे

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रामेश्वर दयाल दुबे (२१ जून १९०८ - २४ जनवरी २०११) गांधीवादी चिन्तक, विचारक, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से आजीवन जुड़े हुए हिन्दी-सेवा के लिए समर्पित, समृद्ध बाल साहित्यकार थे।

जीवनी[संपादित करें]

२१ जून १९०८ को मैनपुरी (उ.प्र.) के हिन्दूपुर गांव में जन्मे श्री रामेश्वर दयाल दुबे हिन्दी में परास्नातक, उत्तमा (साहित्य रत्न) परीक्षा उत्तीर्ण कर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की प्रेरणा से १९३६ में वर्धा गये और वहां उन्होंने गांधी जी की अध्यक्षता में गठित हिन्दी प्रचार समिति से जुड़कर काका कालेलकर के संरक्षकत्व में पांच वर्ष तक कार्य किया। सन्‌ १९४२ में जब राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन हुआ तब उससे जुड़कर सहायक मन्त्री और परीक्षा मन्त्री के रूप में लगभग ४० वर्षों तक हिन्दीतर प्रदेशों में निरन्तर प्रवास करते हुए हिन्दी की अखण्ड सेवा की। हिन्दी की सेवा में अतुल्य योगदान के कारण श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी प्रेमचन्द, सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला", सुमित्रानंदन पन्त, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह "दिनकर" सहित देश के तत्कालीन अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से उनके निकट सम्बन्ध बने।

कृतियाँ[संपादित करें]

श्री दुबे ने सरल, बोधगम्य भाषाशैली में बाल साहित्य की रचना कर हिन्दी को राष्ट्रव्यापी एवं सर्वग्राह्य बनाने में विशेष योगदान दिया। बाल साहित्य में इनकी २० पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इसके साथ ही लगभग इतनी ही कविता, कहानी, एकांकी एवं नाटक की कृतियां भी प्रकाश में आयी हैं। उनका हिन्दी गीत "भारत जननी-एक हृदय हो, एक राष्ट्रभाषा हिन्दी में कोटि-कोटि जनता की जय हो", करोड़ों हिन्दी प्रेमियों का कण्ठहार बना। हिन्दी के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखने के लिए यह अकेला गीत ही पर्याप्त है। उनके द्वारा रचित साहित्य पर लखनऊ, आगरा, कोल्हापुर, मैसूर और हैदराबाद विश्वविद्यालयों ने शोध कार्य कराकर ऋषि-ऋण से उऋण होने की दिशा में भी प्रयास किया गया है।