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रामसनेही सम्प्रदाय

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PCWBS-Ramar Padam

रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्त्तक स्वामी रामचरण जी महाराज थे। उनका प्रादुर्भाव वि. स. १७७६ में हुआ। साधारण जन को लोकभाषा में धर्म के मर्म की बात समझाकर, एक सूत्र में पिरोने में इस संप्रदाय से जुड़े लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इन संतों ने हिंदू-मुसलमान, जैन- वैष्णव, द्विज- शूद्र, सगुण-निर्गुण, भक्ति व योग के द्वन्द्व को समाप्त कर एक ऐसे समन्वित सरल मानवीय धर्म की प्रतिष्ठापना की जो सबके लिए सुकर एवं ग्राह्य था। आगे चलकर मानवीय मूल्यों से सम्पन्न इसी धर्म को "रामस्नेही संप्रदाय' की संज्ञा से अभिहित किया गया।

स्वामी रामचरण जी महाराज[संपादित करें]

प्रात: स्मरणीय स्वामी श्री रामचरण जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1776 सन 1720 (24-फ़रवरी-1720) माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवार को बखतराम जी ग्राम बनवाड़ा में पूज्य शीला माता देऊजी की कोख से हुआ । दीक्षा के समय आपकी आयु 31 वर्ष 7 माह थी | ये विजयवर्गीय वैश्य थे। इनका बचपन का नाम रामकृष्ण था। जन्म के पश्चात हिन्दु परम्परा के अनुसार नामकरण के अवसर पर जन्म पत्रिका बनार्इ गर्इ तो ज्योतिषियों ने कहाकि यह बालक सम्राट या योगेश्वर होगा। बचपन में ये हंसमुख व आकर्षक थे। ये स्वस्थ शरीर व कुशाग्र बुद्धि के धनी थे । इनका विवाह चांदसेन ग्राम के सम्पन्न परिवार की कन्या से हुआ था। यह जयपुर राज्य में महत्वपूर्ण पद पर सेवारत थे। अपने कार्यो के प्रति हमेशा निष्ठावान रहे । उनकी न्यायपरकता और निष्पक्षता से सभी लोग प्रभावित थे। 31 वर्ष की आयु में आपकी भेंट एक ज्योतिषी से हुर्इ उसने आपको देखकर आश्चर्य प्रकट किया कि आपको सम्राट या योगेश्वर होना चाहिए। इस घटना से कुछ दिन पूर्व उनके पिता की मृत्यृ हुर्इ थी इससे वे व्यथित थे। उन पर ज्योतिषी की बात का विशेष प्रभाव हुआ। उसी समय से वे सांसारिक बातों से उदासीन होने लगे तथा सन्यास ग्रहण कर लिया। जिस दिन ज्योतिषी ने यह बात बतार्इ उसी रात्रि को उन्होंने स्वप्न मे देखा किवे ज्यों ही नदी में स्नान को उतरे उनका पैर फिसल गया और तेज धार में बहने लगे। उसी समय उक श्वेत वस्त्रधारी वृद्ध साधू ने उन्हें हाथ पकड़कर उस धार से बाहर निकाल लिया। इसी समय स्वप्न भंग हो गया। देखा तो वहां कुछ नहीं दिखा। इस घटना का उन पर गहरा प्रभाव हुआ। वे अपनी राजकीय सेवाऐ घर बार सब कुछ छोडऋकर स्वप्न का रहस्य जानने निकल पड़े। चलते – चलते ये शाहपुरा आये वहां पता चला कि उनके स्वप्न के अनुरूप् संत ग्राम दोतड़ा में निवास करते है। इस जानकारी से उन्हें अति आनन्द हुआ और वे संत दर्शन के लिए बेताब हो उठे और दोतड़ा की और चल दिये। उस समय दोतड़ा में स्वामी संतराम जी के शिष्य स्वामी कृपाराम जी निवास करते थे। स्वामी रामकृष्ण जी ने अपने आप को इनके चरणों में समर्पित कर दिया। इन्होंने अपने मन की सारी व्यथा उनके सामने रख दी। श्री कृपाराम जी ने योग्य जानकर अपने पास रहने की अनुमति प्रदान कर दी और बाद में अपना शिष्य बनाया। श्री कृपाराम जी ने उनकी हर तरह की परीक्षा के पश्चात विक्रम संवत 1808 भाद्रपद शुक्ल 7 गुरूवार को राममंत्र की दीक्षा देकर दीक्षित किया और उनका नाम रामकृष्ण से रामचरण रख दिया। उस समय इनकी आयु 31 वर्ष थी। दीक्षा प्रापित के बाद स्वामी रामचरण जी गुरू की आज्ञा से 7 वर्ष तक गुदड़वेश साधना करते रहे इसके पश्चात गलता मेले में गुरू आज्ञा से गुदड़वेश त्याग कर साधना में रत हुए। अस समय इनके मन में वृंदावन दर्शन की इच्छा थी। गुरू की आज्ञा प्राप्त कर वृन्दावन की और चले। रास्ते में अचानक उनको संत दर्शन हुद और उन्होने मंत्र जाप की आज्ञा दी और अन्र्तध्यान हो गये । इस घटना से रामचरण जी अचंभित हुए और वृन्दावन का विचार त्याग वापस जयपुर आकर साधना करने लगे वहां उनको गुरू कृपाराम जी के दर्शन हुए। उन्होने रास्ते की घटना अपने गुरू से निवेदन की। गुरूदेव कृपाराम जी ने उन्हें राम नाम की साधना का आर्शीवाद दिया। इसके पश्चात कुछ समय तक जयपुर में साधना की। दो वर्ष जयपुर में साधना के पश्चात भीलवाड़ा गये वहां मायानन्द जी की बावड़ी को अपना साधना स्थल बनाया। उस काल में राजस्थान में मूर्ति पूजा व बाá आडम्बर का जोर था इनकी निवृŸाि मार्ग की साधना से कर्इ लोग रूष्ट थे। एक रात्रि को श्री रामचरण जी को विष दिया गया किन्तु उन पर कोर्इ असर नहीं हुआ स्वामी जी ने भी व्रत ले लिया। विरोधियों ने एक भील को प्रलोभन देकर स्वामी को मरवाने का यत्न किया। भील तलवार लेकर जब साधना स्थल पर गया तो आसन पर स्वामी जी के दर्शन नहीं हुए वह भयभीत हो गया फिर उसे वहां अगिन पुंज के दर्शन हुए और उसमें स्वामी जी के दर्शन हुए। वह भयभीत होकर स्वामी जी के चरणों में गिर गया। स्वामी जी को साधना करते हुए भीलवाड़ा में कर्इ वर्ष हो गये। गृहस्थ शिष्य विरक्त होेने लगे। स्वामी जी के इस प्रयास को कर्इ लोग सहन नहीं कर पाये औद उनके प्राण लेने का यत्न करने लगे। कुछ लोगों ने उदयपुर महाराणा से यह शिकायत की कि स्वामी रामचरण जी धर्म को नष्ट कर रहे हैं। उदयपुर महाराणा ने जानकारी हेतु एक अधिकारी स्वामी जी के पास भेजा इससे उनका मन उद्विग्न हो गया और वे भीलवाड़ा छोड़कर कुहाड़ा चले गये।लोगो ने रोकने की बहुत कोशिश की किन्तु उन्होने समझाकर लोगों को वापस भेज दिया। कुहाड़ा आकर वे साधनारत हो गये। इधर लोगों ने उदयपुर महाराणा को वास्तविकता से अवगत करवाया। महाराणा ने पश्चाताप किया और संतो ंके सम्मान में 300 पगड़ी व शाल भेंट की। लोगों के आग्रह पर पुन: भीलवाड़ा पधारे वहां उन्होंने साधना कर शब्द योग का ज्ञान प्राप्त किया।इसी बीच शाहपुरा के राजा ने उन्हें शाहपुरा पधारने का आमंत्रध दिया। भीलवाड़ा में संवत 1817 में आपने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की। वहां रहते हुए उन्होंने अपनी वाणी की रचना की, अपने शिष्य रामचरण की इस साधना व सफलता से उनके गुरू कृपाराम जी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अणभै वाणी मंगवाकर स्वयं देखा उसे सुना और कहा कि यह संतोषी गृहस्थों का अमूल्य धन है। संवत 1826 में स्वामी जी शाहपुरा पधारे वहां के राजा व प्रजा ने आपका भव्य स्वागत किया। स्वामी जी नेे अपनी साधना स्थली वहां श्मशान को बनाया। वहीं रहकर साधना करने लगे राज्य की और से वहां एक छतरी का निर्माण कराया गया स्वामी जी हर एक मानव को एक समान मानते थे। वे राजा रंक में भेद नहीं करते थे। शाहपुरा में आपके शिष्यों की संख्या 225 हो गर्इ थी। इसके पश्चात स्वामी जी ने अपनी सम्पूर्ण जीवन साधना शाहपुरा में ही रहकर की। दीक्षा के बाद में, 12 वर्ष तक भकित साधना की चार चौकियां पार कर भीलवाड़ा में स्वामी जी की आध्यातिमक अनुभूतियां मुखरित हुर्इ तथा अनुभव वाणी खुली, आपके सैकड़ो भक्त व शिष्य बनने लगे। सन 1761 में राम स्नेही भक्तों ने विचार कर भीलवाड़ा में सरकार से 12 बीघा पक्की भूमि खरीदकर राम – द्वारा भवन निर्माण करवाया। स्वामी जी तब भीलवाड़ा में विराज रहे थे तब सभी भक्तों ने धर्म प्रचार के उíेश्य से एक प्रसिद्ध वार्षिक उत्सव फूल डोल, होली पर मनाने का विचार किया जो आज तक भी मनाया जाता है। स्वामी जी ने 78 वर्ष 2 माह 7 दिन की आयु में इहलीला का संवरण राम नाम अमृत का पान करते हुए बैसाख कृष्ण 5, गुरूवार, 5 अप्रैल 1788 में राम की आवाज करके ब्रáलीन हुए। लेकिन शरीर त्याग के पश्चात भी आपके होंठ हिलते रहे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि स्वामी जी महाराज राम नाम का स्मरण कर रहे हैं। राजस्थान वीरों की भूमि के साथ – साथ संतों की भूति भी रही है। इसी परम्परा में तत्कालिक परिसिथतियों के अनुकूल स्वामी रामचरण जी ने अपने आराध्य राम के नाम पर रामस्नही सम्प्रदाय की स्थापना की जो प्राणी मात्र से रमते राम सा स्नेह करते हैं। इसी भावना से ही उन्होंने सम्प्रदाय का नाम रामस्नेही रखा। उन्होंने अपने साधना अनुभवों का अमूल्य संकलन अणभै वाणी ग्रंथ में किया। जिसमें 36397 पद है। इस ग्रन्थ में दोहा, चन्द्रायण काव्य कवि, कण्डल्या राग रखता आदि है। इसमें 24 ग्रन्थों का संकलन है इसकी हस्तलिखित प्रति आज भी शाहपुरा धाम में सुरक्षित है। स्वामी रामचरण जी महाराज अपने काल के अद्वितीय संत हुए उन्होंने उस अराजक काल में एक नया संदेश देकर लोगो में उत्साह जागृत किया। जाति – पांति के भेद को मिटाकर सभी को राम मंत्र की दीक्षा दी।

स्वामी रामचरण जी महाराज ने ‘जिज्ञासबोध’ के चतुर्थ प्रकरण में ‘राम’ शब्द के दोनो वर्ण रा और म का रहस्य स्पष्ट करते हुए कहा कि जैसे सूर्य और चंद्र ब्रह्मांड के दो नेत्र हैं वैसे ही वेद के दो नेत्र रकार और मकार है इन दोनों नेत्रों से ही ज्ञान का प्रकाश मिलता है। इसके बिना क्रिया कर्म साधन श्रम सब अंधे हैं। इसलिए ‘निजबंदगी’ में लीन होकर ‘ब्रह्मशब्द’ इक ‘राम’ का उच्चारण करना चाहिए

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